आम के पुराने एवं अनुत्पादक बागों की जीर्णोद्धार तकनीक
डॉ. प्रदीप कुमार मिश्रा, डॉ. विनय कुमार, डॉ. के. एम. सिंह, एवं एम. के. पाण्डेय


भारत में आम जन सामान्य द्वारा सर्वाधिक पसन्द किया जाता है और अपनी विविध गुणवत्ता के कारण फलों का राजा कहा जाता है। स्वाद एवं पौष्टिकता के साथ-साथ रोजगार व आमदनी में स्त्रोत का प्रबल क्षमता में कारण इसकी बागवानी देश में लोकप्रिय है। भारत में आम का क्षेत्रफल लगभग 12लाख 28 हजार हेक्टेयर है और इस क्षेत्रफल से 109.9 लाख मैट्रिक टन आमोंत्पादन किया जाता है। विश्व व्यापार संगठन के दौर में आम के निर्यात की स्थिति सुदृढ करने के लिए गुणवत्ता युक्त प्रति इकाई उत्पादन में वृद्धि लाना एक चुनौती है जबकि वर्तमान में आम की उत्पादकता वृक्षों की क्षमता के अनुरूप नहीं है जिसके अनेक कारण हैं जैसे आम के बागों में वैज्ञानिक प्रवर्धन न करना, व्यापारिक किस्मों का द्विवार्षिक फलन कीट एवं व्याधियों का सामयिक एवं उचित नियंत्रण न करना जानकारी के अभाव में अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों के बाग न लगाना तथा पुराने घने व अनुत्पादक बागों की बहुमूल्य आदि। देश में आम के 30-35 प्रतिशत पुराने एवं अनुत्पादक बागों का होना आमोत्पादन में अवरोध ही नहीं बल्कि एक गम्भीर चिन्ता का विषय है।
अन्य फलों की तरह आम के पेड़ भी एक निश्चित आयु के बाद कम उपज देने लगते है और आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी हो जाते है। वृक्षोें की इस स्थिति में प्राकृतिक होने के साथ कई अन्य कारण भी हो सकते हैं क्योंकि उसे इस अवस्था में शीघ्र पहुंचाने में सहायक होते हैं। देखा गया है ककि लगभग 50 वर्ष बाद आम के वृक्षों फैलाव काफी बढ जाता है और वृक्षों की शाखाएं बढकर दूसरे पेड़ों को छूने लगती है। इस कारण बाग अत्याधिक घने हो जाते हैं और वृक्ष में पर्णीय भागों में समुचित मात्रा में धूप नहीं पहुंच पाती है जिससे प्रकाश संश्लेषण क्रिया क्षीण हो जाती है। कल्ले पतले अस्वस्थ हो जाते है जो पुष्पन एवं फलन हेतु अनुपयोगी होते है। यही नहीं बल्कि बाग शीघ्र ही कीट एवं व्याधियों से ग्रसित हो जाते हैं। जिनका सामयिक नियंत्रण कर पाना कठिन हो जाता है। इस प्रकार उत्पादन की दुष्टि से बाग अनुपयुक्त हो जाते हैं। ऐसे वृक्षों में वांछित कटाई छटाई (करके) बागों को पुनः उत्पादक बनाया जा सकता है आवश्यक कटाई-छटाई करने से नये फलों का सृजन होता है। तथा वृक्षों के ढ़ाचे में आवश्यक परिवर्तन लाया जा सकता है। इस क्रिया से सूर्य का प्रकाश वृक्ष के सम्पूर्ण वर्णीय क्षेत्र में समूचित रूप से उपलब्ध हो जाता है जो वृक्षों में पुष्पन एवं फलन में सहायक होता है।
जीर्णोंद्धार तकनीक
कृन्तन विधि:- पुराने घने एवं आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी आम के वृक्षों की सभी अवांछित शाखाओं को पहले चिन्हित कर लेते है। चिन्हित शाखाओं का भूमि सतह लगभग 4.0 मीटर की ऊंचाई पर दिसम्बर में शक्ति चालित आरी से काटते हैं। इसके साथ ही साथ सूखी रोग ग्रस्त एवं पेड़ के बीच घनी शाखाओं को लेकर निकाल देते हैं। कृन्तन कटते समय यह सावधानी अवश्य रखनी चाहिए कि शाखाएं आवश्यक रूप से निचले भाग में फट न जाये। अतः पहले आरी से नीचे की तरफ लगभग 15.20 सेमी0 कृन्तन कर फिर टहनी को दूसरी भाग से काटई करते हैं।
कृन्तन के तुरन्त बाद एक कि0ग्रा0 फंफूदीनाशक दवा (कापर आक्सी क्लोराइड) 250ग्रा0 अरण्डी का तेल एवं उचित मात्रा में पानी मिलाकर तैयार किया गया लेप शाखाओं में कटे हुए भाग पर लगाते है ताकि सूक्ष्म जीवाणुओं तथा रोगों का संक्रमण हो। जीर्णोंद्वार के लिए कृन्तन क्रिया दो चक्रों में की जा सकती है। प्रथम चक्र में बाग की आधी एकान्तर पंक्तियों का कृन्तन करने से बागवानों पर आर्थिक प्रभाव कम पड़ता है। एकान्तर पंक्तियों में कृन्तन के फलस्वरूप बाग में सूर्य का प्रकाश पर्याप्त रूप से उपलब्ध हो जाता है। जिससे शेष एकान्तर पंक्तियों के वृक्षों में जिनकी कटाई, छटाई नहीं की गयी है, समुचित प्रकाश मिलने से स्वस्थ कल्ले निकलते है। और पहले की अपेक्षा कुल उत्पादन में लगभग 3-4 गुना तक वृद्धि हो जाती है साथ ही साथ बागवानों की उपज में वृद्धि कटी लकडि़यों की बिक्री व बाग में अंतः फसलों से अर्जित आमदनी एवं कटाई से हुई उत्पत्ति से पूर्ति हो जाती है।
