

जामुन मूल रुप से भारत, पाकिस्तान और इंडोनेशिया का पौधा है,जिसको विभिन्न नाम जैसे -जावा प्लम/ काला प्लम/जमबोलन या जामबुल आदि के नाम से जाना जाता है। यह वृक्ष मायर्टेऐसी कुल और मायर्टलेस गणके अंतर्गत आता है। जामुन का पेड एक विशाल और अधिक शाखाओं वाला वृक्ष है। इसकी छाल भूरेया स्लेटी रंगकी, अधिक चिकनी और लगभग 2.5 सेंटीमीटर मोटी होती है। यह एक सदाबहार वृक्ष है,जिसकी औसतन ऊंचाई लगभग 30 मीटर तक होती है। इसके पत्ते नरम होते है, जोकि 10-15 से.मी. लम्बे और 4-6 से.मी. चौड़े होते है। इसके फूल पीले रंग के होते है, जिनका व्यास 5 से.मी. होता है और इसके फल हरे रंग के होते है जो कि पकने के बाद गहरे लालया जामुनीया नीले-काले रंग के हो जाते है। फल के अंदर बीज 1-1.5 से.मी. लम्बे होते हैं।इसके फल खाने के लिए और इसके बीज दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग किये जाते है। जामुन से तैयार की गई दवाइयां डायबिटिज, बढ़ते खून और शुगर के इलाज के लिए प्रयोग की जाती है। इसके फलों को सभी के द्वारा पसंद किया जाता है और उच्च दामों में बेचा जाता है।लवणीय, क्षारीय, आर्द्र व जलभराव वाले क्षेत्र में इसे उगाया जा सकता है। नहरों और नदियों के किनारे की मृदा संरक्षण के लिए भी यह वृक्ष उपयुक्त होता है।अफगानिस्तान, म्यांमार, फिलीपींस, पाकिस्तान, इंडोनेशिया और भारत जैसे देशों में जामुन के वृक्ष लगाये जाते हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, आसाम और राजस्थान भारत के मुख्य जामुन उगाने वाले क्षेत्रो मे शामिलहैं।

- स्थानीय नाम-जामुन
- वैज्ञानिक नाम- साइजिजियम क्युूमिनी
- क्रोमोजोम नम्बर -2n = 40
- उत्पत्ति स्थान – दक्षिण पूर्वी एशिया
जामुन केफलो की उपयोगिता
- जामुन का अर्क मधुमेह, रक्त चाप व शर्करा को कम करने में बहुत उपयोगी होता है।
- जामुन के फूल उत्तर भारत में शहद के प्रमुख स्त्रोत के रुप में उपयोग किए जाते हैं।
- इसके फलोंमें प्रतिरोधी गुण पाये जाते हैं और बहुत से रोगों के इलाज के लिए दवा तैयार करने में उपयोग किए जाते हैं।
- फलों का उपयोग जेली, मुरब्बा, संरक्षित खाद्य पदार्थ, शरबत और शराब बनाने में किया जाता है।
- बीजों का उपयोग मधुमेह में एक प्रभावी दवा बनाने के लिए किया जाता है।
जलवायु : जामुन के पौधे के लिए वैसे तो कोई विशेष जलवायु की आवश्यकता नही होती हैं,फिर भी अच्छे उत्पादन के लिए गर्म और शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र जहाँ पाला नहीं पड़ता है, अधिक उपयुक्त होता है। इसकी खेती मैदानी भागों से लेकर समुद्र तल से लगभग 1000 मी. ऊँचाई तक पहाड़ों पर की जा सकती है।
भूमि : जामुन के पेड़ के लिए किसी खास प्रकार की भूमि की आवश्यकता नहीं होती। इसके सख्त होने के कारण इसे सभी प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है लेकिन अच्छी पैदावार के लिए दोमट मिट्टी, जिसमें पानी का निकास अच्छा हो उपयोगी है। इसको सोडिक, नमकीन, चूने वाली और दलदली मिट्टी में उगाया जा सकता है। भारी और रेतली मिट्टी में इसकी खेती नहीं करनी चाहिए।इसका पौधा भूमि में 50 प्रतिशत तक चूने की मात्रा सह लेता है। भूमि का पी.एच.मान 5.5 से 6.5 के बीच अच्छा माना जाता है।
