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फूलगोभी व पत्तागोभी उत्पादन तकनीक

युगलकिशोर लोधी, जितेन्द्र त्रिवेदी एवं प्रवीण कुमार शर्मा

परिचय
शीतकालीन सब्जियों में गोभीवर्गीय सब्जियॉ विशेषकर फूलगोभी एवं पत्तागोभी का विशिष्ट स्थान हैं। गोभी की अगेती फसल लगाकर किसान अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं। गोभी का जन्मस्थान दक्षिण अमेरिका माना जाता हैं। ताजे फूलगोभी व पत्तागोभी की सब्जी बनाई जातीहैं। कुछ लोग फूलगोभी को काटकर सूखा लेते हैं और बाद में इसकी सब्जी बनाकर खाते हैं। पत्तागोभी को सलाद की तरह भी उपयोग किया जाता हैं। गोभी स्वास्थ्य व पोषक दोनों में उच्च है। यह विटामिन, फाइबर, एंटीऑक्सिडेंट एवं खनिज का अच्छा स्रोत हैं। मानव शरीर को स्वस्थ्य बनाए रखने के लिए आवश्यक पोषक तत्व जैसे विटामिन ए एवं सी, प्रोटीन, कार्बोहाइडेट एवं अन्य खनिज पदार्थो की पूर्ति फूलगोभी एवं पत्तागोभी से हो जाती है जो संतुलित आहार की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह प्रोटीनऔर खनिज लवणों का एक अच्छा स्रोत हैं। इसमें कुछ औषाधीय गुण भी पाये जाते है जो कैंसर रोधी होते हैं।

जलवायु
इसकी सफल खेती के लिए ठंडी तथा आद्र्र जलवायु सर्वोत्तम होतीहै। अधिक ठंढा और पाले का प्रकोप होने से फूलों को अधिक नुकसान होता है। शाकीय वृद्धि के समय तापमान अनुकूल से कम रहने पर फूलों का आकार छोटा हो जाता है। अच्छी फसल के लिए 15 से 20 डिग्री तापमान सर्वोत्तम होता है।

भूमि
गोभी की खेती के लिए सभी प्रकार के अच्छे जल निकासी वाली भूमि उपयुक्त होतीहै, परंतु हल्की एवं दोमट मिट्टी जिसका जल निकास अच्छा हो तथा पी.एच. 5.5 से 6.8 हो, अधिक उपयोगी होती है। अम्लीय भूमि में गोभी की खेती अच्छी नहीं होती है। गोभी के लिए खेत तैयार करने के लिए सबसे पहले एक गहरी जुताई कर हैरो से क्रॉस जुताई कर मिट्टी को भूरभूरी कर पाटा चलाकर खेत समतल करें।

किस्में
फूलगोभी की खेती में उन्नत किस्मों का काफी महत्व हैं क्याोंकि, अगेती, मध्य अवधि वाली एवं पछेती खेती के लिए अलग‐अलग जातियों को लगाना चाहिए। मौसम के अनुकूल जातियों को ना लगाने पर उत्पादन पर विपरित असर पडता हैं।
अगेती किस्में‒पूसा कार्तिकी, कल्याणपुर अगेती, पूसादी पाली, पूसा अर्लीसिंथेटिक।
मध्यम अवधि वाली किस्में‒पूसा सिंथेटिक, पूसा अगहनी, इम्पू्रब्ड जापानी, पंत शुभ्रा।
पछेती किस्में‒स्नोबाल 16, पूसा स्नोबाल 1 एवं पूसास्नोबाल 2, पूसा शुभ्रा।

इन जातियों का पौध रोपण का समय, पौध अंतराल, फसल तैयार होने का समय तथा उपज, भिन्न‐भिन्न है। समय एवं मौसम के अनुकूल विकसित जातियों को लगाकर सितंबर माह के आखरी सप्ताह से अप्रैल माह तक लगातार गोभी बाजार में बेच सकते हैं।

किस्में पौध रोपण समय पौध अंतराल फसल तैयार होने का समय उपज (क्विं/ हे.)
अगेती
पूसा कार्तिकी  सितंबर‐अक्टूबर 60 x 45 नवंबर 100‐125
पूसा दीपाली जुलाई‐अगस्त 50 x 45 मध्य अक्टूबर 100‐120
पूसा अर्लीसिंथेटिक जुलाई‐अगस्त 50 x 45 अक्टूबर‐नवंबर 120‐150
मध्यम अवधि वाली किस्में
पूसा सिंथेटिक मई‐जून 45 x 30 15सितंबर‐15अक्टू. 80‐120
पूसाअगहनी अक्टूबर‐नवंबर 60 x 45 दिसम्बर 150‐175
इम्प्रूब्ड जापानी नवंबर 60 x 45 जनवरी‐अप्रैल 150‐200
पंत शुभ्रा अक्टूबर‐नवंबर 60 x 45 जनवरी‐फरवरी 150‐200
पछेती किस्में
पूसा स्नोबाल 1  नवंबर 60 x 45 जनवरी‐अप्रैल 175‐200
पूसा स्नोबाल 2 नवंबर 60 x 45 जनवरी‐अप्रैल 175‐200
स्नोबाल 16 नवंबर 60 x 45 जनवरी‐अप्रैल 175‐200
पूसा शुभ्रा नवंबर 60 x 45 जनवरी‐अप्रैल 175‐200

