उद्यानिकी

आंवला प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन

संस्कृति शुक्ला, डॉ संगीता एवं लिशा तंबोली

परिचयः आंवला, को इंडियन गूजबेरी (फिलैंथस एम्ब्लिका एल) के नाम से भी जाना जाता है, यह भारत का एक प्राचीन देशज फल है। यह यूफोरबियासी कुल से संबंधित है और भारत का स्वदेशी पौधा माना जाता है। आंवला विटामिन सी का अत्यंत समृद्ध स्रोत है, इसके ताजे गूदे में लगभग 200 से 900 मि.ग्रा. प्रति 100 ग्राम तक विटामिन सी पाया जाता है |

आंवला स्वाद में अत्यधिक खट्टा और कसैला होने के कारण सामान्य रूप से सीधे खाने में प्रयोग नहीं किया जाता है। लेकिन प्रसंस्करण के बाद इसके अनेक प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे जैम, जेली, कैंडी, टॉफी, अचार, सॉस, स्क्वैश, जूस, रेडी-टू-सर्व पेय, साइडर, सूखे चूरे और पाउडर जैसे कई उत्पाद तैयार किए जा सकते जो कि खाने में स्वादिष्ट होते है एवं पोषक गुणों से भरपूर होते हैं। आयुर्वेद में यह च्यवनप्राश, त्रिफला और अन्य औषधीय टॉनिक बनाने में प्रयुक्त होता है।

प्रसंस्करण प्रसंस्करण का अर्थ है किसी कच्ची वस्तु को इस तरह तैयार करना कि वह उपयोग, भंडारण और विपणन के योग्य बन जाए। यह केवल उत्पाद को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके पोषक तत्व, स्वाद और गुणों को बनाए रखने का भी एक तरीका है। आंवला, जो विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट का एक समृद्ध स्रोत है, जल्दी खराब हो जाने वाला फल है। इसलिए इसे सीधे खाने के बजाय, लंबे समय तक सुरक्षित रखने और उपयोग में आसान बनाने के लिए प्रसंस्करण (च्तवबमेेपदह) किया जाता है। आंवला प्रसंस्करण में कई चरण शामिल होते हैं। सबसे पहले फल को साफ और छाँटा जाता है, जिससे खराब या क्षतिग्रस्त फल अलग हो जाएँ। इसके बाद फल को काटकर बीज निकाला जाता है और पल्प तैयार किया जाता है। पल्प से जूस, जैम, अचार या पाउडर बनते हैं। कभी-कभी रासायनिक या प्राकृतिक घटकों का उपयोग कर स्वाद, रंग और संरक्षण क्षमता बढ़ाई जाती है। अंत में तैयार उत्पाद को उचित पैकिंग में रखकर सुरक्षित तापमान पर भंडारण किया जाता है।

पोषक तत्व मात्रा (100 ग्राम में)
ऊर्जा 44 किलो कैलोरी
कार्बोहाइड्रेट 10-11 ग्राम
शर्करा 3.39 ग्राम
फाइबर 3-4 ग्राम
प्रोटीन 0.9 ग्राम
वसा 0.5 ग्राम
विटामिन सी 450-600 मिलीग्राम

आंवला का प्रसंस्करण और उसके उत्पाद
आंवला जैमः उत्तम फल जैम में न्यूनतम 45% गूदा, 68% घुलनशील ठोस पदार्थ और लगभग 0.5% अम्लता आवश्यक होती है। उच्च गूदे और कम रेशेदार किस्मों से बना जैम सर्वोत्तम गुणवत्ता का होता है। जैम बनाने के लिए पहले आंवला का गूदा निकाला जाता है, फिर उसे उचित मात्रा में चीनी और साइट्रिक एसिड के साथ मिलाकर आवश्यक गाढ़ापन आने तक उबाला जाता है। पकने का अंत बिंदु 68° ब्रिक्स पर रेफ्रैक्टोमीटर से या ड्रॉप/शीट टेस्ट से निर्धारित किया जाता है।वाला माना जाता है। यह दस्त और चक्कर जैसी समस्याओं के उपचार में भी सहायक माना गया है। स्वादिष्ट होने के साथ-साथ यह एक पौष्टिक और औषधीय गुणों से भरपूर पारंपरिक उत्पाद है।

आंवला जैम बनाने की प्रक्रिया
आंवला जैम एक अत्यंत पोषक और स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद है, जिसमें विटामिन सी और एंटीऑक्सिडेंट की उच्च मात्रा पाई जाती है। आंवला को सीधे खाने की तुलना में जैम के रूप में प्रसंस्कृत करना फल को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और पोषण बनाए रखने का उत्तम तरीका है। आंवला जैम बनाने में प्रत्येक चरण का वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण से विशेष महत्व होता है।

