

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति की आधारशिला रही है। हरित क्रांति के बाद रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से उत्पादन अवश्य बढ़ा, लेकिन इसके दुष्परिणाम भी सामने आए—मिट्टी की उर्वरता में कमी, जल प्रदूषण, किसानों पर बढ़ता कर्ज, स्वास्थ्य समस्याएँ और पर्यावरणीय असंतुलन। ऐसे समय में प्राकृतिक खेती एक वैकल्पिक समाधान के रूप में उभरी है। यह केवल खेती की पद्धति नहीं बल्कि जीवनदर्शन है, जिसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर उत्पादन किया जाता है। (Natural farming: A step towards sustainable agriculture)
प्राकृतिक खेती की अवधारणा
प्राकृतिक खेती का तात्पर्य ऐसी कृषि प्रणाली से है जिसमें रासायनिक खाद या कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता। यह पद्धति कृषि-पर्यावरण पर आधारित है और फसल, वृक्ष तथा पशुधन का एकीकरण करती है। इसमें देसी गाय के गोबर और मूत्र से तैयार घोल (जैसे जीवामृत, बीजामृत) मुख्य आधार होते हैं। इन जैव-घोलों से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है और पौधों को प्राकृतिक पोषण मिलता है। खरपतवार को नष्ट करने के बजाय मल्च के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार यह प्रणाली खेत को जंगल जैसे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के करीब ले जाती है।
प्राकृतिक खेती की प्रमुख विशेषताएँ
- पौधों को 98% पोषण वायुमंडल से और शेष 2% मिट्टी से प्राप्त होता है।
- खेत की मिट्टी हमेशा जैविक मल्च से ढकी रहती है।
- जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत आदि जैव-घोलों का प्रयोग।
- जुताई, गुड़ाई और रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं।
- खरपतवार को मिट्टी ढकने के लिए उपयोग करना।
- दशपर्णी अर्क, नीमास्त्र जैसे घरेलू कीटनाशकों का प्रयोग।
- बहुफसली खेती को बढ़ावा।
- मिट्टी पर सूक्ष्मजीव और केंचुओं की संख्या में वृद्धि।
प्राकृतिक खेती के सिद्धांत
प्राकृतिक खेती का मूल मंत्र “मिट्टी को जीवंत रखना” है। स्वस्थ मिट्टी का अर्थ है उसमें सूक्ष्मजीवों, फफूंदों, शैवालों और केंचुओं की भरपूर उपस्थिति। यही जीव-जंतु जैविक पदार्थों को अपघटित करके पोषण प्रदान करते हैं। इस पद्धति में खेत की खुदाई या जुताई नहीं की जाती क्योंकि इससे मिट्टी की संरचना और जीव-जंतुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
प्राकृतिक खेती का दायरा
भारत जैसे विविध कृषि-जलवायु वाले देश में प्राकृतिक खेती की अपार संभावनाएँ हैं। शून्य बजट प्राकृतिक खेती का मॉडल सबसे अधिक लोकप्रिय है। आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में भी राज्य सरकारें इसे प्रोत्साहित कर रही हैं।
प्राकृतिक खेती का महत्व
- उत्पादन में वृद्धि – पारंपरिक खेती के बराबर या उससे अधिक उत्पादन।
- जल संरक्षण – मिट्टी ढकने और बहुफसली पद्धति से जल की खपत कम।
- स्वास्थ्य सुरक्षा – रसायन रहित अन्न, सब्जियाँ और फल।
- पर्यावरण संरक्षण – कार्बन पदचिह्न में कमी और वायुमंडलीय कार्बन का अवशोषण।
- किसानों की आय में वृद्धि – लागत घटाकर शुद्ध लाभ में वृद्धि।
- रोजगार सृजन – जैव-घोल निर्माण, स्थानीय बाजार और मूल्य संवर्धन से।
- ग्रामीण विकास – गांव में ही रोजगार और आय के साधन।
प्राकृतिक खेती के लाभ

भारत में प्राकृतिक खेती की स्थिति
वर्तमान में भारत में लगभग 6.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र प्राकृतिक खेती के अंतर्गत आ चुका है।
- आंध्र प्रदेश – यहाँ आंध्र प्रदेश सामुदायिक प्रबंधित प्राकृतिक खेती कार्यक्रम लागू है। रायथु साधिकार समिति इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी निभा रही है।
- गुजरात – आत्मनिर्भर पैकेज और “सात पगला किसान कल्याण” योजना से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा।
- हिमाचल प्रदेश – प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान (पीके3) योजना लागू, जिसका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना और रासायनिक निर्भरता घटाना है।
- राजस्थान – “खेती में जान तो सशक्त किसान” पहल के तहत टोंक, सिरोही और बांसवाड़ा जिलों में पायलट परियोजना।
छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक खेती की स्थिति
छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक खेती की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है। राज्य सरकार की Godhan Nyay Yojana, PKVY और Jaivik Kheti Mission जैसी योजनाएँ रासायनिक खेती पर निर्भरता कम कर जैविक एवं टिकाऊ खेती को प्रोत्साहित कर रही हैं। बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्र पारंपरिक रूप से प्राकृतिक खेती के केंद्र हैं, जहाँ जीराफूल चावल जैसी GI टैग प्राप्त फसलें इसकी पहचान हैं। हाल ही में ICAR-NIBSM रायपुर ने हज़ारों किसानों को जीवामृत, बीजामृत और जैविक कीटनाशक बनाने जैसी तकनीकों का प्रशिक्षण दिया, जबकि जशपुर में एग्री-हॉर्टी एक्सपो जैसे आयोजनों से किसानों को तकनीक और बाजार से जोड़ने की पहल हुई।
चुनौतियाँ
- किसानों में जागरूकता की कमी।
- शुरुआत में उत्पादन घटने की आशंका।
- बाजार में जैविक/प्राकृतिक उत्पादों की अलग पहचान की समस्या।
- पर्याप्त प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता का अभाव।
निष्कर्ष
प्राकृतिक खेती केवल एक खेती प्रणाली नहीं, बल्कि सतत विकास की दिशा में ठोस कदम है। यह किसानों की आय बढ़ाने, स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और पर्यावरण बचाने का सशक्त उपाय है। आज जब जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसी वैश्विक चुनौतियाँ सामने हैं, तो प्राकृतिक खेती न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए उम्मीद की किरण है। यदि इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती बचाने की रणनीति सिद्ध हो सकती है।
लेखक :
नीलम सिन्हा ,
पीएच.डी. शोधार्थी, कृषि अर्थशास्त्र विभाग,
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय , रायपुर
डॉ. हेम प्रकाश वर्मा,
यंग प्रोफेशनल, एफएफपी परियोजना,
भाकृअनुप- राष्ट्रिय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर










