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केला की उन्नत खेती

कुमुदनी साहू, डॉ. जी.डी. साहू एवं सेवन दास खुंटे

प्रस्तावना
हमारा देश विकासशील देश है, जिसका जनसंख्या की दृष्टि से संसार में दूसरा स्थान है । वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 121 करोड़ से अधिक हो चुकी है, आज इतनी बड़ी आबादी के लिए 24 करोड़ टन खाद्यान्न की जरूरत है । तेज रफ्तार से बढ़ती जनसंख्या तथा दिन प्रतिदिन होती पानी की कमी से ऐसा अहसास होने लगा है कि आने वाले समय में भारत देश, विश्व के मानचित्र में (जल एवं खाद्यान्न) अभाव ग्रस्त देशों की सूची में आ जाएगा । क्योंकि इस देश में आज भी वर्षा पर आधारित खेती की जाती है जिसके कारण विभिन्न उद्यानिकी फसलों का कुशल एवं सफल उत्पादन लेना संभव नहीं है । ऐसी अवस्था में वैज्ञानिक तकनीक द्वारा केले की खेती कर जिसके अन्तर्गत आधुनिक सिंचाई पद्धति, फर्टीगेशन एवं अन्य तकनीकों द्वारा अधिक से अधिक लाभ कमाया जा सकता है ।

केला भारत के प्राचीन फलों में महत्वपूर्ण फल हैं। इसके विविध उपयोग तथा महत्व को देखते हुये इस फल को कल्पतरु का संबोधन भारतीय संस्कृति में किया जाता है। इस पौधे के सभी भागों को किसी न किसी रुप में प्रयोग किया जाता है। केले के फलों की वर्ष भर उपलब्धता और पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा, इसे प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक संपुर्ण पौष्टिक फल बनाने में महत्वपूर्ण हैं। छत्तीसगढ़ के सिंचित क्षेत्रों मे केले की खेती की अपार संभावनायें हैं।

जलवायुः
केला का पौधा एक उष्ण कटिबंधीय पौधा है। केले के फसल के लिए अनिवार्य रूप से आद्र तथा गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। यह समुद्र तल से 1200 मीटर की ऊंचाई तक उग सकते हैं। केले के पौधे के सर्वांगीण वृद्धि व विकास के लिए 10 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है। बहुत अधिक ठंड इसके लिए हानिकारक है। लेकिन इसका विकास 20 डिग्री सेल्सियस पर मंद हो जाता है और 35 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा होने पर कम हो जाता है। एक विशेष अवधि के लिए जब तापमान 24 डिग्री सेल्सियस के ऊपर हो जाता है पैदावार अधिक होती है। 175 से 200 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में केला उत्पादन अधिक लाभकारी होता है।

भूमिः
केले की फसल हेतु मिट्टी का चयन करने में मृदा की गहराई और जल निकासी दो सबसे महत्वपूर्ण घटक है। इसकी अच्छी उत्पादन हेतु खेत में मिट्टी 0.5 से 1 मीटर गहरी होनी चाहिए। मृदा नमीधारक, उपजाऊ, जैविक पदार्थ मे प्रचुर तथा 6.5 से 7.5 पी.एच. मान वाली होनी चाहिए। अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि (डोरसा/ माल/ चवार – Alfisols) केले की खेती के लिए उपयुक्त होती है। किसान भाई झील, तालाब अथवा नदी किनारे की नम भूमि पर रोपाई करके केले की खेती से अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

