

वर्तमान समय में ग्राहक खुद के आवश्यकता नुसार हर दिन दैनिक जीवन के लिए विभिन्न प्रकार के महंगे उत्पाद बाजारों से खरीदता हैं । जैसे इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रानिक्स, ज्वेलरी, अनाज, कपड़े, जूते-चप्पल आदि। कभी-कभी इन उत्पादों का उपयोग करते समय भयानक हादसे का भी सामना करना पड़ता और बड़े स्तर पर शारीरिक एवं भौतिक नुकसान भी उठाना पड़ता हैं । इसलिए बाजारों से विभन्न उत्पाद खरीदते समय उपभोक्ता को सावधानीपूर्वक उनपर लगे हुवे गुणवत्ता आश्वासन चिन्हों/मानकों को देखकर ही खरीदना चाहिए ना की उनके रंगों और गंध पर । उपभोक्ता को केवल उत्पाद खरीदना नहीं होता हैं, बल्कि उन्हे यह जानने का भी अधिकार होता हैं कि वह उत्पाद किस तरह से बनाया गया हैं साथ ही, क्या यह उत्पाद उपयोग के लिए सुरक्षित और लाभदायक हैं या नहीं । उत्पादनो पर लगे हुवे मानकों से यह जानकारी उपलब्ध होती हैं, की उत्पाद का उत्पादन एक विशिष्ट मानकों के अनुसार किया गया हैं, साथ ही उत्पाद कि गुणवत्ता और स्थायित्व को भी दर्शाते हैं। बाजारों मे बिक्री किए जाने वाले उत्पादों की गुणवत्ता का मूल्यांकन उनपर लगे हुवे मानकों के आधार पर किया जाता हैं। इसलिए, उपभोक्ता को हमेशा उत्पाद खरीदते समय विविध मानक एवं उनका किन उत्पादों पर उपयोग किया जाता हैं, इस विषय की पूरी जानकारी होना अत्यंत आवश्यक हैं । प्राप्त जानकारी के माध्यम से उपभोक्ता भविष्य मे होने वाले हादसे एवं आर्थिक हानि से बचकर उत्पादों के प्रति संतुष्टि महसूस कर सकता हैं ।
मानक क्या हैं?
मानक उन मानदंडों के आधिकारिक कथन हैं, जो यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि सामग्री, उत्पाद या प्रक्रिया अपने इच्छित उद्देश्य के लिए सुरक्षित, सुसंगत और विश्वसनीय हैं। उत्पाद मानक सामान्यतः गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रदर्शन के साथ-साथ नमूनाकरण और व्यावहारिक मूल्यांकन के तरीकों को भी निर्धारित करते हैं। मानक नीचे दिए गए कथनों सुनिश्चित करते है,
- सुरक्षा और स्वास्थ्य
- उपयुक्तता (प्रदर्शन)
- पर्यावरण संरक्षण
- उपयोग में आसानी
- गुणवत्ता और विश्वसनीयता
- उत्पादों के बीच संगतता (अंतर-संचालन)
- उत्पाद जानकारी और लेबलिंग की पारदर्शिता
- झूठे या भ्रामक दावों से सुरक्षा
- निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, इसलिए वस्तुओं और सेवाओं के बीच चयन और प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण
- निवारण की प्रणाली
- सेवाओं के वितरण में एकरूपता
- कमज़ोर आबादी (जैसे बच्चे, विकलांग व्यक्ति और बुज़ुर्ग) के लिए उत्पादों की उपयुक्तता
1)आई एस आई (ISI) मार्क