पत्तागोभी की उन्नत किस्में
प्राइड ऑफ इंडिया, गोल्डन एकड तथा पूसा अर्ली, ड्रम हेड, पूसा मुक्ता आदि प्रचलित किस्मों को लगाकर अधिक आय कमा सकते है।
संकर किस्में
संकर किस्म की उपज उन्नत किस्मों की अपेक्षा दो गुनी होती हैैं। अत: फूलगोभी व पत्तागोभी की संकर किस्मों का उपयोग कर अधिक आर्थिक लाभ कमा सकते हैं। वैसे तो बहुत सी निजी कंपनियों के बीज बाजार में उपलब्ध हैं परंतु अगेती फसल हेतु बी.एस.एस. 57 जिसको कि सितंबर से अक्टूबर तक लगाकर 50‐55 दिन बाद फसल लेंसकते हैं तथा उपज 250‐300 क्विंटल/हे. प्राप्त होती हैं। इसी प्रकार मध्य अवधि वाले संकर किस्मों में सैरेनों, नाथ स्वेता एवं बी.एस.एल.18 अधिक उपयुक्त है जिसको अक्टूबर से दिसम्बर तक पौध रोपणकर 70‐75 दिन बाद फसल प्राप्त कर सकते है। इन संकर किस्मों से 250‐300 क्विं./हे. तक उपज मिलती है।
संकर पत्तागोभी की भी विभिन्न किस्मों का विकास किया जा चुका है जो किसानों के बीच में अधिक प्रचलित हो रही हैं। जैसेकि रैपिड, मस्केटियर, बजरंग, श्रीगणेश,गोल, किवस्टों आदि।

खाद एवं उर्वरक
पौध रोपाई के पूर्व खेत की तैयारी के समय 20से 25 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी तरह सडी गोबर की खाद मिला देना चाहिए। फूलगोभी एवं पत्तागोभी की फसलों में अलग‐अलग फसलों पर उर्वरक की मात्रा भिन्न‐भिन्न होती है जो इस प्रकार है:‐

फसल फसल (किलोग्राम/हे.) स्फुर पोटाश (किलोग्राम/हे.)
उन्नत किस्में
फूलगोभी 120 60 40
अगेती 125 75 40
पछेती 180 80 40
संकर किस्में
फूलगोभी 200 125 150
पत्तागोभी 200 125 150

पौध रोपाई के पूर्व उपरोक्त स्फुर तथा पोटाश की संपूर्ण मात्रा आधार खाद के रूप खेत की तैयारी के समय मिलादें। नत्रजन की आधी मात्रा आधार खाद के रूप मे खेत की तैयारी के समय मिला दें। नत्रजन की मात्रा की आधी मात्रा को दो समान भागों में तीसरे एवं पांचवें सप्ताह में रोपाई के बाद खडी फसल मे पौधो के पास गोलाई मे दें तथा हल्की गुडाई करें।

