दुधारू पशुओं में गर्भपात एवं प्रबंधन
डॉ. प्रशांत सागर शर्मा, डॉ.आर.पी. तिवारी, डॉ.गिरीश कुमार मिश्रा (पशु मादा रोग विषेशज्ञ )


गर्भकाल पूर्ण होने से पूर्व मृत अथवा जीवित भू्रण गर्भाशय से बाहार आना गर्भपात कहलाता है। प्रायः 1 से 3 प्रतिशत गर्भपात में शिशु जीवित रहते है, अन्यथा उनकी मृत्यु गर्भपात के 24 घंटे के भीतर हो जाती है। गर्भपात के कारण पशुपालको को काफी आर्थिक नुकसान का सामना करना पङता है। गर्भपात के अनेक कारण हो सकते है, जैसे संक्रमण, अनुवांशिक विकृति, हार्मोन्स स्त्राव में विषमता, पोषण की कमी, विषैले पदार्थ का सेवन आदि। वृहद रूप में गर्भपात को निम्नलिखित रूपों में बांटा गया हैः-
1.संक्रामक
2.असंक्रामक
गर्भपात के संक्रामक कारण-गाय,भैंसो में गर्भपात के ये प्रमुख कारण है।
| लेप्टोस्पायरोसिस | गर्भकाल के आखिरी दो माह में |
| कवक | गर्भकाल के चार से छः माह के बीच |
| साल्मोनेला डबलिन | गर्भकाल के सातवे माह में |
| ब्रुसेला एबॉर्टस | गर्भकाल के चार से छः माह में |
| हर्पीज वायरस | गर्भकाल के चार से छः माह में |
| लिस्टिरिओसिस | गर्भकाल के आखिरी दो माह में |
| विबियोसिस | गर्भकाल के पॉच से छः माह में |
| ट्राइकोमोनिएसिस | गर्भकाल के किसी भी अवस्था में |
गर्भपात के असंक्रामक कारण-
1. हार्मोन्स स्त्राव में विषमता-कॉटिजोन एवं इस्ट्रोजन हार्मोन्स की अधिकता तथा प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन्स की कमी के कारण गर्भपात होता है। गर्भकाल के दौरान इस्ट्रोजन हार्मोन्स की अधिकता वाले अहार लेना एवं तनाव के कारण कॉटिजोन हार्मोन्स का स्त्राव गर्भपात के प्रमुख कारण है। प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन्स की कमी से गर्भकाल के 45-185 दिनों तक गर्भपात का खतरा बना रहता है।
2.पोषण की कमी-गर्भवस्था हेतु महत्वपूर्ण पोषण तत्व जैसे विटामिन-’ए’,केल्सियम, सेलेनियम, आयोडिन, कोबाल्ट, आयरन व कॉपर की कमी के कारण भी गर्भपात होने का खतरा बना रहता है। इस हेतु गर्भवस्था के दौरान गर्भवती मॉ को तीन माह तक प्रत्येक माह विटामिन-‘ए‘,‘ई‘ एवं ‘डी3‘ का इंजेक्शन लगवाना काफी कारगर होता है।
3.अनुवांशिक तत्व-कुछ घातक जीन के प्रमुखता के कारण भ्रूण कभी भी पूर्ण अवधि तक जीवित नही रह पाता, जिससे भ्रूण का सूखना तथा भू्रण का गर्भाशय के अंदर संङना आदि कठिनाई का सामना करना पङता है। घातक जीन के उभरने का प्रमुख कारण अतः प्रजनन (Inbreeding) है। जिसके बचाव से अनुवांशिक तत्व से होने वाले गर्भपात को रोका जा सकता है।
4.अन्य बीमारियों-खुरहा-चपका,गलघोंटु,शिपिंग-फीवर,म्युकोसल-डीसिस, पॉक्स,बोवाइन इनफेक्सियस फीवर,
मैलिगनेट फीवर आदि बीमारियों के कारण भी गर्भपात होने का खतरा बना रहता है। पॉक्स के कारण भैंसो में गर्भपात शुरूवाती दिनों में ही हो जाता है। जिसके बचाव हेतु केंद्र एवं राज्य शासन द्वारा खुरहा-चपका,गलघांेटु एवं पॉक्स टीकाकरण हेतु वृहद रूप में कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे है।
5.विविध-
अ.पशुओं को गर्भाशय के भाग में किसी तरह बाहरी चोट लगना।
ब.गर्भवती पशुओं का टीकाकरण ।
स.वाहन से एक स्थान से दुसरे स्थान ले जाने से।
द.उपचार के दौरान गर्भवती पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान करना अथवा उस दवा से उपचार (कृमिनाशक दवा,एंटीबायोटिक) हेतु प्रयोग या किसी विषैले पदार्थ (अरंडी तेल,सेलेनियम, अरगट आदि पदार्थ) का सेवन करना जिससे गर्भपात हो सकता है।
ई.शुरूवाती गर्भवस्था में गुदा द्वार से गर्भाशय के परीक्षण के दौरान गर्भाशय तथा अंडाणु में अधिक दबाव के कारण कॉपर्स ल्यूटियम फट जाता है, इसके फलस्वरूप प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन्स की कमी से गर्भपात हो सकता है।
गर्भपात के लक्षण-
गर्भवस्था के शुरूवाती दिनों में गर्भपात बिना लक्षण प्रकट किये हो जाता है जिससे पशुपालको को मालुम ही नही पङता, इस अवस्था में गर्भपात होने से योनी मार्ग के आसपास गर्भनाल का भाग चिपका रहता है। परंतु गर्भवस्था के द्वितीय अथवा तृतीय तिमाही में भू्रण गर्भाशय से बहार आता है। गर्भपात होने से पूर्व पशुओं द्वारा पूंछ ऊंची कर जोर लगाना,विशेष अवाज में रम्हाना, योनी मार्ग का ढीला होना अथवा योनी मार्ग से हलका स़़्त्राव होना आदि लक्षण देखे जा सकते है।

गर्भपात उपरांत उपचार-
1.गर्भाशय का एंटीबायोटिक द्वारा उपचार जिससे आने वाले गर्भवस्था में संक्रमण का खतरा कम हो।
2.दर्द एवं सूजन की दवा से उपचार।
3.गर्भाशय का सिकुङन एवं सफाई करने वाली दवाई से उपचार ।
सावधानियां-
1.जिन पशुओं में गर्भपात होता है उन पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना।
2.मृत भू्रण अथवा शिशु को जमीन में गहरा गाङ कर चूना डालना जिससे यह मृत भू्रण स्वस्थ पशुओं में संक्रमण के कारक ना हो।
3.जिस जगह पर गर्भपात होता है, उस जगह की अच्छी तरह से सफाई करें तथा संक्रमित दाने तथा चारे को आग से जला दे।
4.संक्रमित गर्भपात बीमारीयों का समय में टीकाकरण।
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