पशुपालन

वृषभ पालन

डॉ. रामचंद्र रामटेके, डॉ. डी.के.जोल्हेे , डा. आर. के.गडपायले, डा.शबीर अनंत एवं डा. आशुतोष तिवारी

  • भारत में कृषि में बैलों का महत्व अनन्य साधारण है ।
  • बैल खेती में तो काम आते ही है साथ ही अपने मलमूत्र से बढि़या खाद भी खेती को देते है। बैलों के कारण टेªक्टर में लगने वाले डीजल की बचत से देष का आयात खर्च कम होता है ।
  • इसी कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में बैलों का महत्वपूर्ण स्थान है ।
  • हमारे यहॉ खेती के ज्यादातर कार्य जैसे कि जुताई, समतलीकरण, अंतःकर्षण क्रियाए, कटाई, गहाई और बोझा ढोना जैसे कार्य बैलों की सहायता से किये जाते हैं। ट्रेक्टर का उपयोग बडे किसान ही करते हैं। परन्तु हमारे यहॉ छोटे किसान अधिक है जो कि अधिकतर बैलों का ही उपयोग करते हैं।
  • भैसा को भी इस काम में लाया जाता है। हालाकि भैसा सुस्त गति से काम करते हैं लेकिन उनमें अधिक ताकत होने के कारण वह ज्यादा वजन खीचते हैं। भैसा के खुर बैलों की अपेक्षा चौडे होने के कारण धान के पानी भरे खेतों में फसते नही हैं। और वे आसानी से कीचड में चल फिर सकते हैं। भैसा लम्बी आयु तक अच्छा काम कर सकते हैं ।
  • खेती के पारंपरिक औजार जैसे देसी हल को जुताई के काम लेते है, लगडा, पाटा या कोपर से जमीन समतल करते हैं, बियासी के लिए हल को अंतःकर्षण कार्य हेतु काम लाते हैं, बोझा ढोने के लिए बैंल गाडी काम में लेते हैं। इन सभी कार्यो के लिए ताकत/ऊर्जा की जरूरत होती है।
  • हम बैंल या भैंसा को जोत कर इन सभी कार्यो के लिए ताकत देते हैं। इस तरह से ये पशु हमारी मदद कर अनाज उत्पादन में भरपूर योगदान देते हैं। इस कारण सही मायने में ये हमारे ’अन्नदाता’ ही है। ये पशु हमारी इतनी मदद करते हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि हम उनके स्वास्थ्य का पूरा पूरा ख्याल रखें। उनकी तबीयत अच्छी रहेगी तो वे खेत में अच्छा काम कर सकेंगे। इसके लिए यहां कुछ सुझाव बताए जा रहे हैं।
  • आज भी अच्छी शुद्ध नस्ल (हरियाणा, लाल कंधारी, गिर, गौलो, केनकांथा, औंगोेल, कांक्रेज, नागोरी, मेवाती आदि) के बैलों की मांग और कीमत बनी हुई है।
  • मजबूत बैल बनने के लिए उसकी बचपन से अच्छी देखभाल करने की आवष्यकता है ।
  • “आज का बछड़ा कल का बैल” होने के कारण बछड़ों के जन्म के समय की देखभाल के साथ ही एक दो घंटो के भीतर उन्हे खीस पिलाना जरूरी है ।
  • बछड़ो को वजन के दसवें हिस्से की मात्रा का दूध कम से कम डेढ़ माह या अधिकतम 5 से 6 माह तक पिलाना जरूरी है ।
  • वयस्क बैलों को पेट भर संतुलित आहार जिसमें चारों के साथ 2-2.5 किलो खुराक साथ ही 30-50 ग्राम खनिज मिश्रण देना चाहिए ।
  • गर्मी के मौसम में केवल सूखा चारा उपलब्ध होने के कारण खुराक आधा किलो अधिक देना चाहिए ।
  • गर्मीयों मेें दिन में 3 से 4 और शीत ऋतु में 2 से 3 बार पानी पिलाना चाहिए ।
  • बैलों को बांधने की जगह खुली, हवादार, एवं रोशनदार होनी चाहिए। फिसलन वाली जमीन नहीं हो। नियमित सफाई जरूरी है । उन्हे रोजाना ब्रश या कपड़ो से चमड़ी पे खरारा करना जरूरी है।
  • बारिश के दिनों में पशुुओे मे गलघोटुं या घुरका बीमारी का प्रकोप देखा जाता है। इस बीमारी से पशु को तेज बुखार आता है, गले या चेहरे पे सुजन आती है, फेफडों का निमोनिया हो जाता है, पशु को सांस लेने में तकलीफ होती है, सांस लेते वक्त घुर-घुर की आवाज आती है। इलाज नही होने से सांस रूकने से पशु की मृत्यु हो सकती है।
  • किसान भाई इस बीमारी से भली भांती परिचित है। इस बीमारी से बचने के लिए टीका लगवाना ही सबसे आसान, सुरक्षित एवं सस्ता उपाय है। अतः किसान भाई गलघोंटू बीमारी से बचाव हेतु अपने पशुओं में इसका टीका नजदीकी पशु अस्पताल से लगवा लेवें।
  • काम करने वाले बैलों को लंगडेपन की कोई समस्या हो गई तो वह काम नही कर पाते है। इसलिए उन्हें चोट लगने से बचायें। उन्हें कोई चोट लगकर पैरों में सूजन आ गई हो तो उसका इलाज तुरन्त करवा लेवें। लापरवाही से बीमारी बढ सकती है और इससे आपका खेती किसानी का काम प्रभावित हो सकता है।

