पशुपालन

बकरियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले मुख्य कृमि रोग एवं उनके बचाव के उपाय

डॉ. के.आर. बघेल, डॉ. सविता बिसेन, डॉ. डी. के. जोल्हे, डॉ. जागृति कृषाण एवं डॉ. आर. सी. रामटेके

प्रस्तावना : बकरियॉ विभिन्न प्रकार के क्रृमि रोगों से ग्रसित होते है। मुख्य रूप से क्रृमियॉ तीन प्रकार की होती है जैसे- प्लूक्स, फीताकृमि और गोल कृमियॉ । ये कृमियॉ पशु शरीर के पाचन तंत्र से सम्बन्घित आंतरिक अंगों एवं ऑत मे पाये जाते है और सामान्य पाचन क्रिया को प्रभावित करते है, जिससे बकरियॉ शारीरिक रूप से कमजोर हो जाती है और मृत्यु भी हो जाती है।

प्लूक्स –
प्लूक्स पत्ते के आकार के चपटे होते हैं, अग्र भाग चौडा और पश्च भाग नुकीला होता है। प्लूक्स मे निचले एक तिहाई शरीर के अग्र भाग मे गोलाकार सकर होता है, जो पशुओं के शरीर मे चिपकने मे मदद करता है। प्लूक्स मवेशियों के कलेजा, पितवाहिनी, रूमेन के साथ-साथ नाक एवं ऑत के रक्त-वाहिनियों मे पाये जाते है। इनका जीवन चक्र दो या तीन जीवों मे पूर्ण होता है। तालाव, पोखरों, जलाशयों मे पाये जाने वाले घोंघे मध्यस्थ मेजबान का काम करते है, जिसमे प्लूक्स के अवयस्क अवस्था विकसित होते है। घोंघे से अवयस्क अवस्था वातावरण मे हरे चारे को संक्रमित कर देते है। हरे चारे के संक्रमण से बकरियों मे प्लूक्स का संक्रमण हो जाता है। बकरियों मे मुख्य रूप से फेसियोला एवं एम्पिस्टोम्स का प्रकोप ज्यादा होता है।

1. फेसियोलोसिस – फेसियोलासिस बकरियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण प्लूक्स कृमि रोग है। यह बीमारी पशुओं मे फेसियोला हिपेटिका नामक प्लूक्स से होता है जिसे मुख्यतः लीवर प्लूक के नाम से जाना जाता है। मेटासरकेरिया नामक अवयस्क अवस्था घोंघे से निकलकर घास मे चिपक जाता है। संक्रमित चारे के साथ मेटासरकेरिया के सेवन से पशुओं मे फेसियोलासिस का संक्रमण हो जाता है। मेटासरकेरिया अवस्था बकरियों के छोटे ऑत मे सिष्ट से बाहर आकर 2 महीने तक अवयस्क प्लूक्स लीवर मे विचरण करता है और घाव बना देता है। संक्रमण क्रमण के 3 महीने मे वयस्क फेसियोला पित्त वाहिनी को प्रभावित करती है। वयस्क परजीवी अण्डे देती है जो कि गोबर के माध्यम से बाहर आकर चारागाह से होते हुए जलाशय मे आता है और लार्वा घोंघें मे प्रवेश कर जाता है, जिससे संक्रमित अवस्था निकलकर हरे चारे मे एनसिष्ट हो जाता है। इसका प्रकोप पशुओं मे नवंबर से जनवरी महीने के बीच ज्यादा देखने को मिलता है।

लक्षण
बकरियों मे फेसियोलोसिस बीमारी की तीव्रता संक्रमित चारे के साथ ग्रहण किये गये प्लूक्स की संख्या पर निर्भर करता है और ग्रसित पशुएं भी लछण उसी आधार पर प्रदर्शित करती है।
1. तीव्र संक्रमण – इसमे बकरियॉ जब गर्मी के समय जलाशय के आस-पास के संक्रमित चारे के साथ अत्यधिक मात्रा मे प्लूक्स के सेवन से होता है। इस अवस्था मे बिना लक्षण के बकरियॉ झुण्ड मे मृत्यु हो जाती है।
2. दीर्घ कालिक संक्रमण – इस अवस्था मे प्लूक्स का संक्रमण संक्रमित चारे के साथ कम मात्रा मे होता है, ग्रसित बकरियॉ कमजोर एवं एनीमिक हो जाती है। ग्रसित बकरियों मे प्रोटीन की कमी एवं जबडे के नीचे पानी जमा हो जाता है।

