

परंपरागत तकनीकी ज्ञान (Indigenous Technical Knowledge ITK) वह ज्ञान है जो किसानों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक अनुभवों के आधार पर विकसित किया गया है। यह ज्ञान प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके खेती करने की विधियों को शामिल करता है। छत्तीसगढ़, जो कि आदिवासी और ग्रामीण समुदायों से समृद्ध है, वहां ITK जैविक खेती को टिकाऊ और कम लागत वाला बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जैविक खेती में ITK का महत्व
जैविक खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता। इसके स्थान पर प्राकृतिक विकल्पों का सहारा लिया जाता है, जिसमें ITK की प्रमुख भूमिका होती है:
- स्थानीय और सस्ते संसाधनों का उपयोग
- पर्यावरण के अनुकूल कीट नियंत्रण
- गोबर, गोमूत्र, और जैविक खाद से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना
- देसी बीजों और फसलों का संरक्षण
- छत्तीसगढ़ में ITK के कुछ उदाहरण
- कीट और रोग नियंत्रण
बस्तर और राजनांदगांव के किसान अपने खेतों में बांस या तेंदू की लकड़ियाँ गाड़ते हैं, जिससे कीटों को भगाया जाता है। इसके अलावा नीम की पत्तियाँ और गोबर के उपलों से धुआँ करके कीटों को दूर किया जाता है।

- मिट्टी और जल प्रबंधन
गर्मी में खेत की जुताई (समर पलाउ) करने से मिट्टी के कीट नष्ट होते हैं और नमी भी बनी रहती है। किसान जीवामृत जैसे प्राकृतिक उर्वरक बनाते हैं, जो गोबर, गोमूत्र, गुड़ और चने के आटे से तैयार किया जाता है।
- बीज संरक्षण
बीजों को राख, नीम की पत्तियों, या गोबर से सुरक्षित किया जाता है जिससे वे कीट और नमी से बचते हैं।

- भंडारण तकनीक
ग्रामीण क्षेत्रों में किसान कोठी नामक मिट्टी से बने भंडारण पात्रों का उपयोग करते हैं, जिनमें अनाज को बिना रसायन के सुरक्षित रखा जाता है।
सरकारी योजनाएं और सहयोग
छत्तीसगढ़ सरकार ITK को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है:
- गो धन न्याय योजनाः इसमें गोबर खरीदा जाता है जिससे कम्पोस्ट तैयार कर किसानों को दिया जाता है।
- परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): इसमें जीवामृत, बीजामृत, अग्नि अस्त्र जैसे पारंपरिक तरीकों को बढ़ावा दिया जाता है।
- प्राकृतिक कृषि मिशनः किसानों को पारंपरिक तरीकों से जैविक खेती करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
चुनौतियाँ
आज की नई पीढ़ी में ITK के प्रति जानकारी और रुचि की कमी है। यह ज्ञान मौखिक रूप से चला आ रहा है और दस्तावेज़ीकरण न होने से इसके खोने का खतरा है।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ में जैविक खेती को सफल और टिकाऊ बनाने में परंपरागत तकनीकी ज्ञान (ITK) की अहम भूमिका है। यदि इस ज्ञान को पहचानकर, संरक्षित कर, और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया जाए, तो यह किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है।
लेखक :
डॉ. अनामिका जैन
सहायक प्राध्यापक, सी.एच.आर.एस.-सांकरा-पाटन, दुर्ग
महात्मा गाँधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय










