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मौसम परिवर्तन के दौरान फसलों में जल प्रबन्धन

गुरुप्रीत सिंह गॉंधी, कमलेश साहू, श्री जे एल चौधरी

आए दिन मौसम में परिवर्तन देखने को मिल रहा है। मौसम में हो रहे लगातार परिवर्तन का हमारी कृषि पर बहुत बड़ा असर पड़ता है। इसी परिवर्तन को देखते हुए हमें अपने खेतों के लिए जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होगा। जल ही जीवन है, पानी के बिना हम एक पल भी जीवित नहीं रह सकते, ऐसे कई जुमले दिन-प्रतिदिन सुनते रहते हैं। हम सब यह जानते हैं कि आदमी बिना अन्न के कुछ दिनों तक तो रह सकते हैं मगर पानी के बिना एक पल भी रह पाना मुश्किल है। पानी की इस महत्ता को सदियों से वैज्ञानिकों, लेखकों, कवियों ने अपने-अपने तरीके से परिभाषित किया है। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर पानी हमारे लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

पानी इस धरा के प्रत्येक प्राणी, पेड़-पौधों के लिए जीवनदाता है तथा परम आवष्यक तत्व है। इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। सैंकड़ों वर्ष पहले इस पृथ्वी पर सर्वप्रथम पानी ही बना था। उसके उपरान्त इस जल में जीव, पेड़, पौधों का उद्भव एवं विकास हुआ। यह तथ्य स्वयं ही पानी के महत्व को चरितार्थ करता है। इसमें कोई संषय नहीं है।

जल प्रबंधन क्यों?
पानी मनुष्य एवं अन्य प्राणियों की जैविक तथा अजैविक क्रियाओं के लिए अत्यन्त आवष्यक है। पानी मनुष्य एवं अन्य प्राणियों के जैविक तथा अजैविक क्रियाओं के लिए अत्यन्त आवष्यक है। सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड का सार प्रकाष संश्लेषण की क्रिया जो पौधों द्वारा की जाती है, उसके लिए भी पानी एक मुख्य अवयव है। उस क्रिया के द्वारा ऑक्सीजन एवं कार्बन डाई ऑक्साइड का समन्वय स्थापित होता है। पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार की चक्र विधियॉं प्राकृतिक रूप से संचालित होती है। जिनका एक मात्र उद्देश्य प्राणी के जीवन चक्र को निर्विध्न संचालित करना होता है। उस चक्र में जल चक्र भी सम्मिलित है। पानी हमें वर्षा के जल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होता है। यह जल नदी, नालों, भूमि, झील, झरना, पर्वतों, सागर में प्रवाहित होता है। यही पानी हम लोग प्रयोग करते हैं। पानी प्राणी के द्वारा तथा उनके अन्य कार्यों के लिए उपयोग किया जाता है। घरेलू प्रयोग, कल-कारखानों, व्यवसायिक इकाईयों तथा मुख्य रूप से कृषि में किया जाता है।
कब करें सिंचाई?
फसलों में सिंचाई के रणनीति बनाते समय मिट्टी के प्रकार, फसल, फसल की प्रजाति, वृद्धिकाल मिट्टी में जीवांष के मात्रा और खेत में बोई गयी पिछली फसल आदि को ध्यान में रखना बहुत ही आवष्यक है। जब मिट्टी में स्थित जल की इतनी कमी हो जोय कि पौधों की वृद्धि एवं विकास पर उसका प्रतिकूल असर पड़ने की सम्भावना हो तो सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए यह आवष्यक है कि पौधों की क्रान्तिक अवस्था पर ही सिंचाई करें। फसलों में अधिक पानी देने से नुकसान होने की सम्भावना अधिक रहती है। अतः आवश्यकतानुसार ही सिंचाई करें।

सिंचाई करते समय ध्यान देने योग्य बातेंः

  • कुएं से सिंचाई करने की दषा में छोटी-छोटी क्यारियों को बनाकर ही सिंचाई करें।
  • जल स्रोत से खेत तक सिंचाई हेतु पानी ले जाते समय नाली की सतत निगरानी करनी चाहिए।
  • नहर से पानी देते समय कुलाबे द्वारा उतना ही पानी निकालें जितना पानी नाली में आसानी से बह सके।
  • सिंचाई द्वारा दिये गये पानी को फसलों के जड़ क्षेत्र में अधिकतम समय तक मौजूद रखने हेतु नमी संरक्षण का उपाय करना चाहिए।
  • जलवायु व फसल जल मांग के अनुसार ही सिंचाई करनी चाहिए।
  • सिंचाई हेतु उपलब्ध जल को अधिक से अधिक क्षेत्र में उपयोग में लायें।
  • सिंचाई जल की उपलब्धता के अनुरूप फसलों का चुनाव करना चाहिए जिससे पानी का कुषलतापूर्वक उपयोग किया जा सके। जैसे सामान्य जल प्रबन्ध होने पर गेहूं तथा कम पानी होने की दषा में चना, मसूर, मटर, सरसों, अलसी, धनियॉं आदि फसलों की बोआई करना चाहिए।
  • कम पानी वाली फसलों का चयन करें।
  • चयन की हुई किस्मों की क्रान्तिक अवस्थाओं पर ही सिंचाई करें।
  • फसलों को खरपतवार रहित रखें जिससे उपलब्ध जल का अधिक से अधिक उपयोग फसल द्वारा ही हो सके।

