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उन्नत तकनीकी से स्ट्राबेरी उत्पादन

संगीता चंद्राकर, हेमन्त पाणिग्रही एवं युगलकिषोर लोधी

स्ट्राबेरी एक महत्वपूर्ण नरम फल है, जिसको विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु में उगाया जा सकता है। यह पॉलीहाउस के अंदर और खुले खेत दोनों जगह हो जाता है। इसका पौधा कुछ ही महीनों में फल दे सकता है। इस फसल का उत्पादन बहुत लोगों को रोजगार दे सकता है। स्ट्रॉबेरी दुसरे फलों के मुकाबले जल्दी आमदनी देता है। यह कम लागत और अच्छे मूल्य का फल है।

स्ट्रॉबेरी फ्रेगेरिया जाति का एक पौधा होता है, जिसके फल के लिये इसकी विश्वव्यापी खेती की जाती है। स्ट्रॉबेरी की विशेष गन्ध इसकी पहचान है। ये चटक लाल रंग की होती है। इसे ताजा फल के रूप में खाया जाता है।स्ट्रॉबेरी स्वाद में हल्का खट्टा और हल्का मीठा होता है। साथ ही इसे संरक्षित कर जैम, रस, आइसक्रीम, मिल्क-शेक, कन्फेक्शनरी, चूइंगम, सॉफ्ट ड्रिंक आदि के रूप में भी इसका सेवन किया जाता है। स्ट्रॉबेरी एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन सी, विटामिन-बी 1, बी 2, नियासिन, प्रोटीन और खनिजों का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोतों है। इसमें मिनरल्स भरपूर मात्रा में होते हैं।

स्ट्राबेरी की बहुत सी किस्में उगाई जाती हैं:

1. कैमारोजार: यह एक कैलीफोर्निया में विकसित की गई किस्म है व थोड़े दिन में फल देने वाली किस्म है। इसका फल बहुत बड़ा व मजबूत होता है। यह किस्म लंबे समय तक फल देती है व वायरस रोधक है।
2. ओसो ग्रैन्डर:  यह भी एक कैलीफोर्निया में विकसित किस्म है। जो छोटे दिनों में फल देती है। इसका फल बड़ा होता है तथा खाने व उत्पाद बनाने के लिए अच्छा होता है। परंतु इसके फल में फटने की समस्या देखी जा सकती है। यह किस्म काफी मात्रा में रनर पैदा कर सकती है।
3. ओफरा : यह किस्म इजराईल में विकसित की गई है। यह एक अगेती किस्म है और इसका फल उत्पादन जल्दी आरंभ हो जाता है।
4. चौंडलर: यह कैलीफोर्निया में विकसित किस्म है। इसका फल आकर्षक होता है। परंतु इसकी त्वचा नाजुक होती है।
5. स्वीट चार्ली:  इस किस्म के पौधे जल्दी फल देते हैं। इसका फल मीठा होता है। पौधे में कई फफूंद रोगों की रोधक शक्ति होती है।
6. फेयर फॉक्स
7. ब्लैक मोर
8. एलिस्ता
9. स्ीसकेप
10. नाबीला

जलवायु
यह फसल शीतोष्ण जलवायु वाली फसल है जिसके लिए 20 से 30 डिग्री तापमान उपयुक्त रहता है। तापमान बढ़ने पर पोधों में नुकसान होता है और उपज प्रभावित हो जाती है।

मिट्टी
विभिन्न प्रकार की भूमि में इसको लगाया जा सकता है। परंतु रेतीली-दोमट भूमि इसके लिए सर्वोत्ताम है। भूमि में जल निकासी अच्छी होनी चाहिए। इसकी खेती के लिए पी.एच. 5.0 से 6.5 तक मान वाली मिट्टी भी उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारी
सितम्बर के प्रथम सप्ताह में खेत की 3 बार अच्छी जुताई कर ले फिर उसमे एक हेक्टेयर जमीन में 70-80 टन अच्छी सड़ी हुई खाद् अच्छे से बिखेर कर मिटटी में मिला दे। साथ में पोटाश और फास्फोरस भी मिट्टी परीक्षण के आधार पर खेत तैयार करते समय मिला दे।

