पशुपालन

पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम (एनिमल बर्थ कंट्रोल): आवारा कुत्तों की आबादी का प्रबंधन

डॉ. वर्षा रानी गिलहरे, डॉ नेहा साहू, डॉ गोविना देवांगन, डॉ ऋतु गुप्ता, डॉ काशिफ रज़ा, डॉ शैलेष विशाल

प्रस्तावना : भारत में आवारा कुत्तों की बढ़ती जनसंख्या सार्वजनिक स्वास्थ्य,  पर्यावरणीय संतुलन और पशु कल्याण से संबंधित गंभीर समस्याएँ उत्पन्न करती है। विशेष रूप से रेबीज रोग, मानव-पशु संघर्ष,  सड़क दुर्घटनाएँ और कचरा प्रबंधन की समस्याएँ इस मुद्दे को और जटिल बना देती हैं।  इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत सरकार ने पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम को एक मानवीय और वैज्ञानिक समाधान के रूप में अपनाया है।  पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम मुख्य रूप से आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के माध्यम से उनकी जनसंख्या को नियंत्रित करने का प्रयास करता है।  इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करना,  रेबीज के प्रसार को रोकना और मानव-पशु संघर्ष को कम करना है। यह लेख पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम की अवधारणा, ऐतिहासिक विकास, कानूनी ढाँचा, कार्यान्वयन प्रक्रिया, उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है।  इसके साथ ही इसमें अंतरराष्ट्रीय अनुभवों और भारत के विभिन्न शहरों के केस स्टडी का भी विश्लेषण किया गया है।

पृष्ठभूमि : भारत में शहरीकरण, कचरा प्रबंधन की कमी और पालतू पशुओं के परित्याग के कारण आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।  विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भारत में लाखों की संख्या में आवारा कुत्ते मौजूद हैं। आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या से रेबीज संक्रमण, कुत्तों के काटने की घटनाएँ, सड़क दुर्घटनाएँ, कचरा फैलाव,  मानव-पशु संघर्ष जैसी कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में होने वाली रेबीज से होने वाली मौतों का एक बड़ा हिस्सा भारत में होता है।

समस्या का महत्व : आवारा कुत्तों की समस्या केवल पशु प्रबंधन का मुद्दा नहीं है बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य,  शहरी शासन और पशु कल्याण से जुड़ा हुआ विषय है। इस समस्या के समाधान के लिए कई देशों ने अलग-अलग रणनीतियाँ अपनाई हैं।  पहले कई स्थानों पर कुत्तों को मारने की नीति अपनाई जाती थी,  लेकिन यह तरीका दीर्घकालिक रूप से प्रभावी नहीं पाया गया।  इसके बाद वैज्ञानिकों और पशु कल्याण संगठनों ने नसबंदी आधारित कार्यक्रमों की सिफारिश की।  नसबंदी कार्यक्रम जनसंख्या नियंत्रण का सबसे प्रभावी तरीका है।  केवल कुत्तों को मारना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है,  टीकाकरण कार्यक्रम रेबीज नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे WHO और FAO ने भी नसबंदी आधारित रणनीति को समर्थन दिया है।

पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम की अवधारणा

पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम एक संगठित कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य आवारा पशुओं की जनसंख्या को नियंत्रित करना है।  इस कार्यक्रम का मुख्य सिद्धांत “पकड़नानसबंदीटीकाकरणछोड़नाहै। यह प्रक्रिया मानवीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है।

भारत में पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम के ऐतिहासिक विकास:

भारत में आवारा कुत्तों के प्रबंधन का इतिहास कई चरणों से गुजरा है। प्रारंभिक नीति में पहले नगर निगम आवारा कुत्तों को पकड़कर मार देते थे। लेकिन यह नीति कई कारणों से असफल रही।  नए कुत्ते खाली क्षेत्र में आ जाते थे।  प्रजनन तेजी से होता था और समस्या दोबारा उत्पन्न हो जाती थी। पशु जन्म नियंत्रण (कुत्ते) नियम, 2001 भारत सरकार ने लागू किए। इस नियम के अनुसार कुत्तों को मारना प्रतिबंधित किया गया।  नसबंदी और टीकाकरण को प्राथमिकता दी गई। पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियम, 2023 (जो 2001 नियमों को प्रतिस्थापित करते हैं),  इन नियमों को और मजबूत बनाने के लिए 2023 में नए नियम लागू किए गए। इनमें शामिल हैं: स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी NGO  की भागीदारी, वैज्ञानिक निगरानी प्रणाली है। 2023 के नियमों के तहत, स्थानीय निकायों को पशु जन्म नियंत्रण इकाइयाँ स्थापित करने का निर्देश दिया गया है। पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम 2025 का मुख्य उद्देश्य पशु जन्म नियंत्रण (कुत्ता) नियम, 2023 के तहत आवारा कुत्तों की आबादी को वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से नियंत्रित करना है।

