कृषिकृषि एवम संबद्ध क्षेत्रराज्य

अलसी की उन्नत किस्में एवं उत्पादन तकनीक

रूथ एलिजाबेथ एक्का, राजा राम कंवर एवं राजेश कुमार एक्का

अलसी एक लाभकारी तिलहन फसल है। भारत में अधिकांष राज्यों में अलसी की खेती की जाती है। साधारण तौर पर, विभिन्न प्रान्तों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं झारखण्ड़ में इसकी खेती की जाती है। पहाडी स्थानों पर अधिक ऊँचाई पर भी सफलतापूर्वक खेती की जाती है। अलसी की सफल खेती के लिए ठण्ड़ी और षुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। अलसी की खेती 80 से 100 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में उत्तम होती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में फसल को सिंचाई की आवश्यकता होती है। छत्तीसगढ़ के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र में कुल तिलहनी फसलों के रकबे का लगभग 34 प्रतिशत क्षेत्र में अलसी की खेती की जाती है। अलसी का उपयोग खाने के लिए बहुत कम मात्रा में किया जाता है। केवल 20 प्रतिशत भाग का उपयोग खाने के तेल हेतु किया जाता है, बाकी 80 प्रतिशत अलसी का उपयोग वार्निश, इंक पैड़, छपाई इंक, साबुन बनाने, रंग पेन्ट्स आदि में किया जाता है। अलसी में तेल की मात्रा लगभग 43 प्रतिशत होती है। अलसी का मूल्य संर्वधन कर विभिन्न खाद्य पदार्थ जैसे अलसी के लडडू, केक, बिस्कुट ,आदि बनाए जाते है। अलसी में ओमेगा – 3 पाया जाता है। जो बाजार में विभिन्न व्यावसयिक कंपनियों द्वारा ओमेगा – 3 फैटी एसिड़ एक शु़द्ध रूप में उपलब्ध है।अलसी के दानों से तेल निकालने के बाद बचा हुआ उत्पाद(खली) पशुओं के लिए आहार के रूप में उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग खाद के रूप में भी किया जाता है जिसमें मुख्य पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। अलसी के बीज का उपयोग सुगधित तेल तथा अन्य औषधिया तैयार करने में भी किया जाता है। इसके पौधों के तने से रेशे निकाले जाते हैं जिनका प्रयोग कैनवास, दरी तथा अन्य प्रकार के मोटे कपड़े तैयार करने में किया जाता है।अलसी के रेशों को कोसा एवं कपास के रेशों के साथ मिला करके उच्च गुणवत्तायुक्त कपड़े सोड़ी, धोती आदि तैयार किए जाते है।इसके अतिरिक्त अलसी के ड़ंठल से तैयार रेशों के द्वारा हैण्ड़ीक्राप्ट, गृह साज सज्जा हेतु आकर्षक वस्तुएँ भी तैयार की जाती है।
फसल पद्धति
धान आधारित कृषि पद्धति में इस फसल का महत्वपूर्ण भूमिका है एवं छत्तीसगढ़ राज्य की यह प्रमुख तिलहनी फसल है। अलसी की खेती के लिए ड़ोरसा एवं कन्हार भूमि अधिक उपयुक्त होती है। फसल की उत्तम उपज के लिए मध्यम उपजाऊ दोमट मिट्टी सबसे उत्तम होती है। भारी भूमियों में अलसी की खेती वर्षा आधार पर ही की जाती है लेकिन हल्की भूमि में सिचाई के साधन होना आवश्यक है। अलसी की उत्तम फसल के लिए भूमि में जल-निकास का उत्तम प्रबंध होना चाहिए।
असिंचित एवं सिंचित फसल पद्धति
धान कटाई के पश्चात् खेत तैयार करने के लिए 2-3 बार गहरी जुताई करके खेत की सफाई कर लेना चाहिए। इसके बाद पाटा चलाकर ढ़ेले फोड़ लेना चाहिए। तैयार भूमि में बीज को छिड़ककर पुनः हल चलाकर बीज को अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। कतार में बुआई के लिए चाड़ी वाले हल से या देशी हल के पीछे बीज बुआई करनी चाहिए। इससे प्रति इकाई क्षेत्र में पौध संख्या अच्छी प्राप्त होगी एवं अधिक उत्पादकता मिलेगी। सिंचित खेती में पंक्ति की दूरी 25 -30 से.मी. एवं असिंचित खेती में पंक्ति की दूरी 20 -25 से.मी. रखनी चाहिए। सिंचित खेती में पहली सिंचाई बुआई के लगभग 30-40 दिन बाद और दूसरी सिंचाई बुआई के लगभग 60-70 दिन बाद सिंचाई करना चाहिए। एक ही सिंचाई उपलब्ध होने पर बोने के40-45 दिन बाद सिंचाई करना चाहिए।