ISI मार्क भारत में औद्योगिक उत्पाद के लिए वर्ष 1950 से एक मानक अनुपालन मार्क के रूप मे कार्य करता हैं । यह चिह्न प्रमाणित करता है, कि कोई उत्पाद भारत के राष्ट्रीय मानक निकाय, भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के द्वारा विकसित भारतीय मानक (आईएस) के अनुरूप है । ISI, भारतीय मानक संस्थान का संक्षिप्त रूप है, जो 1 जनवरी 1978 तक राष्ट्रीय मानक निकाय का नाम था, बाद में नाम बदलकर भारतीय मानक ब्यूरो कर दिया गया हैं। आई एस आई मार्क भारतीय मानक ब्युरो (बीआईएस) द्वारा जारी किया एक मानकीकरण चिन्ह हैं, जो उत्पादन कि गुणवत्ता प्रमाणित करता हैं। भारत में बिक्री किए जाने वाले कुछ उत्पादों के लिए ISI मार्क अनिवार्य है, जैसे स्विच, इलेक्ट्रिक मोटर, प्रसंस्कृत अनाज आधारित पूरक खाद्य पदार्थ, वायरिंग केबल, हीटर, पैकेज्ड बोतल पानी, जीएलएस लैंप, रसोई में उपयोग किए जाने वाले उपकरण, विद्युत उपकरण, पोर्टलैंड सीमेंट, एलपीजी वाल्व, एलपीजी सिलेंडर, एलपीजी वाल्व, थर्मामीटर, ऑटोमोटिव टायर आदि। बीआईएस आधारित कुल 93 उत्पाद अनिवार्य प्रमाणन के अंतर्गत आते हैं । कुछ उत्पादों स्वैच्छिक प्रमाणन के अंतर्गत आते हैं, जैसे की, बिस्कुट, कॉफी पाउडर, प्रेशर कुकर, एलपीजी गैस स्टोव, डिटर्जेंट, फाउंटेन पेन स्याही, कार्बन पेपर, ड्राई डिस्टेंपर, पेंट, पीवीसी पाइप, सीलिंग फैन, वॉटर हीटर शामिल हैं।
२ ) हॉलमार्क

कीमती धातु से बनी वस्तुओं की अधिकारीक रिकॉर्डिंग के रूप में हॉलमार्क का उपयोग किया जाता हैं । हॉलमार्किंग वर्ष 2000 में स्वर्ण आभूषणों में शुरू की गई जो बीआईएस की शुद्धता प्रमाणन योजना है। इस प्रकार हॉलमार्क आधिकारिक चिह्न हैं जिनका उपयोग कई देशों में बहुमूल्य धातु से बनी वस्तुओं की शुद्धता या उत्कृष्टता की गारंटी के रूप में उपयोग किया जाता हैं। हॉलमार्क शब्द का प्रयोग गुणवत्ता के किसी भी मानक को संदर्भित करने के लिए किया जाता है। हॉलमार्क का उपयोग मुख्यतः उत्कृष्ट धातुओं – जैसे प्लैटिनम, सोना, चांदी और कुछ देशों में पैलेडियम – की सामग्री को प्रमाणित करने के लिए किया जाता हैं। वर्तमान में भारत में दो कीमती धातु सोना और चांदी के लिए हॉलमार्किंग किया जाता हैं। भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा प्रमाणित किया जाता है कि आभूषण भारत के राष्ट्रीय मानक संगठन, मानकों के अनुरूप है। हॉलमार्किंग योजना का मुख्य उद्देश्य यह हैं, कि सोने एवं चांदी की गुणवत्ता में बदलाव से होने वाले शोषण से उपभोक्ताओं की रक्षा करना, तथा विश्व भारत को एक अग्रणी स्वर्ण बाजार केंद्र के रूप में विकसित करना साथ ही निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता का भी विकसित करना हैं । जिस आभूषणो पर हॉलमार्क का उपयोग किया जाता हैं, उसके निर्माण और गुणवत्ता विविध मानदंडों से गुजरते हैं। साथ ही हॉलमार्क वाले आभूषणों की जांच और चिह्नांकन बीआईएस से किए गए मान्यता प्राप्त परख और हॉलमार्किंग केंद्रों द्वारा ही किया जाता है। इसलिए उपभोक्ताओं कों केवल हॉलमार्क वाले आभूषण ही खरीदने चाहिए। साथ जब भी उपभोक्ता आभूषण खरीदता हों तब दुकानदार से बिल प्राप्त करना आवश्यक होता हैं, चूंकि यदि भविष्य में आभूषण संबंधी कोई शिकायत हो तो इससे हल करने में मदद होती हैं ।
३) एगमार्क