निदान –
1. शव परीक्षण द्वारा – अचानक मृत्यु की स्थिति मे शव परीक्षण कर कलेजा एवं पित्तवाहिनी मे प्लूक्स की उपस्थिति से पता लगाया जा सकता है।
2. गेाबर के परीक्षण द्वारा – संक्रमित पशु के गोबर मे फेसियोला के अण्डे की उपस्थिति से – फेसियोला के अण्डे गोलाकार एवं पीले रंग के होते है।

उपचार –
ट्राइक्लाबेन्डाजाल (फेसिनेक्सद) – 12 मि ग्रा प्रति किलो वजन के हिसाब से
विक्लोबेन्ड (ट्राइक्ला +आइवरमेक्टिन सस्पेंसन) – 1 मि ली प्रति 5 किलो वजन

2. एम्फिस्टोमोसिस –
ये प्लूक्स मस्कुलर एवं शंक के आकर के होते है। देखने मे गुलाबी रंग के होते है और उबले हुए चावल से बनाए गए अन्न – मुररा के आकार के दिखते है। एम्पिस्टोम्स प्लूक्स बकरियों के रूमेन मे पाये जाते है, इसलिए इन्हे रूमिनल प्लूक्स भी कहा जाता है। लीवर प्लूक्स की तरह इनके अवयस्क अवस्थाओं का विकास भी घोंघें मे होता है, परन्तु ये घोंघें,चक्री के आकार के होते हें। बकरियों मे स्ंाक्रमण- संक्रमित चारे के साथ एम्पिस्टोम्स के मेटासरकेरिया अवस्था के सेवन से होता है। अवयस्क अवस्था पशुओं के ऑत मे पाया जाता है और वयस्क अवस्था रूमेन मे पाया जाता है । इस बीमारी का प्रकोप भेड-बकरियों मे गर्मी के मौसम मे ज्यादा होता है। अवयस्क एम्पीस्टोम छोटी ऑत के डयूडीनम मे पाये जाते है और वयस्क की अपेक्षा ज्यादा रोगजनक होते है।

लछण-
1. संक्रमित बकरियॉ कमजोर, दुबले एवं पतले हो जाते है।
2. ग्रसित बकरियों के जबडे के नीचे पानी जमा हो जाता है।
3. छोटी ऑत के डयूडीनम मे संक्रमण के कारण पशु पेट दर्द से ग्रसित होता है और बदबूदार पतला दस्त करता है, जिसमे अवयस्क एम्पीस्टोम भी बाहर आते है।
4. पतला दस्त के कारण ग्रसित पशु बार-बार पानी पीता है।

निदान-
गेाबर परीक्षण द्वारा -एम्पीस्टोम के अण्डे अण्डाकार पारदर्शी होते हैै।
उपचार – आक्सीक्लोजानाइड – 18.7 मिली ग्राम पति किलो वजन 72 घटों मे दो बार

बकरियों मे फीताकृमि –
फीताकृमि चपटे एवं पतले फीते के समान लम्बे होते है। इनकी लम्बाई मे 20-25 मीटर तक लम्बे होते है और खण्डांे मे विभाजित होता है। इनके शरीर मे पाचन तंत्र नही होता है, अतः भोज्य पदार्थ अपने त्वचा के सतह से अवशोषण प्रक्रिया द्वारा ग्रहण करता है। जीवन चक्र दो जीवों मे पूर्ण होता है- कुत्तांे मे पाये जाने वाले फीताकृमियों के लिए बकरियॉ मध्यस्थ मेजबान का काम करती है। याने कि वयस्क फीताकृमि कुत्तों मे विकसित होता है और उसके अवयस्क लार्वा अवस्था बकरियों मे विकसित होते है, जैसे – टीनिया मल्टीसेप्स। बकरियों मे पाये जाने वाले वयस्क फीताकृमियों के लिए कीडे-मकोडे मध्यस्थ मेजबान का काम करते है, जैसे – मोनेजिया। बकरियों मे अवयस्क लार्वा अवस्था मस्तिष्क, मेरूदण्ड, कलेजा एवं पेरिटोनियम मे विकसित होते हेै। बकरियों के मस्तिष्क, मेरूदण्ड मे विकसित होने वाले फीताकृमि के अवयस्क अवस्था ज्यादा घातक बीमारी उत्पन्न करते है।

