उद्यानिकीकृषि एवम संबद्ध क्षेत्रराज्यराष्ट्रीय

अंगूर की वैज्ञानिक तरीके से खेती

संगीता, हेमंत पाणिग्रही एवं युगल किशोर लोधी

परिचय:
अंगूर हमारे देष की एक बहुत प्रसिद्ध फल है। इसका वैज्ञानिक नाम वाइटिसवेनिफेरा है। इसका उत्पत्ति स्थान पश्चिमी एशिया और यूरोप माना जाता है। अंगूर की खेती या बागवानी हमारे देष में बहुत प्रसिद्ध है और इसकी खेती अधिकतर क्षत्रों में व्यापारिक तौर पर की जाती है। यह एक सदाबहार बेल है, जिसके पत्ते साल में एक बार झड़ते हैं। इसका फल विटामिन बी और खनिज पदार्थ जैसे कैल्शियम, फासफोरस और आयरन का अच्छा स्त्रोत है।

उपयोग एवं पोषक मूल्य:
अंगूर एक बलवर्द्धक एवं सौन्दर्यवर्धक फल है। पका हुआ अंगूर तासीर में ठंडा, मीठा और दस्तावर होता है। यह स्परको शुद्ध बनाता है तथा आँखों के लिए हितकर होता है। अंगूर वीर्यवर्घक, रक्त साफ करने वाला, रक्त बढ़ाने वाला तथा तरावट देने वाला फल है। अंगूर में जल, शर्करा, सोडियम, पोटेशियम, साइट्रिक एसिड, फलोराइड, पोटेशियम सल्फेट, मैग्नेशियम और लौह तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। अंगूर ह्दय की दुर्बलता को दूर करने के लिए बहुत गुणकारी है। अंगूर जीमिचलाना, घबराहट, चक्कर आने वाली बीमारियों में भी लाभदायक है। श्वासरोग व वायुरोगों में भी अंगूर का प्रयोग हितकर है।
नकसीर एवं पेशाब में होने वाली रुकावट में भी हितकर है। अंगूर का शरबत तो अमृततुल्य है। शरीर के किसी भी भाग से रक्तस्राव होने पर अंगूर के एक गिलास जूस में दो चम्मच शहद घोलकर पिलाने पर रक्त की कमी को पूरा किया जा सकता है जिसकी कि रक्तस्राव के समय क्षति हुई है। अंगूर का गूदाग्लूकोज व शर्करा युक्त होता है। विटामिन ए पर्याप्त मात्रा में होने से अंगूर का सेवनभूख बढाता है, पाचन शक्तिठीक रखता है, आँखों, बालों एवं त्वचा को चमकदार बनाता है।

जलवायु: अंगूर की खेती के लिए गर्म, शुष्क, तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतू अनुकूल रहती है। लेकिन बहुत अधिक तापमान हानी पहुंचा सकता है, अधिक तापमान के साथ अधिक आद्रता होने से रोग लग जाते है। जलवायु का फल के विकास तथा पके हुए अंगूर की बनावट और गुणों पर काफी असर पड़ता है। अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल का होना बहुत ही हानिकारक है। इससे दाने फट जाते हैं और फलों की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अतः उत्तर भारत में जल्दी पकने वाली किस्मों की सिफारिश की जातीहै।

भूमि: अंगूर की खेती या बागवानी अनेक प्रकार की मृदा में कि जा सकती है। अंगूर की जड़ की संरचना काफी मजबूत होती है। अतः यह कंकरीली, रेतीली से चिकनी तथा उथली से लेकर गहरी मिट्टियों में सफलतापूर्वक पनपता है, लेकिन रेतीली, दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो अंगूर की खेती के लिए उत्तम पाई गयी है। अधिक चिकनी मिट्टी में इसकी खेती न करे तो बेहतर है। अंगूर लवणता के प्रति कुछ हदतक सहनशील है।

