उद्यानिकी
फरवरी माह में किये जाने वाले फलोद्यान के प्रमुख उद्यानिकी कार्य
डॉ. संगीता, सहायक प्राध्यापक (फल विज्ञान)


फरवरी माह में किये जाने वाले फलोद्यान के प्रमुख उद्यानिकी कार्य
1. अनार
- सिंचाई की उपलब्ध्ता के आधार पर नए बागों की स्थापना का कार्य फरवरी माह में किया जा सकता है।
- पेड लगाने के लिए 4 x 4 मीटर की दूरी पर 50 x50 x50 सें.मी. के गड्ढे बना लें। पेड़ लगाने के समय दीमक नियंत्रण के लिए 10-20 मि.ली. क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. प्रति गड्ढा डालें।
- नए लगाए गये पौधो में 4-5 दिनों के अंतराल तथा पुराने पौधो में 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें।
- अनार में ’मिलीबग’ कीट का प्रकोप दिखाई देने पर उपचार की तैयारी करें। मिलीबग कीट की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
- यदि मृगबहार (जून-जुलाई में पुष्पन) की फसल ली गयी हो तो तैयार फलों को जनवरी-फरवरी माह में तुड़ाई के पष्चात बाजार ले जाने की व्यवस्था करें।
- फलों की तुड़ाई के तुरंत बाद, मध्यम से गहरी छंटाई कर रोगग्रस्त,टूटी और एक-दूसरे में मिली शाखाओं को अलग करें। छंटाई के तुरंत बाद मोटे तनों के कटे हुए सिरों को 10 प्रतिशत बोर्डाेलेप के साथ लिपाई करें। काटे गए पौधें पर छंटाई के बाद उसी संध्या 1 प्रतिषत बोर्डाे मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए।
- यदि फलमक्खी का प्रकोप हो तो प्रति हैक्टर 12 मैकफेल/पानी की बोतल प्रपंच को टोरूलायीस्ट/बैक्ट्रोसेराडॉसार्लिसल्यूर के साथ बाग में लगाएं और 15-20 दिनों के अंतराल पर ल्यूर को बदलें।

2. अमरूद
- अमरुद के बागों में साफ़-सफाई, गुड़ाई व खाद देने का काम इस माह में कर सकते है।
- अमरूद में ’मिलीबग’ कीट का प्रकोप दिखाई देने उपचार की तैयारी करें। मिलीबग कीट की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
- फरवरी माह में अमरूद के बागों में फलों की तुडाई का कार्य जारी रखें। तुडाई का सबसे अच्छा समय सुबह का होता है। फलों को उनकी किस्मों के अनुसार अधिकतम आकार तथापरिपक्व-हरे रंग (जब फलों की सतह का रंग गाढ़ेे से हल्के हरे रंग मे परिवर्तित हो रहा हो) के होने पर तोड़ना चाहिए।
- फरवरी में आने वाले फूलों को तोड दें ताकि वर्षा ऋतु में आने वाली कम गुणवत्ता वाली फसल की अपेक्षा जाड़े वाली अच्छी फसल को न लेने के लिए फूलों की तुड़ाई के अतिरिक्त नेप्थेलीन एसिटिकअम्ल (100पी.पी.एम.) का छिड़काव करें एव ंसिंचाई कम कर दें।
- फरवरी के दूसरे पखवाड़े में छंटाई का कार्य शुरू किया जाना चाहिए। यह कार्य मार्च माह के प्रथम सप्ताह तक जारी रखा जा सकता है। पिछले मौसम में विकसित शाखाओं के 10-15 सें.मी.अग्रभाग को काट देना चाहिए। इसके अतिरिक्त टूटी हुई,रोगग्रस्त, आपस में उलझी शाखाओं को भी निकाल देना चाहिए। छंटाई के तुरंत बाद कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (2-3 प्रतिशत) का छिड़काव अथवा बोर्डाेपेस्ट का शाखाओं के कटे भाग पर लेपन करना चाहिए।
- अमरूद के नव रोपित बागों की सिंचाई 5-7 दिनों के अंतराल पर करें।

