जैविक हथियारों के रूप में सूक्ष्म जीव
डॉ. गोविना देवांगन, वेटनरी पॉलीटेक्निक, महासमुन्द, दाऊ श्री वासुदेव चन्द्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.)


जैविक युद्ध/किटाणु युद्ध- किसी युद्ध में किसी व्यक्ति, पशु अथवा पौधे को मारने या नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से जीवाणु, विषाणु अथवा फफूंद जैसे जैविक अथवा संक्रमणकारी तत्वों का उपयोग करना जैविक युद्ध कहलाता है।
जैविक युद्ध में जैविक हथियारों (Bioweapons) का उपयोग किया जाता है। इससे जैविक आंतक का खतरा बना रहता है। जैविक युद्ध में अत्यंत संक्रमणकारी सूक्ष्मजीवों या वेक्सिन का उपयोग किया जाता है। इन जैविक हथियारों को बनाने के लिये अत्यंत संक्रमणकारी जीवाणु, विषाणु, फफूंद या टोक्सिन का उपयोग, जान-बूझकर किया जाता है। यह आपराधिक कृत्य संक्रमणकारी की श्रेणी में आता हैं। इसमें संक्रमणकारी सूक्ष्मजीवो/विष को गलत मकसद या इरादे से किसी पशु विशेष या झुंड में पहुंचा दिया जाता है, जिससे मनुष्य, पशुधन व खाद्य सामग्री को नुकसान पहुंचता है। जैविक युद्ध के द्वारा एक साथ बहुत अधिक संख्या में जीवों को मारा जा सकता है। ये जैविक हथियार नाभिकीय हथियारों जैसे होते हैं। ईरान, ईराक, इजराइल, उत्तरी कोरिया, चीन, लीबिया, सीरिया, ताइवान देशों के द्वारा हाल में ही जैविक हथियारों का निर्माण किया गया है। परन्तु परम्परागत अंतर्राष्ट्रीय मानवता व शांति के लिये, अंतर्राष्ट्रीय संधियों द्वारा जैविक हथियारों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है।
इतिहास में अब तक कई बार अत्यंत संक्रमणकारी सूक्ष्मजीवों व टाक्सिन का उपयोग प्रतिद्वंदी को नुकसान पहंुचाने, मारने व आतंक फैलाने के लिये किया जा चुका है। छोटी माता (Small Pox), साल्मोनेला टाइफी, एन्थ्रक्स, ब्रुसेल्ला सुईस, ईबोला वाइरस, Q-फीवर, घातक टाक्सिन, बाटुलिनम टाक्सिन इत्यादि का उपयोग कई हमले करने, आर्मी में बीमारी फैलाने व आंतक फैलाने में किया जा चुका है।
आंतकी उन तत्वों का चुनाव करते हैं जो अत्यधिक संक्रमणकारी, वातावरण में अधिक समय तक रहने वाला, उपचार न किया जा सकने वाला, मृत्युकारी, गैस द्वारा फैलाने में आसान हो। इस जैविक हथियारों को एयरोसोल (Aerosol) विधि से, पानी या खाद्य पदार्थ में मिलाकर, पार्सल या डाक द्वारा पहुंचाया या झुंड में फैलाया जा सकता है। इनमें एयरोसोल विधि सबसे सुविधाजनक होती है। जिसमें किसी ठोस या तरल पदार्थ के कणों को गैस में निलंबित करके हवा में छिड़काव कर दिया जाता है। ये कण हवा में अधिक समय तक विद्यमान रहते हैं। इसके द्वारा एक ही बार में अत्यधिक संख्या को संक्रमित किया जा सकता है तथा यह अधिक तीव्र (Severe) बीमारी भी उत्पन्न करता है। एयरोसोल में ये सूक्ष्मजीव/टाक्सिन कण दिखाई नहीं देते है और न ही किसी प्रकार की गंध आती है जिससे हवा का जैव हथियारों से विषाक्त होने का पहचान नहीं किया जा सकता है। एयरोसोल के माध्यम से हवा की दिशा में जैविक हथियार तत्व (Agent) को बहुत दूर तक फैलाया जा सकता हैै तथा इससे तलघरों को भी प्रभावित किया जा सकता है। जीवाणुओं जैसे साल्मोनेला टाइफीम्यूरियम, बेसिलस एंथ्रेसिस, बु्रसेल्ला सुईस, कॉक्सिएला बर्नेटी, वीब्रिओ कालेरा, फ्रांसिसेला टुलारेंसिस, यर्सिनिया पेस्टिस एवं शिगेल्ला की विभिन्न प्रजातियों का उपयोग जैविक हथियार निर्माण के लिये किया जाता है। साथ ही विषाणुओं जैसे स्माल पॉक्स, ईबोला वाइरस, येलो फीवर वाइरस तथा टाक्सिन जैसे – बाटुलिनम, रीसिन, स्टेफाइलोकोकल, एन्टेरोटाक्सिन B का भी उपयोग जैविक हथियार निर्माण में किया जाता है।
उपरोक्त सभी वजहों से, जैव हथियार निर्माण के लिये सूक्ष्म जीवो व उनसे निर्मित टाक्सिन का इस्तेमाल किया जाता है इसके अलावा सूक्ष्मजीवों को ही विशेषकर आतंकियों द्वारा उपयोग में लाया जाता है। सूक्ष्मजीवों द्वारा लक्ष्य समूह को आसानी से इंगित किया जाता है। ये निर्माण में आसान, कम खर्चीले होते हैं। इनको गुप्त व अवैध तरीके से उपयोग किया जा सकता हैै तथा एक साथ बहुत बड़े क्षेत्र में फैलाया जा सकता है। एक साथ दो व तीन विभिन्न सूक्ष्मजीवों को मिला दिया जाता है। इन सूक्ष्मजीवों को बायोटेक्नालाजी के माध्यम से भी परिवर्तित कर और अधिक घातक बनाया जा सकता है। इस जैविक हथियारों के उपयोग से जन धन के साथ पूरे देश को भी आर्थिक हानि होती है।
जैव-आंतक से खतरा एवं समस्याएं- इसके द्वारा अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मुख्यतः मानसिक, मनोवैज्ञानिक व सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिसके फलस्वरूप मानव समाज में सामाजिक संस्थानों व शासन के प्रति गुस्सा, भगदड़, अविश्वास तथा आतंकियों के प्रति डर, गुस्सा, भगदड़, पलायन उत्पन्न होता है।
प्राथमिक कार्य- जैविक आतंक के समय किये जाने वाले प्राथमिक कार्यो में निम्न कार्य शामिल है जैसे – जैविक आंतक की पहचान व उसका आकार निर्धारित करना, उसी स्थान पर ही रोकथाम किया जाना, सूचनाएं एकत्रित करना , शुरूआती बचाव के कपड़ो, उपकरणों को एकत्रित कर उपयोग में लाना, निर्जीवीकरण के क्षेत्र को स्थापित करना व कार्य में लाना, जैव आतंक के लिये उपयोग में लाये गये गोलियों, कैप्सूल व अन्य साधनों को एकत्रित करना व उन्हें निष्क्रिय करना, क्षतिग्रस्त मनुष्यों, जानवरों व रेस्क्यू वर्कर को किटाणुमुक्त करना, कार्यो के बाद अभिलेखों का निर्माण करना, संधारण करना व अवलोकन कर निष्कर्ष निकालना, परिस्थिति को बेहतर ढ़ंग से सुनियोजित तरीके से हल करना तथा आगे हो सकने वाले आतंकों के लिये तैयार रहना।









