बतख पालन प्रबंधन के महत्वपूर्ण तथ्य
डॉ. भारती साहू, डॉ. फणेश्वर कुमार, डॉ. जागृति कृषान, डॉ. रुपल पाठक, डॉ. रजनी फ्लोरा कुजुर


बतख पालन का सामान्य परिचयः भारत में बतख पालन का एक विषेश स्थान है तथा इसके पालन की अपार संभावनाएं हैं। अण्डा उत्पादन में मुर्गी के बाद बतख का स्थान है। बतख की रोग प्रतिरोधक क्षमता, कम मृत्युदर, पालन में कम इकाई लागत, अधिक अण्डा व मांस का उत्पादन जैसे प्रभावकारी गुण बतख पालन को और अग्रणी बनाते हैं।
बतखे की नस्लेः- बतख को अंडे व मांस दोनो के लिए पाला है। ग्रामीण क्षेत्रो मे मुख्यतः इंडियन रनर, खाकी कैम्पबेल, पेकिन तथा मसकोवी नस्लो पर ध्यान केद्रित किया जाता है इसके अलावा आइलिस बरी, रोवेन, ऑरपिगटन भी बतख की नस्ले है। खॉकी कैम्पबेल व इंडियन रनर अंडे देने वाली प्रमुख नस्ले है जो कि क्रंमषः 300 व 250 अंडे प्रति वर्ष अंडा उत्पादन करती है। मांस उत्पादन के लिए मुख्यतः पेकिन व मसकोवी बतख का नाम आता है। जिनमे वयस्क नर बतख का भार क्रमशः 4 व 4.5 किग्रा तथा मादा का भार क्रमषः 3.6 किग्रा व 3.0 किग्रा होता है। बतख की कुछ नस्ले जैसे किस्टेड व्हाइड का उपयोग सजावट व सुन्दरता के लिए किया जाता है।
बत्तख के प्रबंधन कार्यः-
बतख का ब्रुडिगः- (0-4 सप्ताह)- बतख का ब्रुडर घर मुर्गी की भॉति ही होता है जिसमे 500 क्षमता वाले ब्रुडर घर मे 200 से 300 बतख के बच्चो को रखा जा सकता है। इन्हे 90-100 सेमी के होवर जगह की आवश्यकता होती है। जिनका तापमान प्रथम सप्ताह मे 29 डिग्री से 35 डिग्री सेल्सियस होता है तथा 3 डिग्री सेल्सियस प्रत्येक 6-7 दिन मे तब तक कम करना चाहिए जब तक बतख को अतिरिक्त गर्मी की आवश्यकता न हो। ब्रुडिंग के दौरान बतख को 900 सेमी. की जगह तथा 5 से 7.5 सेमी. गहराई के पानी के स्थान की आवश्यकता होती है।
वयस्क बतख का प्रबंधन- 3 सप्ताह के बाद बतख को स्वंतत्र रूप से घुमने के लिए छोडा जा सकता है। अतः सेमी इन्टेसिव प्रकार का आवास बतख के लिए उपयुक्त माना जा सकता है। जिनमे इन्हे 0.135 मीटर की बंद जगह उपलब्ध करनी चाहिए। लंेयर बतख 16 से 18 सप्ताह मे अंडे देना प्रारंभ करती है। जिसमे तीन बतख को 30.30.45 सेमी का नेस्ट डिब्बा प्रदान कराना चहिए। 6-7 मादा बत्तख के बीच 1 नर बत्तख रखना चाहिए तथा लेयर बत्तख को 14-17 घंटे का प्रकाष प्रतिदिन उपलब्ध कराया चाहिए। बत्तख को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराना चाहिए ताकि ये अपना सिर डुबा सकें।
बत्तख का आहार प्रकृति:– बत्तख अधिक खाने वाले तथा चरने की प्रकृति वाले होते है। यदि उन्हे तालाब या पानी युक्त जगह पर पाला जाता है तो घोंघा, केंचुआ, कीडे-मकोडे तथा अन्य जीव उनका आहार बनते है जिससे दाने की लागत में कमी आती है। घर के भीतरी भागों में पालने के लिए सूखा दाना गोली के रूप में दाना गीले दाने के साथ देना चाहिए। गीला दाना या पानी के बिना उनका खाना नहीं हो पाता है।
