छत्तीसगढ़ में धान खरीदी टोकन प्रणाली: डिजिटल सुधार, जमीनी चुनौतियाँ और आर्थिक वास्तविकताएँ
नीलम सिन्हा, पीएचडी शोधार्थी, कृषि अर्थशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर


छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में धान की खरीदी केवल कृषि क्षेत्र का आर्थिक आधार नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण आय, राज्य वित्त और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की स्थिरता के लिए भी अत्यंत निर्णायक है। राज्य में धान मुख्य फसल होने के कारण इसका MSP आधारित खरीदी तंत्र किसानों की आय और राज्य के खाद्यान्न भंडार की रणनीति के लिए केंद्रीय भूमिका निभाता है।
राज्य सरकार ने खरीदी प्रक्रिया में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने के लिए टोकन प्रणाली और AgriPortal जैसी डिजिटल सुविधाएँ विकसित की हैं। इन सुधारों का उद्देश्य लंबी कतारों को खत्म करना, भ्रष्टाचार को रोकना और किसानों को निर्धारित तिथि व समय पर खरीदी का अवसर सुनिश्चित करना था। हालांकि, इन डिजिटल सुधारों के बावजूद कई किसानों को वास्तविक उत्पादन के मुकाबले कम खरीद की सीमा, डेटा mismatch, और टोकन वितरण में देरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
धान खरीदी का शेड्यूल और MSP
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी 15 नवंबर 2025 से 31 जनवरी 2026 तक निर्धारित की गई है। इस खरीदी के लिए MSP ₹3,100 प्रति क्विंटल रखा गया है, ताकि किसान अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त कर सकें। राज्यभर में लगभग 2,739 धान खरीदी केंद्र तैयार किए गए हैं, ताकि किसानों की फसल आसानी से खरीदी जा सके और भंडारण व लॉजिस्टिक्स में संतुलन बना रहे।
“टोकन तुहर हाथ” मोबाइल ऐप: तकनीकी सुधार
सरकार ने “टोकन तुहर हाथ” नामक मोबाइल ऐप लॉन्च किया है। इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को घर बैठे धान बिक्री के लिए टोकन प्रदान करना है। इससे खरीदी केंद्रों पर लंबी कतारों की समस्या कम होनी थी, और किसानों को उनके निर्धारित समय पर खरीदी की सुविधा मिलनी थी। डिजिटल टोकन प्रणाली ने पारदर्शिता बढ़ाई और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि, कुछ किसानों के लिए ऐप के प्रयोग में समस्याएँ बनी रहती हैं। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी कमजोर होना, स्मार्टफोन पर लॉगिन की कठिनाई और तकनीकी साक्षरता की कमी टोकन वितरण में देरी का मुख्य कारण है।
धान खरीदी का आधार: पटवारी की गिरदावरी
धान खरीदी पूरी तरह पटवारी की गिरदावरी रिपोर्ट पर आधारित होती है। गिरदावरी वह आधिकारिक रिकॉर्ड है जिसमें पटवारी: भूमि का रकबा, बोई गई फसल और अनुमानित उत्पादन दर्ज करता है। यही रिकॉर्ड AgriPortal में अपडेट होकर किसान की eligible खरीदी सीमा तय करता है।
हालांकि, गिरदावरी में कई बार त्रुटियाँ होती हैं:
- अपडेट में देरी
- कुछ भूमि का छूट जाना
- गलत प्रविष्टियाँ
- दस्तावेज़ों का समय पर अपलोड न होना
इन समस्याओं के कारण किसान का वास्तविक उत्पादन पोर्टल पर प्रतिबिंबित नहीं होता। यदि किसी किसान ने 30 क्विंटल/एकड़ उत्पादन लिया हो लेकिन गिरदावरी में उतना क्षेत्र दर्ज नहीं है, तो पोर्टल केवल औसत 21 क्विंटल/एकड़ के हिसाब से ही खरीदी अनुमति देता है।
क्विंटल/एकड़ का बेंचमार्क और वास्तविकता
सरकार ने धान खरीदी के लिए 21 क्विंटल/एकड़ का औसत मानक तय किया है, जो CCE डेटा और जिला औसत पर आधारित है। लेकिन जमीनी स्तर पर कई किसान इससे अधिक उत्पादन करते हैं।
- HYV और hybrid varieties,
- SRI पद्धति,
- बेहतर सिंचाई,
- उन्नत कृषि प्रबंधन
जैसे उपाय अपनाने वाले किसान 25–35 क्विंटल/एकड़ तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। उच्च उत्पादन वाले किसान इस औसत बेंचमार्क के कारण MSP लाभ से वंचित रह जाते हैं। अर्थशास्त्र में इसे “efficiency penalty” कहा जाता है—अधिक मेहनत करने वाले किसान वास्तविक लाभ से कट जाते हैं।
AgriPortal और खरीदी सीमा: सुविधा या बाधा?
