किसान भाई अधिक उपज के लिए अपनाएं अरहर की वैज्ञानिक खेती
डॉ.एस.एस.पोर्ते वरिष्ठ वैज्ञानिक ,मृदा विज्ञान, डॉ. जी.पी.बंजारा, वरिष्ठ वैज्ञानिक, सस्य विज्ञान, डॉ सुनील अग्रवाल वरिष्ठ वैज्ञानिक, सस्य विज्ञान एवं डॉ ललीत कुमार रामटेके सह प्राध्यापक मृदा विज्ञान


मानव जीवन में अरहर का दाल सबसे अधिक प्रचलित है। क्षेत्रफल तथा उत्पादन की दृष्टि से दालों में चना के बाद अरहर का दूसरा स्थान है। भारत के लगभग सभी प्रान्तों में इसकी खेती होती है। अरहर का उपयोग दाल के रुप में करते हैं, इसकी चूनी को जानवरों को खिलाया जाता है। फसल की हरी पत्ती को चारे के रुप में पशुओं को खिलाया जाता है और पकी फसल से दाल के अलावा पत्तियों का भूसा एवं लकड़ी प्राप्त होती है। इसकी लकडि़यों से टोकरी ,छप्पर ,मकान की छत, दीवार , ढक्कन आदि भी बनाये जाते हैं तथा इसका प्रयोग मृदा क्षरण रोकने के लिये भी किया जाता है। अरहर की फसल उगाने से मृदा उर्वरता की वृद्धि होती है क्योंकि इसकी पत्तियॉ झड़कर मिटटी में मिल जाने पर खाद का काम करती हैं। अरहर की जडें भूमि में गहराई तक वृद्धि करती हैं,जिसके कारण मृदा में वायु का आयतन बढ़ जाता है। तथा जड़ों में उपस्थित राइजोबियम बैक्टीरिया मृदा में नत्रजन की वृद्धि करता है। वायु द्वारा मृदा क्षरण रोकने में वायु प्रतिरोधक के रुप में भी इसे काम में लाते हैं। लाख के कीड़े पालने मे भी अरहर का प्रयोग करते हैं । इसमें 20.9 प्रतिशत तक प्रोटीन पाई जाती है।
जलवायुः अरहर की खेती आर्द्र तथा शुष्क दोनों ही प्रकार के जलवायु में भली प्रकार उगाई जा सकती है। लेकिन शुष्क भागों में सिंचाई की आवश्यकता होती है। फसल की प्रारम्भिक अवस्था में पौधों की अच्छी वृद्धि व विकास के लिए नम जलवायु की आवश्यकता होती है। बहुत अधिक वर्षा वाले क्षेत्र अरहर की खेती के लिए उत्तम नहीं होता है। परंतु जहॉ की 75-100 से.मी.वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र, अरहर की फसल को सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। पौधों पर फूल आते समय तक फली और दाने बनते समय शुष्क मौसम और तेज धूप के साथ उच्च तापमान की आवश्यकता होती है।
भूमि एवं भूमि का प्रकार: अरहर की फसल लगभग सभी प्रकार के भूमि में उगाई जा सकती है। लेकिन यह फसल मुख्यतः हल्की नम भूमि में अच्छी वृद्धि करती है। अरहर की अधिक पैदावार लेने के लिये यह आवश्यक है कि ऐसी दोमट भूमि का चयन किया जाये जहॉ पानी न ठहरता हो और जो गहरी हो और जिसका पी.एच. मान उदासीन (पी.एच. 7.0) हो। एवं भूमि में पर्याप्त मात्रा में चूना हो चाहिए तथा जल निकास एवं जल धारण क्षमता अच्छी होना चाहिए।
भूमि की तैयारी: ग्रीष्म ऋतु में रबी फसल कटने के बाद एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके, दो या तीन जुताई हैरो या देशी हल चलाकर खेत तैयार करते हैं। मिश्रित फसल के रुप में उगाने पर ,साथी फसल ज्वार, बाजरा,सोयाबीन,धान,कोदो आदि के अनुसार ही तैयारी करते हैं। मृदा को भुरभूरा बनाने व मृदा नमी सरक्षण के लिए जुताई के बाद एक बार पाटा चलाना आवश्यक है। आखिरी जुताई पर सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट 5 टन प्रति हेक्टर की दर से खेत में मिलाना चाहिए ।
अरहर की उन्नतशील किस्में:-
| क्र. | किस्में | फसल अवधि (दिन) | उपज (क्वि./हे.) | कीट व रोग सहनशीलता |
