कृषि

खेती में लागत की गणना पत्रक का महत्व

डॉ. ओम प्रकाश सोनवानी एवं डॉ. पंकज भार्गव

प्रस्तावना- भारत में 26.31( 54 प्रतिशत) करोड़ कृषि से संबंधित है एवं छत्तीसगढ़ में कुल कृषक परिवार 40.10 लाख है जिसमें से 33.14 (82 प्रतिशत) लाख सिमान्त एवं लघु किसान है और उन किसानों की वित्तीय शिक्षा का स्तर कम है। सामान्यतः किसान अपनी पूरी मेहनत और पूॅजी फसलों के उत्पादन में लगा देता है फिर भी खेती में लगाये गये श्रम एवं पूॅजी का लिखित रिकार्ड नही रखते है मतलब यह है कि खेति संबंधी हिसाब-किताब नही रखतें है। इस कारण कृषि से संबंधित शोध अध्ययन और नीति निर्माण में बाधायें आती है।
तालिका 1: खेती में लागत की गणना पत्रक

फसल का नाम-                                                                                                  क्षेत्रफल – 1.0 एकड

स.क्र. सामान इकाई   आदान/एकड़ प्रति इकाई लागत (₹) कुल लागत /एकड़ कुल लागत का प्रतिशत
1.

 

किराये पर लिया गया मानव श्रम

 

महिला दिन        
पुरूष दिन        
2. बैल श्रम   दिन        
3. मशीन चार्ज   घंटे        
4. बीज   कि.ग्रा.        
5. खाद   क्विट.        
6.

 

उर्वरक

 

एन. कि.ग्रा.        
पी. कि.ग्रा.        
के. कि.ग्रा.        
अन्य कि.ग्रा.        
7. सिंचाई शुल्क          
8. जैवउर्वरक / सूक्ष्मपोषक          
9. कीटनाशक (पादप संरक्षण रसायन)          
10. आकस्मिक खर्च          
11. मरम्मत शुल्क          
12. बीमा प्रीमियम          
13. पादप वृद्धि नियामक          
14. खरपतवारनाशक          
15. कार्यशील पूंजी (1से 14)          
16. कार्यशील पूंजी पर 6: वार्षिक ब्याज          
17. औजारों और कृषि निर्माण पर मूल्यह्रास          
18. भूमि राजस्व और अन्य कर          
19. लागत ”अ“ (15 से 18)          
20. अपनी जमीन का किराया मूल्य          
21. स्थायी पूंजी पर 08 प्रतिशत वार्षिक ब्याज          
22. परिशोधन (लोन किस्त)लागत          
23. लागत ”ब“ (19 से 22)          
24.

 

पारिवारिक श्रम

 

महिला दिन        
पुरूष दिन        
25. लागत ”स“ (23 से 24)            
26.

 

प्रति एकड़ उपज

 

क्विट. मुख्य        
क्विट. उप        
27. प्रति क्विल्टल उत्पादन लागत(25/26)          
28. लागत ”अ“ (19) $ पारिवारिक श्रम(24)          
29.

 

सकल लाभ (कीमत /क्विट.) ग उपज

 

मुख्य        
उप        
30. शुध्द लाभ (29-25)          

स्त्रोतः कृषि-लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा अनुशंसित खेती में लागत की गणना पत्रक।

कृषि-लागत एवं मूल्य आयोग- कृषि-वस्तुओं की कीमत-नीति के विभिन्न पहलुओं के सम्बन्ध में सुझाव प्रस्तुत करने के उद्देश्य से जनवरी 1965 में भारत सरकार के द्वारा प्रो. एम. एल. दान्तवाला की अध्यक्षता में कृषि मूल्य आयोग का गठन किया गया था। प्रारम्भ में यह आयोग तीन वर्ष की अवधि के लिए गठित किया गया था, लेकिन नीति-निर्धारण में इसकी महत्ता को दृष्टिगत रखते हुए इसे स्थायी रूप दे दिया गया तथा इसका नाम बदलकर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग कर दिया गया।

