छत्तीसगढ़ में बागवानी फसल में प्राकृतिक खेती
Dr. Anamika Jain Badkul, Assistant Professor (Agronomy) MGUVV, Durg


प्राकृतिक खेती का मूल उद्देश्य रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों पर निर्भरता घटाकर मिट्टी, जल और जैव विविधता का संरक्षण करना है। यह प्रणाली फसल, पेड़, पशु और कीट-जीव समुदाय के समन्वय पर आधारित होती है- यानी खेत को एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र माना जाता है। भारतीय संदर्भ में नेचुरल फार्मिंग में स्थानीय करद जैविक तत्वों (घास-फसल अवशेष, खाद, जैविक अर्क, कम्पोस्ट, गोबर/पोषक तरल) का अधिक उपयोग किया जाता है। (Natural Farming in Horticultural Crops in Chhattisgarh)
छत्तीसगढ़ में बागवानी का परिदृश्य
- छत्तीसगढ़ में बागवानी का क्षेत्रफल और उत्पादन राज्य के लिए महत्वपूर्ण है – राज्य में विविध फल (आम, लीची, पोमी, आदि), सब्जियाँ और मसाले उगाए जाते हैं तथा राज्य का प्रशासन बागवानी विकास पर जोर दे रहा है।
- राज्य की भौगोलिक विविधता (जंगल, पठारी, उपजाऊ निचली भूमि) और जल संसाधन छोटे- बड़े बागवानी प्रोजेक्ट के लिए अनुकूल हैं।
बागवानी में प्राकृतिक खेती के प्रमुख सिद्धांत और तकनीकें
1. मिट्टी और जल प्रबंधन : मिट्टी स्वास्थ्यः
- नियमित रूप से जैविक पदार्थ (घास, पत्तियाँ, कम्पोस्ट) मिलाकर मिट्टी का कार्बन और सूक्ष्मजीव संतुलन बनाए रखें। छत्तीसगढ़ में मिट्टी परीक्षण और सूटेड सिफारिशें उपलब्ध हैं – खेत के अनुसार जैविक संशोधनों का उपयोग करें।
- जल संरक्षणः सूक्ष्मनहर, कीचड़ तालाब पानी का रीसायक्लिंग, ड्रिप/माइक्रो-सिंचाई और मल्चिंग से जल की बचत करें।
2. पौध संरचना और विविधीकरण :
- एग्री-फॉरेस्ट्री और इंटरक्रॉपिंगः फलों के बगीचों में मटर, हरी सब्जी या दलहन के साथ इंटरक्रॉपिंग से आय साल भर बनी रहती है और मिट्टी की उर्वरकता बढ़ती है।
3. जैविक खाद और कीट-नियंत्रण :
- घर में बने अर्क/जैविक पेस्टिसाइड: नीम का अर्क, गौमूत्र गोबर खमीरी खाद, बायो-पेस्ट (जैसे नीम-प्रयोग, लौहकट आदि) का प्रयोग।
- पौध-आधारित उपचारः पत्ती-रसायन, हर्बल ड्रिप्स, और फोलीयर स्प्रे जैसी विधियाँ रसायन-योग्य विकल्प देती हैं।
4. पॉण्ड वाटर/पोंड-वॉटर स्प्रे (स्थानीय तकनीक) :
- तालाब/पोन्ड के पानी का विशेष उपयोग करके पौधों की तन्दुरुस्ती बढ़ाने का प्रयोग छत्तीसगढ़ में सफलतम केसों में दिखा है- इससे फसल की कटाई और गुणवत्ता पर सकारात्मक असर पड़ा है।
छत्तीसगढ़ के लिए विशिष्ट बागवानी फसल-टिप्स
- आम (Mango): वृक्ष-आधारित जैविक मल्चिंग, गोबर कम्पोस्ट, और जैविक रोग-प्रतिरोधक स्प्रे; सालाना छंटाई व फ़सल विविधीकरण।
- लीची, अमरुद, नींबूः मिट्टी सुधार + पाइप-ड्रिप सिंचाई: इंटरक्रॉप में सब्जी।
- लाल मिर्च (Chilli): स्वस्थ मिट्टी और पोंड-जल फोलीयर स्प्रे से पैदावार व गुणवत्ता में सुधार के केस-स्टडी उपलब्ध हैं।
- जड़ी-बूटियाँ/मसाले (अदरक, हल्दी): जैविक मसाला खेती से बाजार में प्रीमियम मिलता है- नेचुरल खेती से अवशेष न्यून रहते हैं और निर्यात/वैल्यू-एडिशन अवसर बनते हैं।
नेचुरल फार्मिंग अपनाने के व्यावहारिक कदम – किसानों के लिए कदम-दर-कदम गाइड
- मिट्टी परीक्षण कराएँ और उसके अनुसार कम्पोस्ट/जैविक संशोधक बनाएं।
- छोटे पैमाने पर पायलट 1/4 से 1 हेक्टेयर पर नेचुरल पैच लगाकर परिणाम देखें।
- पॉन्ड/जल प्रबंधन तालाब/पोंड को खेत के साथ रिजवाँयर के रूप में रखें; पानी का उपयोग फोलीयर स्प्रे व सिंचाई के लिए करें।
- इंटरक्रॉपिंग और मल्चिंग अपनाएँ- पेड़-फसल संयोजन से जोखिम कम होता है।
