पशुपालनराज्य

पंचगव्य (Panchgavy) एक स्वरोजगार एवं मानव कल्याण का साधन

डॉ. राकेश मिश्र, डॉ. आर.सी. रामटेके एवं डॉ. के.एम. कोले

फसलों के औद्योगिकीकरण के समय देश में कृषि के क्षेत्र में प्रगति काफी तेजी से हुई | हालाँकि इस दौरान कृषि कार्यों में रासायनिक खादों के इस्तेमाल से खाद्यान्नों के उत्पादन में भारी मात्रा में वृद्धि हुई | यहाँ तक कि रासायनिक खादों के इस्तेमाल से फसलों को आवश्यकता के अनुसार उपयोगी तत्वों को पूर्ति होनें लगी परन्तु भूमि की उर्वरा शक्ति (Fertility Power) नष्ट होनें लगी, जो हमारे भविष्य के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है | आज से कई दशक पूर्व फसलों के उत्पादन में किसानों द्वारा सिर्फ जैविक खाद का ही इस्तेमाल किया जाता था | जिससे उत्पादन के साथ-साथ भूमि की उर्वरा शक्ति में इजाफा भी होता था |

प्राचीन काल में सभी किसान अपनें खेतों और फसलों से बेहतर उत्पादन प्राप्त करनें के लिए जैविक खाद का उपयोग करते थे | वह फसलों की गुणवत्ता और पौधों को कीट, पतंगों आदि से बचानें के लिए आयुर्वेदिक नुस्खों का इस्तेमाल करते थे, इन्ही में एक पंचगव्य है | प्राचीन समय में पंचगव्य का उपयोग खेत की उर्वरकता शक्ति बढ़ाने तथा पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता था। पंचगव्य एक बहुत ही प्रभावकारी जैविक खाद है, जो पौधों की वृद्धि एवं विकास में सहायता करनें के साथ ही प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ानें का कार्य करता है | पंचगव्य का निर्माण देसी गाय के पांच उत्पादों गौमूत्र, गोबर, दूध, दही, और घी के मिश्रण से होता है | दरअसल गाय को ‘माता’ का नाम ऐसे ही नही दे दिया गया है, गाय से उत्पन्न होनें वाली प्रत्येक चीज एक औषधि है | सबसे खास बात यह है, कि गाय के उत्पादों में पौधों के लिए जरुरत के हिसाब से सभी चीजे और पोषक तत्व उपलब्ध होते है | पंचगव्य प्रकृति द्वारा प्रदान की गयी चीजो से बनायीं गयी एक ऐसी औषधि है, जो खेत में उग्नें वाले पौधौ के आलावा भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ानें का कार्य करती है |

पंचगव्य
प्राचीन काल से ही गाय को पूरे भारत वर्ष में माता की तरह पूजा जाता है। यह किसी करुणावश या प्रेम भाव में बहकर नहीं किया जाता। अपितु हमारे पूर्वजों ने गाय के महत्त्व को समझा एवं सब कुछ जानने के बाद ही वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि गाय में पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सम्भालने की क्षमता है। आयुर्वेद में प्राचीन काल से गाय दूध, घी, दही, गोमूत्र, गोमय (गोबर) आदि का स्थान-स्थान पर महत्त्व बतलाया गया है। इन द्रव्यों को आयुर्वेद में ‘गव्य’ कहा गया है। पाँचों को मिलाकर पंचगव्य कहते हैं। हमारा भारत वर्ष अभी कितनी ही अनगिनत समस्याओं से जूझ रहा है। इस वर्तमान अर्थव्यस्था में गोपालन एवं पंचगव्य ही एकमात्र ऐसी शक्ति है, जो हमारे गाँव को पुनः आत्मनिर्भर बना सकती है। पंचगव्य एंव गोपालन ग्रामीण कृषि, ऊर्जा स्रोत, चिकित्सा, घरेलू उपयोगी वस्तुएँ, रोजगार आदि का मूल आधार बने तो हमारे ग्रामीण क्षेत्रों का नजारा ही बदल सकता है।

