उद्यानिकीकृषि

जैविक उपायों से करें रोग एवं कीट नियंत्रण

भुनेश दिवाकर, सोनू दिवाकर

जड़ कवक फफूंद से जैविक नियंत्रण किया जाता है। इसके प्रयोग से पौधा स्फुर एवं जस्ते के तत्व ग्रहण कर मृदा जनित पौध रोग नियंत्रण कर मृदा की उर्वरक क्षमता को बढ़ातें है। ट्राइकोडर्मा/माइकोराइजा ऐसी ही जड़ फफूंद कवक है जो जड़ो के पास अत्यधिक मात्रा में रहकर पोषक तत्व पौधे को प्रदान कर रोग से रक्षा करते है। भूमि में सूक्ष्म जीवों की क्रिया चलती रहती है तथा इस क्रिया को बढ़ाने के लिये इनका प्रयोग किया जाता है।

माइकोराइजा (वैसक्यूलर अरवसकुलर माइकोराइज):- ये पौधों की जड़ो के पास सहजीवी संबंध बनाकर रहता है। ये फफूंद जमीन में स्थित स्फुर को ग्रहण कर पौधों को प्रदान करती है। पौधे की सुगंधता, अधिक अम्लीयता, क्षारियता जैसे प्रतिकूल स्थिति का सामना करने के लिए पौधे को सहायता प्रदान करता है। ये बाहर की कोशिकाओं में कोट बनाकर आवरण तैयार करती है। जिसके कारण जीवाणु अंदर प्रवेश नही कर पाते तथा रोग नियंत्रण भी हो जाता है। पौधें में गंधकीय अमीनो अम्ल तथा आरथों डाय हाइड्रो आक्सीफिनॉल नामक तत्व के स्तर को बढ़ाती है जो पौधे के लिए एन्टीबायोटिक के रूप में कार्य करता है। इसके प्रति हेक्टेर 6 से 10 ग्राम प्रयोग करने से सोयाबीन , चना, गेहॅॅू की फसलों के मृदा जनित रोगों से बचाव किया जा सकता है।

टाइकोडर्माः- ये भूमि से सडे़ गले या मृत पदार्थो से प्राकृतिक में पायी जाने वाली मृत जीवी फफंूद है। भूमि जनित रोग नियंत्रण में लाभदायक है, तथा गोबर खाद के साथ इसका प्रयोग करने से इसकी क्रियाओं में वृद्धि की जा सकती है। इनके प्रयोग करने से गेहूॅ तथा सोयाबीन के तना जड़ तथा कपास के सड़न को नियंत्रित किया जा सकता है।

जैविक विधि में कीट नियंत्रण:- कीट नाशकों के अनियंत्रित प्रयोग से तथा अनुशंसा के विपरित उपयोग से अनेक समस्या सामने आ रही है। जैसे- कीटों में प्रतिरोधी शक्ति का विकास, परजीवी, परभक्षी मित्र कीटों का नाश तथा कीटनाशकों के उपयोग से खेती की लागत में वृद्धि होना इसके साथ ही भूमि तथा जल प्रदूषित होने से पर्यावरण का नुकसान भी हुआ है। जैविक विधि से कीट नियंत्रण करने से काश्त लागत व्यय को कम किया जा सकता है तथा किसान द्वारा आसानी से इसे अपनाया जा सकता है।

गर्मी में गहरी जुताई:- कृषि गत क्रियाओं में फेरबदल कीट पर नियंत्रण रखने का सत्ता सुलभ तरीका है, जिसे किसान आसानी से अपना सकते है। गर्मी में गहरी जुताई करने तथा मिट्टी पलटने से कीटों के अण्डे, इल्लियां, शंखियां व्यस्क कीट जो कि सुप्तावस्था में भूमि मेें पड़े रहते है, बाहर आ जाते है तथा गर्मी की तेज धूप तथा पक्षियों द्वारा नष्ट कर दिये जाते है।

मेढ़ो की साफ-सफाई:- बहुत से कीट खेतों, मेढ़ो की खरपतवार पर रहते है। अतः इनकी समय-समय पर सफाई की जानी आवश्यक है। इस प्रकार कच्चे गोबर का प्रयोग खेतों में नही करें, क्योंकि कच्चे गोबर से दीमक का बहुत अधिक प्रकोप होता है। यदि पौधा किसी रोग से क्षतिग्रस्त होता है तो उसकी नियमित चुनाई कर जला देना चाहिए।

