बीज भण्डारण पर मौसम का प्रभाव
गुरुप्रीत सिंह गॉंधी, कमलेश साहू


उच्च उत्पादन के लिए खेतों की अच्छी तैयारी के साथ ही अच्छे बीज की उपलब्धता बहुत महत्वपूर्ण होती है। बहुत बार बीज अच्छी तरह से अंकुरित नहीं हो पाते। वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसा बीज भण्डारित करते समय मौसम के कारकों पर ध्यान न देने के कारण भी होता है, तो बीज भण्डारण के समय किन बातों को ध्यान में रखें।
क्षेत्र विशेष में मौसम अवयवों के बदलते रहने के कारण गोदामों के अन्दर का तापक्रम एवं आर्द्रता भी परिवर्तित होती रहती है। ज्यादातर सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र दोनों प्रकार के गोदाम इस वर्ग के अन्तर्गत आते हैं। किसानों द्वारा भण्डारित बीज भी इन्हीं विधियों में किन्तु छोटे बर्तनों में सुरक्षित किये जाते हैं अथवा छोटे-छोटे थैलों में बीज की मात्रा के आधार पर भण्डारित किये जाते हैं। एक प्रभावी एवं कुषल प्रबन्धन के द्वारा अनाज की गुणवत्ता को ज्यादा समय तक बनाये रखा जा सकता है। निम्नलिखित विषयों पर भण्डारण के पूर्व एवं भण्डारण के समय विषेष ध्यान देना चाहिए।
डेहरी में भण्डारण के पूर्व उसमें किसी प्रकार के अवशेष अनाज या अवशिष्ट वस्तुओं को निकाल देना चाहिए। इधन-उधर बिखरे अनाज को हटा देना चाहिए अन्यथा इससे चूहों व कीटों से आक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। डेहरी की पेंदी को भली-भॉंति देख लेना चाहिए। वह टेढ़ी-मेढ़ी व ऊॅंची-नीची न हो अन्यथा टेढ़ी-मेढ़ी व जमीन के बीच रिक्त स्थान बन जाता है जो अनाज के गिरने एवं पानी, जीवाणु, कीटों के प्रवेष का कारण बनता है। इस प्रकार के रिक्त स्थानों, छिद्रों तथा दरारों, मोर्चा, जंग इत्यादि होने की दषा में उत्तम गुण वाले प्रोटीन से भर देना चाहिए। टूटे-फूटे दानों के भण्डारण की अपेक्षा अच्छे गुणवत्तापूर्ण व साफ-सुथरे दानों का संग्रहण आसान होता है।
अनाज की सफाईः
टूटे-फूटे एवं पतले दानों को छलनी के द्वारा अलग कर देना चाहिए। इनकी उपस्थिति से हवा का आवागमन बाधित होता है जिससे कीटाणुओं के आक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। विशेषकर यह स्थिति डेहरी के केन्द्र में होती है। आजकल आधुनिक प्रकार की छलनी प्रचलन में है जिनके द्वारा कम समय एवं लागत में अनाज की सफाई की जाती है।
नियंत्रित स्थितियॉंः
इस विधि का उपयोग लम्बी अवधि तक बीजों का भण्डारण करने हेतु किया जाता है। इस प्रकार का भण्डारण करने हेतु गोदामों का तापक्रम लगभग 20 डिग्री सेंटीग्रेड रखा जाता है। इन परिस्थितियों में संरक्षित/भण्डारित बीज ज्यादा हानिकारक स्थितियों एवं बीमारियों से पूर्णतया मुक्त होते हैं।
सुरक्षित बीज भण्डारण के सिद्धान्तः
जलवायुवीय स्थितियॉं फसलों की परिपक्वता अवधि में बीजों के संग्रहित/भण्डारित करने या न करने को सुनिष्चित करती है। प्रतिकूल मौसम जैसे- वर्षा, ओला, अत्यधिक आर्द्रता तेज हवा एवं विभिन्न प्रकार की बीमारियॉं एवं जीवाणुओं के लगने की स्थिति में परिपक्वता से प्राप्त फसलों के बीजों का भण्डारण नहीं करना चाहिए।