1. फल का चयनः जैम बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है ताजे और स्वस्थ आंवले का चयन। इसके लिए हरे-पीले और पूरी तरह विकसित, बिना दाग-धब्बे वाले फलों को चुने जाते हैं। किसी भी प्रकार का सड़ा हुआ या कीट प्रभावित फलों को हटा दिया जाता है। चयन का उद्देश्य जैम की गुणवत्ता और स्वाद को बनाए रखना है।

2. धुलाईः चयनित आंवले को कई बार साफ पानी में धोए जाते हैं ताकि उनके ऊपर लगे मिट्टी, धूल और कीट पूरी तरह हट जाएँ। यह चरण जैम की स्वच्छता और माइक्रोबियल सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

3. ब्लांचिंगः ब्लांचिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें फलों या सब्जि़यों को थोड़ी देर गर्म किया जाता है और तुरंत ठंडा किया जाता है। इससे नॉन-एन्जाइमेटिक ब्राउनिंग (गैर-एंजाइमीय भूरेपन) को रोका जा सकता है जिससे कि संग्रहण के दौरान उत्पाद कि रंग और गुणवत्ता बनी रहती है। यह प्रक्रिया पॉलीफेनॉल ऑक्सिडेज़ जैसे एंजाइमों को निष्क्रिय कर देती है, जो फलों के काले पड़ने के लिए जिम्मेदार होते हैं। आंवला को प्रसंस्करण से पहले ब्लांच करने से पोषक तत्वों की रक्षा होती है और टी एस एस, अम्लता, शर्करा तथा पेक्टिन जैसी गुणात्मक विशेषताएं बेहतर रहती हैं धुले हुए आंवलों को हल्का उबाल कर या भाप में 1-2 मिनट के लिए रखा जाता है।

4. कटाई और बीज निकालनाः ब्लांचिंग के बाद फल को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और बीज को निकाल दिए जाते हैं। बीज निकालने से जैम का स्वाद कड़वा नहीं होता और पल्प निकलने में आसानी होती है।

5. पल्प तैयार करनाः कटे हुए और बीज रहित फल को मिक्सर या ब्लेंडर में मैश किया जाता है। इस प्रक्रिया से चिकना और गाढ़ा पल्प तैयार होता है, जो जैम बनाने के लिए उपयुक्त होता है। पल्प में किसी भी प्रकार की गुठली या कड़े हिस्से नहीं होने चाहिए।

6. शक्कर मिलानाः पल्प में समान अनुपात या स्वादानुसार शक्कर मिलाई जाती है। आमतौर पर पल्प और शक्कर का अनुपात 1ः1 रखा जाता है। शक्कर न केवल जैम को मिठास देती है बल्कि इसे लंबे समय तक संरक्षित भी रखती है। शक्कर और पल्प के मिश्रण को अच्छी तरह मिलाया जाता है ताकि कोई गठान न बने।

7. ठंडा करनाः शक्कर मिलाने के बाद मिश्रण को लगभग 50-60° सेंटीग्रेट तक हल्का ठंडा किया जाता है, ।यह तापमान साइट्रिक एसिड मिलाने के लिए उपयुक्त होता है। ठंडा करने से जैम का पोषण, रंग और स्वाद सुरक्षित रहते हैं।

8. साइट्रिक एसिड मिलाना: ठंडे पल्प में लगभग 0.1-0.2% साइट्रिक एसिड मिलाया जाता है। यह जैम के पी. एच. को नियंत्रित करता है, स्वाद को बेहतर बनाता है और जैम की स्थायित्व बढ़ाता है।

9. एंड पॉइंट का निर्धारण: जैम को गाढ़ा होने तक पकाया जाता है और इसका टी एस एस 68°ब्रिक्स तक पहुँचने पर एंड पॉइंट माना जाता है। इसके लिए रिफ्रैक्टोमीटर का उपयोग किया जाता है।

10. बोतलिंग: तैयार जाम को साफ और स्टरलाइज्ड बोतलों में भरा जाता है। आमतौर पर ग्लास या स्टेनलेस स्टील की बोतलों का उपयोग किया जाता है।

11. कैपिंग: बोतलों को एयरटाइट ढक्कन से बंद किया जाता है। यह जैम को बाहरी हवा और माइक्रोबियल संक्रमण से बचाता है।

12. लेबलिंग: बोतलों पर उत्पादन तिथि, सामग्री और भंडारण निर्देश वाले लेबल लगाए जाते हैं। यह उपभोक्ता को जानकारी देने और विपणन के लिए जरूरी होता है

13. भंडारण: जैम को ठंडी, सूखी और अंधेरी जगह पर रखा जाता है। सही भंडारण से जैम महीनों तक सुरक्षित रहता है और पोषण, स्वाद तथा रंग की गुणवत्ता बनी रहती है |

लेखक :
संस्कृति शुक्ला, डॉ संगीता एवं लिशा तंबोली
पंडित किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र राजनांदगांव (छ.ग.)

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