

भैंस पालन (Buffalo Farming) का डेयरी उधोग में काफी महत्व है। भैंस और विदेशी नस्ल की गायें ज्यादा मात्रा में दूध देती हैं।भारत में 55 प्रतिशत दूध अर्थात 20 मिलियन टन दूध भैंस पालन से मिलता है। भारत में तीन तरह की भैंसें मिलती हैं, जिनमें मुरहा, मेहसना और सुरति प्रमुख हैं। मुरहा भैंसों की प्रमुख नस्ल मानी जाती है। यह ज्यादातर हरियाणा और पंजाब में पाई जाती है। मेहसना मिक्सब्रीड है। यह गुजरात तथा महाराष्ट्र में पाई जाती है। इस नस्ल की भैंस 1200 से 3500 लीटर दूध एक महीने में देती हैं। सुरति इनमें छोटी नस्ल की भैंस है। यह खड़े सींगों वाली भैंस है। यह नस्ल भी गुजरात में पाई जाती है। यह एक महीने में 1600 से 1800 लीटर दूध देती है। भैंस की महत्वपूर्ण डेयरी नस्लों में मुर्रा, नीली, रवि, मेहसाना, सुती, जफराबादी, गोदावरी और भदावरी हैं।
आवास प्रबंधनः प्रत्येक भैंस को 12 से 15 वर्ग मीटर की आवश्यकता होती है। आवास में अच्छा वेंटिलेशन और खुला छत हमेशा बेहतर माना जाता है। सुगम जल निकासी की सुविधा के लिए डेयरी भवन एक ऊँची जगह पर स्थित होना चाहिए। फर्श खुरदरा होना चाहिए और प्रत्येक 25 सेमी लंबाई के लिए 2.5 सेमी की ढाल होनी चाहिए।
आहार प्रबंधनः भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भैंस पालन की मुख्य भूमिका है। इसका प्रयोग दुग्ध एंव खेती के कार्यों में होता है। आमतौर पर भैंस विश्व के ऐसे क्षेत्रों में पायी जाती है जहां खेती से प्राप्त चारे एवं चरागाह सीमित मात्रा में हैं। इसी कारण भैंसों की खिलाई -पिलाई में निकृष्ट चारों के साथ कुछ हरे चारे, कृषि उपोत्पाद, भूसा, खल आदि का प्रयोग होता है। गाय की अपेक्षा भैंस ऐसे भोजन का उपयोग करने में अधिक सक्ष्म है जिनमें रेषे की मात्रा अधिक होती है। इसके अतिरिक्त भैंस गायों की अपेक्षा वसा, कैल्षियम, फास्फोरस एवं प्रोटीन, नाइट्रोजन को भी उपयोग करने में अधिक सक्षम है। जब भैंस को निष्कृष्ट चारों पर रखा जाता है,तो वह इतना भोजन ग्रहण नहीं कर पाती जिससे उसके अनुरक्षण बढ़वार, जनन, उत्पाद एवं कार्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। इसी कारण से भैंसों में आक्षातीत बढ़वार नहीं हो पाती और उनके पहली बार ब्याने की उम्र 3.5 से 4 वर्ष तक आती है। अगर भैंसों की भली प्रकार देखभाल व खिलाई -पिलाई की जाये और आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध करवाये जायें तो इनकी पहली बार ब्याने की उम्र को तीन साल से कम किया जा सकता है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
भैंस पालन के लिये आहार स्रोत : भैसों के लिए उपलब्ध खाद्य सामग्री को हम दो भागों में बाँट सकते हैं, चारा और दाना । चारे में रेशेयुक्त तत्वों की मात्रा शुष्क भार के आधार पर 18 प्रतिशत से अधिक होती है तथा समस्त पचनीय तत्वों की मात्रा 60 प्रतिशत से कम होती है। इसके विपरीत दाने में रेशेयुक्त तत्वों की मात्रा 18 प्रतिशत से कम तथा समस्त पचनीय तत्वों की मात्रा 60 प्रतिशत से अधिक होती है। चारा व नमी के आधार पर चारे को दो भागों में बांटा जा सकता है, सूखा चारा और हरा चारा ।