गोदामों में बीजों को प्रभावित करने वाले कारकः
विभिन्न कारक जो बीजों को संरक्षित/भण्डारित करते समय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं, वे इस प्रकार हैः-
1. अजैविक तत्व
2. जैविक तत्व
1) अजैविक तत्वः
इसके अन्तर्गत तापक्रम, आर्द्रता एवं ऑक्सीजन आदि प्रमुख अवयव आते हैं-
तापक्रमः
तापक्रम वह कारक है जो सभी प्रकार की जैविक क्रियाओं को प्रभावित करता है। 20 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान के ऊपर जीवाणु, कीटाणु, गुणरूपक में वृद्धि करते हैं और बीजों को नुकसान पहुॅंचाते हैं। विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं के बढ़ने हेतु अनुकूल ऊष्मीय स्थितियॉं सारणी-1 में दिया गया है।
सारणीः विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं के बढ़ने हेतु अनुकूल ऊष्मीय स्थितियॉं
| क्र.सं. | जैविक घटक | तापमान डिग्री सेंटीग्रेड | न्यूनतम नमी का प्रतिशत | ||
| न्यूनतम | अधिकतम | अनुकूल | |||
| 1. | कीट | 15-20 | 33-38 | 27-37 | 9-11 |
| 2. | दीमक | 5-12 | 32-36 | 19-31 | – |
| 3. | फफूंदी | 2-5 | 34-40 | 19-31 | 15.4-16.8 |
| 4. | जीवाणु | 5-6 | 50-58 | 28-35 | – |
डेहरी में भण्डारण के पूर्व किसी भी प्रकार के अवशेष (अनाज या अवशिष्ट वस्तुओं) को निकाल देना चाहिए। इधर-उधर बिखरे अनाज को हटा देना चाहिए अन्यथा इससे चूहों व कीटों से आक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। डेहरी की पेंदी को भली-भांति देख लेना चाहिए। वह टेढ़ी-मेढ़ी व ऊॅंची-नीची न हो अन्यथा टेढ़ी-मेढ़ी व जमीन के बीच रिक्त स्थान बन जाता है जो अनाज के गिरने एवं पानी, जीवाणु, कीटों के प्रवेष का कारण बनता है।
आर्द्रताः
तापमान की तरह आर्द्रता भी एक महत्वपूर्ण अवयव है जो पर्यावरण में परिवर्तन करके बीजों की दीर्घावधि तक रखने एवं बीमारियों की क्रियाषीलता को प्रभावित करता है। जब अधिक आर्द्रता के साथ-साथ तापमान भी बढ़ जाता है तो ज्यादातर बीज ट्रॉपिकल पर्यावरण में अपनी गुणवत्ता की तेजी को खो देते हैं।
बीजों की नमीः
बीजों में नमी की उपलब्धता भी एक मुख्य कारक है जो सीधे बीजों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। एवं हानिकारक बीमारियों को गुणक रूप से बढ़ाता है। बीजों में 10 प्रतिशत से कम नमी की उपलब्धता भण्डारण हेतु उपयुक्त पायी गयी है। बीजों को नमी प्रूफ पैकेट में रखने की स्थिति में नमी की मात्रा को और भी कम करके लगभग 4 से 5 प्रतिशत तक रखा जाता है। सुरक्षित बीज भण्डार के दो प्रमुख सिद्धान्त है। वे इस प्रकार हैंः-
1. अपेक्षित आर्द्रता का प्रतिशत एवं तापमान (डिग्री/फारेनहाइट) का योग 100 डिग्री से अधिक नहीं होना चाहिए।
2. प्रति एक प्रतिशत नमी में कमी या 5 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में गिरावट करके बीजों के अंकुरण को सुरक्षित रखते हुए दूने समय तक भण्डारित किया जा सकता है।
जैविक कारकः
