छोटे स्तर पर फलों की नर्सरी एवं पौधे तैयार कैसे करें
नूतन सिंह, विकास रामटेके, और अनुराग केरकेट्टा


सफल फलोत्पदन के लिए नर्सरी या रोवणी का अपना विशेष स्थान है जहां न केवल फलों को पौधों का उत्पादन एवं पालन पोषण ही किया जाता है वरन् साथ-साथ उनका प्रवर्घन भी किया जाता हैं फल नर्सरी का उद्देश्य आदर्श पौधे तैयार करना है जिन्हें प्रायः फल बीज से तथा विधि से तैयार किया जाता है। एक उत्तम फल नर्सरी के विकास के लिए उसके निम्न आवश्यक अंगों पर ध्यान अति आवश्यक है।
- निवास, कार्यालय, भण्डार, पशु-गृह आदि
- सड़क एवं रास्ते।
- मातृ-वृक्ष।
- क्यारियां।
- गमला स्थल।
- कार्यस्थल।
- पैकिंग स्थल
- सिंचाई स्थल।
- खाद के लिए गड्ढे ।
- उपजाऊ मृदा ओर जलनिकास व्यवस्था
भूमि
फलों की नर्सरी लगाने के लिए भूमि सर्वोत्तम किस्म की होनी चाहिए, जैसे दुमट भूमि व गहरी जिसमें जलनिकास ठीक तरह से हो। साथ ही साथ उपयुक्त जलवायु को बनाये रखना भी अत्यावश्यक है। सुरक्षित स्थान,आवागमन के साथ और रास्ते आवश्यकतनुसार ठीक-ठाक होने चाहिए।
वृक्ष
फल वृक्ष मुख्यतः दो प्रकार के कहलाते हैं:- १.सदाबहार २.पर्णपाती।
मुख्य सदाबहार फल
आम, जामुन, अमरूद, केला, चीकू, सन्तरा, माल्टा, नीबू, चकोतरा, ग्रेपफ्रूट, पपीता आदि।
पर्णपाती फल वाले पेडों पर पतझड़ ऋतु में पत्ते गिर जाते हैं और वे कुछ महीने पत्तों के बिना ही रहते हैं। शीत ऋतु के अन्त में इनकी कलिया फूलनी शुरू होती है जो वसन्त ऋतु में खिलती हैं। इन पौधें को नर्सरी से उखाड कर जडों वाला भाग बिना मिट्टी के रखा जाता है।
मुख्य पर्णपाती फल
सेब, बादाम, आडू, अंगूर आदि हैं। इस प्रकार के फलों की पौध तैयार करने के लिए उचित जलवायु का होना अति आवश्यक है। इन फलों की नर्सरी अवस्था में बीज या कलम को रोपित करने से लेकर पौधों को उखाड ने तक के कार्य किए जाते हैं।
बीजों द्धारा फलों के पौधे तैयार करना
सबसे पहले यह ध्यान देना चाहिए कि बीज उन्नत, विश्वसनीय,शुद्ध और रोग रहित हों इनकी अंकुरण क्षमता को भी ज्ञात कर लेना चाहिए। यथा सम्भव इन्हें फलों से निकालने के तुरन्त बाद ही क्यारियों में बुआई कर देना चाहिए।
क्यारियों को कैसे तैयार करें