3. अंगूर
- अंगूर के नए बागलगाने के लिए सर्वोत्तम समय है।
- पेड़ लगाने के समय दीमकनियंत्रण के लिए 10-20 मि.ली. क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. प्रतिगड्ढा डालें।
- अंगूर की किस्में खाने के लिए बिनाबीज की ब्यूटीसीडलैस, डिलाइट, परलेट व थोम्पसन सीडलैस तथा बीज वाली वैकुआ, आवाद, चैम्पियन अर्ली, मस्केट, गोल्ड व कार्डिनल हैं। किसमिस बनाने के लिए थोम्प्सन सीडलैस व गोल्ड, डिब्बाबंद के लिए थोम्पसन सीडलैस तथा शर्बत बनाने के लिए ब्यूटी सीडलैस, अर्ली मस्केट व चैम्पियन किस्में हैं।
- अंगूर की कटाई-छँटाई के लिए उपयुक्त समय है। इसमें पुरानी, बीमार व सूखी टहनियां निकाल दें तथा कटाई-छँटाई के उपरांत फंफूदनाशक 0.3 प्रतिशत कापर ऑक्सीक्लोराइड स्प्रे करें।
- फरवरी में चूर्णिल आसिता रोग से बचाव के लिए केराथेन (0-1 प्रतिशत) का छिड़कावकरें। पौधें की तीन पत्तियों वाली अवस्था पर 2 ग्राम प्रति लीटर ट्राइकोडर्मा का छिड़काव मृदुल और चूर्णिल आसिता दोनों ही व्याधियों से बचाव में उपयागी सिद्ध हुई है।
- बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें।

4. आम
- नर्सरी में लगे पौधें को पाले से सुरक्षा के लिए ढके छप्परों को निकाल दें।
- आम के नवरोपित बागों की आवष्यकतानुसार सिंचाई करें तथा पुराने बागों में 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें।
- फरवरी में आम पौधों के थालों की गुडाई करें।
- आममें ’मिलीबग’ कीट का प्रकोप दिखाई देने उपचार की तैयारी करें। तने के चारों ओर गुड़ाई करके क्लोरोपायरिफ़ॉस या मिथाइलपैराथियॉन के 200 ग्रा. धूल की भुरकाव अथवा पोलोथिन के चादर से तने पर 30 से.मी. की पट्टी एवं ग्रीस लगाने से इसके नवजात को फांसकर इस कीट का निराकरण किया जा सकता है।
- आम में श्यामव्रण (एन्थ्रेक्नोज) रोग की उग्रता की स्थिति में पत्तों एवं बढ़ते फलों पर कवच या इंडोफिल एम-45 नामक फफूंदनाशी (0.2 प्रतिशत) का 2-3 छिड़काव करना चाहिए। रोगग्रसित टहनियों तथा इसके प्रभाव से झड़े पत्तों को जलाना या गाड़ देना लाभकारी होता है।
- आम के फल जब फल सरसों के दाने के बराबर हो जाए तब उपरोक्त दवा का दूसरा तथा मटर के दाने के आकार के फल होने पर तीसरा छिड़काव करें।
- फुदका यातेला (मैंगो हॉपर) के निदान के लिए इमिडाक्लोप्रिड (0.3 प्रतिषत) तथा चूर्णिल आसिता रोग से बचाव के लिए केराथेन (20 ग्रामप्रति 100 लीटरपानी में) अथवा घुलनषील गंधक 2 ग्राम प्रति लीटर पानी या हेक्साकोनाजोल के 0.1 प्रतिषत प्रतिलीटर पानी के घोल का छिडकाव फरवरी माह के अंतिम सप्ताह में अवष्य करें।
- ध्यान दें कि इन्हीं दिनों पौधें पर फूल आते हैं और यदि किसी भी कीटनाषी का प्रयोग फूलों पर किया गया तो संपूर्ण परागण न होने से कम फल लगेंगे। अतः कीटनाषी का प्रयोग के समय सावधानी बरतें।

5. स्ट्रॉबेरी
- जनवरी में स्ट्रॉबेरी के खेत में यदि पलवार न बिछाई गई तो वांछित पलवार जैसे पुआल या पॉलीथीन का प्रयोग करें।
- फलों में उच्चगुणवत्ता प्राप्त करने के लिए फरवरी के शुरूवात में जिब्रेलिक अम्ल (75 पी.पी.एम.) का छिड़काव करें तथा समय पर सिंचाई करते रहें।
- पत्तियों पर यदि धब्बे दिखाई पड़ें तो डाईथेन-एम. 45 (2 ग्राम प्रति लीटर पानी या बाविस्टिन (1 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें।
- फरवरी में स्ट्राबेरी की फसल तैयार हो जाती है। इसे तोड़कर 250 ग्राम के पैकेट में पैककर बाजार भेजने की व्यवस्था करें।