किस्में
अंगूर की खेती या बागवानी के लिए उन्नतशील और संकर किस्में इस प्रकार है, जैसे-
1. पंजाब एमएसीएस पर्पल- यह किस्म 2008 में जारी की गई थी। इसका छोटा फल होता है, जिसमें बीज होते हैं। फल का आकार मध्यम और पकने पर यह जामुनी रंग का हो जाता है। इस की मध्यम और ढीली शाखाएं होती हैं। यह किस्म जून के पहले सप्ताह में पक जाती है। यह जूस और नेक्टर बनाने के लिए उपयुक्त किस्म है।
2. परलेट- यह शीघ्र पकने वाली किस्मों में से एक है। इसकी बेल अधिक फलदायी तथा ओजस्वी होती है। गुच्छे माध्यम, बड़े होते हैं और फल सफेदी लिए हरे तथा गोलाकार होते हैं। फलों में 18 से 19 तक घुलनशील ठोस पदार्थ होते हैं। गुच्छों में छोटे-छोटे अविकसित फलों का होना इस किस्म की मुख्य समस्या है। उत्तरी भारत के लिए उपयुक्त किस्म है।
3. ब्यूटी सीडलेस- यह किस्म 1968 मेंजारी की गई थी। यह भारत के दक्षिण पश्चिमी क्षेत्रों में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है। यह मध्यम आकार की शाखाओं का निर्माण करती है। जोकि अच्छी तरह भरी होती हैं। इसके फल बीज रहित होते हैं, जोकि मध्यम आकार के और नीले काले रंग के होते हैं। फल में टीएसएस की मात्रा 16 से 18 प्रतिशत होती है फल जून के पहले सप्ताह में पक जाते हैं। इसकी औसतन पैदावार 25 किलोग्राम प्रति बेल होती है।
4. फ्लेम सीडलेस- यह किस्म 2000 मेंजारी की गई थी। इसकी शाखाएं मध्यम, बीजरहित फल जोकि सख्त और कुरकुरे होते हैं और पकने पर फल हल्के जामुनी रंग के हो जाते हैं इसमें टीएसएस की मात्रा 16 से 18 प्रतिशत होती है। यह किस्म जून के दूसरे सप्ताह में पक जाती है।
5. पूसा सीडलेस- इस किस्म के कई गुण थाम्पसन सीडलेस किस्म से मिलते जुलते हैं। यह जून के तीसरे सप्ताह तक पकना शुरू होती है। गुच्छे मध्यम, लम्बे, बेलनाकार होते हैं। फल छोटे एवं अंडाकार होते हैं। पकने पर हरे पीले सुनहरे हो जाते हैं। फल खाने के अतिरिक्त अच्छी किशमिश बनाने के लिए उपयुक्त है।
6. पूसा नवरंग- यह संकर किस्म हाल ही में भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित की गयीहै। यह शीघ्र पकने और काफी अच्छी उपज देने वाली किस्म है। गुच्छे मध्यम आकर के होते हैं। फलबीज रहित, गोलाकार और कालेरंग के होते हैं। यह किस्म रस और मदिरा बनाने के लिए उपयुक्त है।
7. अनाब ऐ शाही-इसकी लता अत्यधिक ओजस्वी तथा उत्पादक होती है, अंगूर का फलदीर्घब्रीतीय और लम्बा से लेकर कुछ अंडाकार और बड़े आकार 8.9 ग्राम के भार का होता है। छिलका पतला गुदा मुलायम एवं मीठा तथा बीजो कि संख्या का 2 से 3 होती है। इसका गुच्छा आकर्षक होता है, और स्थानान्तरण के समय अंगूर खराब कम होते है।
8. बंगलोरब्लू- यह किस्म औरंगाबाद महाराष्ट्र से बंगलोर पहुंची थी और यह अमेरिकी संकर जातियों से काफी मिलती जुलती है इसकी लता ओजस्वी तथा उत्पादक होती है इसमें एथ्रेक्नोज तथा चूर्णिल आसिता रोगों का प्रभाव नहीं पड़ता है। गुच्छा अच्छी तरह से भरा हुआ से लेकर गठीला होता तथा बेलनाकार होताहै। प्राय एक प्ररोहपर 2 से 3 गुच्छे लगते है। बीजो कि संख्या 3 से 4 होती है। अंगूर गोल मध्यम आकार के 5 से 7 ग्राम तथा इनका छिलका मोटा, फिसलने वाला, गुदा हरा मुलायम फिसलनदार और रस युक्त होता है।
9. थाम्पसन सीडलेस- यह किस्म संयुक्त राज्य अमेरिका से लाई गयी है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तर भारत के क्षेत्रो में यह सफलतापूर्वक उगाई जाती है। बेल अत्यधिक ओजस्वी परन्तु उत्पादन में कम होती है यह कवक से फैलने वाली सभी बिमारियों से प्रभावित होती है। गुच्छा अच्छी प्रकार भरा हुआ होता है। अंगूर छोटा, हल्का पिला अंडाकार तथा मीठा होता है, छिलका पतला तथा गुदा मुलायम होताहै।
10. अर्का कंचन- इस किस्म का गुच्छा बड़ा और फल बड़े और सुनहरे पीलेरंग के होते है। इनमे कस्तूरी के सामान सुगंध होती है। यह किस्म रोग और कीटो से कम प्रभावित होती है और ताजे प्रयोग और शुष्क सफेद मदिरा के लिए उत्तम होती है।