रबी की प्रमुख फसलें एवं उनमें सिंचाई का उचित समयः
गेहूंः गेहूं की फसल में अच्छी उपज लेने के लिए छः सिंचाई की संस्तुति की गयी है परन्तु हल्की सिंचाई लगभग 6 से.मी. ही होनी चाहिए।
1. पहली सिंचाई बुआई के 20-25 दिन की अवस्था में करना चाहिए।
2. दूसरी सिंचाई कल्ले निकलते समय करनी चाहिए यह समय बुआई के 40-45 दिन पर आता है।
3. तीसरी सिंचाई बुआई के लगभग 60-65 दिन पर करना चाहिए।
4. चौथी सिंचाई बुआई के लगभग 80-85 दिना जो कि फसल की पुष्पावस्था है, में करना चाहिए।
5. पॉंचवी सिंचाई बुआई के 100-105 दिन में करना चाहिए। यह फसल की दुग्धावस्था होती है।
6. छठी सिंचाई दाना भरते समय बुआई के 115-120 दिन पर करनी चाहिए।

आलूः जलवायु, मृदा एवं प्रजातियों के अनुसार 5-10 सिंचाई करना चाहिए। सिंचाई सदैव हल्की करनी चाहिए ताकि बनी हुई मेढे़ं पानी में न डूबे तथा मेढ़ों का दो तिहाई भाग ही पानी में डूबना चाहिए। सिंचाई के पश्चात् अनावश्यक पानी का निकास करन देना चाहिए अन्यथा अधिक गर्मी से आलू के सड़ने की सम्भावना बढ़ जाती है। पहली सिंचाई बुआई के 3-5 दिन बाद करनी चाहिए। शेष अन्य सिंचाई 8-15 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार करना चाहिए।

चनाः चने की फसल में कम पानी की आवष्यकता होती है। चने में पहली सिंचाई बुआई के 40-60 दिन बाद फूल आने से पहले करना चाहिए। यदि जाड़े की बरसात न हो तो दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय करना चाहिए। फूल आने की अवस्था में चने की सिंचाई न करें अन्यथा लाभ के बजाय हानि हो सकती है।

मसूरः मसूर की फसल में भरपूर उत्पादन के लिए दो सिंचाई आवश्यक होती है। यदि जाड़े की वर्षा न हो तो पहली सिंचाई फूल आने के पहले तथा दूसरी सिंचाई फली बनने के समय कर देनी चाहिए।

मटरः मटर की फसल में अच्छे उत्पादन हेतु दो सिंचाई की संस्तुति की जाती है। पहली सिंचाई फूल आने से पूर्व तथा दूसरी सिंचाई दाना भरते समय करनी चाहिए।

राई सरसोंः यह फसल नमी की कमी के प्रति दो अवस्थाओं में ज्यादा संवेदनशील होती है। पहली फूल निकलने के पूर्व तथा दूसरी दाना भरने के समय। ये अवस्थाएं क्रमषः बुआई के 30-35 दिन बाद तथा दूसरी 55-60 दिन पर आती है।

गन्नाः गन्ना एक ऐसी फसल है जिसमें सूखे की अवस्था को सहन करने की क्षमता अधिक होने के कारण अच्छी उपज देने में सक्षम होती है। कुल उत्पादन का लगभग 30 प्रतिषत व्यय सिंचाई पर होता है। गन्ने के लिए 7-8 सिंचाईयों की संस्तुति की जाती है। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई कल्ले निकलते समय होती है। यह अवस्था शरदकालीन गन्ने की बुवाई के 60 दिन बाद आती है। वर्षा ऋतु से पूर्व कम से कम 3-4 सिंचाई कर देना चाहिए।

मक्के की फसल में जल प्रबन्धः
मक्के की अच्छी पैदावार के लिए जल प्रबन्ध अति आवश्यक है क्योंकि यह फसल अधिक पानी हो जाने अथवा कम पानी दोनों दषाओं में प्रभावित होती है। फसल के किसी भी अवस्था में खेत में पानी इकट्ठा नहीं होना चाहिए क्योंकि मात्र छः घण्टे लगातार व पर्याप्त जलभराव इस फसल को बहुत अधिक क्षति पहुंचाता है। यदि खेत में जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो ऐसी स्थिति में मक्का की खेती भारी वर्षा को भी सहन कर सकती है। विभिन्न मौसम में बोई जाने वाली मक्का के लिए निम्न प्रकार से जल प्रबन्ध लाभदायक होता है।

रबी मक्काः रबी मक्के को 5-6 सिंचाई की आवष्यकता पड़ती है। प्रथम सिंचाई बुवाई के 20-25 दिन बाद तथा दूसरी एवं तिसरी सिंचाई 25-30 दिन के अन्तर पर करनी चाहिए। चौथी सिंचाई जीरा निकलते समय, पांचवी भुट्टा लगते समय तथा छठी सिंचाई दाना भरते समय करनी चाहिए। उपरोक्त सभी अवस्थाओं में मक्के की सिंचाई अति आवष्यक है। अन्यथा फसल की उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सिंचाई के बाद उपयुक्त नमी आने पर खेत की गुड़ाई कर देना चाहिए जिससे नमी अधिक समय तक संचित रह सके।

खरीफ मक्काः वर्षा के सामान्य रहने की स्थिति में खरीफ मक्के में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती परन्तु नमी की कमी होने की दषा में आवश्यकतानुसार एक या दो सिंचाई करनी चाहिए। जीरा बनते समय तथा भुट्टे बनने के समय नमी की कमी नहीं होनी चाहिए। अन्यथा उत्पादकता में 40-50 प्रतिशत तक का ह्रास हो सकता है। यह फसल न तो सूखा सहन कर सकती है और न ही अतिरिक्त पानी सहन कर सकती है। खेत में यदि कुछ देर तक पानी रूक जाय जो मक्के की फसल में काफी नुकसान हो सकता है तथा उपज में भारी कमी आ सकती है। अतः जल निकास का उचित प्रबन्ध करना चाहिए।

जायद मक्काः जायद में अन्य ऋतुओं की तुलना में ज्यादा सिंचाई की आवष्यकता पड़ती है। इस फसल में वर्षा होने के पहले 12-15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। पूरी फसल के दौरान 8-10 सिंचाई की आवष्यकता पड़ती है। विषेषकर जीरा निकलते समय, दूध बनने तथा दाने बनने की अवस्था में यदि सिंचाई में दो दिन का भी विलम्ब किया गया तो उपज में 20 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।

धान की फसल में जल प्रबन्धः
धान के फसल की कुछ विषेष अवस्थाओं जैसे-रोपाई के बाद एक सप्ताह तक, कल्ले निकलने, बाली निकलने, फूल आने तथा दाना भरते समय खेत में पर्याप्त पानी भरा रहना चाहिए। धान की अच्छी उपज लेने के लिए खेत में लगातार पानी भरा रहना आवष्यक नहीं है। खेत की ऊपरी सतह से पानी अदृष्य होने के तीन दिन बाद 5-7 से.मी. गहरी सिंचाई करना उपयुक्त होता है। किन्तु यदि वर्षा के अभाव के कारण पानी की कमी दिखाई दे ंतो सिंचाई अवष्य करना चाहिए। कल्ले निकलते समय ज्यादा पानी नहीं भरना चाहिए। जहां ज्यादा पानी होता है, वहां जल की निकासी का भी प्रबन्ध करना आवष्यक है अन्यथा उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। सिंचित दषा में खेत में निरन्तर पानी भरे रहने की स्थिति में यदि खेत से पानी अदृष्य होने की दषा में एक दिन बाद 5-7 से.मी. पानी भर दिया जाय तो इससे सिंचाई के जल में भी बचत होगी।

उचित जल प्रबन्ध हेतु आवष्यक सुझावः
1. गन्दे पानी का उपचार एवं उसका सिंचाई के लिए उपयोग।
2. विभिन्न प्रकार की नवीनतम सिंचाई विधियों का प्रयोग जैसे-फव्वारा विधि, छिड़काव विधि, नालियों द्वारा सिंचाई आदि।
3. पौधों में वाष्पीकरण के द्वारा होने वाले जल नुकसान को रोकने के पर्याप्त तरीके द्वारा।
4. कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अन्य तरीकों से सिंचाई करके, पानी की बचत करके, फसल का उत्पादन करना जैसे-नहर द्वारा सिंचाई।
5. उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग करके जो कम जल में अच्छी पैदावार करें तथा सूखे जैसी स्थिति को झेल सकें।
6. जल प्रबन्धन समितियों की स्थापना जो जल का सही एवं आवष्यकतानुसार वितरण करें।
7. जल के स्रोतों के समुचित प्रबन्धन के लिए किसान, वैज्ञानिक, जल प्रबन्धक तथा अन्य का सहयोग एवं सहमति लेना।
8. विभिन्न प्रकार के नियम और कानून के द्वारा मिट्टी एवंज ल का संरक्षण करना।
9. जल के संरक्षण एवं प्रयोग विधियों के लिए लोगों को प्रषिक्षण प्रदान करना।

इस प्रकार परिवर्तित मौसम की परिस्थितियों में विभिन्न फसलों में उचित जल प्रबन्ध जैसे-सिंचाई कब करें?, कितनी गहराई पर करें? तथा साथ ही साथ उचित जल निकास की व्यवस्था करने पर एक तरफ सिंचाई के जल में बचत होती है तथा उत्पादन लागत घटता है तथा दूसरी तरफ हम बेहतर जल प्रबन्ध से किसी भी फसल में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इससे हमारे देष की अति तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या को पेट भर भोजन मिल सके तथा उनके जीवन स्तर में सुधार आ सके।

गुरुप्रीत सिंह गॉंधी, कमलेश साहू, श्री जे एल चौधरी
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषक नगर, रायपुर (छ.ग.)

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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