पशुपालन

समेकित कृषि प्रणाली में पशुपालन की भूमिका : किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम

डॉ. उपासना वर्मा,  डॉ. चित्रलेखा देव, डॉ. स्मृति श्रवण, डॉ. तरुण साहू

प्रस्तावना : भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ अधिकांश ग्रामीण परिवार कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर हैं। बढ़ती जनसंख्या, सीमित भूमि संसाधन, जलवायु परिवर्तन तथा खेती की बढ़ती लागत के कारण केवल फसल उत्पादन पर आधारित कृषि आज किसानों की आवश्यकताओं को पूर्ण रूप से पूरा नहीं कर पा रही है। ऐसी स्थिति में समेकित कृषि प्रणाली (Integrated Farming System – IFS) किसानों के लिए एक व्यवहारिक एवं टिकाऊ समाधान के रूप में उभरकर सामने आई है।

समेकित कृषि प्रणाली एक ऐसी पद्धति है जिसमें फसल उत्पादन, पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी, कुक्कुट पालन, बकरी पालन, मशरूम उत्पादन तथा अन्य कृषि आधारित गतिविधियों को एक-दूसरे से जोड़कर संचालित किया जाता है। इस प्रणाली में पशुपालन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह पूरे कृषि तंत्र का आधार बनता है।

समेकित कृषि प्रणाली क्या है?

समेकित कृषि प्रणाली वह कृषि मॉडल है जिसमें विभिन्न कृषि उद्यमों को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि एक इकाई का अपशिष्ट दूसरी इकाई के लिए संसाधन बन जाए। इससे संसाधनों का अधिकतम उपयोग होता है, उत्पादन लागत कम होती है तथा किसानों की आय में वृद्धि होती है।

उदाहरण के लिए:

  • खेतों में उगाई गई फसलों का अवशेष पशुओं के चारे के रूप में उपयोग किया जाता है।
  • पशुओं से प्राप्त गोबर एवं मूत्र का उपयोग जैविक खाद एवं बायोगैस उत्पादन में किया जाता है।
  • जैविक खाद का उपयोग फसलों की उर्वरता बढ़ाने में किया जाता है।
  • कृषि एवं पशुपालन से प्राप्त अवशेषों का उपयोग मत्स्य पालन एवं मशरूम उत्पादन में किया जा सकता है।

समेकित कृषि प्रणाली में पशुपालन का महत्व

पशुपालन समेकित कृषि प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। यह किसानों को नियमित आय प्रदान करता है तथा कृषि जोखिमों को कम करता है।

  1. नियमित नकद आय का स्रोत : फसलों से आय वर्ष में केवल एक या दो बार प्राप्त होती है, जबकि दूध, अंडा, मांस एवं अन्य पशु उत्पादों की बिक्री से प्रतिदिन अथवा साप्ताहिक आय प्राप्त होती रहती है। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
  1. पोषण सुरक्षा : दूध, अंडे एवं मांस प्रोटीन, विटामिन तथा खनिजों के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। पशुपालन परिवार के पोषण स्तर को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  1. जैविक खेती को बढ़ावा : पशुओं से प्राप्त गोबर एवं मूत्र उत्कृष्ट जैविक खाद के स्रोत हैं। इनके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है तथा भूमि की उर्वरता बनी रहती है।
  1. रोजगार सृजन : पशुपालन ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं एवं युवाओं के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करता है। डेयरी, बकरी पालन, कुक्कुट पालन एवं सूकर पालन जैसी गतिविधियाँ वर्षभर रोजगार उपलब्ध कराती हैं।
  1. जोखिम प्रबंधन : यदि किसी कारणवश फसल उत्पादन प्रभावित हो जाता है तो पशुपालन किसानों के लिए वैकल्पिक आय का स्रोत बनता है। इससे कृषि व्यवसाय अधिक सुरक्षित एवं स्थिर बनता है।