किस्में
- राइ जामून या राजा जामून: यह एक प्रभावशाली किस्म है, जो आम रूप से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उगाई जाती है। इसके फल मुख्य रूप से जून-जुलाई में पक जाते है। इसके फल बढे, औसतन 2.5-3.5 से.मी. लम्बे और 1.5-2 मीटर व्यास के होते है। इसके फलों का रंग गहरा जामुनी या काला-नीला होता है। इसके फल का गुदा मीठा और रसीला होता है। इसकी गुठली बहुत छोटी होती है।
- बदामाः इस किस्म के फल आकार में बढे और बहुत ज्यादा रसीले होते हैं।
- कथाः इस किस्म के फल आकार में छोटे और खट्टे होते हैं।
- जेठीः इस किस्म के फल मुख्य रूप से मई-जून के महीने में पक जाते हैं।
- अषाढाः इस किस्म के फल मुख्य रूप से जून-जुलाई के महीने में पक जाते हैं।
- भादोः इस किस्म के फल मुख्य रूप से अगस्त के महीने में पक जाते हैं।
- रा-जामूनः इस किस्म के फल आकार में बढे और रसीले होते हैं, जिनका रंग जमुनी होता है और बीज छोटे होते है।
- नरेंद्र जामून-6: यह किस्म नरेंद्र देव यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश के द्वारा तैयार की गई है।
- राजेंद्र जामून-1: यह किस्म बिहार कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर भागलपुर, बिहार के द्वारा तैयार की गई है।
- कोंकन बाहडोलीः यह किस्म क्षेत्रीय फल अनुसंधान केन्द्र, वेंगुर्ला, महाराष्ट्र के द्वारा तैयार की गई है।
- गोमा प्रियंकाः यह किस्म केन्द्रीय बागबानी प्रयोग केन्द्र, गोधरा, गुजरात के द्वारा तैयार की गई है।
- CISH J-42 : इस किस्म के फल बीज रहित होते है।यह किस्म सेंट्रल इंस्टिटूट फॉर सब-ट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर लखनऊ, उत्तर प्रदेश के द्वारा तैयार की गई है।
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- SH J-47 :यह किस्म सेंट्रल इंस्टिटूट फॉर सब-ट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर लखनऊ, उत्तर प्रदेश के द्वारा तैयार की गई है।
प्रवर्धन
जामुन के पौधे बीज व कलम दोनों से तैयार किए जा सकते हैं-
1. बीज से लगाने की विधि
- सबसे पहले बीजों ताजे बीजों को बाविस्टीन से उपचारित किया जाता है।
- उपचारित बीजों को 25-15 से. मी. की दूरी पर और 4-5 से. मी. की गहराई में बोया जाता है।
- बीजों का अंकुरण बुवाई से 10-15 दिनों के बाद प्रांरभ हो जाता है।
- अंकुरित पौधे अगले मानसून तक प्रतिरोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।
2. चश्मा विधि : अच्छी पैदावार देने वाले पौधे से बीजो को इकट्ठा करके उन्हें नर्सरी में जुलाई-अगस्त में बोया जाता है और एक साल में पौधे चश्मा चढ़ाने के लिए तैयार हो जाते हैं।
तैयार पौधों का रोपण
- अंकुरित पौधों के लिए 8 से 10 मी. की दूरी पर 1-1-1 मी. आकार के गड्ढें खोदे जाते हैं।
- गड्ढों को मानसून से पहले या बसंत ऋतु में ही खोद लेना चाहिए।
- गड्ढों की मिट्टी और अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद को 3:1 के अनुपात में मिलाकर भरना चाहिए।
