

छत्तीसगढ़ में कपास की स्थिति : कपास सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसलों में से एक है, जो भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है। अनुकूल जलवायु परिस्थितियों, उन्नत कृषि प्रथाओं और बढ़ती बाजार मांग के कारण छत्तीसगढ़ में कपास की खेती का रकबा पिछले पांच वर्षों में तेजी से बढ़ा है (2018 में 478 हेक्टेयर से 2023 में 5389 हेक्टेयर)। दुर्ग, बेमेतरा, राजनांदगांव, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, बलौदाबाजार, रायपुर जैसे प्रमुख कपास उत्पादक जिलों ने उच्च उत्पादन स्तर का प्रदर्शन किया है, जबकि कई अन्य जिलों में अनुकूल जलवायु और मिट्टी की स्थिति के कारण विस्तार की अप्रयुक्त क्षमता है।

छत्तीसगढ़ में कपास की फसल के लिए अनुकूल जलवायु परिस्थितियाँ
कपास एक उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय फसल है, जो छत्तीसगढ़ की जलवायु में अच्छी तरह उगाई जा सकती है। इस फसल को गर्म और आर्द्र मौसम की आवश्यकता होती है। कपास की अच्छी उपज के लिए तापमान 21 से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए। जून-जुलाई में मानसून की शुरुआत के साथ बुवाई की जाती है और फसल 150 से 180 दिनों में पक कर तैयार होती है।
कपास को 500 से 1000 मिमी तक की वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है, जो मुख्यतः मानसून के दौरान होनी चाहिए। अंकुरण और शुरुआती वृद्धि के लिए बारिश जरूरी है, लेकिन पकने और फूल बनने के समय पर शुष्क और धूप वाला मौसम उपज और रेशा गुणवत्ता के लिए लाभदायक होता है। अत्यधिक नमी से कीट और रोग फैल सकते हैं। यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो, तो उत्पादन और भी बेहतर हो सकता है। साथ ही कीट नियंत्रण और उचित फसल प्रबंधन अपनाकर किसान अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में कपास की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी
कपास की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, विशेष रूप से मध्यम से भारी मिट्टी इसमें उपयुक्त मानी जाती है। हालांकि, काली मिट्टी को कपास की खेती के लिए सबसे आदर्श माना गया है, क्योंकि इसमें जल धारण करने की क्षमता अधिक होती है जो वर्षा आधारित खेती के लिए आवश्यक है। कपास एक गहरी जड़ वाली फसल है जिसकी मुख्य जड़ 200 से 250 सेमी. गहराई तक जा सकती है, इसलिए ऐसी मिट्टी बेहतर होती है जो गहराई तक नरम हो और जड़ों को आसानी से फैलने दे।
कपास की फसल को 5.5 से 8.5 के पीएच स्तर वाली मिट्टी में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। यह फसल लवणीयता को कुछ हद तक सहन कर सकती है, लेकिन जलजमाव की स्थिति में खराब हो जाती है। इसलिए, अच्छी जल निकासी वाली और हवादार मिट्टी अनिवार्य है। छत्तीसगढ़ के उत्तर क्षेत्र में गहरी जलनिकासी वाली एल्यूवियल मिट्टी, मध्य क्षेत्र में काली चिकनी मिट्टी और दक्षिण क्षेत्र में मिश्रित काली एवं लाल मिट्टी कपास के लिए उपयुक्त पाई जाती है।
खेत की तैयारी
छत्तीसगढ़ की काली और मटियार दोमट मिट्टी कपास की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। रबी की फसल कटने के बाद खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से गहराई से करनी चाहिए, जिससे खरपतवार और कीटों के अंडे नष्ट हो जाएं। इसके बाद खेत को 3-4 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरी और समतल बनाना आवश्यक है। समतल खेत वर्षा जल संचय और जल निकासी में सहायक होता है, जिससे अंकुरण बेहतर होता है और पौधों की जड़ों को पोषण आसानी से मिलता है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा है, वहाँ एक बार सिंचाई कर जुताई करने से मिट्टी में नमी बनी रहती है, जो बीज अंकुरण के लिए आवश्यक होती है।