अन्य किस्में-
अर्का हंस, अर्काश्याम, मस्कट हैम्बर्ग, चीमा साहिब और भोकारी आदि प्रमुख है।

प्रवर्धन:
अंगूर की खेती हेतु अंगूर का प्रवर्धन मुख्यतः कटिंग कलम द्वारा होता है। जनवरी माह में काटछाँट से निकली टहनियों से कलमे ली जाती हैं। कलमें सदैव स्वस्थ और परिपक्व टहनियों से ही ली जाने चाहिए, सामान्यतः 4 से 6 गांठों वाली 25 से 45 सेंटीमीटर लम्बी कलमें ली जाती हैं। कलम बनाते समय यह ध्यान रखें कि कलम का निचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए और ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए। इन कलमों को अच्छी प्रकार से तैयार की गयी तथा जमीन की सतह से ऊँची क्यारियों में लगा देते हैं। एक वर्ष पुरानी जड़युक्त कलमों को जनवरी माह में नर्सरी से निकलकर खेत में रोपित कर देते हैं।

कलमों की रोपाई:
तैयार की गईजड़ की कटिंग की रोपाई दिसंबर से जनवरी महीने में की जातीहै। बेल की बीच की दुरी किस्म विशेष और कटाई छटाई की पद्धति पर निर्भर करती है। आवश्यक दुरी पर 90 x 90 सेंटीमीटर आकर के गड्ढे खोदने के बाद उन्हें आधा भाग मिट्टी, आधा भाग गोबर की सड़ी हुई खाद और 30 ग्राम क्लोरपाइरीफास, 1 किलोग्राम सुपरफास्फेट व 500 ग्राम पोटेशियम सल्फेट आदि, को अच्छी तरह मिलाकर गड्ढेभर दें। जनवरी माह में इन गड्ढों में 1 साल पुरानी जड़वाली कलमों को रोपदें। बेल लगाने के तुंरत बाद पानी आवश्यक है।

खाद और उर्वरक:
अंगूर की खेती को काफी मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। अतः खेत की भूमि कि उर्वरता बनाये रखने के लिए और लगातार अच्छी गुणवत्ता वाली फसल लेने के लिए, यह आवश्यक है, की खाद और उर्वरकों द्वारा पोषक तत्वों की पूर्ति की जाये। अंगूर की आदर्श विधि 3 ग 3 मीटर की दुरी पर लगाई गयी अंगूर की 5 वर्ष या आगे के वर्षों हेतु बेल में लगभग 600 ग्राम नाइट्रोजन, 750 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश, 650 ग्राम पोटेशियम सल्फेट और 60 से 70 किलोग्राम गोबर की खाद की आवश्यकता होती हैै।

छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन और पोटाश की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा डाल देनी चाहिए। शेष मात्रा फल लगने के बाद दें। खाद और उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें। खादको मुख्य तने से दूर 20 से 25 सैंटीमीटर की दुरी से डालें।

सिंचाई व्यवस्था: अंगूर की खेती में सिंचाई लता के फलत के समय अत्यधिक आवश्यकता पड़तीहै। इस समय मृदा में नमी कि कमी का हानिकारक प्रभाव पड़ता है और फलो का आकार और गुणवत्ता घट जाती है। फलो के पकने के समय जलाभाव से अंगूरों के गुच्छे का रंग चमकीला रहताहै, फिर भी जब फल पकने को होते है, उस समय नमी थोड़ी भी कमी होने से परिपक्वता जल्दी आ जाती है। लेकिन फलो को तोड़ने के समय सिंचाई, यदि अधिक कि जाती है, तो फलो का आकार तो बढ़ जाता है। लेकिन गुणवत्ता घट जाती है और भंडारण शक्ति भी कम हो जाती है। इसलिए सिंचाई तापमान और पर्यावरण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 7 से 10 दिन के अंतराल पर या आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए।