फसल चक्र अपनाये:- खेत में प्रत्येक वर्ष एक ही प्रकार की फसल लेने से कीटों का प्रकोप बढ़ता है। इसलिए खेत में फसलों को फेर बदल कर बोयंे, ताकि कीट पर नियंत्रण रहें। इसके लिए लंबा फसल चक्र अपनाना चाहिए, ताकि जीव अपना जीवन चक्र पूरा न कर सकें। ऐसे कीट जो अपना जीवन चक्र एक वर्ष में पूर्ण करते है, फसल के बदलने के कारण वो इसे पूरा नही कर पाने के कारण मर जाते है।

अंतवर्ती फसल व प्रतिरोधी किस्में:- अंतवर्ती फसल लेने से खेतों में कीट नियंत्रण में सहायता प्राप्त होती है तथा प्रतिरोधी किस्म का उपयोग करने से प्रकोप को कम अथवा नियंत्रित किया जा सकता है। धान में गंगई से बचाव के लिए गंगई निरोधक जातियां आशा, उषा, रूचित, सुरेखा आदि का चयन करें। गधी बग के बचाव के लिए शीघ्र पकने वाली धान को बोयें। कपास की देशी जातियों में साहू, सफेद मक्खी तथा बेधक कीटों का प्रकोप कम होता है। धान की बोनी मानसून आरंभ होते ही करें तथा धान की रोपाई 15 जून तक पूरी करने पर गंगई, माहो, तना छेदक का प्रकोप थोड़ा कम किया जा सकता है। ज्वार कि बोनी जून अंत तक अथवा जुलाई के पहले सप्ताह तक कर लेने पर तना छेदक कीट का आक्रमण कम होता है। इस तरह सोयाबीन की बोनी जुलाई में करने पर तना छेदक कीट का प्रकोप कम होता है। कटाई के समय में हेर-फेर कर नियंत्रण किया जा सकता है।

प्रमाणित बीज का उपयोग:- कपास में गुलाबी छेदक कीट के आक्रमण से बचने के लिए प्रमाणित बीज का ही उपयोग करें, क्योंकि कई कीट बीज में ही छुपे रहते है।

संतुलित रासायनिक खाद का उपयोग:- हमेशा संतुलित रासायनिक खाद का ही उपयोग करें। नाइट्रोजन गन्ने में अधिक देने पर पायरिल्ला कीट का प्रकोप अधिक होता है और यदि कम उर्वरक दिया जाए तब सफेद मक्खी का प्रकोप बढ़ जाता है। धान में नत्रजन अधिक देने पर सफेद/भूरी माहो तथा तना छेदक का प्रकोप ज्यादातर होता है। खेत में कीट व्याधि होन पर नाइट्रोजन का प्रयोग नही करें तथा पोटाश खाद की अतिरिक्त मात्रा एक बार अवश्य डालने से कीट व्याधि कम की जा सकती है।

उचित जल प्रबंधन से कीट नियंत्रण:- पानी भरे खेत में कीट प्रकोप अधिक होता है। कपास/भिण्डी में जैसिड से बचने के लिए आवश्यकतानुसार ही सिंचाई करें। धान में पानी की निकासी सही होना चाहिए। निकासी सही नही होने पर गालमिज, सफेद प्लांट हापर आदि कीटों का प्रकोप अधिक होने कि संभावना रहती है। गेहॅू, चना अन्य फसलों में दीमक पानी की कमी से होता है। सिंचाई करने से प्रकोप कम होता है। चने की इल्ली, चना कटुआ इल्ली का प्रकोप कम करने के लिए सिंचाई आवश्यक है, क्योंकि भूमि मंें इनके अण्डे और कोष मिलते है। सिंचाई से इन पर विपरित असर पड़ता है। मिट्टी के ढेलो में लाल भृंग पिस्सू भृंग छुपे रहते है। तथा सिंचाई करने पर ये बाहर आ जातें है जिसे रासायनिक से मारा जा सकता है। धान व ज्वार में टिड्डे के अण्डे गर्मी में जमीन पर छुपे रहते है। जून-जुलाई के मानसून के समय नमी प्राप्त होन पर अण्डों से फूटकर शिशु बाहर आ जाते है। सूखे मौसम मे टिड्डे की संख्या कम रहती है। इसी प्रकार वर्षा माहों कीटों की संख्या कम कर देती है।