पंचगव्य एवं कृषि
गाय के गोबर से सर्वोत्तम खाद तथा गोमूत्र से कीट नियंत्रक औषधियाँ निर्मित होती हैं—यह एक अभिप्रमाणित तथ्य है। गौ आधारित कीटनाशक तथा जैविक खाद कम खर्च में तथा ग्रामीण क्षेत्रों में ही तैयार किए जा सकते हैं। यह भी प्रमाणित हो चुका है कि जैविक खाद एवं कीटनाशक जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं एवं यह पर्यावरण मित्रवत भी है। इनसे उत्पादित पदार्थों की गुणवत्ता, पौष्टिकता एवं प्रति यूनिट उत्पादन क्षमता में निरंतर वृद्धि होती है। जैविक खादों में कम लागत व गुणोत्तर उत्पादन से सकल आय में बढ़ोत्तरी होती है। जैविक खेती गाँवों के बेरोजगार लोगों को रोजगार के नए अवसर भी प्रदान करती है। कई पश्चिमी देश भी रासायनिक विधि को छोड़कर जैविक खेती की ओर जा रहे हैं।

भारत में कृषि क्षेत्र छोटे-छोटे वर्गों में बँटा हुआ है, जहाँ हरेक के लिए ट्रैक्टर रख पाना सम्भव नहीं है। कई शोधों द्वारा यह पता चला है कि ट्रैक्टर के प्रयोग से हमारी धरती की उर्वरा शक्ति कम हो रही है तथा यह प्रदूषण का भी कारण है। बैलचालित आधुनिक ट्रैक्टर द्वारा इन सब समस्याओं का हल किया जा सकता है। यह भी प्रमाणित हो चुका है कि भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बैलचालित ट्रैक्टर ही आर्थिक तौर पर सही है।

पंचगव्य ग्रामीण ऊर्जा का स्रोत
भारत वर्ष में कृषि, व्यावसायिक व घरेलू उपयोग में प्रयोग की जा रही ऊर्जा का मुख्य स्रोत पेट्रोलियम है। इसके लिए हमें विदेशों पर आश्रित रहना पड़ता है। कुल गोवंशीय पशुओं से हमारे देश में लगभग 11,500 लाख टन गोबर प्रतिवर्ष मिलता है। यदि इस गोबर से बायोगैस प्लांट संचालित किया जाए तो हमारी अधिकांश ऊर्जा समस्या समाप्त हो जाएगी और हमें किसी पर आश्रित भी नहीं रहना पड़ेगा।

गोबर गैस संयंत्र अनुपयोगी गोवंश के गोबर से भी चलाया जा सकता है। इससे प्राप्त गैस का प्रयोग ईंधन व रोशनी के लिए किया जा सकता है, जिससे वनों की कटाई के दबाव को कम किया जा सकता है और पेट्रोलियम की खपत भी कम की जा सकती है। ग्रामीणों को बिना धुएं का स्वच्छ ईंधन भी मिल जाएगा। गोबर गैस संयंत्र से जेनरेटर चलाकर बिजली भी पैदा की जा सकती है। कृषि के सभी कार्यों के साथ-साथ भारवाहन यातायात का मुख्य स्रोत गाँवों में बैल ही है। बैलचालित ट्रैक्टर, बैलचालित जेनरेटर तथा बैलगाड़ी के प्रयोग से गाँव की वर्तमान स्थिति को बदला जा सकता है जो कि पेट्रोलियम पर आधारित है। इनके प्रयोग से रोजगार के अवसर भी खुलेंगे।

बायोगैस बॉटलिंग पर भी आजकल शोध चल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इस पर भी काफी सफलता हासिल कर ली है। इसके पूरा हो जाने पर बायोगैस को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के लिए पाइपों की जरूरत नहीं पड़ेगी।

पंचगव्य चिकित्सा
दवाओं, डॉक्टरों और अस्पतालों पर आजकल करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं फिर भी रोग और रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। गाँवों के गरीब महंगी आधुनिक चिकित्सा कराने में असमर्थ हैं। हमारा आर्ष साहित्य गो महिमा से भरा हुआ है। अब विज्ञान भी गोबर व गोमूत्र के गुणों को समझने लगा है। आयुर्वेद शास्त्र में गोदुग्ध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र की स्वास्थ्य संरक्षण एवं संवर्धन के संबंध में असीम महिमा वर्णित की गई है। अधिकतर सभी रोगों का इलाज ‘पंचगव्य’ चिकित्सा में मौजूद है। इससे सम्बन्धित कई प्रमाण वैज्ञानिकों ने पेश किए हैं। गोमूत्र में ताम्र, लौह, कैल्शियम, फास्फोरस और अन्य खनिज जैसे—कार्बोलिक एसिड, पोटाश और लैक्टोज नामक तत्व मिलते हैं। गोबर में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, आयरन, जिंक, मैग्जीन, कॉपर, बोरीन, मालीन्डनम आदि तत्व पाए जाते हैं, इन तत्वों के कारण गोमूत्र-गोबर से विविध प्रकार की औषधियाँ बनती हैं और यह सभी प्रकार के रोगों पर काम करती है।