बत्तख अन्य कुक्कटों की तुलना में विटामिन ई व सेलेनियम की कमी के प्रति संवेदनशील होते है। इन्हें पैर की कमजोरी से बचाने के लिए 45 मि.ग्रा नियासिन प्रति किग्रा दाने के साथ देना चाहिए।
विभिन्न उम्र के बत्तख का आहारः-
- 0-4 सप्ताह:- र्स्टाटर को 20 प्रतिशत क्रूड प्र्रोटीन तथा 2750 कि. कैलोरी एम.ई प्रति किलो दाना की आवश्यकता होती है।
- 4-6 सप्ताह के बढते हुए बत्तख को 17-18 क्रूड प्र्रोटीन तथा 2750 से 2800 कि.कैलोरी एम.ई प्रति किलो दाने की आवश्यकता होती है।
- 9-20 सप्ताह की उम्र में 15 प्रतिशत क्रूड प्र्रोटीन व 2600-2700 कि. कैलोरी एम.ई प्रति किलो दाने की आवश्यकता होती है।
- लेयर बत्तख को 10-18 प्रतिशत क्रूड प्र्रोटीन व 2650 कि. कैलोरी एम.ई./ किग्रा दाने की आवश्यकता होती है।
कोलीन छोटे बत्तख के बढ़त में सहायक होते हैं तथा इन्हे 0.6 से 1 प्रतिशत कैल्सियम की आवश्यकता होती है। वृद्वि व अंडा उत्पादन के लिए 0.5 से 0.7 प्रतिशत सल्फर युक्त अमीनों अम्ल के साथ 0.35 से 0.45 प्रतिषत मेथियोनिन तथा 0.15 से 0.25 प्रतिशत सिस्टीन आवश्यक होता है।
छोटे बत्तख के लिए आर्सेनिक युक्त यौगिक वृद्वि बढाने में सहायक होते है।
बत्तख की बीमारियां व उनसे बचाव:-
सामान्यतः बत्तख को अन्य कुक्कटों की तुलना में कम बीमारियों होती है जिनमें बत्तख प्लेग, बत्तख हिपेटाइटिस, बत्तख रानीखेत, बत्तख माता रोग, बत्तख कोलेरा, ई कोलाई का संक्रमण, लिम्बेरनेक(बाटुलिसम) आदि प्रमुख है। छोटे बत्तख में एस्परजिलस फंफूद के संक्रमण की संभावना अधिक होती है।
बीमारियों से बचाव हेतु टीकाकरण ही बेहतर उपाय है। जो कि निम्नानुसार है-
| टीके का नाम | टीका मार्ग | मात्रा | उम्र |
| बत्तख कोलेरा | चमड़ी पर | 1 मिली वयस्क 2 मिली | 3-4 सप्ताह पिछले टीके के 1 माह बाद |
| बत्तख प्लेग | 1 मिली | 8-12 सप्ताह |
उपसंहार:- बत्तख पालन की इतनी लाभप्रद विशेषताएं तथा अनेक कुक्कुट बीमारियों की प्रतिरोधकता में यह एक अच्छे व्यवसाय के रूप में उभर रहा है। जिसमें कम लागत (विशेषतः दाना खर्च) में सफलतापूर्वक आर्थिक प्रगति की जा सकती है। वर्तमान में ग्रामीण बैकयार्ड मुर्गी पालन की भांति ही ग्रामीण बैकयार्ड बत्तख पालन भी षासन की योजनाओं में षामिल है। इससे अनेक ग्रामीण लाभाविन्त हो रहे है। इस प्रकार बत्तख पालन सभी व्यवसाय में अपना श्रेश्ठ स्थान बना रही है।
लेखक :
डॉ. भारती साहू- सहायक प्राध्यापक, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, अंजोरा दुर्ग, छ.ग.
डॉ. फणेष्वर कुमार- पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ, छ.ग. शासन, छ.ग.
डॉ. जागृति कृशान- सहायक प्राध्यापक, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, अंजोरा दुर्ग, छ.ग.
डॉ. रुपल पाठक- सहायक प्राध्यापक, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, अंजोरा दुर्ग, छ.ग.
डॉ. रजनी फ्लोरा कुजुर- सहायक प्राध्यापक, पषुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, अंजोरा दुर्ग,