उन्नत किस्मेंः

  • ग्रैंड नेन (जी.-9): यह अधिक उपज वाली किस्म हैं। करीब एक पौधे से 30 किग्रा. उच्च गुणवत्ता वाले फल प्राप्त होते है, मिठास डवार्फ कैवेन्डिश से कम रहती है। प्रोसेसिंग के लिए ये किस्म उत्तम है, फल को अधिक समय तक सुरक्षित रख सकते हैं। ये किस्म टपक सिंचाई पद्धति से उगाने पर अच्छा उत्पादन देती है।
  • डवार्फ कैवेन्डिश : यह किस्म टिशु कल्चर के द्वारा तैयार किया जाता हैै। साथ ही सब्जियों के रुप में उपयोग करने हेतु उपयुक्त किस्म है। फल लंबे, अण्डाकार होते है तथा फल का वजन 25 किलो तक प्राप्त होता है। परिपक्वता के समय फल हरे रंग के एवं अधिक मिठास वाले होते है। यह हल्की मिट्टी में अच्छा उत्पादन देती है। यह किस्म सघन बागवानी में ड्रिप सिंचाई के साथ अच्छा उत्पादन देती है।
  • लाल केलाः यह किस्म लाल केला, चेन्काडाली, येरा भारती, चन्द्रबाले, अग्निश्वर आदि के नाम से जानी जाती है। यह केला की एक उत्कृष्ट किस्म है, जिसका छिलका लाल एवं स्वाद अच्छा होता है। इसके पौधे बड़े एवं स्वस्थ होते हैं। इनकी उँचाई लगभग 2.5 से 3 मी. तक होती है। उपयुक्त फसल प्रबंधन अपनाने पर इनके एक पौधे से 20-30 कि. ग्रा. फल प्राप्त किये जा सकते है।
  • उद्दयम : यह किस्म संपूर्ण भारत में लगाने के लिए अनुशंषित कि गई है। यह 13 माह की अवधि वाली किस्म है जिसमें गुच्छों का वजन 35-40 किलो तक पाया जाता है। इसमें कुल विलेय पदार्थ 310 ब्रिक्स है। यह किस्म प्रसंस्कृत उत्पाद बनाने हेतु उपयुक्त है। यह किस्म विल्ट व गोल कृमि के लिए सहनशील है। लम्बे समय तक परिवहन हेतु उपयुक्त हैं।

प्रर्वधनः
केले का प्रवर्धन अधो भूस्तारी या सकर्स द्वारा किया जाता है । तलवार सकर की पत्तियां कम चौड़ी होती हैं । जिनका आकार बिल्कुल तलवार के आकार का होता है । नए पौधे तैयार करने के लिए तलवार सकर उत्तम माने जाते है।

उत्तक प्रर्वधन:
उत्तक प्रर्वधन (टिशु कल्चर) के द्वारा तैयार पोधों को प्रसारण के लिये उपयोग में लाया जाता है। उत्तक संवर्धन द्वारा तैयार पौधों की निम्नलिखित विशेषताएं होती है।
1. इस विधि से तैयार पौधे रोग व्याधि से मुक्त रहते हैं।
2. इससे तैयार पौधों को आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है।
3. इससे तैयार पौधों में समरूपता होती है।
4. परंपरागत संकर द्वारा फसलोत्पादन की अपेक्षा इस विधि से तैयार पौधों से कम समय में अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।

खेत की तैयारीः
गर्मी के महीनों में खेत को गहरी जुताई करके छोड़ दें जिससे खरपतवार व कीट व्याधि नष्ट हो जाये। इसके बाद हैरो चलाकर खेत समतल कर ले एवं उचित दूरी पर 60x60x60 सेमी. के आकार के गड्ढे खोदकर 15-20 दिनों के लिए खुला छोड़ दें। इसमें 10 कि.ग्रा. गोबर की खाद एवं 500 ग्राम नीम की खली मिलाकर गड्ढा भर दें।

केले की रोपाईः
छत्तीसगढ़ में केला लगाने का उत्तम समय जून-जुलाई का महीना है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के लिए ग्रैंड नेन व ड्वार्फ कैवेन्डिश को 2.0 x 1.5 मीटर की दूरी पर लगा सकते हैं। पौधा लगाते समय ध्यान रखना चाहिए कि पौधों को उचित दूरी पर तैयार गड्ढों में लगाकर मिट्टी को पौधों के पास अच्छी तरह से दबा देना चाहिए एवं तुरंत हल्की सिंचाई करें।