किस्म का नाम अवधि (दिनों में) औसत उपज (कि. ग्रा./हे.) अन्य गुण
आर. – 552 115-120 800-1000 भूरा मध्यम दाना, उकठा, गेरूवा और भभूतिया रोग के लिए सहनशील, तेलांश 44 प्रतिशत
टी. – 397 120-125 800-1100 उकठा एवं गेरूवा रोग और सूखा के लिए सहनशील, तेलांश 44 प्रतिशत
कार्तिका 100-105 1200-1300 बौना, हल्का भूरा, भभूतिया रोग के लिए  प्रतिरोधी तथा उकठा, गेरूवा और आल्टरनेरिया ब्लाईट  एवं कलिका मक्खी के लिए साधारण प्रतिरोधी, तेलांश 43 प्रतिशत
किरन 120-125 800-1200 उकठा, गेरूवा और भभूतिया रोग के लिए प्रतिरोधी, असिंचित व सिंचित दशा के लिए उपयुक्त, तेलांश 43 प्रतिशत
दीपिका 110-115 1000-1200 मध्यम ऊँचाई, उकठा, गेरूवा और आल्टरनेरिया ब्लाईट  के लिए साधारण प्रतिरोधी, अर्धसिंचित तथा उतेरा के लिए उपयुक्त, तेलांश 41 प्रतिशत
शेखर 130-140 900-1500 चमकदार भूरा दाना, चूर्णी फफूंद, रतुआ और उकठा रोधी, कलिका मक्खी के लिए सहनशील, तेलांश 43 प्रतिशत
इंदिरा अलसी 32 110-115 800-1200 बौना, गहरा भूरा दाना, भभूतिया रोग के लिए साधारण सहिष्णु, सिंचित, असिंचित तथा उतेरा के लिए उपयुक्त, तेलांश 39 प्रतिशत
पदमिनी 120-125 800-1200 उकठा, गेरूवा और भभूतिया रोग के लिए प्रतिरोधी, असिंचित व सिंचित दशा के लिए उपयुक्त, तेलांश 43 प्रतिशत
इंद्रावती अलसी 110-115 1200-1400 उकठा, गेरूवा और भभूतिया रोग के लिए प्रतिरोधी, तथा आल्टरनेरिया ब्लाईट  एवं कलिका मक्खी के लिए सहनशील, शीघ्र समय तथा देर से बुआई के लिए उपयुक्त, 54 प्रतिशत ओमेगा 3, तेलांश 40 प्रतिशत
आर. एल. सी. – 133 100-104 800-1200 वर्षा आधारित, शीघ्र, देरी से बुवाई हेतु
आर. एल. सी. – 143 (उतेरा अलसी) 115-120 500-600 उतेरा हेतु उपयुक्त, गेरूवा, भभूतिया रोग, कलिका मक्खी हेतु प्रतिरोधी

उर्वरक उपयोगः
अलसी में उर्वरक देने से उपज अच्छी मिलती है। असिंचित खेती में 40 किलोग्राम प्रति हे. नाईट्रोजन का उपयोग करना चाहिए। नाईट्रोजन के साथ-साथ 20-25 किलोग्राम स्फुर एवं 20 किलोग्राम पोटाशप्रति हे. देने से अच्छी उत्पादकता प्राप्त होती है। सिंचाई के साथ अलसी की खेती करने पर 60 किलोग्राम नाईट्रोजन एवं 30 किलोग्राम स्फुर एवं 30 किलोग्राम पोटाश प्रति हे. का उपयोग करने से अधिकतम उपज प्राप्त किया जा सकता है।
पौध संरक्षणः
हानिकारक कीटों का नियंत्रणः

  • अलसी की कलिका मक्खीः-कलिका मक्खी की इल्ली ही फसल को नुकसान पहँुचाती है। यह इल्ली कलिकाओं के अन्दर प्रवेष कर अण्ड़ज्ञषय को खा जाती है, जिससे प्रभावित कलियों में फलियाँ नहीं बन पाती हैं और सूखकर लौंग के समान दिखाई देती है। अतः इस कीट से बचाव हेतु अलसी की बुआई 15-30 अक्टूबर के मध्य करें।प्रकाश प्रपंच की सहायता से वयस्क मक्खियों को नष्ट करें।कीट निरोधक / सहनशील प्रजातियों जैसे – आर. एल. सी. – 92, आर. एल. सी. – 27, किरण का चयन करें।एक ही खेत में बार – बार अलसी की फसल न ली जाए।कुसुम के साथ अन्तर्वर्तीय फसल 2ः1 या 4ः2 या 6ः3 के अनुपात में लगाऐं।जैविक नियंत्रण के लिए लेड़ी बडऱ् बीटल, रोव भृंग, ब्रोमस भृंग, लेस, विंग आदि परभक्षी एवं कोटेसिया, केम्पोलेटिस क्लोरिड़ी आदि परजीवी का संरक्षण करें।
  • अलसी की इल्ली:- इस कीट की इल्ली अवस्था हानिकारक होती है। नव-विकसित इल्लियां पत्तियों की बाहरी त्वचा को खाकर पत्तियों को जालीदार कर देती हैं। पूर्ण विकसित इल्लियां पत्तियों को काट कर खाती है। प्रकोप अधिकता में पौधे पत्तीविहीन हो जाती है।अतः इस कीट से रोकथाम हेतु समय पर फसल की बुवाई करें। फसल की बोनी समय पर करें।इल्ली अवस्था को हाथ से पकड़ कर नष्ट करें।रासायनिक नियंत्रण हेतु कार्बारिल 50 ड़ब्ल्यु. पी. दवा का 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।
  • जड़भक्षी दीमक:- यह पौधों की जड़ों को नुकसान पहुँचाता है जिससे पौधे सूख जाते हैं। प्रकोपित पौधे को खींचने पर आसानी से निकल जाते हैं। इस कीट से बचाव हेतु गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें।अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करें।40-50 किलो नीम खली/हे़ खेत तैयार करते समय मिलाऐं।रासायनिक नियंत्रण हेतु इमिड़ाक्लोप्रिड़ 17.8 एस.एल. 125 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से दो बार कली निकलते समय एवं इसके 15 दिन बाद छिड़काव करें।
  • अर्धकुण्ड़लक इल्ली:-इस इल्ली की इल्ली अवस्था हानिकारक होती है, जो पौधों की पत्तियों को खा कर नुकसान पहुँचाती है तथा बाद में कलियों को भी नुकसान पहुँचाती है। कीट नियंत्रण हेतुइल्ली अवस्था को हाथ से पकड़ कर नष्ट करें।प्रकाश प्रपंच की सहायता से वयस्क कीटों को नष्ट करें।इस कीट के रासायनिक नियंत्रण हेतु क्विनालफास 25 ई.सी. का 750-1000 मिली मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

