धान बोनस से आगे: छत्तीसगढ़ के बजट में कृषि-सहायक क्षेत्रों का आर्थिक महत्व
नीलम सिन्हा, पीएचडी शोधार्थी,कृषि अर्थशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर


छत्तीसगढ़, “धान का कटोरा” के नाम से प्रसिद्ध, एक कृषि-प्रधान राज्य है जहाँ लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि एवं उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है। राज्य की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण आजीविका का प्रमुख आधार कृषि है और धान यहाँ की मुख्य खरीफ फसल के रूप में उभरती है। परंतु, एक कृषि अर्थशास्त्री के दृष्टिकोण से कहना आवश्यक है कि केवल धान-केन्द्रित समर्थन नीति न तो राजकोषीय रूप से दीर्घकाल तक टिकाऊ है और न ही समग्र ग्रामीण विकास को सशक्त बना सकती है।
आगामी बजट से अपेक्षा यह है कि नीति-निर्माण का दृष्टिकोण केवल धान बोनस और MSP तक सीमित न रहकर कृषि-सहायक (Agri-Allied) क्षेत्रों के विकास पर ध्यान दे – जैसे पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, बागवानी, वनोपज प्रसंस्करण, मधुमक्खी पालन और कृषि-प्रसंस्करण उद्योग।
धान खरीदी का वर्तमान परिदृश्य
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी (Paddy Procurement) नीति किसानों को MSP के अलावा राज्य बोनस भी देती है। इस सीजन (2025-26) के खरीफ विपणन वर्ष में:
₹3,100 प्रति क्विंटल MSP पर धान खरीदारी का निर्णय लिया गया और सरकार ने 15 नवम्बर 2025 से खरीदी शुरू कर दी।
13 जनवरी 2026 तक लगभग 105.14 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा जा चुका है और किसानों को ₹23,448 करोड़ से अधिक का भुगतान सीधे उनके बैंक खातों में किया जा चुका है – यह राज्य का अब तक का सबसे बड़ा खरीदी आंकड़ा है।
इसी प्रकार की रिपोर्ट के अनुसार 22.04 लाख से अधिक किसानों ने धान बेचा और लगभग ₹24,265 करोड़ का भुगतान उन्हें किया गया है।
धमतरी जैसे जिलों में, अकेले 1.72 लाख मीट्रिक टन धान को खरीदकर लगभग ₹409 करोड़ का भुगतान किया गया।
पिछले वर्ष (2024-25) में भी छत्तीसगढ़ ने लगभग 14.9 मिलियन टन (149 लाख MT) धान को MSP पर खरीदा था, जिससे यह अब तक का सबसे बड़ा खरीद रिकॉर्ड रहा।
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि सरकार धान खरीदी के प्रयास में लगातार निवेश कर रही है और व्यापक स्तर पर किसानों को आय सृजन में सहायता प्रदान कर रही है। परंतु, जब इसका बोझ राजकोष पर बढ़ता है, तो नीतिगत रूप से संसाधनों का पुनर्वितरण आवश्यक हो जाता है।
राजकोषीय दबाव और सब्सिडी का मूल्यांकन
वित्त वर्ष 2025-26 में छत्तीसगढ़ का कुल बजट लगभग ₹1.65 लाख करोड़ है, जिसमें कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर अनुदान देना शामिल है। राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का लगभग 3% है – यह राष्ट्रीय FRBM नियमों के भीतर है, परंतु सब्सिडी के उच्च स्तर से अन्य निवेश क्षमताएँ सीमित हो जाती हैं।
धान बोनस, MSP भुगतान, मुफ्त बिजली, उर्वरक सब्सिडी और अन्य सपोर्ट प्रोग्रामों पर व्यय राजस्व व्यय का बड़ा हिस्सा ले लेता है, जिससे सिंचाई, बागवानी अधोसंरचना, मूल्य संवर्धन और कृषि-प्रसंस्करण जैसी पूंजीगत निवेश योजनाओं के लिए संसाधन कम बचे। यही स्थिति कृषि नीति के आर्थ-नीति (economic policy) उद्देश्य – उत्पादकता वृद्धि, जोखिम विविधीकरण और सतत ग्रामीण आजीविका के विपरीत है।