बीजों के भण्डारण के दौरान बहुत से जैविक कारक उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। बीजों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार ज्यादातर नुकसान भण्डारण की अवधि में होता है। एक दर्जन कीटों की ऐसी प्रजातियॉं है जो बीजों की गुणवत्ता को ज्यादा नुकसान पहंुचाते हैं। नुकसान पहंुचाने की प्रवृत्ति के आधार पर इनको दो भागों में बांटा गया है।
1. प्राथमिक अन्तः भक्षी कीटः ये कीडे़ अपने अण्डों को फसलों की कटाई की पूर्व स्थिति में छोड़ देते हैं। लार्वा अवस्था में ही ये दानों को नुकसान पहुंचाने में सक्षम होते हैं।
2. घुन इत्यादि कीड़ों से प्रभावित बीज पूर्णतः बोने योग्य नहीं रह जाता है क्योंकि ये कीड़े बीज के अंकुरण भाग को सबसे पहले खा जाते हैं। इन कीड़ों का प्रभाव बढ़ने में पूर्णतया टूटे-फूटे बीज और उनके चूर्ण ही उत्तरदायी होते हैं।
संक्रमण के स्रोतः
1. खलिहानों में संक्रमणः कुछ कीड़े बीजों को उनकी जनन प्रावस्था में ही संक्रमित करते हैं। वे फसलों के उत्पाद के समय आ जाते हैं और भण्डारण से पूर्व तथा बाद की अवस्थाओं में नुकसान करते हैं। सामान्यतः संक्रमण का संज्ञान वयस्कों के बाहर निकलने के समय होता है।
2. गोदामों मेंः कीटों के वयस्क लार्वा दीवारों के कोने में, दरारों में या विद्युत उपकरणों के खाली जगह इत्यादि में घुसे होते हैं जो संक्रमण के मुख्य स्रोतों में से एक हैै।
3. पुराने थैलों या टंकियों इत्यादि मेंः कीड़े थैले या टंकियों के कोनों में भण्डारित बीजों को संक्रमित करते हैं।
4. परिवहन साधनों/गाडि़यों मेंः नियमित प्रयोग में लायी जाने वाली गाडि़यॉं भी संक्रमण का स्रोत है। आजकल अधिक मात्रा में थैलों से भरे बीजों को निर्यात करने के लिए टंकियॉं प्रयोग में लायी जा रही है। यद्यपि इन टंकियों की पूर्ण सफाई और उपचार करने की आवश्यकताहोती है।
कीट संक्रमण की देखभाल और निरीक्षण
कीटों के संक्रमण की देखभाल और निरीक्षण के लिए विभिन्न तरीके प्रयोग में लाये जाते हैं। भण्डारित बीजों को संक्रमित करने वाले कीटों की उपस्थिति, उनकी आबादी और संक्रमण के स्तर को जानना अति आवष्यक है। प्रारम्भिक निरीक्षण, उचित प्रबन्धन बीजों के संक्रमण के बचाव को सुनिष्चित करता है।
सारणी-2: भण्डारण पूर्व कीटनाशकों का छिड़काव
| सतह (100 मी2) |
पानी का आयतन (घन ली.) | फेनिस्ट्रोथियॉन 50 ई.सी. (मि.ली.) | मेथिल पिरिमीफॉस 50 ई.सी. (मि.ली.) |
| धातु | 2.5 | 25 | 50 |
| कंकरीट | 5.0 | 50 | 100 |
| ईंट | 7.0 | 70 | 140 |
सारणी-3: मिश्रित किये जाने वाले कीटनाशक
| कीटनाशक | मात्रा/टन बीज |
| मैथिलपिरिमीफॉस 2 प्रतिशत | 200 ग्राम |
| मैलाथियान 50 ई.सी. | 60 मि.ली./5 लीटर पानी |
| मेथिलपिरिमीफॉस 50 ई.सी. | 12 मि.ली./5 लीटर पानी |
बीज गोदाम की देखभालः
इसके अन्तर्गत उड़ने वाले, रेंगने वाले कीड़ों का उचित निरीक्षण बसन्त, गर्मी या बरसात के मौसम में किया जाता है जबकि वायु तापमान और आर्द्रता कीड़ों के गुणन और क्रियाषीलता के लिए अनुकूल होती है। बहुत से कीट रात्रिचर और प्रकाष की उपस्थिति में भोजन ग्रहण करते हैं। आजकल प्रकाष उपकरण विद्युत जाली से युक्त होते हैं, जो प्रकाष की तरफ आकर्षित होने वाले तथा गुजरने वाले कीड़ों को मार देते हैं। इस प्रकार यह वयस्क कीड़ों की आबादी को नियंत्रित करने में मदद करता है।