छत्तीसगढ़ में वर्षा आधारित खेती अधिक होती है, इसलिए खेत की तैयारी करते समय वर्षा जल के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। ऐसे क्षेत्रों में गहरी जुताई और सतह पर दरारें बनाए रखना वर्षा जल को रोकने और मृदा में संग्रहित करने में सहायक होता है। यदि खेत में खरपतवार की समस्या कम हो, तो न्यूनतम जुताई विधि अपनाई जा सकती है, जिससे मृदा संरचना बनी रहती है। खेत की समय पर और वैज्ञानिक विधियों से की गई तैयारी न केवल कपास की उपज को बढ़ाती है, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक उर्वरता को भी बनाए रखती है।
छत्तीसगढ़ के लिए अनुकूल बीटी कपास किस्म
| क्र.सं. | किस्म | प्रजाति | संभावित उपज (क्विंटल/हे.) | अवधि (दिनों में) | रेशा लंबाई (मिमी) | रेशा मजबूती (ग्राम/टेक्स) | टिप्पणियाँ |
| 1 | ICAR-CICR सूरज Bt (प्रमुख रोगों के प्रति प्रतिरोधक) | गॉसिपियम हिरसूटम | 20.0 | 160-170 | 29.1 | 26.0 | वर्षा आधारित और सिंचित क्षेत्रों के लिए (मध्य क्षेत्र – महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश) |
| 2 | ICAR-CICR PKV-081 Bt | गॉसिपियम हिरसूटम | 25.0 | 140-150 | 28.50 | 27.90 | महाराष्ट्र के वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए |
| 3 | CICR Bt-9 | गॉसिपियम हिरसूटम | 31.0 | 150 | 26.3 | 25.5 | महाराष्ट्र के वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए |
| 4 | ICAR-CICR GJHV-374 Bt | गॉसिपियम हिरसूटम | 25.0 | 160-170 | 28.2 | 26.8 | मध्य क्षेत्र (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात) |
| 5 | CICR 21 Bt (प्रमुख रोगों और सूखे के प्रति प्रतिरोधक) | गॉसिपियम हिरसूटम | 15.0 | 150-160 | 27.2 | 27.9 | मध्य क्षेत्र के वर्षा आधारित क्षेत्र (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात); कोराइनोप्सोरा लीफ स्पॉट के प्रति संवेदनशील |
| 6 | CICR-युगांक Bt | गॉसिपियम हिरसूटम | 20.0 | 140 | 25 | 26.0 | मध्य क्षेत्र के वर्षा आधारित क्षेत्र (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात); कोराइनोप्सोरा लीफ स्पॉट के प्रति संवेदनशील |
| 7 | ICAR-CICR 18 Bt (प्रमुख रोगों और चूसक कीटों के प्रति प्रतिरोधक) | गॉसिपियम हिरसूटम | 20.0 | 140-150 | 23.4 | 24.3 | मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात के वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए; |
छत्तीसगढ़ के लिए अनुकूल गैर-बीटी कपास किस्म
| क्र.सं. | किस्म | प्रजाति | संभावित उपज (क्विंटल /हे.) | अवधि (दिनों में) | रेशा लंबाई (मिमी) | रेशा मजबूती (ग्राम/टेक्स) | टिप्पणियाँ |
| 1 | ICAR-CICR CNH 1111 | गॉसिपियम हिरसूटम | 14.1 | 160 | 26.5-28.1 | – | महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और ओडिशा के वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए |
| 2 | सुरक्षा (बोल वज़न 4.0 ग्राम तक, 60 काउंट तक कताई योग्य) | गॉसिपियम हिरसूटम | 22.0 | 150-16 | 32.4 | 34.0 | गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और ओडिशा के सिंचित क्षेत्रों के लिए |
| 3 | सूरज (जैसिड सहनशील, 60 काउंट कताई) | गॉसिपियम हिरसूटम | 25.0 | 160 | 30.3 | 23.8 | मध्य क्षेत्र के वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए |
| 4 | CICR-H कॉटन 54 (नैनो) — HDPS के लिए उपयुक्त सघन पौध आकार वाली कपास किस्म | गॉसिपियम हिरसूटम | 28.60 | 150 | 30.1 | 30.2 | मध्य क्षेत्र (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और ओडिशा) के सिंचित क्षेत्रों के लिए |
Source: CICR, Nagpur, Maharashtra
कपास की बुवाई: बीज मात्रा और फासला
छत्तीसगढ़ में कपास की खेती के लिए बीज की मात्रा कपास की किस्म और सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर करती है। बीटी या संकर किस्मों के लिए 2.5 से 3.0 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है, जबकि देशी किस्मों के लिए 10 से 12 किलोग्राम, अमेरिकी किस्म के लिए 10 से 20 किलोग्राम और अमेरिकी संकर के लिए 3.5 से 5.0 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। बीज को 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए। पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी, देशी किस्मों के लिए 60 x 60 और बीटी या संकर किस्मों के लिए हल्की मिट्टी पर 90 × 90 सेमी. 90 x 60 सेमी, 90 x 30 सेमी और और भारी मिट्टी पर 120 × 30, 120 x 45 सेमी की दूरी रखें। उचित बीज मात्रा और दूरी से फसल की उपज और गुणवत्ता बेहतर होती है।
अंतर-फसल
कपास में पंक्तियों के बीच अधिक अंतराल रखकर अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है। कपास और उड़द को 1:1 या 1:2 अनुपात में उगाया जा सकता है और सोयाबीन को कपास के साथ 2:1 अनुपात में पंक्तियों में उगाया जा सकता है। इसके अलावा किसान मूंग, लोबिया, मिर्च, प्याज आदि फसलें भी उगा सकते हैं।
बीजोपचार
छत्तीसगढ़ में कपास की उन्नत खेती के लिए बीज शोधन अत्यंत आवश्यक है, जिससे फसल की अंकुरण क्षमता, रोग प्रतिरोधकता और उपज में वृद्धि होती है। बीजों को रेशाविहीन करने के लिए 1 किलोग्राम बीज में 100 मिलीलीटर गंधक का अम्ल (सल्फ्यूरिक एसिड) मिलाकर प्लास्टिक या मिट्टी के बर्तन में 2–3 मिनट तक चलाएं, फिर तुरंत साफ पानी से अच्छी तरह 3-4 बार धो लें और छाया में सुखाएं।
रोग नियंत्रण के लिए 10 लीटर पानी में 1 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या 2.5 ग्राम एग्रीमाइसीन घोल में बीजों को 8–10 घंटे भिगोकर सुखाएं।
जड़ गलन से बचाव हेतु ट्राइकोडर्मा या सूडोमोनास फ्लोरोसेंस जैसे जैव एजेंट को 10 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से मिलाएं या रासायनिक फफूंदनाशी जैसे कार्बेन्डाजिम (2-3 ग्राम/किग्रा बीज) से उपचारित करें।
रस चूसक कीटों और वायरस से बचाव के लिए 5 ग्राम इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस या 4 ग्राम थायोमेथोक्साम 70 डब्ल्यूएस प्रति किग्रा बीज उपयोग करें।
असिंचित क्षेत्रों में उपज बढ़ाने के लिए 10 ग्राम एजेटोबैक्टर प्रति किग्रा बीज मिलाना भी लाभकारी होता है। बीज शोधन करके किसान स्वस्थ, रोगमुक्त एवं उच्च उत्पादक क्षमता वाली फसल प्राप्त कर सकते हैं।
खाद और उर्वरक
