उद्यानिकी

पचौली खेती की उन्नत तकनीक

पचौली (Pachauli) से एक महत्वपूर्ण वाष्पशील तेल मिलता है, जो कि अच्छे, विशेषतः, प्राचीन प्रकार के इत्रों में प्रयोग किया जाता है । यह पूरी तरक से साबुन, श्रंगार तंबाखू और अगरबत्ती में प्रयोग किया जाता है । पचौली तेल लकड़ी और मर्दाना पुष्ट सुगंध देता है, जो कि आफ्टर शेव व अन्य टॉयलैट उत्पादों में प्रयोग ,में  लाया जाता है । यह तेजपत्र, लौंग, खस के तेलों और साबुन उद्योगों में प्रयुक्त अन्य सुगंध तेलों के साथ अच्छी तरह से मिल जाता है, जहां पचौली रोसिन्डवॉयड को अत्यधिक प्रयोग किया जाता है । यह तेल में बैक्टेरियम कोलाई, बै. टायफोसम, इपिस्टाइलिस प्रजाति, इस्करसिया कोलाई, माइकोबैक्ओरियम ट्यूबरक्युलोसिस, स्टैफाअलोकॉकस ऑरियस तथा स्ट्रेप्टोकॉकस पायोजीन्स के विरूद्ध एन्टीसेप्टिक विशेषता धारण किये हुए है । यह तेल कीट पतंगों और जोंक जैसे कीटों के लिए कीटनाशक बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है । इसके सूखे पत्तों को कपड़ों को सुगंधित बनाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है । सूखी टहनियों को शराब के स्वाद को बढ़ाने के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है ।

भारत तमिलनाडु के नारियल और सुपारी के बागानों में उगी फसलों से 200 कि.ग्रा. तेल का उत्पादन ही कर पाता है । इस तेल की वार्षिक घरेलू मांग 200 टन है । विश्व भर में पचौली तेल की मांग 2000 टन है, तथा उत्पादन केवल 1500 टन । इस तेल की उच्चतम कीमत 150 डालर प्रति कि.ग्रा. है । वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय कीमत 30-35 डॉलर/कि.ग्रा. है । भारत से इस तेल के निर्यात की अपार संभावनाएं है ।

प्रजाति, किस्में  और कृषि जोप जाति:-
प्रो. कैब्लिन बेन्थ. पर्याय प्रो. पचौली पेलेट प्रजाति सुआविस हूक. को प्राकृतिक पचौली तेल के उत्पादन के लिए व्यावसायिक तौर पर उगाया जाता है । प्रत्यारोपण के छः महीने बाद यह पौधा 1.2 मीटर लंबा हो जाता है, और यह 3-4 वर्षों तक जीवित रहता है । भारत में पोगोस्टेमॉन प्रजाति की बहुत सी जंगली और कृषि योग्य किस्में पायी जाती है, जिनसे पचौली जैसे तेल का उत्पादन किया जाता है । भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंग्लोर ने भारत में ‘जोहोर‘ किस्म को व्यावसायिक खेती के लिए विकसित किया है ।

मिट्टी एवं जलवायु:-
पचौली विभिन्न प्रकार की मिट्टी और जलवायु मंे उगाया जा सकता है । हल्की और 5.6 से 6.5 पी.एच. वाली उच्च उर्वरकतायुक्त मिट्टी में इस फसल को लगाने से अच्छे परिणाम सामने आये है । पचौली के लिए 2000-3000 मि.मी. वार्षिक भारी एवं एकसमान वर्षा एवं 34 से 38 डिग्री सेल्सियस तक की तापमान और वातावरण में 75 प्रतिशत आर्द्रता युक्त गर्म और जलवायु उपयुक्त मानी जाती है । यह फसल निम्न तुंगता और 1000 मी. तक की तलहटियों  में जहां आंशिक छाया, नम और अच्छी तरह की जल निकासी युक्त मिट्टी हो ।

भूमि की तैयारी:-
पौधशाला में उगाये गये पचौली के पौधों को प्रत्यारोपित करने के लिए कीटों से मुक्त अच्छी प्रकार से तैयार भूमि की आवश्यकता होती है । 60 से.मी. के अंतर पर गहरे गढ्ढे/नालियां बनाकर उनमें खाद और उर्वरक को मिलाया जाता है ।

प्रवर्धन:-
विभत्योतक (शूट-टिप) की कलमों को प्रवर्धन के लिए प्रयोग किया जाता है । 10 से 15 से.मी. लंबी, 3 से 5 गाठों वाली कलमों को 10 से 15 से.मी. अच्छी तरह से महीन मिट्टी में लगाना चाहिए । कलमों को लगाने से पहले उनके मूल सिरे को 0.2 प्रतिशत् कार्बेडाजिम/बेनलेट के घोल में उसके बाद सेराडिक्स चूर्ण में डुबोना चाहिए । जब तक इन कलमों में जड़े न उग आयें तक तक इनको छाया में ढक कर रखना चाहिए । बरसात में या फिर मिस्ट चैम्बर में अच्छी प्रकार से जड़े उगती है । प्रत्यारोपण से पहले कलमों को पौधशाला में 3-4 महीने तक पनपने देना चाहिए ।

