कृषि

धान की फसल को प्रभावित करने वाले प्रमुख रोग और उनके रोकथाम के उपाय

आयुष गुप्ता, अभिषेक श्रीनिवास पाटिल एवं मनीष महरानिया

भारत में धान (Oryza sativa) एक प्रमुख खरीफ फसल है, जिसकी खेती मुख्यतः जून से अक्टूबर के बीच की जाती है। यह फसल गर्म व आर्द्र जलवायु में 20°C से 35°C तापमान और 100–200 सेमी वर्षा की आवश्यकता के साथ अच्छी वृद्धि करती है। उपजाऊ जलोढ़, दोमट या चिकनी मिट्टी जिसमें जलधारण क्षमता अधिक हो, धान के लिए उपयुक्त मानी जाती है। प्रमुख उत्पादक राज्य हैं – पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश। धान की बुवाई पारंपरिक रोपाई, सीधी बुवाई तथा SRI (System of Rice Intensification) पद्धति से की जाती है। भारत सरकार MSP, बीज वितरण, उर्वरक सब्सिडी व तकनीकी मार्गदर्शन के माध्यम से किसानों को समर्थन प्रदान करती है, जिससे धान उत्पादन को स्थिरता और वैज्ञानिक आधार मिलता है। आइए इसके प्रमुख रोग और उनके प्रबंधन के बारे में जानें।

  1. झुलसा रोग (Blast Disease)

रोग कारक: पायरिकुलैरिया ओराइज़ी (यौन अवस्था: मैग्नापोर्थे ग्रिसिया)

जीवन चक्र:

  • नर्सरी अवस्था में पौधों की पत्तियों पर रोग के प्रारंभिक लक्षण धब्बाकार नेक्रोटिक घावों के रूप में प्रकट होते हैं, जो सामान्यतः नाव या नेत्राकार संरचना प्रदर्शित करते हैं। रोग जनक बीज, अवशेषों और जंगली घासों पर जीवित रहता है।
  • हवा, वर्षा की बूंदों और संक्रामित पानी से फैलता है।
  • विशेषकर फूल निकलने के समय neck blast होता है।

लक्षण:

  • पत्तियों पर हीरे के आकार के भूरे किनारे वाले सफेद धब्बे ।
  • गांठ और पैंजरे (neck blast) पर काले धब्बे, जिससे दाना नहीं बनता ।
  • नमी और हवा से यह तेज़ी से फैलता है।

अनुकूल परिस्थिति:

  • उच्च आर्द्रता (>90%), 25–30°C तापमान।
  • नाइट्रोजन की अधिक मात्रा।

रासायनिक नियंत्रण:

रसायन मात्रा छिड़काव समय
Tricyclazole 75% WP 0.6 ग्राम/लीटर रोग के लक्षण दिखाई देने पर
Isoprothiolane 40% EC 1 मि.ली./लीटर 2 बार 10 दिन के अंतर पर
Azoxystrobin + Tebuconazole (Ready mix) 1 मि.ली./लीटर प्रारंभिक संक्रमण पर

अन्य प्रबंधन:

  • रोग सहनशील किस्मो का चयन करना चाहिए।
  • बीजोपचार: Carbendazim @ 2g/kg seed
  • जल प्रबंधन और पौधों में दूरी बनाए रखना।

2. शीथ ब्लाइट (Sheath Blight)

रोग कारक: राइजोक्टोनिया सोलेनाई  (मृदाजनित फफूंद)

जीवन चक्र:

  • मिट्टी और पौध अवशेष में जीवित।
  • सन्पर्क द्वारा या वर्षा से ऊपरी पत्तियों तक फैलाव।

लक्षण:

  • संक्रमण नर्सरी से ही दिखना आरंभ हो जाता है, जिससे पौधे नीचे से सड़ने लगते हैं।
  • पत्तियों के आवरण (sheath) पर जलसिक्त धब्बे जो बाद में सफेद और भूरे हो जाते हैं।
  • बाद में सफेद और भूरे रंग में परिवर्तित व पौधे गिर सकते हैं उपज में भारी नुकसान होता है