1. गिड (सिन्युरोसिस)
यह बीमारी भेड, बकरियों मे श्वान फीताकृमि टीनिया मल्टीसेप्स के अवयस्क अवस्था सिन्युरस सेरेब्रेलिस सिस्ट के द्वारा होता है। फीताकृमि के अण्डे कुत्तों के मल के माध्यम से वातावरण मे आते है और चारागह को दूषित कर देते है, इन दूषित चारा एवं पानी के सेवन से भेड, बकरियों मे संक्रमण होता है। बकरियों के ऑत से फीताकृमि के अण्डे रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों जैसे – मस्तिष्क एवं मेरूदण्ड मे अवयस्क अवस्था विकसित होता है। कुत्तों मे संक्रमण इस परजीवी के अवयस्क अवस्था से संक्रमित भेड एवं बकरियॉ के मॉस के सेवन से होता है और भेड एवं बकरियॉ मे इस परजीवी के अण्डे से संक्रमित चारे के सेवन से होता है। भेड एवं बकरियों मे सिस्ट 8-10 महीने मे संक्रमण के उपरांत पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है। सिस्ट तरल पदार्थ युक्त 5 से मी व्यास का सफेद गोलाकार पारदर्शी गांठ होता है, जिसके दीवार के अंदर की तरफ असंख्य स्कोलक्स चिपके होते है। जो भक्षण उपरांत श्वान के छोटी ऑत मे वयस्क फीताकृमि ;टीनिया मल्टीसेप्सद्ध के रूप मे विकसित होते हैं। गिड से ग्रसित भेड एवं बकरियॉ विकसित हुए सिस्ट से प्रभावित केंद्रिय तंत्रिका तंत्र के आधार पर लक्षण प्रदर्शित करती है।

लक्षण-
1. सामान्य लक्षणों मे सामान्य से अधिक शारीरिक तापमान, तीव्र श्वॉस दर एवं हृदय गति एवं बाहय उत्तेजक के प्रति अत्यधिक संवेदनशील।
2. यदि सिस्ट मस्तिष्क के अग्र भाग मे होता है तो सिर को छाती की तरफ झुका कर तब तक चलता है, जब तक किसी कठोर वस्तु से टकरा न जाए और कुछ देर तक वहीं स्थिर रहता है।
3. यदि यह सिस्ट मस्तिष्क ;सिरद्ध के बांए या दाएं ओर मौजूद होती है तो ग्रसित पशु सिर को बांए या दाएं ओर झुकाकर गोल-गोल घुमता है।
4. यदि मस्तिष्क के सेरेबेलम का भाग सिस्ट से प्रभावित होता है तो पशु अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है और लडकडाकर चलता है।
5. यदि सिस्ट मेरूदण्ड मे विकसित होता है तो पिछले भाग एवं पैरों मे निरंतर पक्षाघात की शिकायत।
6. ग्रसित पशु धीरे-धीरे चारा चरने मे अरूचि दिखाता है जिससे कमजोर होता जाता है और अंततः पशु की मृत्यु हो जाती है।

निदान –
1. बीमारी के लक्षण द्वारा जैसे गोल-गोल घुमना, अंधापन, शरीर के पिछले भाग मे पछागात
2. प्रभावित भाग का एक्स-रे द्वारा
3. मल जॉच कर – कुत्तो के मल मे टीनिया के अण्डे की जॉच कर संक्रमण का पता लगाया जा सकता है।

उपचार-
1. बकरियों मे- उत्तम उपचार शल्य चिकित्सा द्वारा सिस्ट को बाहर निकालना।
2. कृमिनाशक दवापान द्वारा- प्राजीक्वेटल – 5 मि ग्रा प्रति किलो, एल्बेन्डाजाल- 15 मि ग्रा प्रति किलो

श्वान मे कृमिनाशक दवापान –
1. एरिकोलिन हाइड्रोबोमाइड- 1-2 मि ग्रा प्रति किलो
2. एरिकोलिन एसिटारसल-5 मि ग्रा प्रति किलो

गोल कृमि
ये कृमियॉ आकार मे गोलाकार होते है, इसलिए इन्हे गोल कृमि कहते है। ये लम्बाई मे 25-30 सेंटी मीटर तक लम्बे होते है और दोनो छोर नुकीले होते है। गोल कृमियॉ मुख्यतः छोटी एवं बडी ऑत मे पाये जाते है। जीवन चक्र एक ही पशु मे पूर्ण होता है। वर्षा ऋ्तु मे इन परजीवियों का प्रकोप ज्यादा देखने को मिलता है। बकरियों के छोटी एवं बडी ऑत मे बहुत सारे गोल कृमियों का प्रकोप होता है परन्तु आर्थिक दृष्टि से बकरियों के स्वास्थ्य को अत्यधिक रूप से प्रभावित करने वाला गोल कृमि हिमोंकस कन्टारटस है, जो कि अमाशय मे पाया जाता है।