खाद एवं उर्वरकः
अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद 10 कि.ग्रा. गड्ढे भरते समय एवं 10 कि.ग्रा. पौधे लगााने के 3-4 माह बाद देना चाहिए। भूमि के उर्वरता के अनुसार प्रति पौधा 350 ग्राम नत्रजन, 150 ग्राम स्फुर तथा 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता पड़ती है। स्फुर की आधी मात्रा पौध रोपण के समय तथा शेष आधी मात्रा रोपाई के बाद देनी चाहिए, नत्रजन की पूरी मात्रा 5 भागो में बाँटकर अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर, फरवरी एवं अप्रैल में देनी चाहिए। पोटाश की पूरी मात्रा तीन भागो में बाँटकर सितम्बर ,अक्टूबर एवं अप्रैल में देना चाहिए।

पानी में घुलनशील खाद डालने का समय:
केले का उत्पादन टपक सिंचाई पद्धति से करने पर ही उत्पादन अधिक मिलता है। घुलनशील उर्वरकों की मात्रा एवं देने का समय को निम्नलिखित तालिका-1 में दर्शाया गया है।

तालिका 1: विभिन्न फसल अवधि में टपक सिंचाई संचंत्र द्वारा दिये जाने वाले घुलनशील उर्वरकों की मात्रा

समय/दिन ग्रेड किग्रा./दिन/एकड़ कुल मात्रा (किग्रा)
1-9′ 19:19:19 2.13 192
13:00:46 1.033 93
यूरिया 0.77 70
91-150 00:52:345 0.983 59
13:00:46 1.376 82.5
यूरिया 1.958 117.5
151-300 13:00:46 1.88 282.5
यूरिया 1 150

सूक्ष्म पोषक तत्व:
जिंक एवं बोरॉन की कमी के लक्षण पौधे पर दिखाई देते है। इसकी कमी के लक्षण दिखाई देने पर पत्तियां छोटी एवं पत्तियों के शिराओं में उत्तकक्षय दिखाई पड़ती है। इसलिए पौधे लगाने के तृतीय सप्ताह बाद 50 ग्राम/पौधे के हिसाब से बोरिक एसिड एवं जिंक सल्फेट डालना चाहिए।

सिंचाई:
केले के खेत में नमी हमेशा बनी रहनी चाहिए। पौध रोपण के बाद सिंचाई करना अति आवश्यक है। आवश्यकतानुसार ग्रीष्म ऋतु में 7 से 10 दिन तथा शीतकाल में 12 से 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। मार्च से जून तक यदि, केले के थालो पर पालीथीन का पलवार बिछा देने से नमी सुरक्षित रहती है, सिचाई की मात्रा भी आधी रह जाती है साथ ही फलोत्पादन एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है। पौधों को लगाने के बाद सिंचाई करनी चाहिए। इसके बाद मौसम के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। टपक (ड्रिप) सिंचाई केले के लिए ज्यादा लाभप्रद है। इस पद्धति से पानी की बचत होती है एवं उत्पादन भी अच्छा प्राप्त होता है।

पानी की आवश्यकता एवं सिंचाई का निर्धारणः छत्तीसगढ़ क्षेत्र के लिए पानी की आवश्यकता एवं सिंचाई निर्धारण निम्न रूप से किया गया है।

माह कुल मात्रा   (लीटर/दिन/पौधा) माह कुल मात्रा   (लीटर/दिन/पौधा)
जून 5 दिसम्बर 6
जुलाई 4 जनवरी 9
अगस्त 5 फरवरी 11
सितम्बर 6 मार्च 16-18
अक्टूबर 8-10 अप्रैल 16-20
नवम्बर 8 मई 20-25

निंदाई-गुड़ाई:
समय – समय पर केले की फसल में निंदाई – गुड़ाई जरूरी होती है। साथ ही साथ पौधों पर मिट्टी चढ़ाते रहना चाहिए, ताकि पौधे को अधिक से अधिक मजबूती और स्तम्भन शक्ति मिल सके।

