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जामुन की खेती

आरती मंडावी एवं डॉ. संगीता

परिचय
जामुन भारत का एक प्रमुख फलदार वृक्ष है। वैज्ञानिक नाम सिजि़जियम क्यूमिनी कुल मायर्टेसी है। जो छत्तीसगढ़ की जलवायु में बहुत अच्छी तरह विकसित होता है। यह वृक्ष कम देखभाल में भी लंबी अवधि तक उपज देने की क्षमता रखता है। जामुन के फल में औषधीय गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, इसलिए इसका उपयोग स्वास्थ्यवर्धक फल और आयुर्वेदिक दवाओं दोनों में किया जाता है। मिट्टी और पानी की सामान्य उपलब्धता वाले क्षेत्रों में यह खेती आसानी से की जा सकती है, जिससे किसानों को स्थिर और अच्छा आर्थिक लाभ मिलता है।

जलवायु
छत्तीसगढ़ की जलवायु जामुन की खेती के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है। यहाँ वर्ष का अधिकतर समय गर्म और आर्द्र रहता है, जो जामुन के वृक्ष के विकास के लिए उपयुक्त है। जामुन के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श माना जाता है, राज्य में जून से सितंबर तक होने वाली पर्याप्त वर्षा जामुन के पौधों को शुरुआती वर्षों में अच्छा सहारा देती है 800.1200 मिमी वार्षिक वर्षा जामुन के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। गर्मियों के दौरान हल्की सिंचाई और सर्दियों में सामान्य तापमान के साथ जामुन का पेड़ आसानी से बढ़ता है। इस प्रकार, छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक जलवायु जामुन बागवानी को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मिट्टी
जामुन की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट, बलुई-दोमट तथा मध्यम काली मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। छत्तीसगढ़ में ऐसी मिट्टियाँ व्यापक रूप से पाई जाती हैं, इसलिए यहाँ जामुन की खेती आसानी से की जा सकती है। मिट्टी का पी.एच 6.5 से 7.5 के बीच होना आदर्श रहता है। भारी, पानी रोकने वाली या बहुत कठोर मिट्टी में जड़ों का विकास प्रभावित हो सकता है, इसलिए खेत की गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा एवं उपजाऊ बनाना जरूरी है। पर्याप्त जैविक खाद वाली मिट्टी जामुन के पौधे को तेजी से बढ़ने और अच्छी उपज देने में मदद करती है।

किस्में
बड़ी जामुन: आकार 2.5-3.5 से.मी. व्यास 1.5-2.0 से.मी. आयताकार, गहरा बैगनी, जामुनी या नीला काला रंग का होता है। गूदा मीठा होता है।
छोटी जामुन: आकार 1.5-2.0 से.मी. व्यास 1-1.5 कुछ गोल गहरा बैगनी या काला, गूदा व रस कम होता है। अगस्त माह में पकती है।

रोपण
जामुन के पौधों के रोपण के लिए 60ग60ग60 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। रोपण से 10.15 दिन पहले इन गड्ढों को भरने हेतु मिट्टी में 15.20 किलोग्राम सड़ी गोबर खाद, थोड़ा रेत तथा नीमखली मिलाकर तैयार करना चाहिए, जिससे पौध की शुरुआती वृद्धि अच्छी होती है। पौधों के बीच उचित दूरी रखना आवश्यक है, ताकि वृक्षों का फैलाव और विकास बाधित न हो। सामान्य रूप से जामुन के पौधों को 8ग8 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है, जबकि बड़े आकार वाली या अधिक फैलाव वाली किस्मों के लिए 10ग10 मीटर दूरी अधिक उपयुक्त रहती है। सही दूरी पर लगाए गए पौधे स्वस्थ बढ़ते हैं और दीर्घकाल में बेहतर उत्पादन देते हैं।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
जामुन के पौधों की बेहतर वृद्धि और नियमित उत्पादन के लिए संतुलित खाद एवं उर्वरक का प्रयोग अत्यंत आवश्यक है। रोपण के समय प्रत्येक गड्ढे में 15.20 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी गोबर खाद, 250 ग्राम नीम खली तथा थोड़ा रेत मिलाकर भरना पौधों को शुरुआती पोषण प्रदान करता है। रोपण के बाद हर वर्ष प्रति पौधा 15.25 किलोग्राम गोबर खाद अवश्य दें, जिससे मिट्टी की उर्वरता और नमी धारण क्षमता बढ़ती है। रासायनिक उर्वरकों में प्रथम वर्ष 200 ग्राम नाइट्रोजन , 100 ग्राम फॉस्फोरस और 100 ग्राम पोटाश देना चाहिए। पौधे की उम्र के साथ उर्वरकों की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाकर तीसरे वर्ष तक इसे दोगुना किया जा सकता है। उर्वरक हमेशा पौधे के चारों ओर बने घेरे में डालें और हल्की सिंचाई करें, जिससे पौधा पोषक तत्वों को आसानी से अवशोषित कर सके। उचित खाद प्रबंधन से पौधे की वृद्धि तेज होती है और फल की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आता है।