अनुकूल परिस्थिति:

  • यह रोग बारिश के मौसम में अधिक फैलता है।
  • उच्च तापमान (28–32°C), RH > 80%।
  • अधिक घनत्व और लगातार पानी भरा खेत ।

रासायनिक नियंत्रण:

रसायन मात्रा उपयोग विधि
Validamycin 3% L 2 मि.ली./लीटर फसल की 40–60 DAT अवस्था में
Hexaconazole 5% EC 1 मि.ली./लीटर संक्रमण दिखने पर 2 बार
Thifluzamide 24% SC 1 मि.ली./लीटर फूल आने से पहले

अन्य उपाय:

  • पौधों की दूरी और जल निकासी का ध्यान रखें ।
  • खेत की सफाई, संतुलित उर्वरक ।

3. भूरा धब्बा रोग (Brown Spot)

रोग कारक: बाइपोलारिस ओराइज़ी (पूर्व में हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराइज़ी)

लक्षण:

  • पत्तियों पर गहरे कत्थई रंग के गोल, भूरे-काले धब्बे बन जाते हैं।
  • धान के दानों पर झुलसन के लक्षण।
  • पौधशाला से ही रोग की शुरुआत हो सकती है।

अनुकूल परिस्थिति:

  • 22–30°C, कम मिट्टी उर्वरक (विशेषकर पोटाश की कमी)

रासायनिक नियंत्रण:

रसायन मात्रा छिड़काव समय
Mancozeb 75% WP 2.5 ग्राम/लीटर 10-15 दिन के अंतर पर
Propiconazole 25% EC 1 मि.ली./लीटर रोग के लक्षण आने पर

अन्य सुझाव:

  • संतुलित NPK खाद, रोगमुक्त बीज।
  • धूप और वायु संचार के लिए उचित अंतर खेत की सफाई, संतुलित उर्वरक।

4.  जीवाणु जनित झुलसा (बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट)

रोग कारक: ज़ेन्थोमोनस ओराइज़ी पीवी. ओराइज़ी

लक्षण:

  • रोग से ग्रसित पौधे की पत्तियों पर पानी से भरे धब्बे दिखाई देते है।
  • पत्तियों के किनारों से पीला झुलसा व पत्तियों का पीला पड़ना एवं मुरझाना।
  • गीली घास जैसी गंध।
  • “V” आकार का पीला क्षेत्र।
  • अधिक नुकसान फूल अवस्था में होता है।

अनुकूल परिस्थिति:

  • मानसून की शुरुआत, अधिक आर्द्रता, हवा के कारण कटे पत्ते ।

रासायनिक नियंत्रण:

रसायन मात्रा उपयोग
Streptomycin + Tetracycline 0.1% घोल स्प्रे करें
Copper oxychloride 50% WP 2.5 ग्राम/लीटर 2 बार 10 दिन के अंतर पर

अन्य सुझाव:

  • गहरी बुआई, बीजोपचार @ 1% NaCl से संक्रमित बीज हटाएँ।

अन्य समेकित रोग प्रबंधन सुझाव (IDM tips)

  • खेत की सफाई, फसल चक्र, संतुलित पोषण (NPK का संतुलन)।
  • अवशेष हटाना, जल निकासी की उचित व्यवस्था।
  • रोग सहनशील किस्मों का चयन।
  • 20–25 दिन के बाद नियमित निगरानी।
  • जैविक नियंत्रणTrichoderma harzianum, Pseudomonas fluorescens का उपयोग।

नोट:

  • सभी रसायनों का छिड़काव सुबह/शाम को करें।
  • उपयुक्त मात्रा व अंतराल का पालन करें।
  • छिड़काव से पहले पानी की pH 6–7 रखें।

 

लेखक:

आयुष गुप्ता (एम. एस. सी.) पादप रोग विज्ञान विभाग,
अभिषेक श्रीनिवास पाटिल (एम. एस. सी.) पादप रोग विज्ञान विभाग,
मनीष महरानिया (पीएचडी स्कॉलर) पादप रोग विज्ञान विभाग
कृषि महाविद्यालय, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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