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पशुओं में रेबीज : लक्षण और रोकथाम

डॉ. पीयूष कुमार, डॉ. डी. के. जोल्हे, डॉ. पूर्णिमा गुमास्ता, डॉ. आर.सी. घोष, डॉ. विवेक कुमार, डॉ. मीनाक्षी

रेबीज :
अंन्य नाम- जलटांका, पागलपन, जलभीति, अलर्क रोग, हिड़क्या, जलातंक

रेबीज एक जानलेवा, विषाणु जनित संक्रामक बीमारी है जो रोगी पशु द्वारा स्वस्थ्य पशु या मनुष्य को काटने या चाटने से फैलती है। रेबीज वायरस मुख्यतया कुत्ते, बिल्ली, भेडिया, सियार, रैकून, बंदर और वेम्पायर प्रजाति की चमगादड़ में अधिक पाया जाता है और इन्ही के जरियें अन्य जीवों में फैलता है। इसमें रोगी के व्यवहार में बदलाव, अधिक उत्तेजना, पागलपन, पक्षाघात व मौत हो सकती है। यह एक प्राणी जन्य रोग है जो पशु से मनुष्य व मनुष्य से पशु में फैलता है। मनुष्य में इसे हाइड्रोफोबिया या जलातंक कहते है क्योंकि इस रोग में गले की मांसपेशियों में ऐठन (पक्षाघात) हो जाने से रोगी पानी नही पी पाता है। भारत में प्रतिवर्ष लगभग साठ हजार लोग रेबीज के कारण बेमौत मारे जाते है।

रोग का कारकः Lyssa virus (लिस्सा वायर) from Rhabdoviridae family

यह विषाणु बुलेट के आकार का है। रेबीज के विषाणु मुख्यतया तंत्रिका उत्तकों, लार ग्रन्थ्यिों और लार में पाये जाते है, लेकिन कभी-कभी रोगी पशु के दूध ओर मूत्र में भी मिला है। यह विषाणु तेज धूप, गर्म पानी, क्लोरोफार्म, फॉर्मेलिन, लाल दवा आदि से नष्ट हो जाते है।
रेबीज कैसे फैलता है?

पशुओं तथा मनुष्यों में यह रोग मुख्य रूप से रेबीज ग्रस्त कुत्ते के काटने से फैलता है। पशु की लार त्वचा के घाव, खरोंच आदि पर लगाने से इन्फेक्शन शरीर मे प्रवेश करता है। इसके अलावा अन्य जानवरो जैसे बिल्ली, भेडि़या, सियार, रैकून, बंदर और चमगादड़ों के काटने से भी फैल सकता है।

रोग जनन की क्रियाविधि:-
जब रेबीज ग्रस्त पशु स्वस्थ पशु को काटता है तो लार के साथ वायरस स्वस्थ पशु के शरीर में पहुॅच जाता है। सबसे पहले विषाणु मांसपेशियों की कोशिकाओं में अपनी संख्या बढ़ाता है इसके बाद विषाणु तंत्रिका तंत्र में प्रवेश करता है। इसके बाद विषाणु तंत्रिका तंत्र के अंदर तंत्रिका उत्तकों में 3-4 मिमी/घण्टें की दर से प्रसार करता है। इसके बाद विषाणु तंत्रिका उत्तकों में अपनी संख्या और बढ़ाता है और पशु के मस्तिष्क में पहुॅच जाता है और वहा से केन्द्रिय तंत्रिका तंत्र में पहुॅच जाता है। यह विषाणु मस्तिष्क में तंत्रिका का विनाश करता है जिससे रेबीज के लक्षण दिखायी देने लगते है। उसके बाद विषाणु शरीर के अन्य उत्तको में मुख्य रूप से लार ग्रन्थि में जाता है और अपनी संख्या को और बढ़ाता है जिसकी वजह से लार ही संक्रमण के फैलने का मुख्य स्त्रोत होता है।

रोग के लक्षणः प्रायः इस रोग की दो अवस्थाएं मिलती है।
i) Dumb form                          ii) Furious form

i) Dumb form ( पक्षाघात रूप)
यह मुख्य रूप से गाय, भैंस, बकरी, भेड़ों आदि में ज्यादा देखने को मिलता है। निचलें जबडे की मांसपेशियों में पक्षाघात से जबड़ा नीचे लटका रहा है। पशु मुह बंद नही कर पाता है तथा मुह खुला रखने से ऐसा लगता हेै मानो मुह में कोई चीज फंस गई है। आँखें लाल, ऑसू गिरना तथा थर्ड आइलिड बढ़ जाती हैं। ऑखे लोमडी की तरह चालाक दिखायी देती है। गले की मांसपेशियों में पक्षाघात के कारण आवाज बदल जाती है। कम आवाज के बीच भौकने की तीखी आवाज आती है। कुत्ता कमजोरी के कारण कभी गिरता है तो कभी खड़ा होता है तथा किसी काल्पनिक चीज को पकड़ने भागता है। आखिर में अधिक पक्षाघात के कारण गिर जाता है। गहरी सांस लेता है, तथा 1-3 दिन में मौत हो जाती है। कभी-कभी 7 दिनों में मौत होती है।