सिंचाई-
जामुन के पौधों में प्रारंभिक अवस्था में अधिक सिचाई की आवश्यकता होती है लेकिन स्थापित हो जाने के बाद यह अंतराल काफी बढ़ाया जा सकता है। नए पौधे को प्रतिवर्ष 8-10 सिंचाई की आवश्यकता होती है जबकि स्थापित हुए पौधे को मई-जून के महीने में फल पकते समय 3-4 सिंचाई की आवश्यकता होती है।

छँटाई-
जामुन में नियमित छँटाई नहीं की जाती है। शुरू में पौधे की सधाई की जाती है तथा बाद में छँटाई के द्वारा सूखे व रोमी शाखाओं को अलग किया जाता है।

प्रजातियाँ-
जामुन का प्रसारण बीज द्वारा किया जाता है तथा इसकी कोई प्रजाति नामांकित नहीं है। सबसे अधिक उगाये जाने वाली प्रजाति है रा० जामुन जिसके फल आयताकार, बड़े, गहरे बैंगनी रंग, गूदा गुलाबी या भूरा जो रसदार एवं मीठा होता है। इसके बीज छोटे होते हैं। इसके फल जून जुलाई में पकते है।

तुड़ाई-
फल जून-जुलाई में पकते हैं तथा पकने पर पूर्ण आकार के गहरे बैंगनी या काले रंग के हो जाते हैं। फल एक-एक कर हाथ से तोड़े जाते हैं। तोड़ने वाला पेड़ पर कंधे में जुट या सूती थैला लेकर चढ़ जाता है। थैला भर जाने पर रस्सी द्वारा नीचे पहुँचाया जाता है।

फल प्रतिदिन तोड़े जाते हैं तथा उसी दिन बिक्री हेतु बाजार भेजे जाते हैं। प्रत्येक पौधे से कई बार फल तोड़े जाते हैं क्योंकि सही समय पर नहीं तोड़ने से फल अधिक पककर गिर जाते है तथा फटकर धूलकण में मिल जाते हैं। फल को 2-3 दिन से अधिक अवधि तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है।

तुड़ाई उपरांत प्रबंधन
जामुन रसीला और पतले छिलके वाला नाशवान प्रकृति का फल है। अतः इसके फल अधिक देर तक नहीं टिक पाते हैं। जितने भी फल तोड़े जाएं उनका विपणन 24 घण्टे के अन्दर आवश्यक होता है। शीत भण्डार में फल 3-4 दिन तक रखे जा जाते है।

रोग एवं नियंत्रण
जामुन के पौधों में प्रमुख रूप से पत्ती झुलसा और जड़ सड़न जैसे रोग देखे जाते हैं। पत्ती झुलसा होने पर पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं, जिससे पत्तियाँ समय से पहले झड़ने लगती हैं। इसके नियंत्रण के लिए 2.2.5 ग्राम मैनकोज़ेब या कॉपपर ऑक्सीक्लोराइड प्रति लीटर पानी में मिलाकर 12.15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना प्रभावी रहता है। वहीं जड़ सड़न रोग अत्यधिक नमी और खराब जल निकासी के कारण विकसित होता है। इससे बचाव के लिए खेत में उचित जल निकासी, गड्ढों में नीम खली का प्रयोग, तथा रोपण क्षेत्र को हमेशा साफ और सूखा रखना आवश्यक है। स्वस्थ पौधों के लिए संतुलित खाद एवं नर्सरी में रोगमुक्त पौधों का चयन भी बेहद जरूरी है।

