पशुधन एवं मानव स्वास्थ्य पर कीटनाशकों का प्रभाव तथा उनके सतत् विकल्प
डॉ. विनीता वासनिक, डॉ. श्वेता जैन, डॉ. आर.सी. रामटेके


आधुनिक कृषि में कीट, खरपतवार, फफूँद तथा अन्य हानिकारक जीवों की समस्या निरंतर बनी रहती है, जिससे फसलों की उपज एवं गुणवत्ता में कमी आती है। इन समस्याओं के नियंत्रण तथा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विश्वभर में कीटनाशकों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। यद्यपि कीटनाशक कृषि उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, परंतु इनके अंधाधुंध एवं अत्यधिक उपयोग से पशुधन स्वास्थ्य, पर्यावरण सुरक्षा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं।
अतः पशु स्वास्थ्य एवं जन स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कीटनाशकों के प्रकार/ प्रकृति उससे होने वाले दुष्प्रभाव तथा सुरक्षित विकल्पों की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है।
कीटनाशक वे रासायनिक अथवा जैविक पदार्थ हैं जिनका उपयोग फसलों, संग्रहित उत्पादों, पशुओं एवं मानव स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाले कीटों को रोकने, नष्ट करने अथवा नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। ये पदार्थ कृत्रिम रसायन या प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त हो सकते हैं। कीटनाशक कीटों की तंत्रिका प्रणाली, वृद्धि, प्रजनन अथवा चयापचय जैसी महत्वपूर्ण शारीरिक क्रियाओं को बाधित करके कार्य करते हैं। यद्यपि कीटनाशक कीट नियंत्रण के लिए प्रभावी साधन हैं, परंतु ये स्वभावतः विषैले होते हैं और यदि इनका विवेकपूर्ण उपयोग न किया जाए तो पशुधन, वन्यजीव एवं मानव जैसे गैर-लक्षित जीवों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
कीटनाशकों के प्रकार
सामान्यतः उपयोग किए जाने वाले कीटनाशकों के उदाहरण निम्नलिखित हैं –
कीटनाशक: मैलाथियान (Malathion 50 EC), क्लोरपायरीफॉस (Dursban), कार्बारिल (Sevin), कार्बोफ्यूरान (Furadan), सायपरमेथ्रिन (Ripcord), डेल्टामेथ्रिन (Decis) आदि
शाकनाशी ध्खरपतवारनाशकः ग्लाइफोसेट (राउंडअप, ग्लाइफोस), एट्राजीन (एट्रेक्स), पैराक्वाट डाइक्लोराइड (ग्रामॉक्सोन, पैराक्वाट) आदि
फफूँदनाशी/कवकनाशकः मैनकोजेब (इंडोफिल ड.45, डाइथेन ड.45),तांबा यौगिक (ब्लाइटॉक्स, कॉपर ऑक्सी)
कृंतकनाशी/चूहामारः एंटीकोएगुलेंट कृंतकनाशी (वारफेरिन (त्ंबनउपद), जिंक फॉस्फाइड (रेटोलर्, च् रेट किलर)
ऐकैरिलाइड /जूँ-किलनी नाशक: ऑर्गेनोफॉस्फेट, क्लोरपायरीफॉस , प्रोफेनोफॉस , सिंथेटिक पाइरेथ्रॉइड (सायपरमेथ्रिन (ब्लचमतापसस), डेल्टामेथ्रिन , फॉर्मामिडिन समूह, अमीट्राज
पशुधन में कीटनाशकों के खतरे
पशुधन का कृषि परिवेश के साथ व्यापक संपर्क होने के कारण वे प्रायः कीटनाशकों के संपर्क में आ जाते हैं। यह संपर्क दूषित चारा एवं भूसा, पीने का पानी, उपचारित चरागाहों में चराई, छिड़काव के दौरान श्वसन द्वारा, अथवा बाह्य परजीवियों के नियंत्रण हेतु प्रत्यक्ष प्रयोग से हो सकता है। इस प्रकार का संपर्क तीव्र (एक्यूट) तथा दीर्घकालिक (क्रॉनिक) दोनों प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न कर सकता है, जिससे पशु उत्पादकता, कल्याण तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं।
कीटनाशकों के दुष्प्रभाव:
1. तीव्र विषाक्तता: तीव्र कीटनाशी विषाक्तता अल्प अवधि में या अधिक मात्रा के संपर्क के बाद होती है, जो सामान्यतः आकस्मिक सेवन, अनुचित प्रयोग या कीटनाशक के फैलाव के कारण होती है।
सामान्य नैदानिक लक्षण:
- अत्यधिक लार एवं अश्रु स्राव
- कंपकंपी, मांसपेशियों में झटके एवं आक्षेप
- दस्त एवं उल्टी
- सांस लेने में कठिनाई
- असंतुलन, कमजोरी एवं गिर जाना
- गंभीर मामलों में आकस्मिक मृत्यु
2. खाद्य दूषण:
- फल, सब्जियां, अनाज, दूध, मांस, मछली एवं अंडों में उपस्थित कीटनाशी अवशेष मुख्य रूप से मानव खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर सकते हैं।
- अनुमेय सीमा से अधिक अवशेषों वाला भोजन सेवन करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
- वसा ऊतकों में स्थायी कीटनाशियों का जैव-संचयन एवं कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जनक है।
- पशुधन से दूध एवं मांस में अवशेषों का स्थानांतरण भी कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जनक है।