अधिनियम, 1937 द्वारा भारत में एगमार्क को कृषि उपज (ग्रेडिंग और मार्किंग) कानूनी रूप से लागू किया गया है। इसका मुख्यालय फरीदाबाद (हरियाणा) में स्थित हैं । यह कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग के एक संलग्न कार्यालय, विपणन और निरीक्षण निदेशालय द्वारा अनुमोदित मानकों के एक सेट के अनुरूप हैं। एगमार्क शब्द की रचना कृषि के लिए प्रयुक्त ‘एग’ तथा प्रमाणन चिह्न के लिए ‘मार्क’ शब्दों को मिलाकर की गई थी। वर्तमान एगमार्क मानकों में विभिन्न प्रकार की दालों, अनाज, आवश्यक तेलों, वनस्पति तेलों, फलों और सब्जियों और सेंवई जैसे अर्ध-प्रसंस्कृत उत्पादों के सहित 224 विभिन्न वस्तुओं के लिए गुणवत्ता दिशानिर्देश शामिल हैं। एगमार्क की पूरी प्रणाली, नाम सहित, वर्ष 1934 से 1941 तक भारत सरकार के कृषि और विपणन सलाहकार आर्चीबाल्ड मैकडोनाल्ड लिविंगस्टोन द्वारा बनाई गई थी। एगमार्क प्रमाणीकरण भारत में स्थापित पूर्णतः शासकीय स्वामित्व वाली एगमार्क प्रयोगशालाओं के माध्यम से प्रदान किया जाता है, जो परीक्षण और प्रमाणन केन्द्रों के रूप में कार्य करती हैं। भारत में नागपुर में केंद्रीय एगमार्क प्रयोगशाला स्थापित हैं इनके अलावा, 11 नोडल शहरों (मुंबई, नई दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, कानपुर, कोच्चि, गुंटूर, अमृतसर, जयपुर, राजकोट, भोपाल) में क्षेत्रीय एगमार्क प्रयोगशालाएँ कार्यान्वित हैं। ये सभी क्षेत्रीय प्रयोगशाला क्षेत्रीय महत्व के उत्पादों के परीक्षण करने मे सर्वोत्तम है।
४ ) शाकाहारी और मांसाहारी चिह्न

भारत देश में बिक्री किए जाने वाले पैकेज्ड खाद्य उत्पादों पर शाकाहारी और मांसाहारी के बीच में अंतर दर्शाने के लिए एक अनिवार्य चिह्न लगाया जाता है। यह प्रतीक खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग और लेबलिंग) अधिनियम 2006 के उपरांत से प्रभावी हुवे है, और 2011 में संबंधित विनियमों (खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग और लेबलिंग) के विकास के बाद इसको अनिवार्य दर्जा प्राप्त हुआ हैं । उत्पादों के पैकेज पर एक वर्ग के अंदर एक छोटे हरे या लाल वृत्त का निशान दिखाई देता हैं। उपभोक्ताओं को दोनों चिन्हों से उत्पाद की आवश्यक जानकारी प्राप्त होती हैं । इसमे लाल वृत्त यह दर्शाता है कि खाद्य पदार्थ में मांसाहारी तत्व हैं, तथा हरा वृत्त यह दर्शाता है कि खाद्य पदार्थ में शाकाहारी तत्व हैं। उपभोक्ता को किसी भी उत्पाद खरीदने से पहले उसकी पूरी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार हैं, इसलिए भारत सरकार ने सभी प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सभी पैकेजों पर शाकाहारी या मांसाहारी चिह्न लगाना अनिवार्य कर दिया है।
५) आई एस ओ मार्क

आई एस ओ का मुख्य रूप अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन हैं, सन 23 फरवरी 1947 को आई एस ओ की स्थापना हुई हैं। इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विटजरलैंड में स्थित हैं। इस संगठन के तहत प्रौद्योगिकी और विनिर्माण के सभी पहलुओं को सम्मिलित करते हुए लगभग 25,000 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय मानक प्रकाशित किए है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादों और सेवाओं के सामान्य मा नक बनाना है, जिससे विदेशी व्यापार को सुविधा मिलती हैं। यह संगठन तकनीकी और गैर-तकनीकी क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय मानकों का विकास और प्रकाशन करता है, जिसमें निर्मित उत्पादों और प्रौद्योगिकी से लेकर खाद्य सुरक्षा, परिवहन, आईटी, कृषि और स्वास्थ्य सेवा तक सब कुछ शामिल है।
६) रेशम (सिल्क) मार्क