6. आंवला
- आँवले के फलों की तुड़ाई जनवरी-फरवरी माह तक जारी रह सकती है।
- इस दौरान फलों से लदे वृक्षों को बांस-बल्ली की सहायता से सहारा देने की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि शाखाओं को टूटने से रोका जा सके। अतः बिक्री की उचित व्यवस्था करें।
- जिन क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो, उन क्षेत्रों में बसंत के आगमन के साथ ही पौधा रोपण का कार्य फरवरी माह के दूसरे पखवाड़े से प्रारम्भ किया जा सकता है। यह मार्च तक जारी रखा जा सकता है।
- साथ ही जहाँ पाले की आषंका हो वहाँ गंधक के अम्ल(0-1 प्रतिषत) का छिड़काव पूरे वृक्ष पर किया जाना चाहिए। जरूरत पड़े तो छिड़काव को दोहराएँ।
- फरवरी में फूल आने का समय होता है जो नई पत्तियों के साथ आते हैं। इस समय सिंचाई न करें।
- आंवला के बाग में गुड़ाई करें एवं थाले बनाएं।

7. बेर
- बेर में चूर्णिल आसिता रोग अत्यधिक हानि पहुंचाता है। इसके लिए फरवरी में 0.2 प्रतिषत केराथेन का छिड़काव करें।
- आवश्यकतानुसार15 दिनों के अंतराल पर दोबारा छिड़काव करें।
- फरवरी के अंत में किसान बेर के नए पौधे भी लगा सकते हैं।
- फरवरी में बेर की अगेती किस्में पकने लगती हैं। फलों की तुड़ाई सुबह या शाम को ही करनी चाहिए। तुड़ाई के समय फलों को उनके रंग एवं आकार के आधार पर छांटकर श्रेणीकृत किया जाना चाहिए। छँटाई उपरांत फलों को कपड़े की चादरों, जूट के बोरो, नाइलोन की जालीदार थैलियो, बांस की टोकरियों, लकड़ी अथवा गत्तों के डिब्बों में भरकर बाजार भेजा जा सकता है।
- बेरके बागों में साफ़-सफाई एवं गुड़ाई करें।

8. नीबू
- नीबू वर्गीय पौधों को फरवरी से मार्च माह तक रोपित कर सकते हैं।
- पौधे लगाने से लगभग एक माह पूर्व खेत में 1 घन मीटर के गड्ढे खोद लेने चाहिए। प्रत्येक गड्ढे में 20-25 कि.ग्रा. गोबर की खाद और 1 कि.ग्रा.सुपरफॉस्फेट मिला ले। दीमक नियंत्रण के लिए क्लोरपायरीफॉस अथवा नीम की खली हर गड्ढे में मिलाएं। एक गड्ढे से दूसरे की दूरी 6-8 मीटर की होनी चाहिए तथा इनमें खाद डालकर सिंचाई करें ताकि मिट्टी बैठ जाए।
- मूलवृंत तैयार करने के लिए बीज की बुआई पॉलीथीन में करें। हर बैग में दो से तीन बीज डालें। इस द्विमाही प्रति पौधा 400 ग्राम नाइट्रोजन, 200 ग्राम फॉस्फोरस तथा 400 ग्राम पोटाष का प्रयोग 50 कि.ग्रा. गोबर की खाद के साथ करके हल्की सिंचाई कर दें।
- निम्बूवर्गीय फलों की कटाई-छँटाई के लिए उपयुक्त समय है। इसमें पुरानी, बीमार व सूखी टहनियां निकाल दें तथा कटाई-छटाई के उपरांत फंफूदनाशक 0.3 प्रतिशत कापर ऑक्सीक्लोराइड स्प्रे करें।
- निम्बूवर्गीय फलोंके बागों में साफ़-सफाई, गुड़ाईव खाद देने का काम इस माह में कर सकते है।
- नींबूवर्गीय फलों में वायरस को फैलाने वाले कीड़ों के नियंत्रण के लिए नये कल्ले निकलते समय इमिडाक्लोरप्रिड (3 मिली/10 ली.) या क्वीनालफ़ॉस (20 मिली./10 ली.) तथा डाइमेथोएट (15 मिली./10 ली.) या कार्बारिल (20 ग्रा./10 ली.) का घोल बनाकर दो-दो छिड़काव एकान्तर विधि से करें।
- नींबू में रोगग्रस्त टहनियां काट दें फिर 0.3 प्रतिशत कॉपर-ऑक्सीक्लोराइड स्प्रे करें।
- नीबू जाति के पौधे मेंसुण्डीछाल खाने तथा तनों में छेद करती हैं। इन छेदों में 30 मि.ली. इण्डोसल्फान 35 ई.सी.को 10 लीटर पानी में घोलकर डालें।
- यदि तने या फल गल रहे हो तो जनवरी के उपचार बाद फरवरी में स्ट्रेप्टासाइक्लिन का स्प्रे करें।