उद्देश्य एवं कार्यः-
कृषि मूल्य आयोग का उद्देश्य सन्तुलित एवं समग्र मूल्य तन्त्र के निर्धारण में सलाह देकर आर्थिक स्थिति के नियन्त्रण तथा उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना निर्धारित किया गया है। कृषि मूल्य आयोग के प्रमुख कार्यों को निम्नवत् व्यक्त किया जा सकता है-

  1. प्रमुख कृषि उत्पादों-गेहूं, चावल, चना, गन्ना, ज्वार, बाजरा, मक्का, तिलहन, कपास, जूट, अन्य दालों एवं मोटे अनाज वाली फसलों के सन्तुलित एवं एकीकृत कीमतों के ढांचे का निर्माण करने एवं उन्हें कार्यान्वित करने के लिए सरकार को समय-समय पर आवश्यक सुझाव देना।
  2. विभिन्न कृषि उत्पादों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ावों की समीक्षा करना तथा उनको कम करने के लिए सरकार को आवश्यक सुझाव देना।
  3. कृषि उत्पादों के विपणन हेतु प्रचलित व्यवस्थाओं, विपणन लागत एवं मध्यस्थों को प्राप्त होने वाले लाभ का अध्ययन करना एवं उनको कम करने के उपायों के सम्बन्ध में सरकार को सलाह देना ताकि उत्पादक कृषकों के हितों की रक्षा की जा सके।
  4. कृषि, उत्पादन के क्षेत्र में आने वाले बाधक तत्वों- उत्पादन-साधनों की कमी तथा समय पर उनकी अनुपलब्धता, कीमतों की अधिकता आदि की समस्याओं को सुलझाने हेतु सरकार को आवश्यक सुझाव देना।
  5. कृषकों को उत्पादन वृद्धि की प्रेरणा देने के लिए सरकार को आवश्यक सुझाव देना, जैसे-विभिन्न कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थित मूल्य घोषित करना, खाद्यान्नों की वसूली के लक्ष्य एवं कीमतें निर्धारित करना आदि।
  6. कृषि मूल्य नीति का अध्ययन करना एवं सूचनाएं एकत्र करना।
  7. सरकार द्वारा घोषित मूल्य नीति एवं उत्पादन से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन करना एवं उस पर सलाह देना।

अतः कृषि मूल्य आयोग प्रत्येक वर्ष खरीफ एवं रबी के मौसम के प्रमुख कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थित मूल्य एवं वसूली कीमत निर्धारित किए जाने के सम्बन्ध में सरकार को सुझाव देता है। सरकार आयोग द्वारा तुझाई गई कीमतों पर सम्यक विचार करके एवं उसमें आवश्यकतानुसार संशोधन करके कीमतें घोषित।

निष्कर्षः- किसानों द्वारा खेती में लगाये गये श्रम एवं पूॅजी का लिखित रिकार्ड रखने या खेति संबंधी हिसाब-किताब रखनें से अनेंको फायदा होता है जैसे न्यूनतम समर्थित मूल्य घोषित करना एवं खाद्यान्नों की वसूली के लिए कीमतें निर्धारित करने के लिए कृषि-लागत एवं मूल्य आयोग, योजना, सांख्यिकी एवं आर्थीकी विभाग और बीमा कंपनीयॉ आदि समय-समय पर सर्वे करते रहते है, जिससे कृषि से संबंधित शोध अध्ययन और नीति निर्माण सरलतापूर्वक किया जा सके। किसानों में वित्तीय शिक्षा और कृषि संबंधी हिसाब-किताब रखनें के लिए जागरूकता कार्यक्रम, प्रभावी प्रचार-प्रसार और प्रशिक्षण पर जोर दिया जाना चाहिए।

लेखक:
डॉ. ओम प्रकाश सोनवानी एवं डॉ. पंकज भार्गव
रानी अवंती बाई लोधी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, छुईखदान, के.सी.जी.,
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (छ.ग.)-491885

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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