नर्सरी पौध या रोपणी

  • सब्जी उत्पादन में रोपणी का विषेष महत्व हैं। अत: उन्नत एवं संकर किस्मों के रोग रहित शुद्ध साफ और 90 प्रतिशत अंकुरण क्षमता वाले बीज को रोपणी के लिए लेना चाहिए।
  • स्वस्थ्य रोपणी तैयार करने के लिए सर्वप्रथम पौधशाला की भूमि का चुनाव मुख्य हैं। इसके लिए ऐसी भूमि का चुनाव करना चाहिए जो खुली जगह हो एवं वहां किसी प्रकार की छाया न पडती हो तथा उस भूमि का जल निकास अच्छा हो। खेत के उंचे स्थान को रोपडी बनाने के लिए चुनना चाहिए तथा सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो।
  • इसके लिए सर्वप्रथम पौधशाला में गोबर खाद डालकर आवश्यकतानुसार 10मीटर x1मीटर x 15 सेमी. उंचाई की क्यारियां बना लें। यह ध्यान रखना चाहिए कि गोबर की खाद अच्छी तरह सडी हुई हो। प्रत्येक क्यारियां में 30 किग्रा. खाद डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिलालें।
  • पौधशाला के लिए चुनी भूमि का निर्जीमीकरण करना चाहिए। पौधशाला में क्यांरियां बनाकर इनका निर्जिमीकरण करें। निर्जिमीकरण दो प्रकार से करतें हैं।
  • पहली विधिग्रीष्म ऋतु में सौरउर्जा द्वारा निर्जिमीकरण‐इसके लिए तैयार क्यांरियों कों सिंचाईकर पॉलीथीन शीट या चद्दर से अच्छी तरह से ढंक कर किनारें से गीली मिट्टी से अच्छी तरह से सीलकर देते हैं जिससे बाहर का हवा अंदर ना आ सके और न ही अंदर की हवा या वाष्प बाहर आ सकें। इस प्रकार पौधशाला को पॉलीथीन शीट से लगभग 15 दिनतक ढककर रखें।
  • दूसरी विधि में तैयार क्यारियों में एक प्रतिशत फार्मेलीन छिडककर पॉलीथीन शीट से अच्छी तरह से ढक कर 10 दिन तक रखें उसके पश्चात् क्यारियों को खोलकर छोड दें, जिससे फार्मेलीन की गंध उड जाती है। इस प्रकार फार्मेलीन या फफूंद नाशक दवा डायथेन एम 45 का 0.3 प्रतिषत घेाल बनाकर 6 लीटर प्रतिवर्गमीटर की दर से पौधशाला को तैयार क्यांरियो में छिडकाव कर मिट्टी का निर्जिमीकरण करें। तद्पश्चात सर्वांगी दानेदार कीटनाशी को 2.5 ग्राम प्रति वर्गमीटर के क्षेत्र में डालकर मिट्टी का कीटों से निर्जिवीकरण करें फिर 15:15:15 (नत्रजन,स्फुर,पोटाश) का संकुल उर्वरक मिश्रण 500 ग्राम प्रतिक्यांरियों के हिसाब से डालकर गुडाई कर मिट्टी को बारीक भुरभुरी बनालें। इस प्रकार पौधशाला की क्यंरियों कों बुआई के लिए तैयार करें।

बीजोपचार एवं बुवाई
थाईरम या केप्टान या सेरेसान या बाविस्टिन 2 ग्राम दवा प्रतिकिलो ग्राम बीज की दर से बीज में मिलाकर पौधशाला की क्यारियों में 10 सेमी. कतार से कतार की दूरी रखतेंहुए 1 से 1.5 सेमी. की गहराई में बुआई करें। बीज बोने के बाद बारीक मिट्टी और सडी गोबर की खाद के मिश्रण से बीज को हल्काढक देना चाहिए, इसके बार सूखी पुआल या कांस से क्यारियों को ढक दें, और फुआर से हल्की सिंचाई करें। जब अंकुरण हो जाए पुआल या कांस को हटा दें। अधिक घना होने पर कुछ अंकुरित पौधे उखाड कर बिरला कर दें या इससे बचने के लिए नर्सरी को ज्यादा घना न बोएं। कीट एवं व्याधियों से पौधशाला को बचाने के लिए डाएथेन एम 45 या मेलाथियान 50 ईसी. का 1‐2 मिली. मात्रा का एक लीटर पानी में घोलकर 10 से 15 दिन के अंतर में छिडकाव करें। उचित नमी बनायें रखने हेंतु आवश्यकतानुसार हजारे से सिंचाई करतें रहें।

सिंचाई
फूलगोभी एवं पत्तागोभी की रोपाई के बाद हल्का पानीदें फिर उचित नमी बनायें रखने के लिए आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई करें। फूल बनते समय और बढते समय उचित नमीं बनायें रखना बहुतही आवश्यक हैं।

निंदाई‒गुडाई
फसल की अच्छी बढवार के लिए खेत की निंदाई‐गुडाई बहुत ही आवश्यक हैं। साधरणत: 2 सें 3 बार निंदाई‐गुडाई की आवश्यकता पडती हैं। पत्तागोभी और फूलगोभी की फसल उथली जड वाली फसलहैं अत: गहरी गुडाई नही करना चाहिए तथा सुबह के समय भी गुडाई नही करना चाहिए।

मिट्टी चढाना
वर्षा ऋतू के समय पानी की बौछार से मिट्टी कट जाती है और जडे निकल आती है, जिससे पौधा असंतुलित होकर गिर जाता हैैं। अत: पौधो को हल्की मिट्टी चढाना चाहिए।