कीट एवं नियंत्रण
जामुन में फल मक्खी, दीमक और तना छेदक कीट प्रमुख रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। फल मक्खी फलों में अंडे देकर उन्हें सड़ाती है। इसके नियंत्रण के लिए 10.12 मिथाइल यूजेनॉल ट्रैप प्रति एकड़ लगाएँ, समय पर फल तुड़ाई, तथा गिरे हुए फलों को नष्ट करना सबसे प्रभावी उपाय है। दीमक जड़ों और तनों को खाती है; इससे बचाव के लिए पौधे के चारों ओर मिट्टी में नीम खली मिलाना, खेत की साफ-सफाई बनाए रखना और आवश्यकता पड़ने पर क्लोरोपायरीफॉस का 2 से 2.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी हल्का छिड़काव करना उपयोगी होता है। तना छेदक कीट पौधे की नई शाखाओं को प्रभावित करता है इसके नियंत्रण के लिए प्रभावित टहनियों की छंटाई और नीम तेल (5 मिली/लीटर) का छिड़काव लाभदायक रहता है। नियमित निगरानी और स्वच्छ बाग प्रबंधन से कीटों का प्रकोप काफी कम हो जाता है।

लागत
जामुन की खेती में प्रारंभिक वर्ष में लागत अपेक्षाकृत अधिक आती है क्योंकि इसमें खेत की तैयारी, गड्ढे खुदाई, पौध खरीद, खाद उर्वरक और सिंचाई की व्यवस्था शामिल होती है। एक एकड़ क्षेत्र में लगभग 40.50 पौधे लगाए जाते हैं, जिसके लिए कुल ₹18,000 से ₹22,000 तक प्रारंभिक लागत आती है। इसमें गड्ढे की खुदाई, खाद (गोबर खाद व नीमखली), पॉलिबैग पौधे, मजदूरी और प्रारंभिक सिंचाई का खर्च शामिल है। दूसरे वर्ष से लागत काफी कम हो जाती है और केवल ₹8,000.10,000 प्रति वर्ष रख-रखाव, उर्वरक और मजदूरी पर खर्च होता है। कुल मिलाकर यह एक दीर्घकालिक फल फसल होने के कारण कम देखभाल में स्थिर आय देने वाली लाभकारी खेती मानी जाती है।

आय
जामुन का वृक्ष 4.5 वर्ष बाद फल देना शुरू करता है और 7.8 वर्ष में पूर्ण उत्पादन पर पहुँच जाता है। एक स्वस्थ पेड़ से औसतन 20 से 80 किलोग्राम फल प्रतिवर्ष प्राप्त होते हैं। छत्तीसगढ़ में जामुन की बाजार कीमत आमतौर पर ₹40 से ₹80 प्रति किलोग्राम रहती है, जिससे एक पेड़ से सालाना ₹800 से ₹6,000 तक की आय मिल सकती है। एक एकड़ में 40.50 पेड़ लगाने पर कुल वार्षिक उत्पादन 1,200 से 3,000 किलोग्राम तक हो सकता है। इस हिसाब से किसान को ₹60,000 से ₹1,20,000 या इससे भी अधिक आय प्राप्त हो सकती है। जैसे-जैसे पेड़ की उम्र बढ़ती है, उपज और आय दोनों में लगातार वृद्धि होती रहती है, जिससे यह खेती दीर्घकाल में अत्यधिक लाभकारी सिद्ध होती है।

विपणन
जामुन का विपणन छत्तीसगढ़ में अपेक्षाकृत सरल है, क्योंकि गर्मी के मौसम में इसकी मांग स्वाभाविक रूप से अधिक रहती है। ताज़े फलों को किसान स्थानीय हाट-बाजार, मंडी तथा खुदरा दुकानों में आसानी से बेच सकते हैं। शहरी क्षेत्रों में जामुन की कीमत अधिक मिलने से किसान सीधे विक्रय या थोक विक्रेताओं के माध्यम से बेहतर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। जामुन का प्रसंस्करण भी एक लाभदायक विकल्प है जैसे जामुन का सिरप, स्क्वैश, पल्प, बीज पाउडर, विनेगर आदि जिनकी बाजार में अच्छी मांग रहती है। साफ-सुथरी पैकिंग, समय पर तुड़ाई और त्वरित परिवहन से फल की गुणवत्ता बनी रहती है और बेहतर मूल्य प्राप्त होता है। स्थानीय कृषि मेलों और किसान उत्पादन संगठनों के माध्यम से भी विपणन के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।

लेखक :
आरती मंडावी एवं डॉ. संगीता
पंडित किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र , राजनांदगांव
महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय , सांकरा, दुर्ग (छ.ग.)

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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