पौधे लगाने का समय
पौधों की रोपाई 10 सितम्बर से 10 अक्तूबर तक की जानी चाहिए। रोपाई के समय अधिक तापमान होने पर पौधों को कुछ समय बाद अर्थात् 20 सितम्बर तक शुरू किया जा सकता है। पौधों की रोपाई दिन के ठंडे समय में की जानी चाहिए।

स्ट्रॉबेरी की पौध लगाना
इसके पौधे ऊपर उठी क्यारियों में लगाए जाते हैं। इन क्यारियों की चौड़ाई 2 फिट व ऊँचाई लगभग 25 से.मी. रखी जाती है। दो क्यारियों के बीच में डेड फिट का अन्तर रखा जाता है। क्यारियों में पौधों को चार पंक्तियों के बीच में 25 सै.मी. की दूरी व पौधे की आपसी दूरी 25-30 से.मी. रखना आवश्यक है। 35000 से 45000 पौधे पर हेक्टयेर यानि की 10,000 वर्ग मीटर में लगने चाहिए। जड़ को पूरी तरह मिटी में सेट कर दें। जड़ बहार रहने से सूखने का खतरा होता है। पौध को ज्यादा तापमान और ठण्ड से इसके ऊपर छाया करनी चाहिए।

बेड तैयार करना
खेत में आवश्यक खाद् उर्वरक देने के बाद बेड बनाने के लिए बेड की चौड़ाई 2 फिट रखे और बेड से बेड की दूरी डेड फिट रखे। बेड तैयार होने के बाद उस पर टपकसिंचाई की पाइपलाइन बिछा दे। पौधे लगाने के लिए प्लास्टिक मल्चिंग में 20 से 30 सेमी की दूरी पर छेद करे।

खाद् और उर्वरक
स्ट्रॉबेरी का पौधा काफी नाजुक होता है। इसलिए उसे समय समय खाद् और उर्वरक देना जरुरी होता है जो कि आपके खेत के मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट को देखकर देवें। साधारण रेतीली भूमि में 10 से 15 टन सड़ी गोबर की खाद प्रति एकड़ की दर से भूमि तैयारी के समय बिखेर कर मिट्टी में मिला देनी चाहिए। भूमि तैयारी के समय 100 कि.ग्रा. फास्फोरस (पी2ओ5) व 60 कि.ग्रा. पोटाश (के2ओ) प्रति एकड़ डालना चाहिए। रोपाई के उपरांत मल्चिंग होने के बाद तरल खाद् टपक सिंचाई के जरिये दिया जाना चाहिए।

सिंचाई
इस पौधे के लिए उत्तम गुणवत्ता (नमक रहित) का पानी होना चाहिए। पौधों को लगाने के तुरंत पश्चात् सिंचाई करना आवश्यक है। सिंचाई सूक्ष्म फव्वारों द्वारा की जानी चाहिए। यह सावधानी रखें कि सूक्ष्म फव्वारों से सिंचाई करते समय पौधा स्वस्थ एवं रोग.फफूंद रहित होना आवश्यक है। फूल आने पर सूक्ष्म फव्वारा सिंचाई को बदल कर टपका विधि द्वारा सिंचाई करें।

लो टनल का उपयोग
पाली हाउस नही होने की अवस्था में किसान भाई स्ट्रॉबेरी को पाले से बचाने के लिए प्लास्टिक लो टनल का उपयोग करे पौधों को पाले से बचाने के लिए ऊपर उठी क्यारियों पर पॉलीथीन की पारदर्शी चद्दर जिसकी मोटाई 100-200 माइक्रोन हो, ढकना आवश्यक है। चद्दर को क्यारियों से ऊपर रखने के लिए बांस की डंडियां या लोहे की तार से बने हुप्स का उपयोग करना चाहिए। ढकने का कार्य सूर्यास्त से पहले कर दें व सूर्योदय उपरांत इस पॉलीथीन की चद्दर से हटा दें।