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी : हाल के वर्षों का परिदृश्य
| विपणन वर्ष | खरीदी गई मात्रा (लाख मीट्रिक टन) | MSP/बोनस (₹/क्विंटल) | कुल भुगतान (₹ करोड़) | लाभान्वित किसान (लाख) |
| 2022-23 | 107 | 2640 | 28,000 | 24 |
| 2023-24 | 115 | 2640 | 30,000 | 25 |
| 2024-25 | 149 | 3100 | 45,000 (अनुमानित) | 26 |
| 2025-26* | 105 (जनवरी तक) | 3100 | 23,448 | 22 |
*2025-26 आंशिक आंकड़े (जनवरी तक)
अर्थशास्त्रीय विश्लेषण
एक कृषि अर्थशास्त्री के दृष्टिकोण से यह स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में धान खरीदी व्यवस्था सबसे बड़ी सार्वजनिक खरीद प्रणालियों में से एक बन चुकी है। वर्ष 2024-25 में लगभग 149 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी और ₹45 हजार करोड़ से अधिक का भुगतान राज्य के राजकोषीय ढांचे पर भारी दबाव दर्शाता है। यद्यपि इससे किसानों को तात्कालिक आय सुरक्षा मिलती है, परंतु यह व्यवस्था संसाधनों के एक ही फसल में अत्यधिक संकेन्द्रण (Over-Concentration of Resources) को भी दर्शाती है।
राजकोषीय दृष्टि से देखा जाए तो कृषि पर कुल व्यय का बड़ा भाग धान बोनस और समर्थन मूल्य भुगतान में चला जाता है, जिससे सिंचाई अधोसंरचना, कृषि अनुसंधान, पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी, वनोपज प्रसंस्करण और ग्रामीण एमएसएमई जैसे उत्पादक क्षेत्रों में अपेक्षित निवेश सीमित रह जाता है। दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक है कि राज्य की कृषि नीति उपभोग-आधारित सब्सिडी से निवेश-आधारित विकास मॉडल की ओर स्थानांतरित हो।
धान से आगे का विकास मॉडल
जोखिम विविधीकरण और स्थिर आय
धान पर अत्यधिक निर्भरता से एक ही कृषि उपज पर जोखिम संकेंद्रित हो जाता है। जलवायु परिवर्तन, बाजार में मूल्य गिरावट, या उत्पादन में अनिश्चितता के समय किसान की आय अस्थिर हो सकती है। फसल विविधीकरण और कृषि-सहायक क्षेत्रों के विकास से आय के स्रोत फैलते हैं, जिससे जोखिम में कमी आती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अधिक लचीली बनती है।
कृषि-सहायक क्षेत्रों पर फोकस: संभावनाएँ और अपेक्षाएँ
- पशुपालन और डेयरी (Livestock & Dairy)
छोटे और सीमांत किसान अतिरिक्त आय के लिए पशुपालन और डेयरी पर निर्भर कर सकते हैं। दुग्ध उत्पादन, बकरी पालन, पोल्ट्री और सूअर पालन से नियमित नकद प्रवाह बनता है।
सरकार द्वारा डूध संग्रहण केंद्र, चिलिंग प्लांट, चारा उत्पादन योजनाएँ, पशु नस्ल सुधार प्रोग्राम्स और पशु-स्वास्थ्य सेवाएँ को बजट में प्राथमिकता देना चाहिए जिससे यह क्षेत्र व्यवस्थित रूप से विकसित हो।
- मत्स्य पालन (Fisheries)
राज्य में तालाबों और नहरों का प्रसार है। आधुनिक मत्स्य पालन, उच्च गुणवत्ता वाला फीड, बेहतर विपणन अवसंरचना और कोल्ड चेन के लिए बजट आवंटन से यह क्षेत्र न केवल स्थानीय बाजार के लिए बल्कि निर्यात की दिशा में भी अग्रसर हो सकता है। इससे ग्रामीण युवाओं को स्थानीय रोजगार मिलेगा और पोषण सुरक्षा के साथ आय के नए स्रोत भी खुलेंगे।
