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अगस्त माह के प्रमुख फलोंद्यानिकी कार्य

डॉ. संगीता, सहायक प्राध्यापक (फल विज्ञान)

1. अनार

  • अगस्त माह में पौध रोपण करना चाहिए तथा रोपण के तुरंत बाद सिंचाई कर लें।
  • मृग बहार हेतु अनार के पौधों में गोबर की खाद तथा फॉस्फोरस की पूरी एवं नाइट्रोजन और पोटाश की आधी मात्रा जुलाई माह में दे देनी चाहिए। खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग छत्रक के नीचे चारों ओर 8-10 सेंमी गहरी खाई बनाकर करना चाहिए।
  • यदि बारिश कम हो रही है, तो अनार के पौधों को नियमित रूप से पानी देना आवश्यक है।
  • खरपतवारों को हाथ से निकालें या निराई-गुड़ाई करें।
  • फलों को कीटों और रोगों से बचाने के लिए फलों को पेपर बैग या जाली से ढक दें।
  • फलों को गिरने से बचाने के लिए पौधों को सहारा दें।
  • अनार में फलों का फटना एक गंभीर समस्या है, इसके प्रबंधन हेतु, नियमित रूप से सिचाई करें एवं जिब्रेलिक अम्ल (जीए 3 ) 15 पीपीएम तथा बोरॉन 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  • अगस्त माह में हस्त बहार हेतु पौधे को पानी देना रोक दें।

2. अमरूद

  • गूटी या कलम से तैयार अमरूद के पौधों को मृदा गेंद के साथ 45x45x45 सेंमी के पहले से खुदे गड्ढों के बीचों-बीच रोपित करना चाहिए।
  • श्यामव्रण रोग को नियंत्रित करने के लिए कार्बेण्डाजम (2 ग्राम प्रति लीटर) का फलों पर और बोर्डो मिश्रण (3:3:50) अथवा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लीटर) का तनों तथा पत्तियों पर छिड़काव करें।
  • पुराने स्थापित बगीचों में 0.3 प्रतिशत बोरेक्स का 15 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें। बाग में कीटों का प्रकोप होने पर क्विनालफॉस 25 ईसी का 2 मिली प्रति लीटर या नीम तेल का 3 प्रतिशत की दर से 21 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें।
  • अगस्त माह में, फल मक्खी के प्रकोप को कम करने के लिए गिरे हुए तथा ग्रसित फलों को नष्ट कर देना चाहिए। छेदक कीटों से बचाव के लिए बागों में नियमित रूप से कीटों को एकत्रित कर उन्हे नष्ट कर देना चाहिए।
    ऽ सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे जिंक, लौह, ताँबा, मैंगनीज इत्यादि मिश्रण का भी 2 मिली प्रति लीटर की दर से पौधों पर छिड़काव करें।
  • नीम खली, जैविक खाद इत्यादि का भरपूर प्रयोग करें एवं बाग में निकासी की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करें।

3. आम

  • नवजात पौधों (1-3 साल पुराने) को खाद और उर्वरक देने का यह सही समय है। गोबर की खाद/कम्पोस्ट, नीम खली, सिंगल सुपर फॉस्फेट, पोटाश और यूरिया का प्रयोग करें।
  • मानसून के मौसम में, हल्की सिंचाई करें और जल निकासी का ध्यान रखें। 2 वर्ष से अधिक उम्र के पौधों के लिए, सिंचाई 4-5 दिनों के अंतराल पर करें।
  • खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए बगीचे में निराई-गुड़ाई करें।
  • आम के पौधों पर गांठ बनाने वाले कीड़ों (शूट गॉल मेकर) की रोकथाम के लिए डाइमेथोएट (0.06 प्रतिशत) दवा का छिड़काव करें। लाल रतुआ एवं श्यामवर्ण (एन्थ्रोक्नोज) की बीमारी की रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सिक्लोराइड (0.3 प्रतिशत ) दवा का छिड़काव करें।
  • वृक्षों में गोंदार्ति की समस्या हो तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (0.2 प्रतिशत) $ बुझा हुआ चूना (0.1 प्रतिशत) $ बोरेक्स (0.4 प्रतिशत) मिश्रण के घोल का ऊपर से छिड़काव करें।
  • अगले वर्ष में नए पौधे तैयार करने के लिए मूलवृंत हेतु फलों की गुठलियों को एकत्रित करके पौधशाला में बो दें।
  • यदि जुलाई में किसी कारणवश विनियर कलम न की जा सकी हो तो अगस्त माह में अवष्य कलम कर लेंवे।
  • जिंक सल्फेट का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
  • आम के पौधों की कटाई और छंटाई इस समय की जा सकती है। पौधों को स्वस्थ और आकार में रखने के लिए मृत या रोगग्रस्त शाखाओं को काट दें।