ब्लेचिंग
फूलगोभी की शीघ्र फूलने वाली किस्मों के फूल को उसी की सुखी पत्तियों से ढकना चाहिए, इसको ब्लेचिंग कहते हैं। इससे फूल धुप में जलते नही और पीले नही पडतें। उनकी सुगंध और आकर्षकता बनी रहती हैं। ब्लेंचिंग के समयावधि गर्म मौसम में 3‐5 दिन व ढंडे मौसम में 8‐10 दिन से अधिक नही होनी चाहिए इससे फूल के उपर विपरीत प्रभाव पडता हैं। लेट किस्मों में ब्लेचिंग की आवश्यकता नही होती हैं।

पौध संरक्षण
प्रमुख कीट
1. एफिड‒ये चूशने वाले कीडे है जो पत्तियों का रस चुशते, इनकी रोकथाम के लिए एमीडाक्लोप्रिड 0.006 प्रतिशत का छिडकाव करें।
2. डायमंड बैकमोथ‒इसकी इल्लियां पत्तियों को खाती हैं। इनकी रोकथाम के लिए फिप्रोनिल 5 प्रतिशत का छिडकाव करें।
3. बिहार हेयरीकेटर पिलर‒ ये कीट भी पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाती हैं। इनकी रोकथाम के लिए फिप्रोनिल 5 प्रतिशत का छिडकाव करें।
4. कटवर्म‒ ये कीट बहुत हानि पहुंचाती हैं। ये छोटे पौधे को जमीन के पास से काट देते हैं। इसके नियंत्रण के लिए क्लोरोपायरीफॅास का छिडकाव करें।
प्रमुख रोग
आमतौर पर गोभीवर्गीय फसलो को ब्लेक रॉट तथा फ्यूजेरियम उकढा रोग का प्रकोप होता हैं।
ब्लेकरॉट‒इससे ग्रसित पौंधो के किनारें किनारें वी आकार में मटमैले भूरे धब्बे आते हैं जो बाद में फैलकर संपूर्ण पत्ति को नष्ट करते हैं। बाद में तने का अंत: भाग काला पडकर पूर्णत: सड जाता हैं। गोभी को तोडने पर बरबूदारगंध आतीहैं। रोकथाम के लिए बीज की बुआई के पूर्व 50 सें.ग्रे. ताप वाले गर्म पानी में 20‐22 मिनिट तक डुबाकर रखें फिर उपचारित बीज को छाया में सुखाकर बुआईकरें। ध्यान रहें कि उपचार का तापक्रम अथवा समय की अधिकता से अंकुरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड सकता हैं। फसल की शुरूवात की अवस्था में बीमारी आने के पूर्व बाविस्टिन 3 ग्राम तथा स्ट्रेप्टोसायक्लीन 2 ग्राम प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करने से फसल को बचाया जा सकता हैं। इसके अतिरिक्त कुछ संकर किस्में जैसे क्विस्टोएन.वी.एस.एस: 115 इस रोग के लिए प्रतिरोधी पायी गयी है इनको लगाना चाहिए।

कटाई एवं पैदावार
फूलगोभी व पत्तागोभी की कटाई उनकी जातियों पर निर्भर करतीहै। फूलगोभी कि कटाई तब करें जब उसके फलपूर्ण रूप से विकसित हो जाएँ। फल ठोस तथा आकर्षक होने चाहिए। फूलगोभी की किस्मों के अनुसार रोपाई के बाद अगेती 60 से 70 दिन, मध्यम 90 से 100 दिन और पछेती 110 से 180 दिन में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। उपरोक्त तकनीक द्वारा फूलगोभी की खेती करने से प्रतिहेक्टेयर 150 से 250 क्विंटल तक पैदावार मिल जातीहैं।

ठोस तथा पूर्ण विकसित पत्तागोभी तुड़ाई के योग्य मानी जाती हैं। अगेती फसल की पैदावार प्रति हैक्टेयर 200 से 300 क्विंटल तथा पिछेती किस्म की पैदावार 300 से 400 क्विंटल प्रति हैक्टेयर के बीच होती हैं। संकर किस्मों से तैयार होने वाली गोभी समान आकार की व एक ही समय में तुड़ाई लायक हो जातीहैं। इसके अलावा शतप्रतिशत गोभी प्राप्त होती हैं। जो खेत में लम्बे समय तक बिना फटे टिक पाती हैं। इन किस्मों से 400 से 550 क्विंटल प्रति हैक्टेयर की पैदावार आसानी से प्राप्त की जा सकतीहैं।

युगलकिशोर लोधी,
जितेन्द्र त्रिवेदी एवं प्रवीण कुमार शर्मा
सब्जी विज्ञान विभाग,
इंदिरागांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषकनगर, रायपुर

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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