2. Furious form (पागलपन रूप):-
यह रूप मुख्य रूप से कुत्तों में दिखायी देता है। कुत्ते के व्यवहार में बदलाव आ जाता है, अपने मालिक को नही पहचानता है तथा आज्ञा पालन भी नही करता है। जो कुत्ते बंधे होते है, पशु घर की आसपास की चीजो को तथा जो खुले होते है वे अपने रास्ते में अपने वाली हर चीज, पशु, मनुष्य को काटने भागते है। पशु की मौत तक काटने की यह प्रवृत्ति बनी रहती है। कुत्ता उद्देश्यहीन सीधा चलता रहता है। चेहरे से काफी संचेत लगता है। शुरू में लार गिरती भी है और नहीं भी। भूख भी प्रभावित नही होती हैं। बाद में अखाद्य चाीजों जैसे पत्थर , लकडी, कीचड़, घास आदि को चबाता है या काटने भागता हैं। खाना नहीं निगल पाता है। पशु की उत्तेजना बढ़ती जाती है और न खा पाता है न ही पानी पी पाता है। लार गिरते समय नीचे तक लटकी रहती है। भूखा प्यासा कुत्ता काफी कमजोर हो जाता है लेकिन बहुत उग्र रहता है। अंत में कुत्ता भौंक भी नही पाता है, नीचला जबडा लटक जाता है, जीभ बाहर निकली होती है, चलनेे में लड़खड़ाता है फिर जमीन पर गिर जाता है। पक्षाघात व सांस में तकलीफ के कारण 10 दिन में अंदर ही कुत्ते की मौत हो सकती है।

परिक्षण/निदानः
रोग का निदान लक्षणों के आधार पर किया जा सकता है। मस्तिष्क भी कोशिकाओं के परिक्षण करने से उसमें नेग्री बॉडी का मौजूद होना। अन्य परिक्षण जैसे Mouse inoculation test, compliment fixation test के आधार पर भी इस रोग की पहचान की जा सकती है।

इलाजः रेबीज का कोई उचित इलाज नहीं है। एक बार रोग के लक्षण प्रकट हो जाने पर रोगी पशु या मनुष्य की मौत के अवसर ज्यादा होते है। इसलिए इसकी रोकथाम ही एक मात्र उपाय है। पागल पशु के काटने पर टीके का पूरा कोर्स लगवायें। काटने के स्थान और खरोंचो को 15 मिनटों तक साबुन और पानी, पोवीडोन आयोडीन, या डिटर्जेंट से धोना क्योकि यह विषाणु को मार सकते है और कुछ हद तक रेबीज के रोकथाम में प्रभावी प्रतीत होता है।

रोकथामः-
भारतीय समाज में लावारिस कुत्तें एक सबसे बड़ी समस्या है। इनकी अंधाधुंध बढ़ती संख्या के रोकथाम के लिये कुत्तों का नसबंदी आपरेशन बड़े पैमाने पर चलाया जाना चाहिये। पालतू कुत्तों का भी हर वर्ष बडे पैमाने पर टीकारण करना चाहिये। जब पिल्ला दो महीने का हो तो पहला ARV (Anti Rabies Vaccine) लगवाएं। दूसरा इंजेक्शन तीसरे महीने पर लगवाएं। इसके बाद हर वर्ष एक बार लगवाएं। आजकल काटने के बाद उत्तक कल्चर टीके काम में लिये जाते है जो काटने से पहले भी हर वर्ष टीकाकरण के काम में लिया जाता है। इसका कोई साइड इफेंक्ट नही होता है। यह टीका काटने से पहले व बाद में दोनो स्थितियों में लगा सकते है। काटने के बाद टीके का कोर्स 0, 3, 7, 14, 30 व 90 वें दिन लगवायें। एक बार किसी रेबीज ग्रस्त पशु द्वारा अन्य पशु को काट लेने पर Post exposure vaccination योग्य चिकित्सक द्वारा लगवाना चाहिये। देश, प्रदेश या किसी क्षेत्र में बाहर से नयें कुत्ते के प्रवेश के समय रेबीज हेतु जॉच होनी चाहिए तथा 4-6 महीने तक निगराती में रखना चाहिए।

डॉ. पीयूष कुमार, डॉ. डी. के. जोल्हे, डॉ. पूर्णिमा गुमास्ता,
डॉ. आर.सी. घोष, डॉ. विवेक कुमार, डॉ. मीनाक्षी
पशु विक्रति विज्ञान विभाग,
पशु चिकित्सा व पशुपालन महाविद्यालय, अंजोरा दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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