

पिछले कुछ वर्षों में गिनी फाउल पालन (Guinea fowl Farming) का चलन तेजी से बढ़ा है। गिनी फाउल, जिसे आमतौर पर ‘चीनी मुर्गी‘ कहा जाता है, इसे मांस और अंडे के लिए पाला जाता है। मूल रूप से गिनी फाउल की उत्पत्ति भारत में नहीं हुई है। हमारे देश में सम्भवतः यह पुर्तगालियों या अंग्रेजों द्वारा लाई गयी। हमारे देश में गिनी फाउल विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नामों से जानी जाती हैं। लोकप्रियता के अनुसार भारत में इसका स्थान मुर्गी तथा बतख के बाद आता है। मुख्य रूप से यह छोटे तथा सीमान्त कृषकों, अदिवासी तथा पैस्टोरोलिस्ट के बीच ज्यादा लोकप्रिय है। छोटे किसान जिनके पास जमीन कम है, उन किसनों के लिए गिनी फाउल बहुत उपयोगी है। इसलिए इसे लो इन्वेस्टमेंट बर्ड भी कहा जाता है। इसके आवास, दाना और दवाई पर न के बराबर खर्च होता है।
इसका मांस कोमल होता है और स्वाद जंगली मुर्गी जैसा होता है। मांस में वसा कम और आवश्यक अमीनो एसिड भरपूर होता है। गिन्नी फाउल के अंडे को मुर्गी के अंडे की तरह ही खाया जा सकता है एक वर्ष की एक वयस्क गिनी मादा – एक दिन में एक अंडा देती है।
प्रमुख नस्लें – भारत में गिनी फाउल के तीन प्रमुख नस्लें पायी जाती हैं –
1. पर्ल – यह नस्ल सबसे ज्यादा पायी जाती है। इस नस्ल के पक्षियों के पंख गहरे सलेटी रंग के होते हैं तथा इन पर बड़े सफेद गोल धब्बे समान रूप से बिखरे हुए होते हैं। इनके नर का वजन 3 – 4 कि.ग्रा. एवं मादा का वजन 2.5 – 3 कि.ग्रा. का होता है।

2. लेवेन्डर – यह जाति देखने में सुन्दर प्रतीत होती हे। लेवेन्डर नस्ल को इसके सफेद धब्बेदार हल्के सलेटी रंगों के पंखों द्वारा पहचाना जा सकता है। इनके नर का वजन 3.5 – 4 कि.ग्रा. एवं मादा का वजन 2.5 – 3 कि.ग्रा. का होता है।

3. व्हाइट – व्हाइट गिनी फाउल पूर्णतः सफेद रंग की होती है। इसकी त्वचा का रंग भी पर्ल की अपेक्षा हल्का होता है। इनके नर का वजन 3 – 4 कि.ग्रा. एवं मादा का वजन 2.0 – 3 कि.ग्रा. का होता है।

पालन विधि – भारत में गिनी फाउल के पालन की मुख्यतः दो विधियां प्रचलित हैं – सघन विधि एवं मुक्त क्षेत्र विधि। जहां फार्म में सघन विधि प्रयोग में लायी जाती है। वहीं कृषकों द्वारा गिनी फाउल का पालन पूर्णतया मुक्त क्षेत्र विधि या अर्ध सघन विधि द्वारा किया जाता है।
(अ) सघन विधि – गिनी फाउल के बच्चों को कीट कहते हैं। इस विधि में गिनी फाउल के बच्चों (कीटों) को गहरी बिछावन पद्धति या बैट्ररी ब्रूडर में पाला जाता है। इन दोनीें पद्धतियों में डीप लीटर (गहरी बिछावन पद्धति) ज्यादा प्रचलित एवं सुगम है। 10 – 15 के छोटे-छोटे समुहों में पालने से उचित देखभाल होती है। यह देखा गया है कि एक दिन के कीट को 12 सप्ताह तक बैट्री ब्रडर में पालने व इसके पश्चात ग्रोंवर केज में रखने पर कीट के शरीर भार में वृद्धि अधिक होती है। कीटों के पालन में सावधानी रखनी चाहिए क्योंकि कीट कुछ हद तक गर्मी तो सह लेते हैं पर ठंडक बर्दाश्त नहीं कर पाते तथा ठंड से मृत्यु दर अधिक हो जाती है। कीटों को अधिक संख्या में रखने पर भी मृत्यु दर अधिक पायी गयी है।