भारत में 2004 को सिल्क मार्क का शुभारंभ किया गया । भारत में यह मार्क रेशमी वस्त्रों के लिए एक प्रमाणन चिह्न के लिए कार्य करता है। यह चिह्न द्वारा प्रमाणित किया जाता है कि जिस कपड़े पर यह चिह्न लगा है वह शुद्ध प्राकृतिक रेशम से बना है। प्रमाणीकरण का प्रबंधन ‘सिल्क मार्क ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया’ द्वारा किया जाता है, जो कि राज्य-नियंत्रित केंद्रीय रेशम बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा स्थापित एक सोसायटी है। इससे उपभोक्ताओं को शुद्ध रेशम की पहचान करने में मदद मिलती है। अधिकृत उपयोगकर्ताओं से रेशम चिह्न लेबल लगे हुवे उत्पाद खरीदकर उपभोक्ताओं को यह आश्वासन मिलता है कि वे वास्तव में 100 प्र तिशत प्राकृतिक रेशम उत्पाद खरीद रहे हैं। सिल्क मार्क उपभोक्ताओं और रेशम के वास्तविक व्यापारियों के साथ ही निर्माताओं के हितों की रक्षा करता है, एवं यह प्राकृतिक रेशम के सामान्य प्रचार में भी मदद करता है।
७) वूलमार्क

वूलमार्क एक ऊन उद्योग प्रमाणन चिह्न है, जिसका उपयोग शुद्ध ऊन उत्पादों पर किया जाता है जो वूलमार्क कंपनी द्वारा निर्धारित गुणवत्ता मानकों को पूरा करती हैं। वूलमार्क लोगो वर्ष 1964 में वूलमार्क कंपनी द्वारा किया गया था। यह चिह्न दुनिया भर में गुणवत्ता और विश्वसनीयता के प्रतीक के रूप में मान्यता प्राप्त है।
८ ) एफ एस एस ए आई लोगो

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन एक वैधानिक निकाय है। इस मानक की स्थापना 5 सितंबर, 2008 को नई दिल्ली मे हुई हैं । इसके के दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में चार क्षेत्रीय कार्यालय हैं। इसके द्वारा अधिसूचित 22 जाँच प्रयोगशालाएँ हैं, पूरे भारत में 72 राज्य/संघ राज्य क्षेत्र प्रयोगशालाएँ हैं और 112 प्रयोगशालाएँ FSSAI द्वारा अधिसूचित NABL मान्यता प्राप्त निजी प्रयोगशालाएँ हैं। यह खाद्य पदार्थों के विनिर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री और आयात को नियंत्रित करता है, साथ ही खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मानक भी स्थापित करता है। खाद्य सुरक्षा और मानक (एफएसएस) अधिनियम, 2006 के तहत दिए गए दिशानिर्देशों के अनुसार खाद्य व्यवसाय संचालकों (एफबीओ) के लिए वैध लाइसेंस का प्रतीक है। एफएसएस अधिनियम के अनुसार अब इसे उत्पादों के लेबल पर प्रदर्शित करना अनिवार्य है, क्योंकि इससे उपभोक्ताओं का जानकारी मिलती है कि उत्पाद स्वच्छ और अनुमोदित है। एफएसएसएआई का लोगो और लाइसेंस संख्या खाद्य उत्पादों के पैकेज के लेबल पर पृष्ठभूमि के विपरीत रंग में प्रदर्शित की जाता हैं ।
स्त्रोत: इस्तेमाल किए गए फ़ोटो ऑनलाईन प्रकाशन से लिए गए ।
लेखक :
डॉ. सेवक अमृत ढेंगे व डॉ. अरविंद कुमार नंदनवार
सहायक प्राध्यापक
रानी अवंती बाई लोधी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, छुईखदान, जिला केसीजी