4. आंवला

  • आँवले के फलों की तुड़ाई जनवरी-फरवरी माह तक जारी रह सकती है।
  • अगस्त माह में आँवले का रस्ट रोग के नियंत्रण के लिए घुलनशील गंधक (0.4 प्रतिशत) या क्लोरथैलोनिल (0.2 प्रतिशत) के तीन छिड़काव एक माह के अंतराल पर करना चाहिए।
  • अगस्त माह में गुठली छेदक के प्रकोप के नियंत्रण के लिए क्विनालफॉस या सेविन का 2 मिली प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें।
  • अगस्त माह में आंवला के बीजों की बुआई कर सकते हैं।
  • माह में ही आंवला में पैबंदी कलिकायन या तथा विरूपित छल्ला विधि द्वारा प्रवर्धन किया जा सकता है।
  • जुलाई-अगस्त के माह में ही कलिकायन द्वारा तैयार पौधों को 8-10 मीटर (किस्म के अनुसार) की दूरी पर उद्यान में रोपित कर सकते हैं।
  • नाइट्रोजन की आधी मात्रा जुलाई-अगस्त के महीने में डालनी चाहिए।

5. नीबू

  • अगस्त माह में नया बाग लगाने का कार्य कर सकते हैं।
  • कैंकर रोग से छुटकारा पाने के लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लिन (250 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) और नीम की खली (5 किलो/100 लीटर पानी में) के घोल का छिड़काव करें।
  • नींबू वर्गीय फलों में रस चूसने वाले कीड़े आने पर मेलाथियान (2 मिली/लीटर पानी) का छिड़काव करें।
  • जल निकासी की उचित व्यवस्था करें।
  • पर्णसुरंगी कीट बचाव के लिए पौधशाला में रोगोर या मेटासिस्टॉक्स (300 मिली/100 लीटर पानी) का छिड़काव करें।
  • फलों की तुड़ाई के पूर्व फलों का गिरना एक गंभीर समस्या है, जिसके नियंत्रण के लिए अगस्त में 10 पीपीएम 2, 4 डी (1 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) का छिड़काव अवश्य करें।
  • फल वृक्षों में लगभग सभी सूक्ष्म तत्वों की विशेष कमी पाई जाती है जिनकी पूर्ति के लिए जिंक सल्फेट, मैग्नीशियम सल्फेट, बोरिक अम्ल, बुझा हुआ चूना (प्रति किलोग्राम/450 लीटर पानी) आदि के संयुक्त घोल का छिड़काव करें।

6. पपीता

  • अगस्त माह में पपीते की पौध तैयार कर सकते हैं। अच्छी किस्म का बीज चयन करके उन्हें कवकनाशी से उपचारित करें। उपचारित बीजों को ऊंची उठी हुई क्यारियों में बोना चाहिए।
  • पौधशाला में बीजों/पौधों को आर्द्रपतन रोग से बचाने के लिए क्यारियों को बुआई से 15 दिन पहले ही 2.5 प्रतिशत फार्मेल्डिहाइड के घोल से उपचारित करने के 48 घंटे बाद पॉलीथीन से ढककर कीटाणुरहित कर लें।
  • बीजों के अंकुरण के बाद थीरम (0.2 प्रतिशत) के घोल का छिड़काव करें। सड़न रोग की रोकथाम के लिए ब्लिटॉक्स (0.3 प्रतिशत) के घोल का छिड़काव अवश्य करें एवं पौधों के तनों के चारों ओर मिट्टी चढ़ा दें।
  • अगस्त के महीने में जब बारिश कम होती है, तब पपीते के पौधों को नियमित रूप से पानी देना आवश्यक है।
  • खरपतवारों को समय-समय पर हटाते रहना चाहिए, ताकि वे पपीते के पौधों के साथ पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा न करें। खरपतवारों को निराई-गुड़ाई करके हटाया जा सकता है।
  • पपीता फल मक्खी भी एक समस्या हो सकती है, इसके लिए उचित उपाय करें।
  • पपीते के पौधों को स्वस्थ रखने और फलों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए, उन्हें आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति करना महत्वपूर्ण है। फूल आने के समय सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे कि जिंक, बोरॉन, और मैग्नीशियम का (2.5 मिलि./लीटर पानीं) भी प्रयोग करें।
  • पपीते के पौधों को सहारा देने के लिए बल्लियाँ लगाएं।
  • पके हुए फलों की सावधानी से तुड़ाई करें।

7. केला

  • पौधों के तनों के चारों ओर मिट्टी की चढ़ाई का कार्य अवश्य पूरा कर लें। इससे जल निकास का उचित प्रबंधन किया जा सकता है।
  • जिन पौधों में फल लगे हों उन्हें बांस से बांधकर सहारा देना लाभप्रद रहता है।
  • नए बाग लगाने का कार्य भी इस माह किया जा सकता है, इसके लिए तलवार की शक्ल के अंतः भूस्तारी का चयन किया जाना चाहिए।
  • अंतःभूस्तारियों को रोगमुक्त मातृ पौधों से ही चयनित करें। भूस्तारी 3-5 माह पुराने होने चाहिए।
  • फ्यूजेरियम म्लानि रोग से बचाव हेतु 0.2 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम के घोल में भूस्तारियों को 15-20 मिनट तक डुबोकर रखें। उपचारित पौधों को रात भर छाया में रखें तथा अगले दिन रोपण करें।

 

लेखक :
डॉ. संगीता,
सहायक प्राध्यापक (फल विज्ञान)
पंडित किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, पेन्ड्री, राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)

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