पंचगव्य देसी गाय से प्राप्त पांच चीजों का समूह है। इसमें गोदुग्ध (दूध), गोदधी (दही-छाछ), गोमेह (गोबर), गोघृत (घी) व गोमूत्र (मूत्र) शामिल हैं।

आयुर्वेद में रोगों से मुक्ति के लिए पंचगव्य को औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं। पंचगव्य देसी गाय से प्राप्त पांच चीजों का समूह है। इसमें गोदुग्ध (दूध), गोदधी (दही-छाछ), गोमेह (गोबर), गोघृत (घी) व गोमूत्र (मूत्र) शामिल हैं। सेहतमंद रहने के लिए पांचों को अलग-अलग और समूह, दोनों रूप में इस्तेमाल करते हैं। जानते हैं इसके बारे में-

गोदुग्ध (दूध) –
इस दूध में कैल्शियम, विटामिन बी-12, आयोडीन, पोटेशियम जैसे तत्त्व होते हैं। यह इम्युनिटी बढ़ाकर कोशिकाओं को ऊर्जा देता है। दिमाग, हड्डी और मांसपेशियों को मजबूत करता है। जिन्हें इस दूध से एलर्जी/अपच की समस्या हो वे न पिएं। दिन में दो बार एक गिलास की मात्रा में पी सकते हैं।

गोमेह (गोबर)-
गोबर के कंडों को जलाने से वातावरण शुद्ध होता है। साथ ही इसमें मौजूद अर्क से तैयार क्रीम एक्जिमा, एलर्जी जैसे त्वचा रोगों में प्रयोग होती है। यह एंटीसेप्टिक, एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल व विटामिन-बी12 के गुणों से भरपूर होता है।

गोमूत्र (मूत्र)-
15% पानी, 2.5% यूरिया, मिनरल्स, एंजाइम्स, पोटेशियम, विटामिन्स और सोडियम सभी 2.5% की मात्रा में होते हैं। हृदय रोग, कैंसर, टीबी, पीलिया, मिर्गी व हिस्टीरिया आदि रोगों में विशेषज्ञ की सलाह से लेने पर यह लाभकारी है। एक बार में इसकी दो चम्मच की मात्रा ली जा सकती है।

गोदधी (दही) –
इसमें कैल्शियम, विटामिंस, प्रोटीन, मिनरल्स होते हैं। यह बच्चों व बड़ों में पाचनक्रिया को मजबूत करने और भूख बढ़ाने का काम करता है।

गोघृत (घी) –
इसमें कैल्शियम, विटामिन-ए, डी व ई पाए जाते हैं। यह दिमाग व शारीरिक विकास के लिए फायदेमंद है। इससे आंखों की रोशनी दुरुस्त रहती है और मिर्गी, लकवा, कमजोरी, जोड़ों के दर्द, आर्थराइटिस व याददाश्त में सुधार होता है। भोजन में इसके प्रयोग के अलावा इसे आधार बनाकर औषधियां भी तैयार की जाती हैं।

पंचगव्य एवं मनुष्य का पोषण
गाय का दूध किसी भी अन्य दूध के मुकाबले ज्यादा श्रेष्ठ है इसीलिए आज भी डॉक्टर नन्हें-मुन्हें बच्चों को ऊपर का दूध पिलाने के लिए गाय के दूध की ही सलाह देते हैं। गाय के दूध में वसा, कार्बोहाइट्रेट, प्रोटीन के अलावा अन्य एन्जायम पाए जाते हैं जो हमारे भोजन को सुपाच्य बनाते हैं। धरती पर दूध ही एक ऐसा तत्व है जिसे पूर्ण आहार माना गया है। इसमें हमारे शरीर के विकास व वृद्धि के लिए आवश्यक सभी तत्व उपलब्ध हैं। दूध एवं दूध के अन्य उत्पाद से गाँव में रोजगार के काफी अवसर खुल जाएंगे।

