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चौलाई (भाजी) की उन्नत खेती

युगल किशोर लोधी, जितेन्द्र त्रिवेदी, अरविंद कुमार जंघेल, मुक्तिलता तिर्की एवं गुलशन कुमार जंघेल

चौलाई एक छोटा एकवर्षीय पौधा हैं जिसकी पत्तियों को छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के ग्रामीण अँचलों में भाजी की तरह उपयोग में लाया जाता है। वास्तव में एक शाक आहार होने के साथ ही साथ एक उत्तम औषधि भी है। अब तक इसकी लगभग 60 प्रजातियां पाई व पहचानी गई हैं जिनके पुष्प बैगनी एवं लाल-सुनहरे रंग के होते हैं। गर्मी और बरसात के मौसम के लिए चौलाई बहुत ही उपयोगी पत्तेदार सब्जी हैं।

पोषक तत्व एवं उपयोग
इसके पत्तियों में कार्बोहाईड्रेड्स, प्रोटीन, विटामिन ’सी’, खनिज और लौह तत्व प्रचुरता में पाए जाते हैं। गर्भ की स्थिरता के लिए मासिक धर्म के समय चौलाई की जड़ को चावल के माँड में पीसकर पिलाने से लाभ होता है। इसकी जड़ो और पत्तियों को सिर पर बाँधने से बुखार उतर जाता है। चौलाई की भाजी माताओं में दूध के स्रावण को नियमित करने के लिए काफी कारगर मानी जाती है। चौलाई में पाए जाने वाले पोषक तत्व बच्चों के मस्तिष्क के तीव्र विकास के बेहद गुणकारी हैं।

जलवायु
चौलाई को गर्मी और बरसात के दोनों मौसमों में आसानी से उगाया जा सकता हैैं।

भूमि
इसकी खेती के लिए उपजाऊ भूमि, जिसमे कंकड़-पत्थर न हों उपयुक्त रहती है। उत्तम पैदावार के लिए रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। इसकी खेती सीमांत भूमियों में भी कि जा सकती है। यह क्षारीय व अम्लीय भूमि में पैदा नहीं होती है। भूमि का पी.एच. मान 6.0-7.0 के बीच उत्तम रहता है। इसकी खेती सीमांत भूमियों में भी की जा सकती हैं।

प्रजातियाँ
चौलाई की कई प्रजातियां भारत में मिलती और प्रयोग की जाती हैंः
1. छोटी चौलाई
इस किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित किया गया है। इसके पौधे सीधे बढ़वार वाले तथा छोटे आकार के होते है, पत्तियाँ छोटी तथा हरे रंग की होती है। यह किस्म बरसात में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है।
2. बङी चौलाई
इस किस्म को भी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित किया गया है। इसकी पत्तियाँ बङी तथा हरे रंग की होती है और तने मोटे, मुलायम एवं हरे रंग के होते हैं। यह ग्रीष्म ऋतु में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है।
3. पूसा कीर्ति
इसकी पत्तियाँ हरे रंग की काफी बड़ी, 6-8 सेमी० लम्बी और 4-6 सेमी० चौङई होती है तथा डंठल 3-4 सेमी० लम्बा होता है। इसका तना हरा और मुलायम होता है। यह ग्रीष्म ऋतु में उगाने के लिए बहुत उपयुक्त किस्म है।
4. पूसा लाल चौलाई
इस किस्म को भी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा ही विकसित किया गया है। इसकी पत्तियाँ लाल रंग की काफी बङी लगभग 7.5 सेमी० लम्बी और 6.5 सेमी० चौङी होती हैं। इसकी पत्तियों के डंठल की लम्बाई 4 सेमी० होती है। इसका तना भी गहरे लाल रंग का होता है तथा तना और पत्ती का अनुपात 1ः5 का होता है।
5. पूसा किरण
यह बरसात के मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है। इसकी पत्तियाँ मुलायम हरे रंग की तथा चौङी होती है और पत्ती के डंठल की लम्बाई 5-6.5 सेमी० होती है।
6. मोरपंखी
यह बरसात के मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म होती है। इसकी पत्तियाँ मुलायम हरे तथा लाल रंग की तथा चौङी होती है और पत्ती के डंठल की लम्बाई 5-6.5 सेमी० होती है। इसका फूल बहुत सुंदर होता है और इसे सजावट के रूप में गमलों में भि लगाया जा सकता है।

भूमि की तैयारी
भूमि की तैयारी के लिए खेत को अच्छी तरह से घास रहित करना चाहिए। पहले 2-3 जुताइयां ट्रैक्टर-हैरो या मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए तथा बाद में घास सूखने के बाद ट्रिलर या देशी हल से 1-2 बार जुताई करके खेत को तैयार कर लेना चाहिए तथा मेड़बंदी करके छोटी-छोटी क्यारियां बना देनी चाहिए। क्यारियों के बीच सिंचाई की नालियां बनाना चाहिए जिससे बाद में पानी लगाने में सुविधा रहें। यह फसल अन्य फसल के साथ भी लगाई जा सकती है।

बुवाई
उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में चौलाई को गर्मी एवं बरसात में उगाते हैं। गर्मी कि फसल के लिए बुवाई फरवरी-मार्च में करते हैं। चौलाई की बीज दर किस्म पर एवं बीज के आकार बुवाई के समय पर निर्भर करती हैं। इन सब बातों को ध्यान में रखकर बीज 2.5 किलो से 3.0 किलो प्रति हेक्टर की दर से बोते हैं। बीज हल्का व छोटा होने के कारण चींटी आदि द्वारा भी नष्ट हो जाता हैं। इसलिये बीज की मात्रा कम नहीं होनी चाहिए। अच्छी प्रकार से तैयार क्यारी में बीज को थोडा मिटटी मिलाकर छिटक देते हैं। चूँकि बीज बहुत छोटे है इसलिए सुखी मिटटी मिलाकर छिटकने से उनका एक समान वितरण होता हैं। बीज छिटकने के बाद क्यारी में हलकी सी गुड़ाई करके बीज को मिटटी में मिला देते हैं। इसके बाद क्यारी कि हलकी सिचाई कर देते हैं।