सूखा चाराः चारे में नमी की मात्रा यदि 12 प्रतिशत से कम है तो यह सूखे चारे की श्रेणी में आता है। इसमें गेहूं का भूसा, धान का पुआल व ज्वार, बाजरा एवं मक्का की कड़वी आती है। इनकी गणना घटिया चारे के रूप में की जाती है।
हरा चाराः चारे में नमी की मात्रा यदि 80 प्रतिशत हो तो इसे हरा रसीला चारा कहते हैं। पशुओं के लिये हराचारा दो प्रकार का होता है दलहनी तथा बिना दाल वाला। दलहनी चारे में बरसीम, रिजका, ग्वार और लोबिया आदि आतेहैं। दलहनी चारे में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। अतः ये अत्याधिक पौष्टिक तथा उत्तम गुणवत्ता वाले होते हैं।बिना दाल वाले चारे में ज्वार, बाजरा, मक्का, जई, अगोला तथा हरी घास आदि आते हैं। दलहनी चारे की अपेक्षा इनमें प्रोटीन की मात्रा कम होती है। अतः ये कम पौष्टिक होते हैं। इनकी गणना मध्यम चारे के रूप में की जाती है।
दानाः पशुओं के लिए उपलब्ध खाद्य पदार्थों को हम दो भागों में बाँट सकते है, प्रोटीन युक्त और ऊर्जायुक्त खाद्यपदार्थ। प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों में तिलहन, दलहन व उनकी चूरी और सभी खलें, जैसे सरसों की खल, बिनौले की खल, मूँगफली की खल, सोयाबीन की खल, सूरजमुखी की खल आदि आते हैं। इनमें प्रोटीन की मात्रा 18 प्रतिशत से अधिक होती है। ऊर्जायुक्त दाने में सभी प्रकार के अनाज, जैसे गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का, जई, जौ तथा गेहूँ, मक्का व धान का चोकर, चावल कीपॉलिस, चावल की किन्की, गुड़ तथा शीरा आदि आते हैं। इनमें प्रोटीन की मात्रा 18 प्रतिशत से कम होती है।
संतुलित दाना मिश्रण
पशुओं के दाना मिश्रण में काम आने वाले पदार्थों का नाम जान लेना ही काफी नही है। क्योंकि यह ज्ञान पशुओं कादराशन परिकलन करने के लिए काफी नही है।एक पशुपालक को इस से प्राप्त होने वाले पाचक तत्वों जैसे कच्ची प्रोटीन, कुल पाचक तत्व और चयापचयी उर्जा का भी ज्ञान होना आवश्यक है। तभी भोज्य में पाये जाने वाले तत्वों के आधार पर संतुलित दाना मिश्रण बनाने में सहयता मिल सकेगी। नीचे लिखे गये किसी भी एक तरीके से यह दाना मिश्रण बनाया जा सकता है, परन्तु यह इस पर भी निर्भर करता है कि कौन सी चीज सस्ती व आसानी से उपलब्ध है।
भैंस की आहार बनाने का तरीका
| मक्का, जौ, जई | 40 किलो मात्रा |
| मूंगफली की खल | 15 किलो |
| बिनौले की खल | 16 किलो |
| चिलेटेड ग्रोमिन फोर्ट | 2 किलो |
| गेहूं की चोकरः | 24 किलो |
| इम्यून बुस्टर प्री-मिक्स | 1 किलो |
| साधारण नमक | 1 किलो |
| कुल | 100 किलो |
या
| गेहूं: | 32 किलो मात्रा |
| सरसों की खल | 10 किलो |
| मूंगफली की खल | 10 किलो |
| बिनौले की खल | 10 किलो |
| दालों की चूरी | 10 किलो |
| चौकर | 24 किलो मात्रा |
| चिलेटेड ग्रोमिन फोर्ट | 2 किलो |
| इम्यून बुस्टर प्री-मिक्स | 1 किलो |
| नमक: | 1 किलो |
| कुल | 100 किलो |
.
संतुलित दाना मिश्रण कितना खिलायें
1. शरीर की देखभाल के लिएः 2 किलो प्रतिदिन
2. दुधारू पशुओं के लिएः प्रत्येक 2 लीटर दूध के पीछे 1 किलो दाना
3. गाभिन भैंस के लिएः 6 महीने से ऊपर की गाभिन भैंस को 1 से 5 किलो दाना प्रतिदिन देना चाहिए।
4. बछड़ा- बछडि़यों के लिएः 1 से 5 किलो तक दाना प्रतिदिन उनकी उम्र या वजन के अनुसार देना चाहिए।