सधाई और कटाई-छटाई:
अंगूर की खेती में इसके उत्पादन में कटाई-छटाई का बड़ा महत्वहै। कटाई-छटाई के दो उद्देश्य होतेहै। पहला लता कि समुचित ढ़ंग के किस्म कि ओज क्षमता के अनुसार सधाई करना तथा एक स्थाई ढ़ांचा निर्मित करना ताकि लता का विकास चरों दिशाओं में समुचित रूप से हो सके और दूसरा लताओं से नियमित रूप से फल प्राप्त करना प्रथम दो वर्षों के अन्दर लता को ढ़ांचा प्रदान किया जाता है। अंगूर कि सधाई कि अनेक विधियां है, और इनके अलग-अलग गुणदोषहै, अंगूर कि छटाई कि चार मुख्य विधियां है, जैसे-
1. शीर्ष विधि
2. निफिन विधि
3. टेलीफोन विधि
4. पंडाल विधि

शीर्ष विधि-
इस विधि से सधाई गई झाड़ीनुमा होती है। जिसका तना सीधा तथा 75 से 90 सेंटीमीटर उंचा होता है। जिसके शीर्ष पर सुवितरित छोटी-छोटी 5 से 6 मुख्य शाखाये फैलती है प्रारंभिक अवस्था में लता को एक सहारे कि आवश्यकता होती है, चार से पांच वर्षों बाद जब तना काफी मजबूत हो जाता है, तोलता के भार को स्वंय संभाल लेता है और सहारे कि आवश्यकता नहीं होती है। इन मुख्य शाखाओं पर निकले प्ररोह जब एक वर्ष पुराने परिपक्व हो जाते है तो सर्दी के दिनों में 2 से 3 गाठों परकाट दिया जाता है। इनके बाद दलपुटो के ऊपर प्ररोह निकलते है। जो परिपक्व होकर अगले वर्षफल देते है। यह विधि कम ओज वाली किस्मों के लिए उपयुक्त है।

निफिन विधि- इस विधि में दो जी आई तार 11-11 ग्रेज भूमि से ऊपर क्रमश 1.05 और 1.65 मीटर कि उंचाई पर लोहे या लकड़ी के सहारे एक छोरसे दूसरी छोर तक खींचे जाते है। ये तार दोनों छोर से पेच द्वारा कसे जाते है, ताकि इनको खीचा या ढीला किया जा सकें। आपसी दुरी 4.8 मीटर होती है, लता को भूमि से 1.65 मीटर कि उंचाई पर ऊपर से काट दिया जाता हैऔरनारों के दोनोंदिशाओंमेंस्थाई रूप 4 से 5 शंखाओकोचलनेदियाजाताहै।इनकोफलने के लिए से 8 से 12 गांठों पर और दल पुट बनाने के लिए 1 से 2 गांठों पर काटा जाता है, अधिक ओजस्वी किस्मों के लिए यह विधि उपयुक्त होतीहै।

टेलीफोन विधि-
उपरोक्त आकार के तिन चार कतारों में क्षेत्रीय रूप से लोहे 1.70 मीटर लम्बी भुजाओं के साथ जो लोहे के थम्ब के उपरी भाग पर जुड़ें रहते है एक छोर से दूसरी छोर तक खींचे जाते है, ये खम्बे कि 1.80 मीटर ऊँचे होते है जो 3.60 से 4.80 मीटर कि दुरी पर गड़े होते है। प्रत्येक भुजा में तीन छेद बने होते है बेल को 1.80 मीटर कि उंचाई पर काट दिया जाता है, और 4 से 5 मुख्य शाखाएं छोड़ी जाती है। इस तरह की बेल की कटाई-छटाई निफिन विधि द्वारा करते है। यह विधि भी अधिक ओज वाली किस्मों के लिए उपयुक्त है।