9. पपीता
- पपीते को तना गलन रोग से बचाने के लिए खेत में पानी भरान रहने दें। बीमारी फैलने पर 2 ग्राम केप्टालून प्रति लीटर पानी में घोलकर 17 दिन के अंतराल पर छिडकें।
- पाले से बचाने के लिए ढकेंगए पुआल को फरवरी के अंत में हटा दें।
- 25 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फॉस्पफोरस तथा 100 ग्राम पोटाश का प्रयोग फरवरी में प्रति पौधे की दर से करें।
- बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें।
- प्रवर्धन हेतु बीजों की बुआई फरवरी माह में की जा सकती है। यह मार्च के महीने तक जारी रह सकती है। बोने से पहले बीज को फफुँदीनाषक से उपचारित अवश्य करें।
- यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो फरवरी माह में रोपाई का कार्य किया जा सकता है। पौधें की रोपाई संध्या काल में करनी चाहिए। रोपाई के पष्चात सिंचाई करना आवष्यक होता है। जब तक अच्छी तरह से पौधा लग न जाए तब तक प्रतिदिन हल्की सिंचाई करनी चाहिए।
- पपीतेपर मिट्टी चढ़ाना जरूरी होता है। प्रत्येक गड्ढे में एक पौधे को रखने के बाद पौधे की जड़ के आसपास 30 संे.मी. की गोलाई में मिट्टी को ऊंचा चढ़ा देते हैं ताकि पेड़ के पास सिंचाई का पानी न ठहर सके और पौधे सीधा खड़ा रहे।
- पपीते के बागान को खरपतवार से मुक्त रखें।

10. लीची
- मंजर आने के सम्भावित समय में आंतरिक फसल न लगाएं।
- लीची में फूल आते समय पौधों पर कीटनाशी दवा का छिड़काव न करें तथा बगीचे में पर्याप्त संख्या में मधुमक्खी के छत्ते रखें।
- फरवरी में लीची में फूल आते समय सिंचाई न करें क्योंकि इससे फूलों के गिरने का डर रहता है।
- फूल आने से पहले एवं बाद में पानी की समुचित व्यवस्था करें।
- चूर्णिल आसिता रोग से बचाव के लिए केराथेन (20 ग्रामप्रति 100 लीटरपानी में) अथवा घुलनषील गंधक 2 ग्राम प्रति लीटर पानी या हेक्साकोनाजोल के 0.1 प्रतिषत प्रति लीटर पानी के घोल का छिडकाव फरवरी माह के अंतिम सप्ताह में अवष्य करें।
- फुदका कीट से बचाव हेतु इमिडाक्लोरोप्रिड (0.7-1.0 मिलीप्रति लीटर) अथवा थायोमेथोक्साम (2-3 ग्रामप्रति 5 लीटर पानी) का छिड़काव करें।
- कैल्शियमअमोनियमनाइट्रेट की आधी मात्रा अर्थात 1.5 कि.ग्रा. प्रति पौधा फरवरी में प्रयोग करें।
- लीची के नवरोपित बागों की सिंचाई करें।
- बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें।

11. तरबूज एवं खरबूज
- तरबूज की फसल में फरवरी में लगा सकते है जिसके लिए 3 कि.ग्रा. बीज को मेढों पर 2.5 x 2.5 फुट की दूरी पर लगाएं।
- बीजाई से पूर्व बीज को 1 ग्राम बाविस्टीनमें 1 लीटर पानी में 10-15 घंटे तक भिगोएं तथा गर्म जगह पर अंकुरित करलें।
- खेतमें 10 टन गोबर की खाद, 2 बोरे यूरिया, 2 बोरे सिंगल सुपर फास्फेट व 1 बोरा म्युरेट आफ पोटाश बीजाई पर डालें।
- त्रबूज की चर्चित किस्में असाई या माटों व सुगरबेबी 100-120 किंवटल तक पैदावार देती हैं।
- खरबूज के लिए 2.7 ग्राम बीज को 2-2.7 फुट दूरी पर मेंढ़ो पर लगाएं।
- खरबूज की चर्चित किस्में पूसा शरबती, पूसा मधुरस तथा पूसा रसराज 75-100 किंवटल तक पैदावार देती है।