छत्तीसगढ़ की जलवायु और मिट्टी को ध्यान में रखते हुए कपास की अच्छी पैदावार के लिए उर्वरकों का संतुलित उपयोग अत्यंत आवश्यक है। खेत की तैयारी के समय प्रति हेक्टेयर 10 से 15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए। बीटी या हाईब्रिड कपास किस्मों के लिए 100-120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40-50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस (P₂O₅), 40-50 कि.ग्रा. पोटाश (K₂O) और 20-25 कि.ग्रा.सल्फर प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। देसी किस्मों के लिए 50:25:25 का अनुपात पर्याप्त होता है। जिंक की कमी की भरपाई के लिए 25-50 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट और 25 कि.ग्रा. मैंगनीज सल्फेट भूमि तैयार करते समय डालें। नाइट्रोजन को तीन बराबर भागों में बाँटकर बेसल खुराक के रूप में, 30-40, 60-75 दिनों में दें, जबकि फॉस्फोरस और पोटाश की आधी मात्रा रोपाई के समय और शेष 60 दिन बाद दें। अधिक उपज के लिए 19:19:19 (NPK) और सूक्ष्म पोषक तत्वों का दो से तीन बार छिड़काव भी लाभकारी होता है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक मात्रा समायोजित करना सबसे बेहतर उपाय है।
सिंचाई प्रबंधन:
कपास की अच्छी उपज के लिए फसल को कुल 700-1200 मिमी जल की आवश्यकता होती है। बुवाई के 20-30 दिन बाद पहली सिंचाई करें, फिर 20-25 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई करते रहें। फूल और गुड़िया (बोल) बनने के समय (बुवाई के 60-100 दिन बाद) पर्याप्त नमी बनाए रखें, क्योंकि यह उपज का मुख्य चरण होता है। इस समय जल की कमी से फूल और गुड़िया झड़ सकते हैं। हल्की भूमि (रेतिली दोमट) में 8-13 बार तक सिंचाई करनी पड़ सकती है जबकि मध्यम भूमि में 4-6 सिंचाई पर्याप्त होती हैं। फसल के अंतिम चरण में, जब लगभग 33% बोल खुल जाएं, अंतिम सिंचाई करें और उसके बाद सिंचाई बंद कर दें। ड्रिप सिंचाई प्रणाली को प्राथमिकता दें क्योंकि इससे जल की बचत होती है और पौधों की जड़ तक नमी बनी रहती है। जल निकासी की उचित व्यवस्था भी आवश्यक है ताकि खेत में पानी जमा न हो। यदि खारा पानी उपयोग करना हो तो प्रयोगशाला से परीक्षण कर आवश्यकतानुसार जिप्सम मिलाकर ही उपयोग करें।
अंतरशस्य क्रियाएं व खरपतवार नियंत्रण
कपास की अच्छी उपज हेतु समय पर निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण अति आवश्यक है। बुवाई के 30-35 दिन के भीतर ट्रैक्टर या बैल चालित कल्टीवेटर से 2-3 बार गुड़ाई करें, जिससे मिट्टी में हवा का संचरण बढ़े और नमी संरक्षित रहे। प्रारंभिक अवस्था में गहरी और बाद में हल्की गुड़ाई करें ताकि जड़ों को नुकसान न हो। पहली सिंचाई के बाद कसोला से निराई लाभकारी रहती है। खरपतवार नियंत्रण हेतु पेन्डीमेथालिन 0.9-1.0 किग्रा/हेक्टेयर को 500-600 लीटर पानी में घोलकर बीज अंकुरण से पहले छिड़काव करें। फूल या गुलेर बनने की अवस्था में यांत्रिक गुड़ाई न करें, बल्कि हाथ से निराई करें। छत्तीसगढ़ में घमुरा, सत्यानाशी, लटजीरा, मोथा व दूब जैसे खरपतवार कपास की बढ़वार और उत्पादन को प्रभावित करते हैं। यदि खेत में मिश्रित किस्में पाई जाएं तो निराई के समय उन्हें हटा देना चाहिए ताकि कपास की गुणवत्ता और मूल्य बना रहे। समय पर खरपतवार नियंत्रण से कपास की उपज में 50-85% तक वृद्धि संभव है।
रोग एवं उनका समेकित प्रबंधन
कपास की खेती के दौरान कई प्रमुख रोग फसल को प्रभावित करते हैं। तना सड़न रोग अधिक नमी और जलजमाव के कारण होता है, इसके प्रबंधन के लिए जल निकासी की उचित व्यवस्था और बीजोपचार (कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा से) जरूरी है। अंगमारी रोग (बैक्टीरियल ब्लाइट) पत्तियों पर पानी जैसे धब्बों के रूप में दिखता है, इसके लिए रोग मुक्त बीजों का प्रयोग करें और शुरुआती अवस्था में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या स्ट्रेप्टोसायक्लिन का छिड़काव करें। लाल सड़न या विल्ट (फ्यूजेरियम विल्ट) जड़ सड़ने और पौधे के मुरझाने का कारण बनता है, इसके लिए रोग प्रतिरोधी किस्में लगाएं और फसल चक्र अपनाएं। पत्ती मुड़न वायरस, जो सफेद मक्खी से फैलता है, से बचाव के लिए सफेद मक्खी की निगरानी करें और थायोमेथॉक्साम या इमिडाक्लोप्रिड जैसे कीटनाशकों का सीमित छिड़काव करें। साफ-सफाई, संतुलित पोषण, समय पर निराई-गुड़ाई और समेकित रोग प्रबंधन तकनीकों को अपनाकर किसान इन रोगों से कपास की फसल को सुरक्षित रख सकते हैं और उपज में वृद्धि कर सकते हैं।