केले में आवश्यक अंतर सस्य क्रियाएंः

  • अनावश्यक पुत्तियां (सकर) निकालना: पौधे के अधिक वृद्धि व विकास के लिए पैतृक वृक्ष से निकले हुए अन्य दूसरे अधो-भूस्तारी को मुख्य पौधे में फल आने तक वृद्धि करने से रोकना चहिये। अन्यथा ये अनैच्छिक अधो-भूस्तारी केले के फल उत्पादन पर बुरा प्रभाव डालते हैं। पौधे लगाने के 2-3 माह बाद से ही पौधों के बगल से पुत्ती (सकर) निकलने लगती है। जिसे समय समय पर निकालते रहना चाहिए। जब केले में फूल आना शुरू हो उस समय एक स्वस्थ सकर, आगामी (रेटून) की फसल के लिये रखें जो मुख्य फसल कटने तक लगभग 3-4 माह की हो जाती है। इस बीच और जो भी सकर निकलते हैं उसे निकालते रहना चाहिए।
  • केले के घेर को सहारा देनाः केले के घेर को बॉस द्वारा कैंची आकार में फंसाकर सहारा देना चाहिये, अन्यथा पौधों के टूटने की संभावना रहती है। विशेष रूप से घेर निकलते समय सहारे की आवश्यकता होती है। केले के पौधे फल आने पर एक तरफ झुक जाते हैं तथा अधिक भार पड़ने पर पौधे टूट सकते हैं, इसके लिए पौधों में बांस अथवा लकड़ी का सहारा दें। साथ ही केले के पौधों की जड़ों में 25 से 30 सेंटीमीटर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।
  • मिट्टी चढ़ानाः केले के पौधों में मिट्टी समय-समय पर चढ़ाते रहना चाहिए जिससे पौधे ज्यादा हवा गिर न जाये । पौधों के जड़ों का विकास अच्छे से हों सके। केले के लम्बे वाले किस्मों में मिट्टी चढ़ाना अत्यंत ही आवश्यक है।
  • नर फूलों को निकालनाः केले के पौधों में फल के घेर का पूर्ण विकास हो जाने पर घेरे के अंतिम छोर पर लगा हुआ नर फूल को निकाल देना चाहिए जिससे की केले के घेर में लगा हुआ अंतिम फलों के गुच्छों का वृद्धि एवं विकास हो सके।
  • मेटॉकिंगः केले के मुख्य फसल के कटाई उपरांत मुख्य फसल के तने का जमीन की सतह से 60 से.मी. उपर काट दी जाती है एवं बाकी तने को जमीन पर ही छोड़ दी जाती है इस तने में विघमान पोषक तत्व पेड़ी वाली केले के फसल को धीरे-धीरे मिलता रहता है जिससे पेड़ी वाली फसल की वृद्धि तीव्रगति से होता है। इसी प्रकार जमीन की सतह से 60 से.मी. उपर काटी गई केले के तनों को बाद में कई बार में काटा जाता है।
  • गर्म हवा से सुरक्षाः केले के पौधों को तेज हवाओं से बचाव करना अत्यंत आवश्यक होता है। वायु अवरोधक के रूप में सेसबेनिया या एम.पी.चरी को उत्तर पश्चिम दिशा की ओर पांच कतारों में लगाना चाहिए।

केले में पुष्पन व फलों का लगना:
केले की अगेती किस्मों में रोपाई के 7 से 8 माह में लाल रंग में पुष्प आने लगते हैं। केले के पुष्प में नर व मादा दोनो पाए जाते हैं। केले में पुष्प आने के 6 से 7 माह में केले की फलियां पकने लगती है। केले की रोपाई के बाद पहली फलन लगभग 10 से 12 माह में होती है। केले की दूसरी फलन ;पेड़ी वालीद्ध 12 से 18 माह में प्राप्त होती है। जिस पौधें में एक बार फलन हो जाती है उस पर दोबारा पुष्प नही लगते इसलिए पोषक तत्वों के दुरुपयोग से बचाव हेतु फलन के बाद उस पौधे को काटकर गिरा दें। तने को एक ही बार में न काटें। जिससे अधिक मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त कर पुत्तियाँ पर कोई दुष्प्रभाव न पड़े। केले के घौर कटने के करीब 15 से 20 दिन के अंतराल में दो बार करके तना काटें। जिससे पौधे के जड़ों के पास निकली अधो-भूस्तारी पुत्तियाँ खुली हवा व पोषक तत्व पाकर जल्दी से विकसित हो जाती है।