रोग एवं प्रबंधनः

  • उकठा रोगः यह रोग पौधों की किसी भी अवस्था में फ्यूजेरियम लिनी नामक फफूँद से होता है। शाखा निकलने की अवस्था से पौधों के पकने की अवस्था तक नीचे की पत्तियों का पीला पड़ना, उनका सूखना एवं समय से पहले सूख जाना रोेग का प्रमुख लक्षण है। इस रोग के कारण 80 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है। रोगरोधी जातियों जैसे – किरन, आर. – 552, कार्तिका, आर. एल. सी. – 92, इंदिरा अलसी 32 आदि का उपयोग इस रोग के रोकथाम का सर्वोत्तम उपाय है। बीज को कार्बेन्ड़ाजिम 3 ग्राम/किलो तथा ट्राईकोड़र्मा विरड़ी या हारजियानम 4-6 गा्रम/किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके बुआई करनी चाहिए।
  • भभूतिया रोगः अलसी का प्रमुख रोग है, जो ऑइडि़यम लिनी फफूंद द्वारा होता है। इस रोग के लक्षण पौधों की ऊपरी पत्तियों में सफेद पावड़र समान बिखरे हुए चकत्ते में दिखाई देते हैं। रोग से ग्रसित पौधों के दाने छोटे एवं सिकुड़े होते है और उनमें तेल की मात्रा कम हो जाती है। रोग प्रबंधन हेतु फसल को अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में लगाएँ तथा रोगरोधी किस्मों जैसे – किरन, आर. – 552, कार्तिका, आर. एल. सी. – 92 आदि प्रयोग करें। रोग के लक्षण प्रगट होने पर घुलनशील गंधक का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव 8-10 दिन के अन्तराल में 2 बार करना चाहिए।
  • गेरूआ रोग: अलसी में गेरूआ रोग मेलाम्पसोरा लिनी नामक फफूंद द्वारा होता है। पत्तियों, तनों व कलियों पर चमकीले पीले रंग की छोटी ुुनितयाँ (पश्चूल) बन जाती है और पौधा मरने लगता है। रोग के प्रभावी नियंत्रण हेतु रोगरोधी किस्मों जैसे – किरन, आर. – 552, इंदिरा अलसी -32, आर. एल. सी. – 92 आदि प्रयोग करें। रोग के प्रकोप होने पर घुलनशील गंधक का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी या ट्राइड़ेमार्फ (1 मिली) या जिनेब (3 ग्रा.) प्रति लीटर का दो बार 8-10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए। बीज को सदैव फफूंदनाशक द्वारा उपचारित कर बोना चाहिए।
  • आल्टरनेरिया ब्लाईट: पत्तियों, तनों एवं पुष्प-कलिकाओं पर इसके भूरे रंग के छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं और पूरी पत्ती में फैलकर पत्तियों को सुखा देते हैं। रोग से बचाव हेतु 3 ग्राम थायरम/किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके बुआई करें।

कटाई-गहाईः
अलसी की पत्तियाँ पीली होकर झड़ जाऐ तथा फलियों का रंग हल्का भूरा होने लगे, तब फसल काटना चाहिए। काटने के बाद अच्छी तरह धूप में सूखाकर गहाई करें। सफाई के बाद सूखे स्थान पर भण्ड़ारण करना चाहिए।

रूथ एलिजाबेथ एक्का एवं राजा राम कंवर
आनुवांशिकी एवं पादप अभिजनन विभाग
राजेश कुमार एक्का
कीटविज्ञान विभाग
इन्दिरा गॉधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर, छत्तीसगढ़

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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