पंचगव्य घरेलू उपयोगी वस्तुएँ
गोमूत्र व गोमय की विशिष्टताओं के कारण न केवल उनका प्रयोग रोगों के शमन के लिए किया जा सकता है बल्कि अनेक ऐसे उत्पाद बनाए जा सकते हैं जो कुटीर उद्योग व ग्रामोद्योग का आधार बन सकते हैं। इससे त्वचा रक्षक साबुन, दंतमंजन, डिस्टेम्पर, धूपबत्ती, फिनायल, शैम्पू, उबटन, तेल, मच्छर विनाशक, मरहम आदि बनते हैं। इन सभी वस्तुओं का उत्पादन गौशालाएँ आयुर्वेद के आधार पर कर रही हैं, जिनका संतुष्टी विश्लेषण भी किया गया है। इस रिपोर्ट के हिसाब से सभी उपभोक्ता 80-90 प्रतिशत संतुष्ट हैं तथा सभी ने इन वस्तुओं के अनेक फायदे भी बताए हैं।

पंचगव्य एवं रोजगार
उपर्युक्त सभी बातों से यह स्पष्ट हो चुका है कि अगर गोवंश को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार बनाया जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों की कई समस्याओं के साथ रोजगार की सबसे बड़ी समस्या भी दूर हो जाएगी, फिर से गाँव आत्मनिर्भर हो जाएंगे तथा जो अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थी फिर से कायम हो जाएगी।

पंचगव्य से फायदे

  • कृषि योग्य भूमि में पंचगव्य का उपयोग करनें से होनें वाले लाभ इस प्रकार है-
  • भूमि में पंचगव्य का इस्तेमाल करनें से खेत में सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है |
  • खेत में पंचगव्य का इस्तेमाल करनें से खेत की उर्वरा अर्थात उपजाऊ शक्ति में सुधार होता है |
  • इसके निरंतर उपयोग से भूमि में हवा व नमी का संतुलन बना रहता है |
  • फसलों में विभिन्न प्रकार के होनें वाले रोग और कीट का प्रभाव काफी कम हो जाता है |
  • रासायनिक खादों की अपेक्षा यह काफी सरल और आसानी से प्राप्त किया जा सकता है |
  • पंचगव्य खेत में जल की आवश्यकता को 25 से 30 प्रतिशत तक कम कर देता है, जिसके कारण सूखे की स्थिति में पौधा जीवित अवस्था में बना रहता है |
  • पंचगव्य के इस्तेमाल से फसलों के उत्पादन में वृद्धि के साथ ही यह पशुओं और मानव जीवन के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

सुझाव

  1. पंचगव्य एंव गो आधारित वस्तुओं को गाँवों तक ले जाने में गोशालाएँ, पंचायतें, एन.जी.ओ. प्रचारक आदि सहायता दें। वे सभी अपने-अपने गाँवों के गोवंश को बचाने में, देखभाल करने में तथा रोजगार स्थापित करने में मदद करें।
  2. भारतीय देसी नस्ल की गाएं ज्यादा बेहतर हैं क्योंकि वह हमारे मौसम एवं पर्यावरण के हिसाब से ज्यादा बेहतर हैं तथा भारतीय देसी नस्ल को बचाने में तथा गोवंश बढ़ाने में सभी संलग्न व्यक्ति, वैज्ञानिक आदि मदद करें।
  3. महिलाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन में काफी संलग्न हैं तथा उनकी दशा गाँवों में सही नहीं है। महिलाओं को भी रोजगार (गो आधारित) स्थापित करने में शामिल करना चाहिए।
  4. पशु चारा का इन्तजाम ग्राम स्तर पर सही तरह से संचालित किया जाए, ताकि गोपालक को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।
  5. सरकार को पंचगव्य आधारित वस्तुओं पर से टैक्स मुक्त कर देना चाहिए ताकि ग्रामीणों को रोजगार स्थापित करने में प्रोत्साहन मिले।
  6. पेट्रोलियम और पंचगव्य में कोई लड़ाई नहीं है, परंतु उसका प्रयोग वहीं करना चाहिए जहाँ वह आर्थिक तौर पर लाभदायक है और जहाँ ज्यादा प्रदूषण नहीं है।

निष्कर्ष

आधुनिकता एवं पश्चिमी देशों के प्रभाव में आकर आज हमने पंचगव्य की महिमा को बिलकुल नकार दिया है। इसके परिणाम हमारे सामने हैं। अगर हमें ग्रामीण क्षेत्रों को रोजगार तथा आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना है, तो आवश्यकता है पंचगव्य एवं गोवंश के महत्त्व को समझा जाए। पंचगव्य एवं गोवंश के महत्त्व को समझकर, उसके ग्रामीण क्षेत्रों में पुनः स्थापना के प्रयास करने होंगे, एक नए ढंग से, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सके।