गिनी फाउल घरों में पालने पर 6-9 सेमी2 प्रति पक्षी तक की अवस्था तक आवश्यकता पड़ती है। फीडिंग के लिए 2.5, 4.0, 7.5, 10.0 से.मी. तथा पानी के लिए 2.5,1.00, 1.50, 2.5 से.मी. प्रति पक्षी जगह की जरूरत पड़ती है। अच्छी बढ़वार के लिए नर व मादा को अलग-अलग पालना चाहिए। पिंजरे में पालने पर गिनी फाउल की बढ़वार कम होती है तथा उत्पादन क्षमता भी कम हो जाती है।
(ब) मुक्त क्षेत्र विधि – गिनी फाउल मुर्गी की अपेक्षा विपरीत परिस्थितियों, बीमारियों व रोगों के प्रति अधिक सहनशील, स्वच्छन्द घूमने फिरने वाली, आजादी पसन्द स्वभाव की होती हैं उसे अर्द्ध उघन विधि से अच्छी तरह पाला जा सकता है।
जहां भूमी की अधिकता हो, मौसम शुष्क व गर्म हो, तथा वर्षा कम होती हो ऐसे क्षेत्रों में यह पाली जाती है। भारत में इसे खुला छोड़कर पाला जाता है तथा जब खेतों में फसलें कट जाती हैं तब गिनी फाउल के समूहों को भेड़ की तरह चराया जाता है। यह फसलों के झड़े हुए दानों, कीड़े-मकोड़े तथा मुलायम घासों को खाती है, तथा बदले में खेत में बीट कर खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है। गिनी फाउल की 500 – 600 की संख्या में एक एकड़ में चुग सकती है। दो या तीन आदमी इस समूह को चूगा सकते हैं।
आहार प्रबन्ध – ग्रामीण क्षेत्रों में गिनी फाउल के आहार पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। यहां पर गिनी फाउल को दिन के समय खुला चुगने के लिए छोड़ दिया जाता है। यह गिनी फाउल खेत, खलिहान, गलियों की नाली तथा घर में शेष बचे भोजन, कीड़े-मकोड़ों को खाकर अपना पेट भर लेती है। इन पक्षियों को केवल रात के समय आवास का जरूरत होती है, जिससे गीदड़, लामड़ी, जंगली जानवर, नेवले आदि से बचे रहें।
गिनी फाउल को फार्मों में पालने पर आहार व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता है। फार्मों पर इनहें सघन विधि से पाला जाता है। यहां संतुलित आहार व स्वच्छ पानी की उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। गिनी फाउल के बच्चों को अण्डे से निकलने के 24 घण्टे तक किसी प्रकार के भोजन व पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती है। परन्तु बाद में स्टार्टर दाना एक सप्ताह तक अखबारी कागज पर छिड़क कर दिया जाता है। दाना बहुत महीन पिसा नहीं होना चाहिए। दाने के साथ-साथ बच्चों को मल्टी-विटामिन मिला पानी पीने के लिए देते है।
सघन विधि में गिनी फाउल का आहार संतुलित तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता गिनी फाउल की स्वास्थ्य सम्बन्धी आवश्यकतसओं के अनुरूप होना चाहिए। जिससे गिनी फाउल की बढ़वार सही ढ़ग से हो सके तथा पोषण से सम्बंधित बीमारियों आदि से भी बचाव हो सके। गिनी फाउल के आयु अनुसार निम्न प्रकार के दाने दिए जाते हैं-
स्टार्टर दाना – इस प्रकार के दाने में 25 – 28 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन रखते हैं तथा विटामीन एवं मिनरल को भी दाने में मिलाते हैं। ऊर्जा के लिए कार्बोहाइड्रेट, मक्का से देते हैं।