बीज बोने के लिए ऊंचे स्थान पर जहां कि पानी रूकने की संभावना न हों, क्यारियां बनानी चाहिए। ऐसी क्यारियां भूमि के धरातल से १५-२० से. मी. ऊंची बनानी चाहिएं। क्यारियां बनाने से पहले भूमि की जुताई करके मिट्टी अच्छी तरह भुरभुरी बना लेना चाहिए। क्यारियां तैयार कर इनमें १५ किलो ग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति क्यारी मिलाकर हल्की गुडाई द्वारा समतल कर लेना चाहिए। क्यारियों में कंकड तथा घास के बीज नहीं होने चाहिए। फलों के बीजों को सदैव कतारों में ही बुआई करें। बीज बोने के बाद बीजों को खाद की पर्त से ढक दें। धूप से बचाव के लिए इन्हें चाहें तो चटाई या घास से ढक दें। सिंचाई नित्यप्रति हजारे से हल्के रूप में प्रातः काल करना आवश्यक है। महीन आकार के बीजों को क्यारियों में बुआई न करके गमलों में बोना चाहिए। यदि इन्हें क्यारियों में बोना पडे तो बीजों को रेत के साथ मिलाकर बोयें।
बीज बोने से पहले बीजों को एग्रीसन, कैप्टान, थाइरम, ब्रॉसीकाल आदि दवाओं से उपचारित कर लें। क्यारियों में उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए भूमि उपचार भी आवश्यक है। भूमि उपचार १: १: १०० या १ प्रतिशत बोर्ड़ो मिश्रण या ०.२ प्रतिशत फाइटोलोन २५ प्रतिशत फार्मेलिन आदि दवाओं से किया जाता है। बीज जमने के पश्चात क्यारियों से घास आदि निकालते रहना चाहिए। हल्की सिंचाई करके ही पौधों को उखाड़ना चाहिए।
पौलीथीन की थैलियों में फल – पौधे तैयार करना
पौलीथीन की थैलियों में फलों के पौधे तैयार किए जाते हैं और इन पौधों को स्थानान्तरण करने में भी सरलता होती है पौलीथीन में तैयार पौधे किसी भी मौसम में उद्यान में लगाए जा सकते है। पौलीथीन मोटे किस्म की होनी चाहए। पौलीथीन की थैलियों का आकार २५-१० से.मी. ३०-१५ या अन्य आकार वाली पौधों के अनुसार हो सकती है।
इन पौलीथीन की थैलियों को बीज बोने के लिए उपयुक्त बनाने के लिये पहले थैलियों में नीचे की ओर महीन छिद्र कर देना चाहिए जिससे आवश्यकता से अधिक हल बाहर निकल जाए किन्तु मिट्टी न निकल पाए। थैलियों में मिट्टी २ भाग, बालू, १भाग, गोबर हुई गोबर की खाद १ भाग तथा पत्ती की खाद २ भाग का मिश्रण कर देना चाहिए। बोने के लिए थैलियों में एक या दो बीज बोने चाहिए। जब पौधे ५ से. मी. के हो जाए तो सविधानुसार एक स्वस्थ पौधा रखकर अन्य को निकाल देना चाहिए।
कायिक प्रवर्धन
इस प्रकार का अलैंगिक प्रजनन सिर्फ पौधों में होता है। कायिक प्रवर्धन में, पुराने पौधों के हिस्से जैसे तना, जड़ और पत्ती का प्रयोग नए पौधे को उगाने में किया जाता है। पुराने पौधों में निष्क्रिय स्थिति में मौजूद अंकुर को जब अनुकूल स्थितियां जैसे नमी और ताप दिया जाता है, तब वे नए पौधों के रूप में उगने लगती हैं और विकसित होने लगती हैं।
हरी घास, ब्रायोफाइलम, मनीप्लांट, आलू, प्याज, केला आदि के पौधों में कायिक प्रवर्धन होता है।