हिमोंकोसिस –
यह गोल कृमि आर्थिक दृष्टि से बकरी व्यवसाय से जुडे किसानों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। ग्रसित बकरियों मे मौजूद वयस्क परजीवी अण्डे देते है और बारिश के समय वातावरण मे नमी होने के कारण अण्डे से लार्वा का विकास होता है और चारागह को संक्रमित कर देते है। इसका संक्रमण बकरियों मे वर्षा ़ऋृतु मे संक्रमित चारे के साथ परजीवी के सेवन से होता है। 14 से 21 दिन मे एबोमेसम मे परजीवी वयस्क होकर रक्त का सेवन करता है। अत्यधिक संक्रमण की स्थिति मे भेड-बकरियॉ झुण्ड के झुण्ड मे खत्म हो जाती है।

रोग एवं लक्षण –
रोग की तीव्रता बकरी द्वारा संक्रमित परजीवियों की संख्या पर निर्भर करता है – अति तीव्र, तीव्र एवं दीर्घकालिक रोगजनक अनुसार ग्रसित पशुएं प्रदर्शित करती है-
1. अति तीव्र – बकरियॉ जब संक्रमित चारे के साथ अत्यधिक मात्रा मे परजीवी के लार्वा के सेवन (30000) इस अवस्था का संक्रमण होता है। इस अवस्था मे सेवन किये गये लार्वा एक साथ वयस्क होकर अमाशय मे रक्त सेवन करते है। एक वयस्क हिमोंकस प्रतिदिन 0.05 मि ली तक रक्त सेवन करता है, साथ ही रक्त सेवन के दौरान जगह बदलने से अत्यध्कि रक्त स्त्राव होता है, जिससे बकरियॉ सॉक के कारण अचानक मृत्यु हो जाती है। रक्त स्त्राव के कारण गोबर काला पड जाता है। अति-तीव्र हिमोंकोसिस मे बकरियॉ की झुण्ड मे मृत्यु हो जाती है।

2. तीव्र हिमोंकोसिस – इस अवस्था मे बकरियॉ 1000-20000 कृृमियों के सेवन से होता है। ग्रसित बकरियॉ खून की कमी के कारण एनिमिया के शिकार, हो जाते है। रक्त स्त्राव होने से बकरियों मे प्रोटीन की कमी हो जाती है और, गोबर काला पड जाता है। जबडे के नीचे पानी जमा हो जाता है और कमजोर होकर मृत्यु हो जाता है।

3, दीर्घ कालिक- इस अवस्था मे बकरियॉ 1000 से कम कृमियों से संक्रमित होती है। बकरियों के स्वास्थ्य पर कृमियों का असर कम दिखता है, परन्तु बकरियॉ धीरे-धीरे कमजोर हो जाती है। चारा कम खाने की वजह से वजन कम होता जाता है और जबडे के नीचे पानी जमा हो जाता है।

निदान –

  • गोबर की जॉच द्वारा- अधिक संख्या मे परजीवी के अण्डे की उपस्थिति
  • फामाचा चार्ट द्वारा – यह चार्ट एनिमिया जॉच के लिए विकसित किया गया है। इस विधि मे ऑख के निचले स्तर के म्यूक्स मेम्बरेन के रंग के आधार पर स्वस्थ एवं बीमार बकरी का परीक्षण कर उपचार किया जाता है।
बीमारी का स्तर ऑख के म्यूकस मेमबरेन का रंग उपचार हेतु सलाह
1 लाल नही
2 लाल- गुलाबी नही
3 गुलाबी नही
4 गुलाबी -सफेद कृमि दवा देना चाहिए
5 सफेद कृमि दवा देना चाहिए

उपचार-
बकरियों मे कृमि नाशक दवापान हेतु निम्न सावधानी बरतनी चाहिए –

  • पहली खुराक 3 महीने के उम्र मे देना चाहिए
  • कृमिनाशक दवापान वर्ष मे दो बार जुलाई और अक्टूबर महीने मे देना चाहिए
  • ग्रीष्म ऋृतु मे दवापान नही कराना चाहिए
  • हमेशा टेबलेटस कृमिनाशक का इस्तेमाल करें
  • दवापान के 24 घंटे पहले बकरियों को चारा न देवें (खाली पेट)
  • हमेशा शरीर के वजन के हिसाब से कृमिनाशक का दवापान करें
  • एल्बेन्डाजाल – 5-7.5 मि ग्रा, फेन्बेन्डाजाल, फेबेन्टल, – 5-7.5 मि ग्रा, लिवामिजाल- 7.5 मि.ग्रा. आइवरमेक्टिन- 0.2 मि.ग्रा. चमडी मे, क्लोजेन्टल – 10 मि.ग्रा.

लेखक:
डॉ. के.आर. बघेल, डॉ. सविता बिसेन, डॉ. डी. के. जोल्हे, डॉ. जागृति कृषाण एवं डॉ. आर. सी. रामटेके
पशु परजीवी विभाग, पशु चिकित्सा एवं पशु पालन महाविद्यालय, अंजोरा, दुर्ग

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Related Articles

Back to top button