कानूनी ढांचा : एबीसी का संचालन कई कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत किया जाता है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 पशुओं के प्रति क्रूरता को रोकने के लिए बनाया गया है। पशु जन्म नियंत्रण (एनिमल बर्थ कंट्रोल) नियम के तहत कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण, पुनर्वास की व्यवस्था की गई है।

कार्यान्वयन प्रक्रिया : पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम को लागू करने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई जाती है। सबसे पहले क्षेत्र में आवारा कुत्तों की संख्या का सर्वेक्षण किया जाता है। विशेष रूप से प्रशिक्षित टीम कुत्तों को सुरक्षित तरीके से पकड़ती है। पकड़े गए कुत्तों को पशु चिकित्सा केंद्र ले जाया जाता है। नसबंदी प्रक्रिया पशु चिकित्सकों द्वारा की जाती है। नर कुत्ता  या श्वान का बधियाकरना, मादा श्वान (कुतिया) का ओवेरियो हिस्टेरेक्टॉमी (मादा नसबंदी) पशु चिकित्सकों द्वारा की जाती है। कुत्तों को रेबीज रोधी टीका” या “आलर्क निरोधी वैक्सीन दिया जाता है। पहचान लिए के कुत्तों के कान में चिन्ह लगाया जाता है। स्वस्थ होने के बाद कुत्तों को उसी क्षेत्र में छोड़ दिया जाता है। पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम में पशु चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भूमिका कुत्तों की सर्जरी करना, टीकाकरण,  पशुओं की स्वास्थ्य निगरानी होती है।

जन स्वास्थ्य महत्व : पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। रेबीज एक घातक वायरस जनित रोग है जिसकी मृत्यु दर लगभग 100% होती है। नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम रेबीज नियंत्रण में सहायक हैं। जनसंख्या नियंत्रण से कुत्तों के काटने की घटनाओं में कमी आती है। कम कुत्ते होने से कचरा फैलाव कम होता है। मानव और पशुओं के बीच संघर्ष कम होता है।

क्रियान्वयन में बाधाएं : पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम के सामने कई चुनौतियाँ हैं। कई नगर निगमों के पास पर्याप्त बजट नहीं होता। सर्जिकल केंद्रों की कमी है। लोगों में जागरूकता की कमी है। लोग अपने पालतू कुत्तों को छोड़ देते हैं।

नीति सिफ़ारिशें : पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम को बेहतर बनाने के लिए सरकार को अधिक बजट देना, माइक्रो चिप द्वारा पहचान, डिजिटल डेटाबेस, जनजागरण जागरूकता अभियान चलाने, मजबूत निगरानी प्रणाली आवश्यक है। भविष्य में पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम को और प्रभावी बनाने के लिए कई तकनीकी GIS आधारित सर्वेक्षण, मोबाइल ऐप रिपोर्टिंग, राष्ट्रीय स्तर की नीति और प्रशासनिक सुधार किए जा सकते हैं।

राष्ट्रीय पहल : लखनऊ नगर निगम ने उत्तर प्रदेश के जरहरा में भारत का पहला पशु जन्म नियंत्रण प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया है,  जो भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के सहयोग से कार्य करेगा।  सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद राजस्थान आवारा कुत्तों के प्रबंधन पर व्यापक दिशा निर्देश जारी करने वाला प्रमुख राज्य बना है।  चेन्नई में भी नसबंदी कार्यक्रम से सकारात्मक परिणाम मिले। छत्तीसगढ़ जिलों में प्रभावी रूप से नसबंदी और रेबीज टीकाकरण किया जा रहा है।

निष्कर्ष : पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम भारत में आवारा कुत्तों की समस्या के समाधान के लिए एक महत्वपूर्ण और मानवीय पहल है। यह कार्यक्रम नसबंदी और टीकाकरण के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण और रेबीज रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि कार्यक्रम के सामने कई चुनौतियाँ हैं, लेकिन उचित नीति, पर्याप्त संसाधनों और जनसहयोग के माध्यम से इसे सफल बनाया जा सकता है। यदि सरकार, पशु चिकित्सक, NGOs और नागरिक मिलकर प्रयास करें तो भविष्य में आवारा कुत्तों की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है दुनिया के कई देशों ने पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम जैसे कार्यक्रम अपनाए हैं।

लेखक :
डॉ. वर्षा रानी गिलहरे (पशुचिकित्सक), डॉ नेहा साहू (पशुचिकित्सक),
डॉ गोविना देवांगन (सहायक प्राध्यापक), डॉ ऋतु गुप्ता (सहायक प्राध्यापक),
डॉ काशिफ रज़ा (टीचिंग सहायक), डॉ शैलेष विशाल (टीचिंग सहायक)

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Related Articles

Back to top button