संतुलित आहार की गणना निम्न प्रकार से की जाती है-
(क) शुष्क पदार्थ की मात्रा का निर्धारण- गाय, बैल, बछड़े, बछिया और संाडो को प्रति 100 कि.ग्रा. पर 2 से 2.5 कि.ग्रा. सूखा तत्व की आवश्यकता होती है लेकिन संकर नस्ल की गाय तथा भैंसो को प्रति 100 कि.ग्रा. शरीर भार पर 3 कि.ग्रा. सूखा तत्व देना चाहिए । सूखा तत्व में दाने के अलावा सूखे चारा 2/3 भाग एवं हरा चारा 1/3 भाग देना चाहिए । हरा चारा यदि फलीदार हो तो सूखा चारा 3/4 भाग एवं हरा चारा 1/4 भाग देना चाहिए ।

(ख) दाने की मात्रा की गणना-
जीवन निर्वाह हेतु रातिब या दाना-पशु को विश्राम अवस्था में भी अपने विभिन्न शारीरिक क्रियाओं जैसे पाचन, वसन,उत्सर्जन,रक्त संचरण आदि को सुचारू रूप से चलाने के लिये ऊर्जा की जरूरत होती है जिसके लिए गाय को 1 से 1.5 कि.ग्रा. एवं भैंस के लिये 2 कि.ग्रा. दाना प्रतिदिन देना चाहिए । यदि पशु के लिये फलीदार हरा चारा जैसे बरसीम,रिजिका,मटर लोबिया उपलब्ध हो तो दाना की आवश्यकता जीवन निर्वाह हेतु नहीं पड़ती है ।

आहार की मात्रा एवं गुणवत्ता के साथ-साथ खिलाने की विधि एवं अन्य निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना निहायत जरूरी हैः-

