पशुपालन

बकरियों के प्राकृतिक प्रजनन,चुनाव और आहार प्रबंधन

डाॅ.अभिषेक कुमार, डाॅ. ऋतु गुप्ता, डाॅ. निंगथाउ खोंग जम लिन्दा, डाॅ. चित्रलेखा देव, डाॅ.कमलेश कुमार चौधरी, डाॅ.तरूण साहु

बकरियों के प्रजनन के लिए उत्कृष्ट नर, निरोगी मादा एवं नियंत्रित प्रजनन महत्वपूर्ण होता हैं। साधारणतया बकरियों में वर्ष भर प्रजनन होता है। परन्तु बड़े फार्म पर यह प्रजनन नियंत्रित होना चाहिए।

बकरियों के प्रजनन हेतु लक्ष्य में रखने वाली बातें

  1. गर्मी एवं गर्भाधान के समय और तारीख की लिखकर जानकारी रखनी चाहिए।
  2. बड़ी उम्र की बकरियां गर्मी में कब आती हैं उनकी जानकारी रखनी चाहिए।
  3. बकरी गर्भित है या नहीं इसकी समय-समय पर जांच करनी चाहिए।
  4. गर्भावस्था में आने के एक माह पूर्व प्रत्येक बकरी को 100 ग्राम ज्यादा खुराक देना चाहिए।
  5. एक बकरे से 20-25 बकरियों का रेतन करवाना चाहिए।
  6. हर तीसरे वर्ष प्रजनन के लिए उपयोग किया हुआ बकरा बदलना चाहिए।

प्रजनन करने के लिए बकरियों का चुनाव
प्रजनन करने के लिए योग्य बकरियों का चुनाव करना अति आवश्यक है। क्योंकि बाद में यही बकरियां फार्म के लिए उत्तम नस्ल की बकरियां पैदा करती है इसलिए किसी भी फार्म पर प्रजनन के लिए बकरियों का चुनाव महत्वपूर्ण है। बकरी अच्छी तो उनकी संतान अच्छी ।

  1. बकरियां निरोगी हो और उनमें कोई भी शारीरिक खोट न हो।
  2. उनकी चमड़ी अच्छी होनी चाहिए।
  3. ऐसी बकरियों जिनका वजन जन्म के समय अच्छा होता है एवं जिनकी बाद में बाढ़ अच्छी होती है।
  4. जिनकी मां अच्छा दूध देती थी एवं वे बकरियां जो एक बार में 2 से 3 बच्चे जनती हैं ऐसी बकरियां चुनना चाहिए।
  5. एक से दो वर्ष के नर प्रजनन के लिए उपयोग करना चाहिए।
गाभिन बकरियों का विशेष रख-रखाव
गाभिन बकरियों की विशेष देखभाल करने के लिए निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना चाहिए-
  1. चार माह की गाभिन बकरियों को एक ही बाड़े में रखना चाहिए।
  2. जमीन पर घास का बिछौना तैयार करना चाहिए।
  3. प्रतिदिन 250-300 ग्राम दाना / सांद्र मिश्रण (Concentrate Mixture)देना चाहिए।
  4. बाहर चारागाह में रहने का समय धीरे-धीरे कम करके 2-3 घण्टे कर देना चाहिए।
  5. उत्तम प्रकार की हरी घास उपलब्ध करवाना चाहिए।
  6. साधारणतयाः जनन के एक हफ्ते पहले बाहर चराने के लिए भेजना बंद कर देना चाहिए।
  7. स्वच्छ पानी हमेशा उपलब्ध होना चाहिए।

जनन
बकरियों के जनन के समय बाड़े की व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है, इस कोठे को कीटाणुरहित करना आवश्यक है, अन्यथा नवजात शिशुओं में रोग की आशंका बनी रहती है। जल्दी ही जनने वाली बकरियों की विशेष व्यवस्था करनी चाहिए। मादा के पिछले हिस्से के बाल निकाल देना चाहिए एवं उस जगह स्वच्छ रखना चाहिए।