फल की कटाईः
फसल रोपण के 12-15 महीने के भीतर फसल के लिए तैयार हो जाती है और केले की मुख्य कटाई का मौसम सितंबर से अप्रैल तक होता है। विभिन्न प्रकार की मिट्टी, मौसम की स्थिति और समुद्रतल से ऊंचाई के आधार पर फूल आने के 90-150 दिनों के बाद परिपक्वता प्राप्त करते हैं। जब फलियाँ की चारो धारियाँ तिकोनी न रहकर गोलाई लेकर पीली होने लगे तो फल पूर्ण विकसित होकर पकने लगते है इस दशा पर तेज धार वाले चाकू आदि के द्वारा घेर को काटकर पौधे से अलग कर लेना चाहिए। कटे हुए गुच्छे को आमतौर पर अच्छी तरह से गद्देदार ट्रे या टोकरी में एकत्र किया जाना चाहिए और संग्रह स्थल पर लाया जाना चाहिए। फल पूर्ण विकसित हो जाये और उसमें रंग परिवर्तन दिखाई देने लगे तो पूरे घेर को काट लेना चाहिये।

केले की पेड़ी (रैटून) की फसल:
पेड़ी की फसल द्वारा भी उचित प्रबंधन से अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। जब मुख्य फसल 7-8 माह की हो जाती है एवं मुख्य फसल में फूल आना शुरू हो तो एक स्वस्थ सकर को पेड़ी की फसल हेतु छोड़ देना चाहिए। मुख्य फसल के कटाई हो जाने के उपरांत मुख्य फसल के अवशेष को तुरंत साफ करके पेड़ी की फसल हेतु खाद एवं उर्वरक का उपयोग करना चाहिए। मुख्य फसल के तरह ही पेड़ी की फसल से अच्छी उपज प्राप्त करने हेतु 250 ग्राम नत्रजन, 150 ग्राम स्फुर एवं 200 ग्राम पोटाश प्रति पौध की दर से देना चाहिए। नत्रजन उर्वरक को 3 बराबर भागों में बांटकर 30 दिनो के अंतराल पर देना चाहिए। स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की एक भाग को मुख्य फसल की कटाई के तुरंत बाद पौधों से 40 से.मी. की दूरी पर देकर तुरंत गुड़ाई करके मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए और सिंचाई करना चाहिए। समय समय पर बगल की सकर को काटकर अलग करते रहना चाहिये। शेष सस्य क्रियाएं मुख्य फसल की तरह ही अपनायें।

फलों को पकाने की विधिः
केलों को पकाने के लिए घेर को केले की पत्तियों, पुवाल अथवा बोरा से ढककर कमरे में बंद कर रख देते हैं। 6 से 8 दिनों में घेर की सभी फलियाँ पक जाती हैं। केले के घेर को बंद कमरे में 2 से 2.5 मीटर की ऊंचाई पर टांगकर 18 से 24 घण्टे तक धुँवा देने के बाद बिना धुँवा वाले कमरे में रख देते हैं। 2 से 4 दिन में फलियाँ पक जाती हैं। केले को पहले जहां कैल्शियम कार्बाइड से पकाया जाता था जो की हमारे स्वास्थ के लिए बहुत ही नुकसानदायक होता था। इसी बात को देखते हुए भारत में इस पर प्रतिबंध लगने के बाद अब केले को पकाने का नया आधुनिक वैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल किया जाता है। जिसमे कोल्ड स्टोरेज में एथिलीन गैस की मदद से ये कार्य किया जाता है जो की केले को पकाने का एक सुरक्षित तरीका है। ईथीलीन 150-250 पी.पी.एम. के घोल में उपचारित करने पर फल जल्दी व एक साथ पकते हैं।