ग्रोवर दाना – इस प्रकार के दाने में 22 – 23 प्रतिशत तक क्रूड प्रोटीन होता है तथा यह 5 से 8 सप्ताह तक दिया जाता है।
लेयर दाना – इस दाने में 1 8- 22 प्रतिशत तक क्रूड प्रोटीन रखते हैं। इसे 8 से 12 सप्ताह में देते हैं तथा इस दाने में कैल्शियम व फास्फोरस युक्त मिनरल मिक्सचर भी देते हैं क्योंकि अण्डे का छिलका बनने में कैलिशयम की आवश्यकता होती है।
आहार में ध्यान देने योग्य बात यह है कि आहार देते समय गिनी फाउल की उम्र का ख्याल रखा जाता है। गिनी फाउल के बच्चों को 0 – 4 सप्ताह की उम्र तक प्रोटान की आवश्यकता अधिक पड़ती है तथा ऊर्जा की आवश्यकता अपेक्षृत कम पड़ती है। विटामिन व मिनरल पानी में घोल कर दिया जाता है।
उम्र बढ़ने के साथ – साथ ग्रोवर की ग्रोवर की उम्र में प्रोटान को कम कर देते हैं तथा ऊर्जा को थोड़ा बढ़ा देते हैं तथा लेयर की उम्र में प्रोटीन और कम कर देते हैं तथा ऊर्जा बढ़ा देते हैं। साथ – साथ कैल्शियम फास्फोरस अधिकता वाला मिनरल मिक्सचर देते हैं।
संवृद्धि दर – गिनी फाउल में संवृद्धि दर काफी धीमी होती है सामान्यतः गिनी फाउल में विभिन्न आयु पर निम्न शारीरिक भार पाया जाता है –
| आयु (सप्ताह में) | शारीरिक भार (ग्राम में) |
| 0 सप्ताह (जन्म के समय) | 23 – 25 |
| चार सप्ताह | 150 – 200 |
| आठ सप्ताह | 450 – 550 |
| बरह सप्ताह | 800 – 1000 |
| वयस्क आयु | 1300 – 1500 |
अण्डा उत्पादन दर – गिनी फाउल मुख्य रूप् से मौसमी प्रजने हैं, इसमें अण्डा उत्पादन अप्रैल से लेकर आरंम्भिक अक्टूबर तक होता है। इस दौरान औसतन गिनी फाउल 100 – 1200 अण्डे तक देती है।
गिनी फाउल का अण्डा, आकार में मुर्गी के अण्डे की अपेक्षा छोटा (40-42ग्राम) होता है। इसका छिलका काफी मजबूत होता है, हालांकि यह आंतरिक गुणों में मुर्गी के अण्डे के समान ही होता है पर इसमें कोलेस्ट्राल की मात्रा कम होती है। अण्डे का रंग हल्का भूरा, 40-42 ग्राम तक होता है।
सामान्यतः गिनी फाउल मांस के पाली जाती है। इसका मांस मुलायम तथा मुर्गी के मांस से थोड़ा गहरे रंग का होता है। इसके मांस की विशेष सुगंध तथा स्वाद शिकार वाले पक्षी जैसे कि बटेर, तीतर आदि के जैसे होता है। इसके मांस में कोलेस्ट्राल तथा सोडियम की मात्रा कम होती है। अतः यह हृदय रोगियों के लिए भी लाभकारी है।
उपचार व रोगों से बचाव – गिनी फाउल मुर्गियों के अपेक्षा अधिक मजबूत होते हैं तथा उनमें होने वाले रोगों से भी कम प्रभावित होते हैं। अतः इनमें बीमारी के टीके इत्यादि का खर्चा तथा फफंुदी वाले रोग भी नहीं होते। दाने में पाये जाने वाले अफ्लाटॉक्सीन से भी कुछ हद तक सहनशील हैं। रानीखेत बीमारी जिससे देशी मुर्गी में 70 – 80 प्रतिशत मृत्यु दर पायी जाती है, के प्रति भी गिनी फाउल सहनशील पायी गई हैं व इससे टीकाकारण की आवश्यकता भी नहीं पड़ती परन्तु गिनी फाउल अन्तः तथा वाह्य परजीवियों के प्रति कुछ कम सहनशील हैं। अतः परम्परागत विधि से पाली जाने वाली गिनी फाउल की डिवार्मिंग करवाना चाहिए तथा पंखों पर लगने वाले जू आदि से बचाव करना चाहिए।