- 1 हेक्टेयर भूमि में लगभग 100-150 पौधों की आवश्यकता होती है।
खाद एवं उर्वरक : प्रारंभिक वर्ष में 20-25 कि. ग्रा. अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट को प्रति वर्षप्रतिपौधा की दर से देना चाहिए। परिपक्व वृक्षों के लिए खुराक बढ़ाते हुयेगोबर की खाद या कम्पोस्ट को 50-60 कि. ग्रा./पौधे/वर्ष दी जानी चाहिए। खाद देने का सही समय फूल आने से पहले का होता है। बढ़ते हुए वृक्षों को 500 ग्राम नत्रजन, 600 ग्राम फास्फोरस और 300 ग्राम पोटाश प्रति वर्ष देना चाहिए।
सिंचाई : जामुन एक बहुत ही सख्त पौधा है और वर्ष में केवल 8-10 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। जब पौधे फल देने के लायक हो जायें तो अच्छी पैदावार के लिए 4-6 सिंचाई करनी चाहिए। अधिक ठंड के समय पौधों की सिंचाई करके पाले से बचाव करना चाहिए।
निंदाई-गुड़ाई : पौधों के थालों में से समय-समय पर खरपतवार निकाल कर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। निंदाई-गुड़ाई करके पौधे के थाले साफ़ रखने चाहिए। बड़े पेड़ों के बागों की वर्ष में दो बार जुताई करनी चाहिए। जामुन के बाग़ में बरसात आदि में पानी बिल्कुल नहीं रूकना चाहिए।
अंतरवर्तीय फसलें : जामुन के बाग में वृक्षों के बीच की दूरी 8 से 10 मी. तक होती है,जिसमें तरह-तरह की अंतरशस्य फसले जैसे जायद में लौकी, खीरा व अन्य सब्जियां, खरीफ में अरहर, मूंग, उड़द व अन्य दलहनी फसलें तथा रबी में आलू, मटर, सरसों, बोदी इत्यादि फसलों की सफल खेती कर सकते हैं । इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी के साथ-साथ बगीचे की मिट्टी में भी सुधार होता है । जब तक पौधे छोटे हों, तब अंतरशस्य फसल पौधों के पूर्ण छत्रक विकास होने तक लगाई जा सकती है । उसके बाद छाया में होने वाली फसलों जैसे हल्दी, अदरक की सफल खेती भी की जा सकती है ।
पौधों की देखभाल : पौधा लगाने के बाद से पौधे की नियमित रूप से देखभाल की जानी चाहिये। पौधे के थालों में समय-समय पर खरपतवार नियंत्रण करना चाहिए। पौधों में जुलाई-अगस्त में खाद एवं उर्वरक प्रयोग तथा आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिये।
कांट-छांट : नये पौधों में 3 वर्ष तक उचित ढाँचा देने के लिये कांट-छांट करना चाहिये। कांट-छांट करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि तने पर 50-60 सें.मी. ऊँचाई तक किसी भी शाखा को नहीं निकलने दें। उसके ऊपर 3-4 अच्छी शाखाओं को चारों तरफ बढ़ने देना चाहिये जिससे पौधा का अच्छा ढांचा तैयार होता है। प्रति वर्ष फल तोड़ने के बाद पेड़ पर लगी सुखी टहनिया और अधिक बड़ी हुई शाखा को काट के अलग कर देना चाहिए।
फूल और फलों का गिरना : यह जामुन केपौधे की एक प्रमुख समस्या है जिसमें फूल और फल पकने से पहले ही गिर जाते हैं । जिसके कारण पैदावार बहुत कम होता हैं।इसकी रोकथाम के लिए जिब्रेलिक एसिड-3की दो बार स्प्रे करें।पहली स्प्रे फूल निकलने पर और दूसरी फलों के गुच्छे बनने के 15 दिन बाद करें।