गो का दूध भैस और बकरी के दूध की पौष्टिकता से कम होता है। लेकिन संघटन की दृष्टि से गाय का दूध माता के दूध के समकक्ष होता है। मनुष्य का आहारनाल जितनी आसानी से गाय का दूध पचा लेती है उतनी आसानी से भैंस के दूध को नहीं पचा पाता क्योंकि गाय का दूध ही रोगी, वृद्ध तथा बच्चों को दिया जा सकता है। भैस के दूध से इन लोगों को कब्जियत हो सकती है। इसीलिए पंचगव्य में गौमाता के दूध, दही और घी का प्रयोग किया जाता है।

गौमाता का दूध पीने से मस्तिष्क तथा तंत्रिकातंत्र की कोशिकाओं की बढ़त, रखरखाव तथा मरम्मत होती है। जिन्दगी भर गौ दुग्ध पान करने वालों को कैंसर तथा खासतौर पर माताओं और बहनों को स्तन का कैंसर नहीं होता। गाय का दूध अन्य प्राणियों के दूध से अधिक गुणकारी होता है। इसलिए ‘पंचगव्य’ में गाय के दूध का प्रयोग होता है।

डॉ. ई. वैडीवेल की एक शोध के अनुसार चारा, दाना और पानी के साथ जो विषाक्त पदार्थ गोमाता खाती हैं उन्हें वह कभी भी अपने दूध, मूत्र या गोबर के माध्यम से बाहर नहीं निकालती जबकि बकरी, भैंस तथा सभी पशु विषाक्त पदार्थों को दूध, मूत्र तथा गोबर से बाहर निकाल देते हैं। उक्त प्रक्रिया के कारण गाय का दूध, मूत्र तथा गोबर पवित्र, पोषक तथा औषधिगुणों से युक्त माना गया है। जल, पृथ्वी, वायु, आकाश और अग्नि से पंच महाभूत शरीर की रचना होती है। पांचों तत्व सभी प्राणियों में भिन्न-भिन्न मात्रा में पाया जाात है, लेकिन गौ माता के शरीर में पांचों तत्व संतुलित मात्रा में पाया जाता है इसलिए गाय में दैविक शक्ति अधिक होती है।

वैदिक ग्रन्थों के अनुसार गौ माता के शरीर में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास माना गया है। अगर यह सत्य है तो इससे उत्पन्न होने वाले दूध, मूत्र तथा गोबर किसी न किसी देवी-देवता के सान्निध्य से गुजरते हैं। मान्यताओं के अनुसार गोबर में लक्ष्मी, गोमूत्र में गंगा तथा दूध में सरस्वती का निवास है। इसीलिए कहा जाता है कि गो दुग्ध के सेवन से बुद्धि तीव्र होती है। दूसरे अर्थों में गो दुग्ध में सोम, दही में वायु, गोबर में अग्नि तथा गोमूत्र में वरुण देव का निवास माना गया है। अत: गाय का दूध, मूत्र तथा गोबर दिव्य शक्तियों वाले माने जाते हैं।

पंचगव्य प्राशनम् महापातक नाशनम्

पंचगव्य को सर्वरोगहारी माना गया है। अलग-अलग रूपों में प्रत्येक गव्य त्रिदोष नाशक नहीं हैं। परन्तु पंचगव्य के रूप में एकात्मक होने पर यह त्रिदोषनाशक हो जाता है। अत: त्रिदोष से उत्पन्न सभी रोगों की चिकित्सा ‘पंचगव्य’ से सम्भव है।

पंचगव्य एक अच्छा प्रोबायोटिक है। प्रोबायोटिक रोग न उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर मनुष्य को उपयोगी किस्म का फ्लोरा उपलब्ध कराते हैं। प्रोबायोटिक शरीर की व्याधियों को कम करके प्राणी की उत्पादन क्षमता, प्रजनन क्षमता ओज और रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाते हैं। पंचगव्य एक अच्छा एन्टीआक्सीडेन्ट तथा एक अच्छा विषशोधक है। पंचगव्य में मौजूद घी विष शोधक का कार्य करता है। उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त पंचगव्य का प्रयोग रक्तचाप, शुगर, मिर्गी तथा अन्य बहुत से रोगों में भी लाभकारी हैं इस प्रकार से सर्वविदित है कि कैंसर जैसे रोगों के अलावा अन्य कई रोगों में भी ‘पंचगव्य’ की भूमिका महत्वपूर्ण है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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