| 01 | राजीवलोचन | 180-190 | 18-20 | सूखा निरोधक |
| 02 | टी.जे.टी.-501 | 135-183 | 15-18 | फल्लीभेदक सहनशील |
| 03 | जे.के.एम.-189 | 170-190 | 18-20 | उकठारोग व बॉझपन निरोधक |
| 04 | विपुला | 145-160 | 14-16 | उकठारोग निरोधक एवे बॉझपन सहनशील |
| 05 | ए.के.टी.-8811 | 135-145 | 15-18 | उकठारोग व फल्लीभेदक सहनशील |
| 06 | मलवीय चमत्कार (एम.ए.एल.-13) | 189-271 | 22-25 | उकठारोग व बॉझपन सहनशील |
| 07 | जे.के.एम.-7 | 170-180 | 18-20 | उकठारोग एवं बॉझपन सहनशील |
| 08 | आशा (आई.सी.पी.एल.-87119) | 180-200 | 18-20 | उकठारोग व बॉझपन निरोधक एवं फल्लीभेदक सहनशील |
| 09 | जागृति (आई.सी.पी.एल.-151) | 135-150 | 15-18 | बॉझपन निरोधक |
| 10 | प्रगति (आई.सी.पी.एल.-87) | 135-150 | 15-17 | उकठा रोग सहनशील |
| 11 | वैशाली (बी.एस.एम.आर.-853) | 165-170 | 16-18 | बॉझपन एवं उकठारोग निरोधक |
| 12 | लक्ष्मी (आई.सी.पी.एल.-85063) | 170-185 | 18-20 | बॉझपन निरोधक |
बीज दर: अच्छी गुणवत्ता वाले बीज 15-20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करना चाहिये । शीघ्र पकने वाली किस्मों में कतारों से कतारों की दूरी 60 से.मी.व पौधे से पौधे की दूरी 15 से.मी. रखी जाती है। एवं मध्यम अवधि वाली फसल को कतार से कतार 90 से.मी. व पौधे से पौधे 20 से.मी. की दूरी में लगाया जाता है।
बीजोपचार: बीज को बुवाई से पहले कार्बेन्डाजिम या थायरम नामक दवा से 3 ग्राम दवा प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करने के बाद राइजोबियम कल्चर एवं पी.एस.बी.कल्चर का 5 से 10 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके बुवाई करना चाहिये।
बुवाई का समयः- अरहर की बुवाई का उपयुक्त समय 25 जून से 15 जुलाई तक रहता है। जहा पर सिंचाई की सुविधा हो, वहॉ जल्दी बुवाई करना लाभदायक रहता है । इसकी बुवाई में देरी की दशा में अगस्त के प्रथम सप्ताह तक बुवाई कर सकते हैं।
बुवाई की विधिः अरहर की फसल को हमेशा पंक्तियों में बोना लाभप्रद रहता है। तथा मिश्रित फसल की दशा में बोई गई फसल जैसे -मक्का ,मूॅग, मूॅगफली,उड़द,बाजरा,सोयाबीन एवं शीघ्र पकने वाले धान के साथ इसकी सफलता पूर्वक खेती की जा सकती है। ट्रैक्टर सीड ड्रिल के सीड बाक्स में किसी एक पंक्ति में बीज गिरने वाले सुराख को बन्द करने से एक-एक कूड़ के अंतराल में बीज गिरेगा तथा आवश्यक दूरी पंक्तियों के बीच में बनाई जावे। सोयाबीन के साथ अरहर को लगाने के लिये सोयाबीन की 4-6 कतारें के बाद अरहर की दो कतार लगाएं। ऐसा करने से सोयाबीन फसल कटने के बाद अरहर से अतिक्ति उपज प्राप्त हो जाती है। जिस भूमि में पानी नहीं रुकता हो, वहॉ धान के साथ अरहर लगाकर अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
उर्वरक: उर्वरक का उपयोग हमेंशा मृदा परीक्षण परिणाम के बाद सिफारिशा की गई उर्वरक की मात्रा के अनुसार करना चाहिए। सामानयतः इस फसल के लिये 20 कि.ग्रा.नत्रजन, 50 कि.ग्रा.स्फुर एवं 20 कि.ग्रा.पोटाश प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय उपयोग करते हैं। सल्फर 20 कि.ग्रा.प्रति हेक्टेयर की दर से देना लाभप्रद है। स्फुर की पूर्ति के लिए डी.ए.पी. उर्वरक की अपेक्षा राखड़ (सिंगल सुपर फास्फेट) का उपयोग करना चाहिये। इससे सल्फर की मात्रा अलग से देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