पौधों का कृत्रिम प्रवर्धन
जब मानव-निर्मित पद्धतियों का प्रयोग कर एक पौधे से कई नए पौधों को विकसित किया जाता है, तो उसे ‘कृत्रिम प्रवर्धन’ कहते हैं। पौधों के कृत्रिम प्रवर्धन की निम्नलिखित तीन सामान्य विधियाँ हैं –
- कलम लगाना
- लेयरिंग
- ग्राफ्टिंग
कलम लगाना
पौधे के किसी भी छोटे हिस्से, जो तना या पत्ती कुछ भी हो सकता है और जिस पर अंकुर लगा हो, को काटकर तथा उसे मिट्टी और पानी की सुविधा देकर एक नया पौधा उगाया जाता है। कुछ दिनों के बाद आप नए पौधे को बढ़ता देख सकते हैं।
बोगनविलिया, गुलदाउदी, अंगूर आदि के पेड़ कलम लगाकर उगाये जा सकते हैं।

लेयरिंग
लेयरिंग में जनक पौधे की शाखाओं को मिट्टी में इस प्रकार डाला जाता है कि उस शाखा का एक हिस्सा मिट्टी से बाहर की ओर निकल रहा हो। मिट्टी के भीतर वाली शाखा के हिस्से पर जब जड़े उग आती हैं तो उसे जनक पौधे से काट कर अलग कर लिया जाता है। इस प्रकार मिट्टी में दबी शाखा से नया पौधा उग जाता है।
चमेली, स्ट्रॉबेरी, रसभरी जैसे पौधों के लिए लेयरिंग विधि का प्रयोग किया जाता है।

ग्राफ्टिंग
ग्राफ्टिंग में दो अलगदृअलग पौधों के तने को काटा जाता है और इस प्रकार जोड़ा जाता है कि वे एक पौधे के रूप में विकसित हों। काटे गए दो तनों में से, एक तने में जड़ें होती हैं और इसे ‘स्टॉक’ (ेजवबा) कहा जाता है। दूसरा तना बिना जड़ों के काटा जाता है और इसे नवपल्लव (scion) कहा जाता है। स्टॉक पौधे का निचला हिस्सा होता है और नवपल्लव ऊपरी हिस्सा। दोनों तनों को तिरछे रूप में काटा जाता है।

नवपल्लव और स्टॉक की कटी हुई सतह को कपड़े के टुकड़े से एक साथ जोड़ा जाता है और बाँध दिया जाता है और फिर पॉलिथीन की शीट से ढँक दिया जाता है। यह तने को किसी भी प्रकार के संक्रमण या अन्य समस्याओं से बचाता है।
जल्द ही स्टॉक और नवपल्लव मिल जाते हैं और एक नया पौधा बनने लगा है। इस नए पौधे के फल में दोनों ही पौधों के गुण होते हैं। सेब, आड़ू, खुबानी आदि ग्राफ्ट किए गए फलों के उदाहरण हैं।
कृत्रिम कायिक प्रवर्धन के लाभः
- नए पौधे में जनक पौधे के जैसे ही गुण होंगे।
- ग्राफ्टिंग द्वारा उगाए गए फलों के पौधों में फल बहुत पहले आने लगते हैं।
- आरंभिक वर्षों में पौधों पर कम ध्यान देने की जरूरत होती है।
- एक ही जनक से कई पौधे उगाए जा सकते हैं।
- बीजरहित पौधे भी प्राप्त कर सकते हैं।
अन्य सावधानियाँ
१. नर्सरी व छोटे फलदार पौधों में पाले से भारी नुकसान होता है। इन्हें पाले से बचाने के लिए पौलीथीन की सीट अथवा घास से ढक देना चाहिए। उत्तर-पश्चिम से चलने वाली ठण्डी हवा से टोटियों का उपयोग भी काफी लाभप्रद है। रात्रि के तीसरे पहर नर्सरी व उत्तर-पश्चिम दिशा में कूड़ा करकट जलाकर धुंआ करने से भी पाले से बचाव किया जा सकता है।
२. वायु अवरोधक वृक्ष जैसे कीकर ,बबूल आदि का भी आवश्यक है जिसे ग्रीष्म में लू तथा शरद में पाले से छोटे पौधों का बचाव हो सके।
लाभ
आज के समय, फलों की नर्सरी एक महत्वपूर्ण व्यवसाय के रूप में उभर कर आ रहा है किसान कम लागत से केवल थोडी सी जमीन पर इस व्यवसाय को अपना कर अधिक मूल्य तथा ज्यादा आय प्राप्त कर सकते हैं।
नूतन सिंह, विकास रामटेके, और अनुराग केरकेट्टा
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छ. ग.)