खाद उर्वक एवं प्रबंधन:-कृन्तित वृक्षों में 2.5 कि0ग्रा0 यूरिया 3.0 सिंगल सुपर फास्फट एवं 1.20 कि0 ग्रा0 क्यूरिएट ऑफ पोटाश प्रति वृक्ष की दर मात्रा से देते है। इन खादों में सिंगल सुपर फास्फेट एवं क्यूरिएट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा और यूरिया की आधी मात्रा फरवरी माह में डालते है। शेष यूरिया की आधी मात्रा जून के अन्त में डालते हैं। इसके अलावा 120 किग्रा0 गोबर की सड़ी खाद (प्रतिवृक्ष) जुलाई के प्रथम सप्ताह में देते है। उर्वक देने के बाद अनिवार्य रूप से अप्रैल से मई के बीच 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते है। साथ ही पेड़ों के नीचे थालों में निराई गुड़ाई करना आदि भी आवश्यक है। जून माह तक नमी को संचित रखने के लिए पॉलीथीन या आम की पत्ती सूखी घास अथवा पुआल थालों में बिछाना (मल्यिग) चाहिए।
सृजित कल्लों का विरलीकरण:-दिसम्बर महीने में कृन्तन के लगभग तीन चार माह उपरान्त (मार्च-अप्रैल) इन काटे गये शाखाओं पर बाहुल्यता से नये कल्ले निकलते हैं जिनका वांछित विरलीकरण आवश्यक है। अन्यथा जलव पोषक तत्वों के लिए परस्पर स्पर्धा के कारण स्वस्थ कल्ले का विकास नहीं हो जाता साथ ही साथ पर्णीय क्षेत्र झाड़ीनुमा हो जाता है।
जो फलन के लिए अनुपयुक्त होते हैं। स्वस्थ कल्लों युक्त खुले पर्णीय क्षेत्र के विकास के लिए शाखाओं के बाहरी और 8-10 स्वस्थ कल्ले क्षति प्रति शाखा रखकर शेष अवांछित कल्लों को हटा दिया जाता है। जून एवं अगस्त में वांछित छंटाई के बाद कापर आक्सीक्लोराइड फफूंदीनाशक दवा (3 ग्रा0 प्रति लीटर पानी में) छिड़काव करना आवश्यक है। इससे पत्तियों पर लगने वाले रोगों से बचाव होता है। अक्टूबर में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का पत्तों पर छिड़काव प्ररोहों की उचित बृद्धि हेतु लाभ दायक होता है।
शिखा (युक्टिंग) रोपड़ः इस विधि में कृन्तित शाखाओं पर बने नव सृजित कल्लों के ऊपर जुलाई-अगस्त में वांछित किस्म से वीनियर साफ्ट वुड की जा सकती है। ऐसा करना तभी उचित रहता है तब कृन्तित वृक्ष वीजू अथवा अवांछित किस्म का हो और उसे वांछित किस्म में परिवर्तित करना हो।
अन्तः फसलें:- वृक्षों की कंटाई-छटाई उपरान्त दोनों तरफ काफी खुली जगह हो जाती है। जिससे अन्तः फसलें लेकर भूमिका उचित उपयोग किया जा सकता है। अतिरिक्त आमदनी अर्जित की जा सकती है। जिसके लिए कोई विशेष लागत नहीं लगानी पड़ती है। इसमें जायद की फसलें खीरा, लौकी, तोरई, तरबूज, खरबूजा, लोबिया, और रबी के मौसम में आलू एवं सरसों बोना लाभदायक है। कीट एवं
व्याधियों का प्रर्वधन:- कृत्रिम पेड़ों की सामायिक देखभाल करनाअति आवश्यक है। शाखाओं के कटे हुए भाग पर कापर आक्सी क्लोराइड का लेप उक्त विधि से तैयार करके कृन्तन के तुरन्त बाद कर देना चाहिए। साथ ही बाग की सामयिक निराई-गुड़ाई करते है ताकि पेड़ों को किसी प्रकार से व्याधि एवं कीटों से क्षति न हो। इसके बावजूद भी यदि वृक्ष तना भेदर कीट से ग्रषित हो जाता है तो वहां से कीट तने पर लकड़ी का बूरादा निकालता है उस सुराख में लोहे पतली तीली डालकर कीटों को नष्ट कर देते है या सल्फास की टिकिया छेद में रख रखकर एवं रूई से ढक कर गीली मिट्टी से विधिवत बन्द कर देते है। इस तरह से कीटों पर नियंत्रण किया जा सकता है पत्ती खाने वाले कीटे के लिए काव्ररर्टल कीटनाशी दवा (तीन ग्रा/लीटर) का 20.-25 दिन के अन्तराल पर 2 छिड़काव रोध पर्ण धब्बों की रोक थाम के लिए कापर आक्सी क्लोराइड 3ग्राम प्रति ली0पानी में) इस का छिड़काव लाभदायक होता है।
पुष्पन एवं फलन: उपरोक्त विवरण के अनुसार कृार्न्तत वृक्षों की विधिवत सघन एवं सामयिक देखभाल करते है। फलस्वरूप इन कृतित शाखाओं पर आये कल्लों पर लगभग दो वर्ष बाद पुष्पन एवं फलन में आने लगते हैं। प्रयोगों के आधार पर पाया गया है कि कृतित वृक्षों से गुणवत्ता युक्त आम ही उपज में प्रति वर्ष बढोतरी होती है। ये पौधे अगले 20 वर्षों के लिए पुनः फलन हेतृ उपयुक्त हो जाते है।