किसान अक्सर बताते हैं कि उनका वास्तविक उत्पादन 30–35 क्विंटल तक है, लेकिन AgriPortal केवल 21 क्विंटल तक खरीदी की अनुमति देता है। यह समस्या तीन मुख्य कारणों से उत्पन्न होती है:
- भूमि रिकॉर्ड और पोर्टल डेटा mismatch: गिरदावरी और पोर्टल पर खेत का सही विवरण न होने पर उत्पादन क्षमता कम दर्ज होती है।
- Rigid yield algorithm: पोर्टल हर किसान के लिए औसत उत्पादन मान लेता है, चाहे जमीन की उपजाऊ क्षमता कितनी भी अधिक क्यों न हो।
- Maximum cap system: कुछ समितियों में अधिकतम 21 क्विंटल तक ही लोडिंग की अनुमति होती है—यह system-induced rationing है।
इससे किसान अपने वास्तविक उत्पादन का पूरा मूल्य नहीं प्राप्त कर पाते।
किसानों पर आर्थिक प्रभाव
- MSP प्राप्त न कर पाना: जब प्रणाली 1500 क्विंटल तक ही खरीदी की अनुमति देती है तो शेष धान को निजी व्यापारियों को बेचना पड़ता है, जो MSP से 200–300 रुपये/क्विंटल कम पर बिकता है।
- अधिक निवेश करने वाले किसान निरुत्साहित होते हैं: उन्नत कृषि तकनीक, उर्वरक, उच्च किस्म और श्रम का खर्च उठाकर अधिक उत्पादन करने वाले किसान ceiling के कारण लाभ नहीं उठा पाते।
- Informal बाजार का विस्तार: अतिरिक्त धान निजी व्यापारियों द्वारा खरीदा जाता है, जिससे राज्य के स्टॉक अनुमान बिगड़ते हैं, PDS योजना प्रभावित होती है और बाजार में unreported flow बढ़ता है।
- Cash flow disruption: MSP पर पूर्ण फसल न बिकने से किसान अगले सीजन की तैयारी में वित्तीय संकट झेलते हैं।
टोकन वितरण में देरी और लंबी कतारें
कई किसानों की शिकायत है कि टोकन समय पर नहीं मिलते। प्रमुख कारण हैं:
- High demand vs server capacity: खरीदी शुरू होते ही किसान ऐप पर एक साथ लॉगिन करते हैं, जिससे सिस्टम धीमा हो जाता है।
- Connectivity issues: ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर इंटरनेट।
- Portal queue algorithm: सिस्टम में एक समय पर generate होने वाले टोकन की संख्या सीमित।
- Paperless verification delays: डिजिटल रिकॉर्ड और गिरदावरी में mismatch होने पर टोकन verification में समय लग जाता है।
परिणाम:
- खरीदी केंद्रों पर लंबी कतारें और समय की हानि।
- MSP पर फसल बेचने में विलंब और आर्थिक नुकसान।
- अतिरिक्त उत्पादन का निजी बाजार में कम मूल्य पर बिक्री।
प्रशासनिक और लॉजिस्टिक समस्याएँ
- खरीदी केंद्रों का गलत capacity planning: वास्तविक उत्पादन पोर्टल में परिलक्षित न होने से केंद्रों में असंतुलित भीड़।
- Complaint redressal कमजोर: शिकायतें “pending” ही रहती हैं, limit correction का त्वरित mechanism नहीं।
- Digital divide: ग्रामीण किसान डिजिटल प्रक्रियाओं को समझने में कठिनाई महसूस करते हैं।
सुधार के संभावित उपाय
- Dynamic Yield-Based Token System: वास्तविक productivity डेटा को प्रणाली में शामिल करना।
- Token Revision Window: खरीदी शुरू होने से पहले किसानों को रिकॉर्ड सुधारने के लिए 7–10 दिन का समय।
- Multi-token mechanism for high-output farmers: उत्पादन क्षमता के अनुसार multi-slot tokens।
- Digital गिरदावरी और GIS-based reporting: मोबाइल ऐप, फोटो टैगिंग, geo-mapping और time-stamp के साथ।
- Pre-scheduled token slots और Offline token generation।
- System load balancing और Farmer helpdesk।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ की धान खरीदी प्रणाली तकनीकी सुधारों के साथ अधिक पारदर्शी और सुव्यवस्थित हुई है। टोकन प्रणाली ने भीड़ प्रबंधन और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, 21 क्विंटल/एकड़ खरीदी सीमा, गिरदावरी में त्रुटियाँ, AgriPortal की rigid structure और टोकन वितरण में देरी अभी भी किसानों के वास्तविक उत्पादन को सही तरीके से प्रतिबिंबित नहीं करती।
सुझाव: यदि प्रणाली को अधिक लचीला, क्षेत्र-विशिष्ट, डेटा-आधारित और farmer-centric बनाया जाए, तो यह न केवल कृषि क्षेत्र को स्थिर बनाएगी, बल्कि किसानों की आय सुरक्षा और राज्य की खाद्यान्न नीति को भी मजबूत करेगी।