  • पशुओं को इच्छानुसार भरपेट खिलाना चाहिए । इसका तात्पर्य जरूरत से ज्यादा खिलाना कतई नहीं है ।
  • संतुलित आहार में उत्तम गुणवत्ता वाले विभिन्न खाद्य पदार्थों का मिश्रण होना चाहिए जो भोजन को स्वादिष्ट बनाने के साथ-साथ पोषक तत्वों (प्रोटीन,वसा,ऊर्जा, खनिज लवण,विटामिन आदि) को उचित अनुपात भी देता है ।
  • आहार देने का समय निर्धारित होना चाहिए ।
  • आहार में किसी तरह का परिवर्तन अचानक नहीं करना चाहिए ।
  • निम्न कोटि का, बदबूदार,कंकड़-मिट्टीयुक्त आहार नहीं देना चाहिए ।
  • आहार में हरा चारा एवं खनिज मिश्रण का समावेश अवश्य करना चाहिए ।
  • प्रति 6 किलो के उन्नत किस्म वाले हरा चारा की व्यवस्था व्दारा एक किलो दाना मिश्रण हटाया जा सकता है, परन्तु ध्यान रहे कि किसी भी आहार का सम्पूर्ण भाग हरा चारा पर ही आधारित न हो ।
  • एक गाय को लगभग 60 ग्राम नमक प्रतिदिन देना चाहिए एवं 30 ग्राम मिनरल पाउडर अथवा 60 ग्राम खडि़या मिलनी चाहिए ।
  • कार्य करने के लिए- हल्का कार्य (4 घंटे तक प्रतिदिन) करने वाले बैलों को 1 कि.ग्रा. दाना तथा भारी कार्य (6-8 घंटे) करने वाले बैल को 2 कि.ग्रा. दाना प्रतिदिन दिया जाना चाहिए ।
  • (4) प्रजनन के लिये- संाडो को जीेवन निर्वाह के अतिरिक्त 2 कि.ग्रा. दाना प्रतिदिन देना चाहिये ।
  • किसान भाई अपने बैलों से दिन में लगभग 8 से 10 घंटे काम कराते हैं। ध्यान रखने की बात यह है कि बैलों को इस बीच दोपहर के समय में 1 से 2 घंटे का आराम दिया जाना चाहिए । भैसा को हर 2 घंटे बाद आधे घंटे का विश्राम देवें।
  • इस आराम के समय में बैंलों को पैरा, भुसी, मक्का कुट्टी या हरी घास चरने दे, साफ पानी भी पिला देवें। यदि 2 किलो पशु आहार पानी में मिलाकर पशु को देगें तो उनमें ताकत बनी रहेगी। पशु आहार में धान का कोढा एवं आधा किलो गुड भी दिया जाना चाहिए । पानी में 1 मुट्ठी नमक मिला कर देवें, जिससे पसीने से बहे शरीर के नमक की पूर्ति हो सके। इसी तरह शाम को अपने बैल को चारे के साथ-साथ 1 किलो पशु आहार खिलावें।
  • नांगर की जुआडी में, बैल की गर्दन टीकने वाली जगह पर, चमडे का पैड लगाने से बैलों को नांगर खीचने में आसानी रहती हैं और इससे गर्दन पर घाव नही बनते है। आमतौर पर जुआडी में गर्दन के एक ओर डंडी फॅंसाते हैं। लेकिन इससे ढलान या मोड पर बैलों को गाडी खींचने में परेशानी होती है। अतः जुआडी में गर्दन के दोनो तरफ से डंडी फसाना चाहिए।
  • बैलों और भैसा को रोजाना काम करने के बाद शाम को नहलाना जरूरी है। इनके पैरों का खास कर ध्यान रखें। खूरों के बीच में फसें कीचड, पत्थर के टुकडे या काटे को निकाल देना चाहिए। यदि कोई घाव हो गया हो तो उसे साफ कर दवाई लगा कर पट्टी कर देवें। फिनाईल दवाई को खाने के तेल में मिला कर पटटी करने से मक्खियॉ घाव पर नही बैठती हैं और घाव में कीडे नही लगते हैं, घाव जल्दी भर जाते हैं।
  • रात को दर्दनाशक तेल जैसे कि निरगुंडी या सरसों या जाडा अरंडी तेल से गर्दन के उपरी हिस्से की मालिष करें। गरम पानी से सिकाई भी कर सकते है। जिससे की पशु के दुःखते कंधे को आराम मिले। और वह जल्दी ठीक होकर काम कर सके।
  • पशु के लिए बारिश से बचाव हेतु बाडे का इंतजाम करना चाहिए। इससे उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
  • इन सभी बातों को अमल में लाकर किसान भाई अपने पशुओं से अच्छा काम करा सकते हैं।

लेखक :

डॉ. रामचंद्र रामटेके, डॉ. डी.के.जोल्हेे , डा. आर. के.गडपायले, डा.शबीर अनंत एवं डा. आशुतोष तिवारी
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनू विश्वविदयालय, दुर्ग

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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