थोडे ही समय पर जनने वाली बकरियां निम्न प्रकार पहचानी जा सकती हैः
  • बकरी चारा खाना बन्द करेगी।
  • योनि द्वार बड़ा हो जाता है।
  • श्वास-दर तेज हो जाती है।
  • बाह्य योनि मार्ग फूलता है।
  • सफेद स्त्राव शुरू होता है।
जनन क्रिया
  1. साधारणतया नैसर्गिक रीति से जनन में कोई अड़चन उत्पन्न नहीं होती।
  2. कुछ समय पश्चात् बच्चे के आगे दो पैर दिखने लगते है। बच्चे का सिर इस पैर पर ही टिका होता है।
  3. सर्वप्रथम पानी की थैली योनि द्वार के बाहर आकर लटकती है।
  4. इसके कुछ समय बाद बच्चे का जन्म होता है।
  5. बच्चों का नैसर्गिक जन्म 15-30 मिनट में हो जाता है।
  6. बकरी जनने में कुछ अड़चन उत्पन्न होने पर या बच्चे के जन्म होने के बाद 6-8 घण्टे में जेर (प्लेसेण्टा) नहीं गिरा तो पशु चिकित्सक की मदद लेनी चाहिए।
बकरी के नवजात बच्चों का पालन-पोषण
  1. बच्चे का जन्म होते ही नाल बांधना चाहिए। फिर काटकर टिंचर आयोडीन की दो बूंद उस जख्म पर लगायें।
  2. नवजात बच्चे का मुंह व नाक के पतले आवरण (म्युकस मेंम्ब्रेन) को एक स्वच्छ कपड़े से साफ करना चाहिए।
  3. बकरी की योनि कुनकुने पानी में थोड़ा डेटाल डालकर धोना चाहिए।
  4. बच्चे के जन्म होने के बाद 15-30 मिनट में ही उसे बकरी का प्रथम दूध पिलाना चाहिए। जन्म के समय बच्चे का जो वजन होगा उसका 1/10 भाग दूध पिलाना चाहिए एवं बाद में दिन में 3 बार मां का दूध पिलाना चाहिए।
  5. बच्चे को बकरी से 3-4 दिनों में थोड़ा दूर करना चाहिए।
  6. बकरी का ज्यादा दूध बच्चे को पिलाने से पहले निकाल लेना चाहिए।
  7. बच्चों को दूध देने वाली मां का दूध हमेशा व समय पर मिले इसका ध्यान रखना चाहिए।
  8. साफ पानी कोठे में पीने के लिए हमेशा उपलब्ध रखना चाहिए।
  9. नवजात बच्चों की उम्र 3-4 हफ्तों की होते तक बाह्य वातावरण में बदलाव नहीं होना चाहिए।
  10. बच्चों की आयु 3 माह होने पर उन्हें कृमिनाशक दवाई पहली बार देना चाहिए।
  11. आवश्यकतानुसार बाह्य कीटाणुनाशक का प्रयोग करने के लिए भी योजना बनानी चाहिए।
  12. इन्टेरोटाक्सोमिया वेक्सीन लगाकर 14 दिनों में एक और डोज देना चाहिए।
  13. बीमार बच्चों को स्वस्थ बच्चों से दूर हटाकर तुरन्त पशु चिकित्सक की मदद लेना चाहिए।
तीन माह व उसके ऊपर की उम्र के बच्चों का रख-रखाव

  1. मादा के पास से बच्चे 2 माह में अलग करना चाहिए।
  2. मादा के पास से बच्चे को अलग करने की प्रकिया धीरे-धीरे होनी चाहिए ताकि उन्हें इसकी धीरे-धीरे आदत पड़े।
  3. हर 15 दिनों में बच्चे का वजन लेना चाहिए।
  4. बच्चे का वजन कैसे बढ़ रहा है इस पर ध्यान देना चाहिए।
  5. बच्चे को रोग से बचाव के लिए टीकाकरण करना चाहिए।
बकरियों के विभिन्न जीवन काल हेतु संतुलित आहार/ सांद्र मिश्रण (Concentrate Mixture)
रखरखाव एवं विकास हेतु दुधारू पशु एवं प्रजनन हेतु
मक्का खली /ज्वार चुनी: 45% मक्का खली /ज्वार चुनी: 35%
गेहु की भूसी:35% गेहु की भूसी:25%
सोयाबीन/मूंगफली खली:16 % सोयाबीन/मूंगफली खली:35%
मिनरल मिक्चर:3% मिनरल मिक्चर:4%
साधारण नमक:1% साधारण नमक:1%
उपरोक्त सांद्र मिश्रण को निम्नानुसार संतुलित आहार के रूप में विभिन्न वर्गों को खिलाया जा सकता हैं-
  • बकरी के बच्चे (2 से 4 माह तक)-50-100 ग्राम प्रतिदिन।
  • बड़ी बकरियों सूखी/गर्भवती-300 ग्राम प्रतिदिन ।
  • दुधारू बकरियों को अतिरिक्त आहार-350 ग्राम प्रतिदिन।
  • प्रजनन हेतु रखे गए बकरे -450 ग्राम प्रतिदिन

लेखक:
डाॅ.अभिषेक कुमार (पशु चिकित्सक),डाॅ.ऋतु गुप्ता (सहायक प्राध्यापक), डाॅ.निंगथाउ खोंग जम लिन्दा (सहायक प्राध्यापक), ), डाॅ.चित्रलेखा देव (पशु चिकित्सक), डाॅ.कमलेश कुमार चौधरी (पशु चिकित्सक), डाॅ.तरूण साहु (पशु चिकित्सक)

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