स्ट्रॉबेरी की तोड़ाई
जब फल का रंग 70 प्रतिशत असली हो जाये तो तोड़ लेना चाहिए। अगर बाजार दूरी पर है तब थोड़ा सख्त ही तोडना चाहिए। तोडाई अलग अलग दिनों में करनी चाहिए।तोडाईके समय स्ट्रॉबेरी के फल को नहीं पकड़ना चाहिए, ऊपर से डण्डी पकड़ना चाहिए। औसत फल सात से दस टन प्रति हेक्टयेर निकलता है।

पैकिंग
स्ट्रॉबेरी की पैकिंग प्लास्टिक की प्लेटों में करनी चाहिए। इसको हवादार जगह पर रखना चाहिए,जहां तापमान पांच डिग्री हो। एक दिन के बाद तापमान जीरो डिग्री होना चाहिए।

कीट
कीटों में पतंगे, चाफर, मक्खियां, स्ट्रॉबेरी जड़ वीविल्स, झरबेरी एक प्रकार का कीड़ा, स्ट्रॉबेरी रस भृंग, स्ट्रॉबेरी मुकुट कीट, ंचीपके इत्यादि शामिल हैं।

प्रबंधन
1. प्रारम्भिक प्रकोप होने पर प्रोफेनाफास-50 या डायमिथोएट-30की 2 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
2. अधिक प्रकोप होने पर इमिडाक्लोप्रिड (17.8 एस.एल.) 0.3 मिली.ध् लीटर या थायोमिथोग्जाम (25 डब्लू.जी.) 0.25 ग्राम ध्लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

रोग
स्ट्राबेरी के पौधे विभिन्न रोगों के शिकार हो सकते हैं। इसकी पत्तियां खस्ता फफूंदी, पत्ता स्पॉट (कवक स्पैर्रेला फ्रैगरियाद्वारा कारण), पत्ता ब्लाइट (कवकफोमोप्सिस के कारण) से संक्रमित हो सकती हैं।अपने स्ट्रॉबेरी के पौधों में पानी देते समय यह ध्याम रखें कि पानी पत्तों को नहीं जड़ों को ही दें अन्यथा पत्तियों पर नमी कवक के विकास को प्रोत्साहित करती है। सुनिश्चित करें कि स्ट्रॉबेरी एक खुले क्षेत्र में हो जिससे कि कवक रोगों का खतरा कम किया जा सके।

प्रबंधन

1. रोग की प्रारम्भिक अवस्था में मैन्कोजेब (75 डब्लू.पी.) 2.5 ग्राम ध् लीटर या क्लोरोथायलोनिल (75डब्लू.पी.) 2 ग्राम / लीटर पानी में घोलकर 2-3 छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें।
2. अधिक प्रकोप की अवस्था में हेक्साकोनाजोल (5 ई.सी.) 1मिली. ध् लीटर या डाईफनकोनाजोल (25 ई.सी.) 0.5 मिली. ध् प्रति लीटर पानी में घोलकर 30-40 के अन्तराल पर छिड़काव करें।

स्ट्रॉबेरी की खेती का आर्थिक दृष्टिकोण –
स्ट्रॉबेरी की खेती कम लागत और न्यूनतम रख रखाव में बहुत ज्यादा मुनाफे वाला देना वाला फसल है। लोकल बाजार में स्ट्रॉबेरी का मूल्य 400-600 रुपए किलो के हिसाब से बिकती हैं। स्ट्रॉबेरी की पैदावार प्रति हेक्टेयर 7 से 10 टन हो सकती है (1-1.5 किलोध/प्रति पौधा )। यदि 4,00,000 रू.ध्टन भी कीमत आंकी जावें तो फल बेचकर किसानों को प्रति हेक्टर 28,00,000 रू. का कूल अर्जन तथा लागत काट कर 5,00,000.00 रू. का शुद्ध लाभ प्राप्त होगा।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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