भण्डारण से पूर्व बचाव के उपायः
बीज भण्डारण की तैयारियॉः
नई कटी फसलों के आने से पहले कम से कम चार सप्ताह पहले कीटनाशकों का छिड़काव करना चाहिए। यदि पूर्व भण्डारित बीज संक्रमित हो गये हो तो एक सप्ताह पहले दोबारा छिड़काव करना चाहिए। यह काम नई फसल आने से पूर्व ही करना चाहिए। गोदाम के खाली होने की अवस्था में उपचार करना बेहतर होता है।
सारणी-4: कीटनाशक और सतह उपचार के लिए मात्रा
| कीटनाशक | प्रति 100 मी2 सतह में मात्रा |
| मैथिलपिरिमीफॉस 2 प्रतिशत डी | 1.25 कि.ग्रा. |
| फेनीट्रोथियॉन 50 ई.सी. | 50 मि.ली./5 लीटर पानी |
| मैथिपपिरिमीफॉस 50 ई.सी. | 50 मि.ली./5 लीटर पानी |
सारणी-2 का प्रयोग करते हुए कीटनाशक का छिड़काव करें और पानी का बिलयन फर्शों, दीवारों और दरारों को भरने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। ट्रकों, ट्रालियों और अन्य संरचनाओं को भी उपचारित करें जहां कीड़ों के छिपे होने की संभावना हो सके।
स्प्रेयर (छिड़काव) पम्प भरने से पहले कीटनाशक को उचित मात्रा में पानी में मिला लेने की सावधानी बरतनी चाहिए।
- पुराने थैलों को गर्म पानी में 50 सेंटीग्रेड तापमान पर 15 मिनट तक भिगोना और फिर सुखाना चाहिए या 10 मि.ली./लीटर मैलाथियान का पानी में घोल बनाकर दोनों सतहों को उपचारित करना चाहिए।
- नये बीजों को पुराने स्टाक के साथ भण्डारित नहीं करना चाहिए। यह भी सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि नये बीजों में किसी तरह का संक्रमण नहीं है।
- बोरों की सिलाई मशीन से सूती धागों से करनी चाहिए क्योंकि जूट के धागों, सुतली से सिलाई करने पर मोड़ों और छोरों पर जगह छूट जाती है।
- कीटनाशकों का प्रत्यक्ष मिश्रण बीजों को लम्बे समय तक सुरक्षा प्रदान करता है। लेकिन उपचारित बीजों को ठंडे सूखे स्थानों में रखना चाहिए। बीजों में नमी की मात्रा 10 प्रतिषत से अधिक नहीं होनी चाहिए। 10 प्रतिशत नमी के परीक्षण के लिए अनाज को दांतों तले दबाने से कट की आवाज के साथ टूटता है। मिश्रित किये जाने वाले कीटनाशक नीचे सारणी-3 में अंकित है।
भण्डारण के समय सावधानियां
उचित भण्डारण के बाद बची हुई खुली सतह, दरवाजों इत्यादि को नीचे दी गई सारणी-4 के किसी एक कीटनाशक से उपचारित करना चाहिए। यह नये उत्पादों को लगभग तीन माह तक सुरक्षा प्रदान करता है। धुंए के बाद सतह का उपचार पुनः संक्रमण को रोकता है।
जब किन्ही कारणों से कीड़ों की देखभाल उपर्युक्त विधियों से नहीं की जाती है तो कम से कम बीजों का निरीक्षण दो सप्ताह (बरसात और बसन्त) से चार सप्ताह (गर्मी और शरद ऋतु) में हानिकारक कीड़ों के प्रबन्धन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यदि जीवित कीट या संक्रमण के अन्य प्रमाण दिखाई देते हैं तो बीजों को हवा की बन्द स्थिति में या तो कमरे में या 1000 गेज की मोटी पालीथीन की चादर से ढक कर धुएं से उपचारित किया जात है।









