उद्यानिकी

सूरन की वैज्ञानिक खेती

युगल किशोर लोधी, जितेन्द्र त्रिवेदी एवं प्रवीण कुमार शर्मा

परिचय : जिमीकंद या सूरन ‘एरेसी’ कुल का एक बहुवर्षीय कंद वर्गीय पौधा है, जिसके कंद व तने का इस्तेमाल सब्ज़ी, अचार, चटनी बनाने से लेकर औषधि बनाने में किया जाता है। भोज्य पदार्थों के संचन हेतु यह भूमिगत तना का रूपांतरण कर कंद बनाता है, जिसे घनकंद कहते हैं। जिमीकंद को ओल या सूरन या बालुकन्द आदि नामों से भी जाना जाता है। जिमीकंद में कैल्शियम, खनिज, फास्फोरस, कार्बोहाइड्रेट जैसे कई प्रमुख पोषक तत्व पाए जाते है। इसमें पोषक तत्वों के साथ ही अनेक औषधीय गुण भी पाये जाते हैं जिनके कारण इसे आयुर्वेदिक औषधियाँ बनाने में उपयोग किया जाता है। जिमीकंद को बवासीर, खुनी बवासीर, दमा, उबकाई, ट्यूमर, फेफड़ो की सूजन, पेचिस और पेट दर्द जैसी कई बीमारियों से राहत पाने के लिए औषधि के रूप में उपयोग में लाया जाता है।

देश के लगभग सभी राज्यों में जिमीकंद की खेती की वर्षों से की जा रही है किन्तु फिर भी कई किसान इसकी खेती से मुनाफा नहीं ले पा रहे हैं। किसी भी फसल से मुनाफा प्राप्त करने के लिए सही विधि से खेती करना आवश्यक है। इसकी खेती गर्मी के मौसम में अप्रैल मई के महीने में शुरू की जाती है, इसलिए अच्छी फसल के लिए सिंचाई की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। खेत में जिमीकंद लगाने हेतु कंद का ही उपयोग की जाती है, ज्यादातर किसान जिमीकंद के छोटे कंद का उपयोग लगाने हेतु करते हैं। जिस वजह से उपज के रूप में छोटे व कम वनज वाले जिमीकंद ही प्राप्त होते है। यदि जिमीकंद की व्यवसायिक खेती शुरू करनी है, तो कम से कम एक से डेढ़ किलो वजनी जिमीकंद का ही उपयोग बीज के रूप में करना चाहिए। बड़े जिमीकंद का उपयोग खेती में बीज के रूप में करने से सात से आठ महीने बाद हमें बड़े आकार का जिमीकंद उपज के रूप में प्राप्त हो सकती है। किसान अगर इसकी उन्नत किस्मों का चयन करके वैज्ञानिक तकनीक से खेती करें, तो अच्छा मुनाफ़ा कमा सकते हैं।

उपयुक्त जलवायु
जिमीकंद गर्म जलवायु का पौधा है। इसकी खेती के लिए 20 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड का तापमान काफी उपयुक्त होता है। बुआई के समय बीजों को अंकुरण के लिए अधिक तापमान की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि इसकी बुआई अप्रैल से मई के महीने में की जाती है जबकि पौधों की बढ़वार के दौरान अच्छी बारिश होना जरूरी है। कंद को विकास करने के लिए ठंड के मौसम की जरूरत होती है। जिमीकंद के पौधों को अंकुरित होने के लिए 20 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती है। अंकुरित होने के बाद पौधों को विकास करने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है। इसके पौधे अधिकतम 35 डिग्री तापमान पर भी अच्छे से विकास करते हैं।

उपयुक्त मिट्टी
जिमीकंद की खेती के लिए उत्तम जल निकास वाली भूरभुरी बलूई दोमट मिट्टी, जिसमें जीवांश पदार्थ का प्रचुर मात्रा हो उपयुक्त होती है। इस तरह की मिट्टी में इसके पौधे अच्छे से विकसित होते हैं। किन्तु अधिक जल-भराव वाली भूमि में इसका विकास रूक जाता है। जलभराव की स्थिति में इसके कंदो का विकास अच्छे से नहीं हो पाता है। इसकी खेती के लिए 6 से 7 पी.एच मान वाली भूमि उपयुक्त होती हैं।