कार्बनिक खाद
यदि चौलाई को आलू वाली क्यारी में या मटर की क्यारी में लगाना है तो विशेष तैयारी की आवश्यकता नहीं होती हैं। यदि जमीन कम उपजाऊ हो उस अवस्था में क्यारी की अंतिम बार तैयारी करते समय प्रति 10 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में 50 किग्रा० सङी हुई गोबर की खाद और आर्गनिक खाद मिश्रण 1 किलो ग्राम भू पावर, 1 किलो ग्राम माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट, 1 किलो ग्राम सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट, 1 किलो ग्राम माइक्रो नीम, 1 किलो ग्राम माइक्रो भू पावर इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर बराबर मात्रा मंे बिखेर कर मिला देते है। 15-20 दिन बाद 25 मी.ली. माइक्रो झाइम और सुपर गोल्ड मैग्नीशियम 25 मिली ग्राम पानी में मिलाकर प्रति पम्प तर-बतर कर छिड़काव करना चाहिए। यह क्रिया हर कटाई के बाद दुहराना चाहिए।

उर्वरक
चौलाई की फसल में अच्छा उत्पादन लेने के लिए प्रति हेक्टेयर निम्न मात्रा में उर्वरक का प्रयोग करना चाहिएः
नाइट्रोजन – 50 किग्रा. प्रति हेक्टेयर
फॉस्फोरस – 50 किग्रा. प्रति हेक्टेयर
पोटाश – 20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर

सिंचाई
पहली सिचाई बुवाई के तुरंत बाद करें। फिर अंकुरण के बाद 4-5 दिन के अन्तराल पर गर्मी में सिचाई कि आवश्यकता होती हैं। बरसात कि फसल में सिचाई कि कोई विशेष आवश्यकता नहीं होती हैं। बोने के बाद पहली सिंचाई 15-20 दिन के बाद करनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण
चौलाई की फसल में सिंचाई के बाद खरपतवार तथा अन्य घास उग जाती है, जिसे निकालना अति आवश्यक हो जाता है। क्योंकि पोषक तत्त्वों को खरपतवार ही सोख लेते हैं और फसल कमजोर हो जाती है। इसलिए निकाई-गुड़ाई कर खरपतवारों को खेत से बाहर निकाल देना चाहिए तथा साथ-साथ पौधों की थिनिंग (विरलन) भी करते रहना चाहिए। पौधों की आपस की दूरी सही रखनी चाहिए। इस प्रकार से शुरू में दो निकाई-गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए, जिससे खरपतवार नहीं आ सकें।

कटाई एवं उपजः
बुवाई के 3-4 सप्ताह बाद (जब पौधे की पत्तियां व तना मुलायम ही हों) कटाई योग्य हो जाती हैं। इसके बाद कटाइयां 8-10 दिन के अन्तराल पर करते हैं। एक फसल से 8-10 बार कटाई की जा सकती हैं। चौलाई की उपज फसल को उगाने के लिए अपनाई गई कृषि तकनिकों पर निर्भर करती हैं। सामान्यतः एक हे० से लगभग 18-20 क्विंटल उपज प्राप्त हो जाती है परन्तु यदि खेती पूर्णतः वैज्ञानिक ढंग से की जाए तो उपज 30 क्विंटल प्रति हे० और भी अधिक प्राप्त हो जाती हैं।

भण्डारण एवं बाजार
चौलाई का साग, शहरी क्षेत्रों में अधिक प्रिय होता हैं। कटाई के तुरंत बाद छोटी-छोटी बन्च (बण्डल) बनाकर बाजार भेजने चाहिए। पत्तियों को सुरक्षित बाजार में ले जाना चाहिए। पत्तियां मुड्नी, टूटनी नहीं चाहिए जिससे बाजार मूल्य अधिक मिल सकंे। चौलाई को कुछ घण्टों से ज्यादा तक भण्डारण में नहीं रखा जा सकता। कोल्ड स्टोरेज में इसे 95 प्रतिशत आर्द्रता में 7-10 दिन तक भण्डारित किया जा सकता हैं।

चौलाई की फसल के कीट एवं उनका नियन्त्रण

चौलाई पर भी अन्य पत्तियों वाली फसल की तरह कीट लगते हैं-
1. पत्तियों को खाने वाला कैटर पिलर- यह कीट पत्तियों को खाते हैं। नियन्त्रण के लिए जैसे ही थोड़े केटर पिलर पौधों पर दिखाई दें तो उन पौधों को उखाड़ देना चाहिए तथा जला देना चाहिए।
2. ग्रासहोपर-यह कीट पत्तियों के रंग जैसा हरा होता हैं। यह दिखाई नहीं देता और छिपकर फसल को क्षति पहुंचाता है। मुलायम तना तथा पत्तियों को काटता है। नियन्त्रण के लिये खेत में खरपतवार नहीं होने चाहिए। इनका साफ खेत पर कम आक्रमण होता है।

बीमारी एवं उनका नियन्त्रण
चौलाई पर बीमारी कम लगती है। देर से बोई जाने वाली फसल पर पाउडरी मिल्डयू आती है। इसलिए नियन्त्रण के लिये समय से बुवाई करनी चाहिए।

सावधानी-
पत्तियों वाली फसल पर कीटनाशक दवाओं को छिड़ने की सिफारिश नहीं की जाती है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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