- प्रशिक्षण और नेटवर्किंग स्थानीय कृषि विभाग, विश्वविद्यालय और FPO/NGO के साथ जुड़ें; प्रमाणन और बाज़ार (ऑर्गेनिक/नेचुरल ब्रांड) की जानकारी लें।
| फसल / पौधा | क्यों उपयुक्त हो सकती है | ध्यान की बातें |
| केला (Banana) | केले को उच्च नमी पसंद है, वर्षा-प्रद क्षेत्रों में उत्पादन अच्छा होता है। छत्तीसगढ़ में किसान धान की जगह केला लगा रहे हैं और अच्छी आमदनी कर रहे है | यदि पानी बहुत ज्यादा जमा हो जाए, जलनिकासी अच्छी हो; फंगस कीट नियंत्रणः भूमि ऊँची हो या थोड़ा ढाल हो जाए। |
| अनानास (Pineapple) | अनानास को वातावरण में नमी अच्छी लगती है, वर्षा 100-150 सेमी का अनानास के लिए अनुकूल है। | भारी मिट्टी (क्ले) में जल जमा होने से बचना चाहिए; मिट्टी हल्की-दोमट या क्षेत्र रेतीली-दोमट हो तो बेहतर; फसल लगाने से पहले जलनिकासी की व्यवस्था। |
| आम, लीची, अमरुद, आदि फल-वृक्ष | कुछ फल-वृक्ष जिनकी जड़ें अच्छी जल निकासी वाले मिट्टी में हों, अधिक वर्षा के ‘मानसून के बाद नए विकास कर सकते हैं। उदाहरण: आम वृक्षों में वर्षा के बाद रोग- रोकथाम ज़रूरी। | छंटाई और वृक्ष संरचना अच्छी रखें ताकि हवा चले और पत्ती जल्दी सूखे; रोग की रोकथाम लें; मल्चिंग से पर्त मिट्टी गीली न बनी रहे। |
| पत्तेदार सब्जियाँ । ग्रीन्स जो नमी स्वीकार कर सकें | जैसे साग-भाजी (चौलाई, पालक आदि) जिनके लिए थोड़ी नमी बढ़ी हुई भी सहन हो जाती है, यदि पानी जमा न हो। नए रोग- प्रति सेंसिटिव प्रकारों से बचें। | बेमौसम बहुत ज्यादा बारिश हो तो खरपतवार व फंगी होने की संभावना; समय से कटाई; बीज गुणवत्ता; भूमि की तैयारी; हल्की सुपारी या छाया। |
छत्तीसगढ़ के स्थानीय सफल उदाहरण
- Dantewada का जैविक आन्दोलन – कुछ जिलों में छोटे-छोटे किसानों ने सब्सिडी व स्थानीय स्कीम के साथ जैविक/प्राकृतिक खेती अपनाई, जिससे आर्थिक स्थिरता व मिट्टी की उर्वरकता में सुधार हुआ।
- मिर्च में मिट्टी-स्वास्थ्य सुधार (केस स्टडी)- स्थानीय समुदायों ने तालाब जल व जैविक प्रक्रियाओं के प्रयोग से मिर्च की उत्पादन अवधि व गुणवत्ता बेहतर की।
- लैक़ (lac) और वान-उत्पाद – कटघोरा इलाके में लैक़ उन्नयन से कुछ किसानों की आमदनी बढ़ी – यह इको-फ्रेंडली हॉर्टीकल्चर/वेटलैंड-आधारित व्यवसाय का उदाहरण है।
सरकारी योजनाएँ और सहायता (छत्तीसगढ़ / केंद्र)
- केंद्र/राज्य दोनों स्तरों पर प्राकृतिक जैविक खेती को बढ़ावा देने वाली योजनाएँ हैं – ट्रेनिंग, सब्सिडी, प्रमाणन व मार्केट लिंकिंग के लिए विभिन्न कार्यक्रम संचालित हैं। उदाहरण के लिए MOVCDNER/प्रमोट-ऑर्गेनिक स्कीम जैसी सहायता उपलब्ध होती है। किसानों को समूहों (FPOs) या क्लस्टर मॉडल से जोड़कर मूल्य श्रृंखला विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।
फायदे और चुनौतियाँ
फायदे : रासायनिक लागत में कमी, मिट्टी और पानी की दीर्घकालिक उर्वरकता, बेहतर खाद्य सुरक्षा, और बाज़ार में ऑर्गेनिक प्रीमियम की संभावना।
चुनौतियाँ : सुरुआती संक्रमण में पैदावार अस्थायी रूप से घट सकती है; प्रमाणन की लागत; किसानों को बाजार और मूल्य श्रृंखला तक पहुँच की आवश्यकता। सरकारी और NGO सपोर्ट इन बाधाओं को कम कर सकता है।
निष्कर्ष : छत्तीसगढ़ में हॉर्टीकल्चर के लिए प्राकृतिक खेती न केवल पर्यावरण के अनुकूल है बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक लाभ और स्थानीय खाद्य सुरक्षा का मार्ग भी खोलती है। सही प्रशिक्षण, जल-प्रबंधन और बाज़ार पहुंच के साथ छोटे व बड़े किसानों के लिए यह व्यवहारिक और लाभप्रद विकल्प साबित हो सकता है। प्रमुख सफलता के संकेत पहले से मिल रहे हैं और राज्य व केंद्र स्तर की नीतियाँ इस परिवर्तन को आगे बढ़ाने में मदद कर रही हैं।