खेत की तैयारी
जिमीकंद की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए बीजों को खेत में लगाने से पहले खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लें। इसके लिए खेत की अच्छे से गहरी जुताई कर कुछ दिनों के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दें, ताकि खेत की मिट्टी में अच्छे से धूप लग सके। खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और दो-तीन बार देशी हल से अच्छी तरह जोत कर मिट्टी को मुलायम तथा भुरभुरी बना लें। प्रत्येक जुताई के बाद खेत में पट्टा चलाकर समतल कर दें।

प्रवर्धन
जिमीकंद में प्रवर्धन वानस्पतिक विधि द्वारा की जाती है। बीज के रूप में बुवाई के लिए पूर्ण रूप से पक चुके कंदो का ही उपयोग किया जाता हैं। पूर्ण रूप से पक चुके कंदो को कई भागों में काटकर कंद का टुकड़ा खेत में लगाया जा सकता है। बुआई हेतु 250 से 500 ग्राम का कंद का टुकड़ा उपयुक्त होता है। यदि उपरोक्त वजन के पूर्ण कंद के उपलब्ध हो, तो उनका ही उपयोग करें। इससे फसल जल्दी तैयार होता है एवं अधिक उपज की प्राप्ति होती है। कंद को टुकड़े में काटते समय ध्यान रखें कि प्रत्येक टुकड़े में कम से कम एक कलिका अवश्य रहें। प्रति हेक्टेयर खेत में 50 किंवटल बीज की आवश्यकता होती है।

बीज दर
250 ग्राम के कंद को 75 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाने से 50 किंवटल प्रति हैक्टेयर, 500 ग्राम के कंद लगाने पर 80 किं्वटल, 250 ग्राम का कंद एक मीटर की दूरी पर लगाने से 25 किंवटल, 500 ग्राम के कंदों को एक मीटर पर लगाने के लिए 50 किंवटल प्रति हैक्टेयर बीज कंद की जरूरत होती है।

बीजोपचार
कंदों की बिजाई करने से पूर्व इनका उपचार जरूर करना चाहिए। इसके लिए 5 ग्राम इमीसान एवं तीन ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 0.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में घोलकर कंदों को आधा घण्टे तक दवा वाले पानी में डुबाकर निकालना चाहिए या कार्बन्डाजिम एवं बावस्टीन की दो ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर कंदों को उसमें डुबोकर भी उपचार किया जा सकता है।

बुवाई का समय
जिमीकंद की बुवाई अप्रैल से मई महीने में की जाती है।

बुवाई की विधि
दो विधियों द्वारा जिमीकंद की बुआई की जाती है।
नाली मेंः जिमीकंद की बुआई करने के लिए अंतिम जुताई के समय गोबर की सड़ी खाद एवं रासायनिक उर्वरक में नेत्रजन एवं पोटाश की 1/3 मात्रा एवं फास्फोरस की पूर्ण मात्रा को खेत में मिलाकर जुताई कर देते हैं। उसके बाद कंदों के आकार के अनुसार 75 से 90 सें.मी. की दूरी पर कुदाल द्वारा 20 से 30 सें.मी. गहरी नाली बनाकर कंदों की बुआई कर दी जाती है तथा नाली को मिट्टी से ढक दिया जाता है।

गड्ढों मेंः जिमीकंद की बुआई अधिकांशतः इसी विधि से की जाती है। इस विधि में 75 x 75 x 30 सेमी या 1.0 x 1.0 मी. x 30 सेमी लंबा, चौड़ा एवं गहरा गड्ढा खोद कर कंदों की रोपाई की जाती है। रोपाई के पूर्व निर्धारित मात्रा में खाद एवं उर्वरक मिलाकर गड्ढों में डाल दें। कंदों को बुआई के बाद मिट्टी से पिरामिड के आकार में 15 सें.मी. उंचा कर दें। कंद की बुआई इस प्रकार करते हैं कि कंद का कलिका युक्त भाग ऊपर की तरफ सीधा रहें।

उन्नत किस्में
जिमीकंद की कई उन्नत किस्में हैं। जिन्हें उनकी गुणवत्ता, पैदावार और उगने के मौसम के आधार पर तैयार किया गया है। जैसे- गजेन्द्र, एम -15, संतरागाछी, कोयंबटूर इत्यादि।