खरपतवार नियंत्रणः अरहर की फसल बुवाई के पश्चात दो माह तक खेत खरपतवार से रहित होनी चाहिये। इस अवधि में खरपतवारों का नियंत्रण करना आवश्यक है। अरहर फसल में दो बार निंदाई व गंड़ाई करनी चाहिये। रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण हेतु बुवाई के 2 से 3 दिन के अंदर ऐलाक्लोर (सक्रिय तत्व 800-1000 ग्राम प्रति एकड़) नामक दवा का छिड़काव करना चाहिए । यह दवा संकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले दोनों प्रकार के खरपतवारों को नियंत्रण करता है।
सिंचाई एवं जल निकासः अरहर खरीफ की फसल होने के कारण इसमें सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है, परंतु मध्यम तथा देर से पकने वाली किस्मों में फूल आने व दाने पड़ते समय मृदा में नमी का अभाव नहीं होना चाहिये । अर्थात खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिये। जल निकास के अभाव में पद गलन रोग से फसल को नुकसान होता है तथा उपज में कमी हो जाती है।
कीट प्रबन्धन: अरहर की फसल पर मुख्य रुप से निम्नलिखित कीटों का प्रकोप होता है
1 चने की इल्ली 2 चित्तीदार फली भेदक 3 अरहर की फल मक्खी 4 पिच्छकी शालभ 5 फली मत्कुण आदि ।
प्रबंधन के उपाय: निम्नलिखित इस प्रकार हैं
1. खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें ।
2. गेंदा के पौधों को टैªप फसल के रुप में बार्डर (फसल के चारों तरफ) पर लगायें ।
3. खेत में चिडि़यों के बैठने हेतु ”टी“ आकार की खूंटी लगभग 50 नग प्रति हेक्टेयर गड़ायें ।
4. प्रकाश प्रपंच फसल से 10-15 मीटर की दूरी पर लगायें एवं शाम 6.30 बजे रात्रि 10.30 बजे तक चलायें।
5. फसल की कटाई होनें तक सतत् निगरानी करते रहें।
कीट का रासायनिक नियंत्रण:
अ. फसल में इल्लियों के साथ पाड बग होने पर:- एसीफेट 75 एस.पी. नामक दवा का 1.0 कि.ग्रा./हे. की दर से खेत में छिड़काव करें।
ब. इल्ली की अवस्था बड़ी (4 या 5 ) होने पर:- 1. प्रोफेनोफास 40 ई.सी + साइपरमेथ्रिन 4 ई.सी.1.5ली/हे. दर से छिड़काव करें। 2. क्लोरपायरीफॉस 50 प्रतिशत + साइपरमेथ्रिन 5 प्रतिशत 1.0 ली/हे. दर से छिड़काव करें।
अरहर फसल में रोग प्रबन्धन:-
| क्र. | रोग | कारण | रोकथाम के उपाय |
| 01 | उकठा (विल्ट) | यह रोग फ्यूजेरियम उडम नामक कवक द्वारा होता है। | रोग से बचने के लिए गर्मी में खेत की गहरी जुताई करे व निरोधक किस्में जैसे सी.-11,जे.ए.-4, आशा, राजीवलोचन आदि लगाना चहिए। |
| 02 | झाुलसा रोग | खेत में जहॉ पानी अधिक ठहरने के कारण होता है। | बीज बोने से पूर्व बीजोपचार करें। जल निकास का उचित व्यवस्था करें। तथा निरोधक किस्में जैसे- जे.के.एम.-189 को लगाएं। |
| 03 | बॉझ रोग | यह रोग वायरस से होता है तथा एरेयोफिड माइट के द्वारा फैलता है। जिससे पौधा झाड़ीनुमा हो जाता है एवं फूल -फल नहीं बनता है। | माइट के नियंत्रण के लिए मेटासिस्टॉक्स 20 ई.सी. नामक दवा का 600मि.ली. या फास्फोमिडान 85 ई.सी.का 300 मि.ली.दवा का छिड़काव करें तथा निरोधक किस्में जैसे – आशा,राजीवलोचन ,बी.एस.एम.आर.-736,जे.के.एम.-189 को लगाएॅ। |
फसल कटाई व गहाईः उचित समय पर फसल की कटाई करने के बाद गहाई करें।भण्डारण के समय दानों में नमी की मात्रा 10से 13 प्रतिशत होना चाहिए।