- बागवानी और उच्च मूल्य वाली फसलें (Horticulture & High-Value Crops)
फल, सब्जियाँ, मसाले, औषधीय पौधे और फूल किसानों को धान की तुलना में कहीं अधिक प्रति हेक्टेयर आय प्रदान कर सकते हैं।
बजट में ड्रिप सिंचाई, पॉलीहाउस, पॉवर गुरिल्ला/सौर जल स्रोत, नर्सरी विकास, कोल्ड स्टोरेज और मूल्य संवर्धन प्रोसेसिंग यूनिट्स जैसी योजनाओं के लिए लक्ष्यित निवेश की आवश्यकता है। इससे बागवानी बेहतर रूप से सुगठित और आर्थिक दृष्टि से लाभदायी बनेगी।
- वनोपज आधारित उद्योग (Forest Produce & Allied)
छत्तीसगढ़ वनोपज (tendu patta, mahua, imli, lakh, medicinal herbs आदि) के क्षेत्र में समृद्ध है।
इन सब्जेटों का संग्रहण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार एकीकरण यदि बजट के तहत योजनाबद्ध रूप से किया जाए तो आदिवासी और ग्रामीण समुदायों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। समेकित वनोपज आधारित इको-उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर सकते हैं।
- कृषि-प्रसंस्करण और ग्रामीण एमएसएमई (Agri-Processing & MSME)
धान, फल, सब्जियाँ, दूध और मत्स्य जैसे कच्चे उत्पादों का मूल्य ऊँचा तब होता है जब उसे स्थानीय स्तर पर प्रोसेस किया जाता है।
सरकार को बजट में फूड पार्क्स, मिनी प्रोसेसिंग इकाइयाँ, पॅकिंग-लाइन, भंडारण और लॉजिस्टिक्स को शामिल करना चाहिए जिससे ग्रामीण स्तर का सूक्ष्म और लघु उद्योग (MSME) विकसित हो। इससे स्थानीय रोजगार, मूल्य संवर्धन और निर्यात क्षमता में इजाफा होगा।
सब्सिडी प्रणाली का पुनर्विचार : आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार सब्सिडी का उद्देश्य अल्पकालिक राहत प्रदान करना है, परंतु अगर वह दीर्घकालिक निवेश में तब्दील नहीं होती तो किसान और राज्य दोनों के हितों को संतुलित नहीं कर पाती।
डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) आधारित सिस्टम लागू करके इनपुट सब्सिडी सीधे किसानों के बैंक खातों में भेजने से पारदर्शिता और लक्ष्यकृत लाभ सुनिश्चित किया जा सकता है। संसाधनों का यही हिस्सा कृषि-सहायक क्षेत्रों के निवेश में जा सकता है।
राज्य की समग्र आर्थिक मजबूती के लिए विविधीकरण : छत्तीसगढ़ को चाहिए कि वह केवल कृषि को ही प्राथमिकता न दे, बल्कि उद्योग, पर्यटन, सेवा क्षेत्र, वनोपज आधारित कुटीर उद्योग, स्वरोजगार तथा ग्रामीण उद्यमिता को भी समान रूप से प्रोत्साहन दे। इससे कृषि पर जनसंख्या दबाव कम होगा और ग्रामीण युवाओं के लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे।
निष्कर्ष : धान पर ₹3100 प्रति क्विंटल बोनस तथा अतिविशेष MSP नीतियाँ किसानों को अल्पकालिक सुरक्षा देती हैं, परंतु आर्थिक रूप से यह राजकोषीय बोझ बन सकती हैं और अन्य क्षेत्रों में निवेश की संभावनाएँ घटा सकती हैं। एक दूरदर्शी बजट वही होगा जो सब्सिडी आधारित दृष्टिकोण से निवेश-आधारित, विविधीकरण-समर्थक और समग्र ग्रामीण विकास की दिशा में आगे बढ़े।
पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी, वनोपज, कृषि-प्रसंस्करण और एमएसएमई में लक्ष्यित निवेश से किसानों की आय स्थिर और विविध होगी, रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था अधिक संतुलित, समावेशी और दीर्घकालिक रूप से सशक्त बनेगी।