समेकित कृषि प्रणाली में पशुपालन के प्रमुख घटक

डेयरी पशुपालन : गाय एवं भैंस पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। दुग्ध उत्पादन से प्रतिदिन आय प्राप्त होती है तथा गोबर से जैविक खाद एवं बायोगैस का उत्पादन किया जा सकता है।

बकरी पालन : बकरी को “गरीब व्यक्ति की गाय” कहा जाता है। कम निवेश में अधिक लाभ प्राप्त होने के कारण छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए यह अत्यंत उपयोगी व्यवसाय है।

कुक्कुट पालन : मुर्गी पालन से अंडा एवं मांस उत्पादन के माध्यम से अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। यह कम भूमि एवं सीमित संसाधनों में भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

सूकर पालन : पूर्वी एवं मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में सूकर पालन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इसकी उत्पादन क्षमता एवं लाभप्रदता अपेक्षाकृत अधिक होती है।

बतख एवं अन्य लघु पशुपालन : बतख पालन, खरगोश पालन एवं बटेर पालन जैसी गतिविधियाँ भी समेकित कृषि प्रणाली में शामिल की जा सकती हैं।

पशुपालन आधारित समेकित कृषि मॉडल

मॉडल 1 : फसल + डेयरी

  • धान, गेहूँ, मक्का जैसी फसलें
  • 2–5 दुग्ध पशु
  • गोबर से जैविक खाद
  • खेतों में खाद का उपयोग

मॉडल 2 : फसल + डेयरी + कुक्कुट

  • फसल उत्पादन
  • दूध उत्पादन
  • अंडा एवं मांस उत्पादन
  • अतिरिक्त रोजगार एवं आय

मॉडल 3 : फसल + डेयरी + बकरी पालन + बागवानी

  • बहुआयामी आय स्रोत
  • भूमि एवं श्रम का बेहतर उपयोग
  • जोखिम में कमी

पर्यावरण संरक्षण में योगदान

समेकित कृषि प्रणाली प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

  • मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि
  • जैव विविधता का संरक्षण
  • रासायनिक उर्वरकों का कम उपयोग
  • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी
  • जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन

किसानों के लिए लाभ

  1. प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक उत्पादन।
  2. वर्षभर आय की उपलब्धता।
  3. कृषि जोखिमों में कमी।
  4. परिवार को पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता।
  5. रोजगार के अवसरों में वृद्धि।
  6. कृषि लागत में कमी।
  7. पर्यावरणीय स्थिरता।

चुनौतियाँ

यद्यपि समेकित कृषि प्रणाली अत्यंत लाभकारी है, फिर भी कुछ चुनौतियाँ मौजूद हैं:

  • गुणवत्तापूर्ण पशु नस्लों की कमी
  • पशु रोगों का प्रकोप
  • तकनीकी ज्ञान का अभाव
  • बाजार तक सीमित पहुँच
  • प्रारंभिक निवेश की आवश्यकता

इन चुनौतियों का समाधान प्रशिक्षण, पशु स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी योजनाओं एवं वैज्ञानिक मार्गदर्शन के माध्यम से किया जा सकता है।

निष्कर्ष : समेकित कृषि प्रणाली ग्रामीण विकास एवं कृषि स्थिरता का एक प्रभावी मॉडल है। इसमें पशुपालन की भूमिका केंद्रीय एवं बहुआयामी है। पशुधन किसानों को नियमित आय, पोषण सुरक्षा, जैविक खाद तथा रोजगार प्रदान करता है। वर्तमान परिस्थितियों में छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए पशुपालन आधारित समेकित कृषि प्रणाली आय दोगुनी करने, संसाधनों के संरक्षण तथा टिकाऊ कृषि विकास का सशक्त माध्यम बन सकती है। इसलिए कृषि एवं पशुपालन को एकीकृत करके वैज्ञानिक तरीके से अपनाना समय की आवश्यकता है।

प्रेषक :
डॉ उपासना वर्मा,  डॉ. चित्रलेखा देव, डॉ. स्मृति श्रवण, डॉ. तरुण साहू
पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञ पशुधन विकास विभाग छत्तीसगढ़

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Related Articles

Back to top button