पशुपालन

अंजोरी-छत्तीसगढ की बकरी की एक मात्र पंजीकृत नस्ल

डॉ. रामचंद्र रामटेके, डॉ. केशर परवीन, डॉ.मनोज गेन्दले, डा. शबीर अनंत एवं डा. के.मुखर्जी

छत्तीसगढ़ राज्य को पशु अनुवांशिक संसाधनों की विविधता के लिए जाना जाता है। 2019 के 20 वी पशु संगणना के अनुसार भारत में बकरी की आबादी लगभग 1350 लाख है, इनमें से लगभग 40 लाख बकरी छत्तीसगढ़ में पाई जाती है। छत्तीसगढ़ एक उन्नतिशील राज्य है। इसका क्षेत्रफल 1,35,198 वर्ग कि.मी. है तथा इसका तकरीबन 41 प्रतिशत क्षेत्रफल वनााच्छादित है। छत्तीसगढ़ राज्य की 32.0 प्रतिशत आबादी जनजातीय है। बकरी पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है, विशेष रूप से देश के शुष्क, अर्ध-शुष्क और पर्वतीय क्षेत्रों में बकरी सीमांत, छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों को खाद्य और पोषण सुरक्षा प्रदान करते हैं। जनजातीय क्षेत्रों में प्रायः बकरी पालन, मुर्गी पालन एक सूकर पालन आजीविका के मुख्य क्षेत्र है। छत्तीसगढ में प्रति व्यक्ति मांस की उपलब्धता 2.250 किलोग्राम/व्यक्ति/वर्ष है जबकि राष्ट्रीय औसत 5.40 किलोग्राम/व्यक्ति/वर्ष है, इस डाटा के अनुसार एवं मांग एवं आपूर्ति के अनुसार हमारे प्रदेश में बकरीपालन की अपार संभावनायें है जिससे यहां के लोगो को दूध व मांस के रूप में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन मिल सकता हैं।

बकरी पालन भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में यह अच्छी आमदानी देने वाला व्यवसाय सदियों से प्रचलित रहा है। गरीबो की आय का प्रमुख स्त्रोत होने के कारण बकरी को ‘गरीब की गाय‘ कहा जाता है। बकरियां भारत में मुख्य मांस उत्पादक जानवरों में से हैं, जिनका मांस सबसे अच्छे मांस में से एक है और इसकी घरेलू मांग बहुत अधिक है। मांस के अलावा, बकरियां दूध, चमड़ा, फाइबर और खाद जैसे अन्य उत्पाद प्रदान करती हैं। बकरियां छोटी आकार की होने के कारण आसानी से महिलाओ एवं बच्चो के द्वारा पाली जा सकती है। बकरी व्यवसाय प्रारंभ करने के लिये अधिक धन की आवश्यकता भी नही होती है तथा रखरखाव पर खर्च भी बहुत कम होता है। जितने खर्च पर गाय पाली जाती है उतने खर्च पर 05 बकरियां पाली जा सकती है।

छत्तीसगढ की जलवायु एवं परिस्थितियों में बकरी पालन के लिये अनुकूलता की असाधारण क्षमता है। अतः समय की मांग के अनुसार छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में बकरीपालन की असीम संभावनाओं का भरपूर लाभ उठाना चाहिये। विश्व में पालतु बकरी की 300 से अधिक नस्लें हैं एवं वर्तमान में भारत में कुल 34 पंजीकृत नस्लें है इसके अलावा यहॉ पर स्थानीय अपंजीकृत संकर एवं विदेशी नस्लें भी पायी जाती है।

छत्तीसढ़ के ग्रामीण क्षेत्रो में बकरी पालन का चलन प्राचीन काल से ही लोकप्रिय है। ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष वर्ग ’गड़रिया‘ इनके बड़े समूहो को परंपरागत रूप से पालते है। दूसरे गरीब एवं सर्वहारा तबके भी इनका पालन करते आये है। छत्तीसगढ में इसे छेरी कह कर संबोधित किया जाता है। प्रदेश मे 2019 के 20वी पशु संगणना के अनुसार 40 लाख बकरा बकरी, में से लगभग 10 लाख अंजोरी नस्ल की है छत्तीसगढ के पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्याालय के वैज्ञानिकों ने लगातार कई वर्षो तक इस स्थानीय बकरी का विधिवत अध्ययन किया एवं जिसे वर्ष 2022-23 को पंजीकृत ( INDIA_GOAT_ANJORI_06038) किया गया है एवं अजोंरा स्थान के नाम से अंजोरी नाम दिया गया।

अंजोरी बकरी मुख्य रूप से छत्तीसगढ के प्लेन एरिया जैसे, रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा, बेमेतरा, बालोद, धमतरी, महासमुंद, बलौदाबाजार आदि जगहों में पाई जाती है। इनका रंग भूरा काला एवं आकार मध्यम का होता है एक व्यस्क बकरी की औसतन ऊंचाई 66 सें.मी. एवं व्यस्क बकरे का औसतन ऊंचाई 65 सें.मी. तक हो सकती है। व्यस्क बकरी का वजन 15 से 30 किलोग्राम एवं बकरे का वजन 20 से 35 किलोग्राम होता है। इन बकरियों के सींग प्रायः सीधे खडें एवं पीछे की ओर मुडे हूये होते है। बकरी लगभग 8 माह के उम्र में प्रजनन योग्य हो जाती है। दो साल के अंतराल में तीन बार बच्चें देती है। 50 फीसदी बकरियां जुडवें बच्चें देती है। इनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता बहुत कम होती है जो कि लगभग आधा लीटर प्रतिदिन एवं एक ब्यांत में कुल 30 से 35 लीटर दूग्ध उत्पादन क्षमता होती है इन बकरियों का दूध उत्पादन अवधि तीन से साडें 3 माह तक होता है, लेकिन स्थानीय जलवायु के हिसाब से बकरियों के दूध में मिठास होने के साथ-साथ गर्मी सहन करने की अधिक क्षमता के साथ साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता दूसरें राज्य के बकरियों से ज्यादा होती है जो कि अन्य नस्लों में नहीं पाई जाती है।

ए.आई.सी.आर.पी बकरी परियोजना अंतर्गत दाउ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनू विश्वविद्यालय अंजोरा दुर्ग एवं केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान मथुरा के संयुक्त प्रयास से भविष्य में अंजोरा में अंजोरी बकरी के आनुवांशिक, प्रजनन क्षमता, पोषण, सामान्य प्रबंधन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, दूग्ध एवं मांस की गुणपत्ता के ऊपर इंटेसिव अध्ययन के साथ-साथ आसपास के अंजोरी बकरी पालने वाले किसानों को क्षमा मूलक प्रशिक्षण, तकनीकी मदद देकर साथ ही साथ अच्छे नस्ल के बकरे वितरित करके जर्मप्लाज्म में सुधार करके बकरियों के नस्ल में सुधार करके ज्यादा से ज्यादा बच्चे एवं औसत वजन को बढाकर अधिक आर्थिक लाभ कमाया जा सकता है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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