प्रत्यारोपण:-
प्रत्यारोपण बसंत के महीने या फिर मानसून के शुरू होते ही करना चाहिए । पौधशाला में उगे पौधों को जिसकी लंबाई 30 से.मी. तक हो, प्रक्षेत्र में 60 x 60 से.मी. या 60 x 45 से.मी. की दूरी पर लगाना चाहिए । इस प्रकार प्रति हेक्टेयर में क्रमशः 26,780 या 38,888 पौधे लगते है । मेड़ों में लगाए गए पौधों की अपेक्षा गढ्ढों या नाली में प्रतिरोपित पौधे अधिक वृद्धि करते है । पौधे के चारों ओर मिट्टी को अच्छी प्रकार से दबाना चाहिए, और प्रत्यारोपण के तुरंत बाद सिंचाई करनी चाहिए ।

खाद एवं उर्वरक:-
जड़युक्त कलमों को प्रतिरोपित करने से पहले गढ्ढों या नालियों में अच्छी तरह से मिलाई गई गोबर की खाद 20-25 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिलानी चाहिए । प्रतिरोपण के प्रथम व दूसरे वर्ष फिर से 10-12 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर डालनी चाहिए ।
जैविक खाद के अतिरिक्त गढ्ढों में 25 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फॉस्फेट और 50 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से मिलानी चाहिए । दो महीने बाद 25 कि.ग्रा. नत्रजन फिर से मिलानी चाहिए । प्रत्येक कटाई के बाद तथा फिर दो महीने के बाद 25 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर यूरिया के रूप में मिलानी चाहिए । पर्ण उत्पादन को बढ़ाने के लिए 0.2 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव पौधों पर करना चाहिए ।

सिंचाई:-
कुछ अंतराल पर हल्की सिंचाई से इस फसल का अत्यधिक लाभ मिलता है । पहली सिंचाई, रोपाई के तुरंत बाद करनी चाहिए । प्रत्यारोपण के प्रथम माह में प्रत्येक सप्ताह में सिंचाई करनी चाहिए । उसके बाद सूखे की स्थिमि में प्रत्येक माह में दो बार सिंचाई करना उचित होगा । क्योंकि यह फसल जलाक्रांत से प्रभावित होती है, अतः फालतू पानी की निकासी बहुत आवश्यक है ।

अंतकृषि:-
पौधों के बीच उचित अंतर से गुड़ाई व खरपतवार निकालने में आसानी होगी । प्रत्येक माह बारी-बारी से खरपतवार निकासी एवं गुड़ाई करनी चाहिए ।

शीर्षनोचन:
पर्ण उत्पादन को बढ़ाने के लिए पचौली के पौधे का शीर्षनोचन आवश्यक है । शिखाग्र भाग को तोड़ने से नीचे की टहनियों/कोपलों के उत्पादन में वृद्धि होती है । इस कार्य के पश्चात् पौधा एक अच्छी झाड़ी का रूप ले लेता है । महीने के अंतराल पर जब शाखाएं 30 से.मी. ऊॅंची हो जाएं, सभी मुख्य एवं नीचे की अग्र शाखाओं को (5-8 से.मी. लंबी) काट लेना चाहिए ।

कीट एवं व्याधि:-
पचौली की फसल पत्ती मोड़ने, पत्ती खाने और तनाभेदक कीड़ों से प्रभावित होती है । निमैटोड के प्रकोप से इसकी जड़ों में गांठें पड़ जाती है । फफूंद से पत्तियों में झुलसा और पौधों के सूखने वाले दो मुख्य रोग उत्पन्न होते है । इस फसल में विषाणु रोग भी लग जाता है ।
कीट नियंत्रण हेतु मोनोक्रोटाफॉस या मेथाइल पैराथियान के 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए । जड़ों में गांठे पड़ने से बचाव के लिए एल्डीकार्ब या कार्बोफ्यूरान का 2 ग्राम प्रति पौधा की दर से प्रयोग करना चाहिए । फफूंदी जन्य रोगों के नियंत्रण हेतु डाईथेन एम-45 या कैप्टान के 0.5 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए ।

कटाई एवं सुरवाना:-
प्रतिरोपण के 6-8 महीने के बाद पहली कटाई कर देनी चाहिए । पौधे के ऊपर के 20-30 से.मी. भाग को दराटी से कांट लेना चाहिए । उसके बाद वर्ष में दो बार मई-जून व अक्टूबर-नवंबर में फसल को कांटना चाहिए ।
कटाई के उपरांत पत्तियों का शाखाओं से अलग कर लिया जाता है । पर्ण को छाया में बारीक तह में समतल धरातल पर सुखाना चाहिए, ताकि हवा भी मिलती रहे । 3-4 दिनों में आर्द्रता स्तर को 10 से 12 प्रतिशत् तक कम करने के लिए मध्यम स्तर तक सुखाना चाहिए । इसके बाद आगामी 24 घंटों के लिए पत्तियों का एक ढेर लगाकर जूट के कपड़े से ढक देना चाहिए, ताकि उनमें मध्यम किण्वन हो सके । अच्छी गुणवत्तायुक्त तेल के उत्पादन के लिए यह प्रक्रिया आवश्यक है ।

आसवन:-
आसवन इकाई के आकार को देखते हुए सूखे एवं अर्ध किण्वनयुक्त पत्तियों का 6 से 12 घंटे तक वाष्प-आसवन करना चाहिए । बड़े आकार की आसवन इकाई की अपेक्षा कम क्षमता वाली इकाई में कम समय लगता है । आसवित तेल को एनहाड्रस सोडियम सल्फेट 20-25 ग्राम प्रति लीटर की दर से जलरहित लेना चाहिए । उच्च गुणवत्तायुक्त सूखे एवं किण्वन युक्त पत्ते व्यवसायिक स्तर पर 3-4 प्रतिशत् तेल देते है ।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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