सिंचाई प्रबंधन
सूरन की फसल को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है, इसलिए बीजो की रोपाई के बाद तुरंत सिंचाई कर देनी चाहिए, तथा बीजो के अनुकरण तक खेत में नमी को बरक़रार रखने के लिए सप्ताह में दो बार सिंचाई करनी चाहिए द्य सर्दियों के मौसम में इसके पौधों को 15-20 दिन सिंचाई की आवश्यकता होती है, वही बारिश के मौसम में जरूरत पड़ने पर ही इसके पौधों की सिंचाई करनी चाहिए।

मल्चिंग
बुआई के बाद पुआल अथवा शीशम की पत्तियों से ढक दें जिससे जिमीकंद का अंकुरण जल्दी होता है, खेत में नमी बनी रहती है तथा खरपतवार कम होने के साथ ही अच्छी उपज प्राप्त होती है।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
जिमीकंद की अच्छी उपज हेतु खाद एवं उर्वरक का इस्तेमाल करना बहुत ही आवश्यक है। इसके लिए 10-15 किं्वटल गोबर की सड़ी खाद, नेत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश 80ः60ः80 किग्रा./हे. के अनुपात में प्रयोग करें। बुआई के पूर्व गोबर की सड़ी खाद को अंतिम जुताई के समय खेत में मिला दें। फास्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा, नेत्रजन एवं पोटाश की 1/3 मात्रा बेसल ड्रेसिंग के रूप में तथा शेष बची नेत्रजन एवं पोटाश को दो बराबर भागों में बाँट कर कंदों के रोपाई के 50-60 तथा 80-90 दिनों बाद गुड़ाई एवं मिट्टी चढ़ाते समय प्रयोग करें।

खरपतवार प्रबंधन
जिमीकंद के खेत में बहुत ज्यादा खरपतवार नहीं होती है। लेकिन खेत से घास और खरपतवार को हटा देने से रोग लगने की संभावना नहीं रहती है। जिमीकंद के खेत में सामान्य खरपतवार नियंत्रण की आवश्यकता होती है। इसके लिए बीजो की रोपाई से तक़रीबन 15 दिन बाद प्राकृतिक तरीके से निराई-गुड़ाई कर खरपतवार पर नियंत्रण करना चाहिए। जिमीकंद के पौधों को लगभग तीन से चार निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है।

रोग व कीट प्रबंधन
झुलसा रोगः रोग का लक्षण आते ही बाविस्टीन अथवा इंडोफिल एम 45 का 2.5 मिली. प्रति ली. की दर से 2 से 3 छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करें।
तना गलनः इसके रोकथाम हेतु उचित फसल चक्र अपनाएँ। जल निकास की उचित व्यवस्था रखें। कंद लगाने से पूर्व उसे बताई गयी विधि द्वारा उपचारित कर लें। कैप्टान दवा के 2 प्रतिशत के घोल से 15 दिनों के अंतराल पर दो से तीन बार पौधे के आस-पास भूमि को भींगा दें।
जिमीकंद भृंग: इस कीट से बचाव के लिए नीम के काढ़े का माइक्रो झाइम के साथ मिश्रित कर छिड़काव करें।
तम्बाकू की सुंडीः इस कीट की रोकथाम के लिए पौधों पर मेन्कोजेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की उचित मात्रा का छिडकाव करें।

कंदो की खुदाई, पैदावार एवं भंडारण
बुआई के सात से आठ माह के बाद जब पत्तियाँ पीली पड़ कर सूखने लगती है तब फसल खुदाई हेतु तैयार हो जाती है। खुदाई के पश्चात कंदों की अच्छी तरह मिट्टी साफ़ कर दो-तीन दिन धूप में रखकर सुखा लें। कटे या चोट ग्रस्त कंद को स्वस्थ कंदों से अलग कर लें। इसके बाद कंद को किसी हवादार भण्डार गृह में लकड़ी के मचान पर रखकर भण्डारित करें। इस प्रकार जिमीकंद को पांच से छः माह तक आसानी से भण्डारित किया जा सकता है। एक हेक्टेयर के खेत में तकरीबन 70 से 80 टन की पैदावार प्राप्त हो जाती है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Related Articles

Back to top button