फिरोमैन ट्रेप का उपयोग:- किसी भी वयस्क कीट क शरीर से बाहरी वातावरण में जो रासायनिक पदार्थ छोड़ा जाता है। उसकी पहचान कृषि वैज्ञानिकों ने करते हुए इसको संश्लेषित कर रबर के टुकड़ो में समावेश किया है जिसे ल्योर कहते है। यह वातावरण में घुलनशील होती है तथा इसी समूह के नर मादा कीटों को आकर्षित करती है। इसी ल्योर को प्रपंच मे रख कर कीटों को आकर्षित कर फंसाया जाता है। इसे फिरोमेन ट्रेप कहते है। इसके प्रयोग से चने की इल्ली कपास की चित्तेदार इल्ली व गुलाबी इल्ली को आसानी से नष्ट किया जा सकता है। इसके फोया (ल्योर) चार सप्ताह तक क्रियाशील रहता है। विभिन्न प्रकार के कीट के लिए अलग-अलग ल्योर होते है। ट्रेप को खेतों पर बांस के सहारे इस प्रकार लगाना चाहिए ताकि आंधी इत्यादि में सुरक्षित रहे। प्रति हेक्टेयर 10 ट्रेप लगाए जाने से कीटों पर नियंत्रण किया जा सकता है।

प्रकाश प्रपंच:- प्रकाश प्रपंच से कीट इसकी ओर आकर्षित होते है, जिन्हे आसानी से नष्ट किया जा सकता है। यह सरल एवं प्रभावी तरीका है। जिससे चने की हरी इल्ली कटुआ, कीट तना छेदक, पत्ती खाने वाले व सुरंग बनाने वाले रस चूसने वाले कीट तथा हरे मच्छर को नियंत्रित किया जा सकता है।

चिपचिपे बोर्ड:- इस प्रकार के बोर्ड खेत में लगाने से हरा मच्छर, सफेद मक्खी आदि पर नियंत्रण हेतु पीले चिपचिपे बोर्ड अधिक लाभदायक है।

ट्रायकोगामा:- यह किसान का मित्र कीट है, किन्तु कीटनाशक औषधि के प्रयोग से इसका विनाश हुआ है, जिससे कीटों पर प्राकृतिक नियंत्रण खतरे में पड़ गया है। किन्तु कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों से इसका उत्पादन एवं पालन कर ट्रायको कार्ड्स के माध्यम से खेतों पर चिपकाकर छोड़ा जाता है। प्रति हेक्टेयर पांच कार्ड पर्याप्त होते है तथा प्रत्येक कार्ड पर 20 हजार के लगभग ट्रायकोगामा रहते है तथा इस कार्ड के टुकड़े कर गोंद या पिन से खेत की फसलों में चिपकाने पर ट्रायकोगामा मित्र कीट शंखियों से बाहर निकलकर शत्रु कीट हेलियोथिस, चित्तेदार इल्ली गन्ने को छेदने वाली सूड़ी के अण्डो को खाना शुरू कर देता है, जिससे शत्रु कीट पर नियंत्रण संभव हो जाता है। इसका प्रयोग करने पर कीटनाशक औषधि का उपयोग नही करना चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर मैलाथियान का प्रयोग किया जा सकता है।

काडसोपिडिस:- माहू, सफेद मक्खी नियंत्रण के लिए काइसोपरला कीट से नियंत्रण किया जा सकता है। वयस्क काइसोपायरिला करिनिया प्रजाति पीला ,हरा जालीदार पंखो वाला शिकारी कीट है। यह हानिकारक कीटों को नष्ट करता है। इसका जीवन चक्र 27 व 30 दिन में पूर्ण होता है। सामान्यतः 2 हजार से 5 हजार अण्डे प्रति हेक्टेयर खेत में देना होता है। यह नियंत्रण के लिए लाभदायक है।

एन.पी.वायरस:- न्यूक्लियर पॉली हाइड्रोसिस वायरस को तरल पदार्थ में घोलकर कीटनाशक के समान खेत में छिड़काव करने पर इल्लियां हेयरी केटरपिलर मर जाती है इसका प्रयोग प्रति हेक्टेयर 250 लाबों (1 मि.ली. बराबर) की मात्रा पर्याप्त है।

नीम रसायन:- प्राकृतिक रूप से नीम की निबोली को सुखाकर इसका पावडर तैयार कर कीटनाशक में प्रयोग किया जा सकता है तथा निबोली के अर्क से निकाला गया नीम रसायन प्रभावी कीटनाशक है। इसकी गंध से कीट भागते है। 3 से 5 कि.ली. प्रति हेक्टेयर की दर से इसका छिड़काव किया जाता है।

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