पंडाल विधि-
इस विधि में पंडाल के आकार का ढ़ांचा बनाया जाता है इसके लिए 2.10 से 4.50 मीटर ऊँचे खंबों के ऊपर उपर्युक्त आकार के तार दुरी पर खींचे जाते है। लताओं को इस जाली के ऊपर इस प्रकार साधा जाता है, कि उसकी मुख्य शाखाओं से 45 मीटर कि दुरी पर उपशाखाएँ निकलकर छतरीनुमा फैल जाये। इस विधि का प्रयोग अत्यधिक ओजस्वी किस्मों के लिए किया जाता है। इसमंे खर्च अधिक होता है, अधिक छटाई करने में पुरानी शाखाओ को किनारे तक छाँट दिया जाता है जिसके नयी टहनियों और उन पर नए प्ररोह बिकसित हो जाये जून में फल तोड़ने के बाद यहाँ छटाई नहीं कि जाती और लता अपने आप सुसुप्त अवस्था में जाने दी जातीहै।
खरपतवारनियंत्रण: अंगूर की खेती के क्षेत्र को खरपतवारमुक्त रखें, और समय समय परलता के तने के आसपास निराई गुड़ाई करते रहें।

रोगनियंत्रण
धब्बा रोग-
अंगूर की खेती में लगने वाले प्रमुख रोग धब्बा रोग है। धब्बारोग के नियंत्रण लिए कार्बेनडाजिम या घुलनशील सल्फर का छिड़काव फूलों के विकसित होने से पहले और फलों के विकसित होने के समय करें। साथ में कटाई-छंटाई के दौरान मैनकोजेब के 3 से 4 छिड़काव 15 से 20 दिन के अन्तराल पर करें।
एंथ्राक्नोस रोग
एंथ्राक्नोस रोग से फलों, तनों और टहनियों परगहरे धंसे हुए धब्बे देखे जा सकतेहैं। इसकी रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या एम- 45, 400 ग्रामको 150 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

कीटनियंत्रण
थ्रिप्स और तेला-
ये कीट पत्तों और फलों से रस चूसते हैं तेलापत्तों की निचली सतह से रसचूसता है जिसके कारण ऊपरी सतह पर सफेदरंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए मैलाथियान 400 मिलीलीटर को 150 लीटरपानी में मिलाकर छिड़काव करें।
भुंडियां-
ये कीट ताजे पत्तों को खाती है और बेलों को पत्ते रहित बना देती है। इसकी रोकथाम के लिए मैलाथियोन 400 मिलीलीटर को 150 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
पीला और लाल ततैया-
ये कीट पके फलों में छेदकर के उन्हें खाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए इसके लिए क्विनलफॉस 600 मिलीलीटर को 150 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
पत्ता लपेट सुंडी-
ये सुंडियां पत्तों को लपेट देती हैं और फूलों को भी खाती है इसकी रोकथाम के लिए क्विनलफॉस 600 मिली लीटर को 150 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

फल तोड़ाई:
अंगूर की खेती के अच्छे रखरखाव वाले बाग से तीन वर्ष पश्चात् फल मिलने शुरू हो जाते हैं और 2 से 3 दशक तक फल प्राप्त किये जा सकते हैं, अंगूर तोड़ने के पश्चात् पकते नहीं हैं, अतः जब खाने योग्य हो जाये अथवा बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए। शर्करा में वृद्धि और अम्लता में कमी होना फल पकने के लक्षण हैं। फलों की तुडाई प्रातः काल या सायंकाल में करनी चाहिए उचित कीमत लेने के लिए गुच्छों का वर्गीकरण करें। पैकिंग के पूर्व गुच्छों से टूटे एवं गलेसड़े दानों को निकाल दें।

उपज:
भारत में अंगूर की औसत पैदावार 30 टन प्रति हेक्टेयर है, जो विश्व में सर्वाधिक है। वैसे तो पैदावार किस्म, मिट्टी और जलवायु पर निर्भर होती है, लेकिन एक पूर्ण विकसित बाग से अंगूर की 30 से 50 टन पैदावार मिल जातीहै।

संगीता, हेमंत पाणिग्रही एवं युगल किशोर लोधी
उद्यान विज्ञान विभाग,
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषक नगर, रायपुर

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Related Articles

Back to top button