- बच्चों, गर्भवती महिलाओं एवं प्रतिरक्षा-क्षीण व्यक्ति कीटनाशकों के दुष्प्रभाव के लिए अधिक जोखिम है।
- कीटनाशकों की कम मात्रा में भी दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव दुष्प्रभाव होते हैं।
- कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग एवं दुष्प्रभावों की आशंका से खाद्य सुरक्षा एवं उपभोक्ता विश्वास में कमी आ रही है।
- अधिकतम अवशेष सीमाओं (डत्स्) का अनुपालन एवं प्रतीक्षा अवधि का पालन जोखिम कम करने के लिए अनिवार्य है।
3. दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव
लंबे समय तक कम मात्रा में कीटनाशकों के संपर्क से दीर्घकालिक विषाक्तता हो सकती है, जो धीरे-धीरे विकसित होती है और इसकी पहचान नहीं हो पाती। इसके लक्षण प्रदर्शित नहीं होते या पहचान नहीं हो पाती।
दीर्घकालिक प्रभावों में मुख्यतः निम्नलिखित का समावेश है:
- कैंसर (जैसे ल्यूकेमिया, लिम्फोमा, स्तन एवं प्रोस्टेट कैंसर)
- तंत्रिका विकार – पार्किंसन रोग, संज्ञानात्मक क्षति एवं बच्चों में विकास में देरी या असामान्य विकास
- हार्मोनल असंतुलन
- प्रजनन समस्याएँ-बांझपन, स्वतः गर्भपात एवं जन्मजात असामान्यताएँ
4. पर्यावरणीय दूषण एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव
- कीटनाशी अपवाह, रिसाव, बहाव एवं वाष्पीकरण के माध्यम से मिट्टी, सतही जल, भूजल एवं वायु को दूषित करते हैं।
- यह पेयजल स्रोतों को दूषित करते हैं।
- इसके उपयोग से लाभकारी जीवों, परागणकर्ताओं एवं मृदा सूक्ष्मजीवों में कमी का कारण हैं।
- खाद्य उत्पादन एवं पोषण सुरक्षा को प्रभावित करने वाला पारिस्थितिक संतुलन असंतुलित करते हैं।
- दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थायित्व से सतत मानव संपर्क बना रहते है एवं जिसके दुष्प्रभावों की संभावना बरकरार रहती है।
- पर्यावरणीय प्रदूषण ग्रामीण एवं शहरी दोनों आबादियों को प्रभावित करता है।
- कीटनाशी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बहुआयामी खतरा उत्पन्न करते हैं-प्रत्यक्ष रूप से व्यावसायिक संपर्क द्वारा तथा अप्रत्यक्ष रूप से भोजन एवं पर्यावरणीय दूषण के माध्यम से कीटनाशकों के प्रयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाना, नियमों का कड़ाई से पालन, सुरक्षित उपयोग विधियों को बढ़ावा देना तथा जैव-कीटनाशी एवं एकीकृत कीट प्रबंधन (प्च्ड) को अपनाना मानव स्वास्थ्य संरक्षण एवं पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
कीटनाशकों के विकल्प
रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने एवं उनके खतरों को घटाने के लिए कई सुरक्षित एवं सतत विकल्प उपलब्ध हैं।
1. समन्वित कीट प्रबंधन (प्च्ड)ः
इसमें सांस्कृतिक, जैविक, यांत्रिक एवं रासायनिक विधियों का समन्वय किया जाता है। रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप में किया जाता है।
2. जैविक नियंत्रण:
प्राकृतिक शत्रुओं जैसे परभक्षी, परजीवी एवं रोगजनकों का उपयोग (जैसे लेडीबर्ड बीटल, परजीवी ततैया, बैसिलस थुरिंजिएन्सिस)।
3. जैव-कीटनाशक:
नीम अर्क, करंज तेल, आवश्यक तेल एवं सूक्ष्मजीवी उत्पाद सुरक्षित एवं जैव-अपघटनीय होते हैं।
4. सांस्कृतिक एवं यांत्रिक विधियाँ:
- फसल चक्र
- प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग
- समय पर बुआई एवं कटाई
- कीट एवं खरपतवार का हाथ से नियंत्रण
5. जैविक कृषि पद्धति
जैविक खेती में कृत्रिम कीटनाशकों से परहेज कर प्राकृतिक इनपुट का उपयोग किया जाता है, जिससे मृदा स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा में सुधार होता है।
कीटनाशकों ने कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, परंतु इनका अनुचित उपयोग पशुधन, सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है। कीटनाशकों के प्रकार, उनसे होने वाले खतरों तथा सुरक्षित विकल्पों के प्रति जागरूकता सतत कृषि के लिए आवश्यक है। समन्वित कीट प्रबंधन, जैविक नियंत्रण एवं पर्यावरण-अनुकूल पद्धतियों को बढ़ावा देकर कीटनाशकों पर निर्भरता कम की जा सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा, पशु कल्याण एवं पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
लेखक :
डॉ. विनीता वासनिक, डॉ. श्वेता जैन, डॉ. आर.सी. रामटेके
वेटेरिनरी पॉलिटेक्निक, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़