तुड़ाई या फसल कटाई का समय : जामुन के चार वर्ष के पेड में फल-फूल आना शुरू हो जाता है।तुड़ाई फल पकने के बाद मुख्य रूप से रोज़ की जाती हैं क्योंकि परिपक्व अवस्था में फल वृक्ष पर नही रह सकता। इसकी तुड़ाई आम रूप से वृक्ष के ऊपर चढ़ कर की जाती है। तुड़ाई के लिए पके फलों की मुख्य पहचान है कि वे गहरे बैंगनी या काले रंग के हो जाते हैं। तुड़ाई के समय ध्यान रखें कि फलों को कोई नुकसान न पहुंचें।तुड़ाई के लिए कंधे पर कपास के थैले लेकर पेड़ पर चढ़ते हैं।
रोग और किट
हानिकारक कीट और रोकथाम
1. पत्ते खाने वाली सुंडीः यह सुंडी ताज़े पत्ते और तने को खाकर फसल को नुकसान पहुँचातीहै। इसे रोकने के लिए फ्लूबैनडीयामाइड/20 मि.ली. या क्विनलफॉस/400 मि.ली. को प्रति 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
2. जामुन के पत्तों की सुंडीः यह सुंडी पत्तों को खाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए डाइमेथोएट 30 ई सी 1.2 मि.ली. प्रति लीटर की स्प्रे करें।
3. छाल खाने वाली सुंडीः यह सुंडी टिशू की छाल को खाती है। रोगोर 30 ई सी 3 मि.ली. या मैलाथियान 50 ई सी 3 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर फूल निकलने के समय स्प्रे करें।
4. जामुन की पत्ता लपेट सुंडीः यह जामुन के पत्तों को लपेट देती है और फसल का नुकसान करती हैं। इसकी रोकथाम के लिए क्लोरपाइरीफोस 20 ई सी 2 मि.ली.प्रति लीटरपानी में मिलाकरस्प्रे करें।
5. पत्ता जोड़ सुंडीः यह कीट पत्तें और कली को खाकर फसल को नुकसान पहुँचाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए क्लोरपारिफॉस 20 ई सी 2 मि.ली.प्रति लीटर पानी में मिलाकरस्प्रे करें।
बीमारियां और रोकथाम
ऐंथ्राक्नोसः इस बीमारी के साथ पत्तों पर धब्बे पड़ना, पत्ते झाड़ जाना और टहनियों का सूखना आदि मुश्किलें आती है। यदि इसका प्रकोप दिखे तो जि़नेब 75 डब्लयु. पी. 400 ग्राम या एम-45/400 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
कटाई के बाद की क्रियाए एवं प्रसंस्करण
कटाई के बाद फलों की छंटाई की जाती है। फिर फलों को बांस की टोकरियों या लकड़ी के बक्सों में पैक किया जाता हैं। जामुनों को लम्बे समय तक रखने के लिए इनको कम तापमान पर रखा जाता हैं।फलों को नुकसान से बचाने के लिए अच्छी तरह से पैकिंग करें।जामुनों के फलों से सिरका,कैप्सूल, बीजों का पाउडर, जैम, जेली, और स्कवेश आदि उत्पाद तैयार किये जाते हैं।जामुनके फल से एक मशीन के द्वारा गुददे और बीज को अलग निकला जाता है। उस निकले हुए गुददे से कड़वाहट ना आयें और सुरक्षित रखने के लिए इस मशीन का उपयोग किया जाता है। एस मशीन से गुद्दे को एक साल तक सुरक्षित रख कर बाज़ार मे अच्छे भाव पर बेच सकते है। इस गूदे का उपयोग अनेक प्रकार के पेय पदार्थ बनाने में किया जाता हैं।
उपज : प्रारंभिक वर्ष में प्रत्येक पेड़ से 2-4 किलो तक जामुन प्राप्त होते हैं। समय के साथ पैदावार बढ़ती है और आठ वर्षों के बाद प्रत्येक पेड़ से 40-50 किलो की उपज प्राप्त होती हैं। एक पौधे से औसतन 50 किलो फल तथा एक एकड़ में 8 से 10 टन फल मिल जाता है। प्रति हेक्टर जामुन का उत्पादन 20-25 टन होता हैं।