प्रमुख कीट एवं उनका प्रबंधन
छत्तीसगढ़ में कपास की फसल को माहू, जैसिड्स, थ्रिप्स, सफेद मक्खी, अमेरिकन सुंडी, स्पोडोप्टेरा और गुलाबी सुंडी जैसे कीटों से भारी नुकसान होता है। इन रस चूसने वाले कीटों (माहू, जैसिड्स, थ्रिप्स, सफेद मक्खी) के लिए नीम तेल (1500 पीपीएम, 5 मि.ली./लीटर पानी) या Flonicamid 50 WG (60-70 ग्राम प्रति एकड़) का छिड़काव करें। सफेद मक्खी के प्रकोप में Buprofezin 25 SC (1-2 मि.ली./ ली) या Pyriproxyfen 10EC (200 मि.ली./एकड़) प्रभावी हैं।

फूल आने के समय अमेरिकन सुंडी और स्पोडोप्टेरा के लिए फेरोमोन ट्रैप (4 प्रति एकड़) लगाकर निगरानी करें और आवश्यकता होने पर Emamectin benzoate 5S G (88 ग्राम प्रति एकड़) या Spinosad 45SC (60 मि.ली./एकड़) का छिड़काव करें।
संक्रमित पौधों के हिस्सों को हटाने और नष्ट करने से कीटों के जीवित रहने और सर्दियों में जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है। कपास के आस-पास ट्रैप क्रॉपिंग जैसे मैरीगोल्ड या अरहर लगाने से बॉलवर्म आकर्षित हो सकते हैं, जिससे कपास की फसल में संक्रमण कम हो जाता है।
गुलाबी सुंडी के लिए Helicoverpa NPV या Bacillus thuringiensis जैसे जैविक कीटनाशकों का उपयोग करें। कीटों के प्राकृतिक दुश्मनों जैसे लेडी बर्ड बीटल और क्रायसोपा को बचाकर रखना भी लाभकारी होता है। फसल की समय पर बुवाई, संतुलित पोषण, खेत में सफाई और नियमित निरीक्षण से कीटों पर नियंत्रण सरलता से पाया जा सकता है। इस समन्वित कीट प्रबंधन (IPM) पद्धति से किसान उत्पादन बढ़ाकर लागत घटा सकते हैं।
कपास की कटाई और उपज
जब कपास की फसल पूरी तरह से परिपक्व हो जाए, तब उसकी चुनाई (कटाई) सुबह के समय ओस हटने के बाद करनी चाहिए। चुनाई के समय केवल पूरी तरह से खुले हुए गुलों को ही तोड़ना चाहिए। सूखी पत्तियां या डंठल साथ में न आएं, क्योंकि इससे कपास की गुणवत्ता घटती है। कपास की कटाई दो या तीन बार में की जाती है, क्योंकि इसकी फसल एक साथ परिपक्व नहीं होती। पहली कटाई तब करें जब लगभग 50-60 % बॉल्स (टिंडे) खुल चुके हों, और अगली कटाई बाकी बॉल्स के परिपक्व होने पर करें। कटाई के बाद कपास को अच्छी तरह सूखा कर भंडारण करना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में उपयुक्त उन्नत विधियों से खेती करने पर देसी किस्मों से 12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, संकर किस्मों से 13 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा बीटी किस्मों से 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक औसत उपज प्राप्त होती है। यदि उन्नत तकनीक, समय पर सिंचाई, और कीट नियंत्रण अपनाया जाए तो विशेष रूप से सिंचित क्षेत्रों में उपज कुछ अधिक (20–32 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) भी हो सकती है I
लेखक:
प्रज्ञा पांडेय, सहायक प्रोफेसर, कृषि विज्ञान विभाग, कृषि महाविद्यालय, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर
एवं
प्रतीक झा, बी.एस.सी. (कृषि, ऑनर्स) द्वितीय वर्ष