रोग एवं कीट: केले में प्रमुख रूप से पनामा विल्ट, बंची टॉप रोग एवं तनाछेदक व जड़ में छेद करने वाले कीट लगते हैं जिसे लिये कवकनाशी व कीटनाशक दवाओं का स्प्रे समय-समय पर करना चाहिये।

  • चित्ती रोग या सिगाटोक रोग:- केले की फसल में होने वाला ये एक मुख्य रोग है जिसमे की केले की पत्तियां नष्ट होती है जिससे की हमे फसल का उत्पादन कम मिलता है। इस रोग के होने पर हमे ताम्रयुक्त दवा कॉपर आक्सीक्लोराइड का 0.3 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें। ये छिडकाव करीब एक हेक्टर के लिए 1000 लीटर घोल उत्तम रहता है।
  • शीर्षगुच्छ रोगः- केले की फसल में होने वाला ये एक विषाणु जनित खतरनाक रोग है जिसमे की पौधों के शीर्ष पर पत्तियों का गुच्छा बन जाता है इसलिए इसे शीर्षगुच्छ रोग कहते है इस रोग की रोकथाम के लिए बिना विलम्ब किये इमिडाक्लोप्रिड 17 ई. सी. 1 एम. एल. प्रतिलीटर पानी में दवा का छिड़काव करना चाहिए।
  • पनामा या उकठा रोग: यह रोग फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरियम नामक कवक के द्वारा होता है। इस रोग के लक्षण 2-5 माह पुराने पौधों पर दिखाई देते हैं। सबसे पुरानी और नीचे की पत्तियों के पर्ण वृन्त पर हल्के पीले रंग की लकीरें दिखाई देती हैं। इसका लक्षण यह है कि पुरानी पत्तियाँ धीरे-धीरे पीली हो जाती हैं और सूख जाती हैं। पत्तियाँ तुड़ी-मुड़ी होती हैं। प्रभावित पौधे की जडे़ काली होकर सड़ जाती हैं। नियंत्रण हेतु रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिये। ग्रीष्मकाल में गहरी जुताई करके ही पौधे को लगाना चाहिये। रोग निरोधक किस्में लगायें, जैसे-बसरई ड्वार्फ एवं पूवन। नीम की खली भी 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब डाली जावे।

कीट नियत्रंणः केले में कई कीट लगते है जैसे केले का पत्ती बीटिल (बनाना बीटिल), तना बीटिल आदि लगते है नियंत्रण के लिए मिथाइल डीमेटान 25 ई सी 1.25 मिली० प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। चूसने वाले कीटों को नियंत्रित करने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17 ई.सी. का 1 एम.एल. प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल कर छिड़काव करना चाहिए। कीटों के नियंत्रण के लिए उपयुक्त कृषि क्रियाओं का चयन प्रभावी पाया गया है।

उपजः
केले की घेर में लगे केले जब पर्याप्त रूप से विकसित व सुड़ौल हो जाएं तब घेर को लगभग 30 सेंटीमीटर डंठल सहित काट लें। उपयुक्त विधि अनुसार केले की खेती की जाये तो प्रति पौधा 20-25 किलोग्राम फल प्राप्त किये जा सकते हैं, एवं 250-300 कुन्तल प्रति हैक्टेयर मुख्य फसल से, एवं इतनी ही उपज पेड़ी (रैटून) फसल से ले सकते है। एक पेड़ से केवल एक ही घेर प्राप्त होती है । एक घेेर में करीब 50 से 100 फलियाँ होती हैं।

कुमुदनी साहू, डॉ. जी.डी. साहू
एवं सेवन दास खुंटे
फल विज्ञान विभागए इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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