सरकारी योजनाएं

खेत बचाओ अभियान – रबी 2026 : मृदा स्वास्थ्य और टिकाऊ कृषि

खेत बचाओ अभियान (केबीए) – रबी 2026 एक राष्ट्रव्यापी अभियान है, जो 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य लगभग 50 लाख किसानों लक्षित करते हुए  34 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों, 700 से अधिक जिलों तथा 50,000 गाँवों में मृदा स्वास्थ्य, उर्वरकों के संतुलित उपयोग और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देना है। इस अभियान की प्रमुख प्राथमिकताओं में संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, फसल अवशेष प्रबंधन, फसल विविधीकरण और जलवायु-अनुकूल कृषि शामिल हैं। इसके अंतर्गत केवीके और एटीएमए को शामिल करते हुए 4,150 टीमों के गठन की परिकल्पना की गई है, जिन्हें 12,000 से अधिक वैज्ञानिकों और एटीएमए के अधिकारियों एवं कर्मचारियों का सहयोग प्राप्त होगा। इस पहल के तहत खेतों में 50,000 व्‍यावहारिक प्रदर्शन  और 11,750 व्यवस्थित प्रशिक्षण सत्र आयोजित करने का लक्ष्य है। अभियान के माध्यम से सोशल मीडिया आउटरीच के जरिए  1.5 करोड़ किसानों तक पहुँच कायम करने का अनुमान है, जबकि समग्र डिजिटल आउटरीच को बढ़ाकर 2.5 करोड़ किसानों तक विस्तारित करने की परिकल्पना की गई है।

खेती की बुनियाद मृदा में निहित है  

मृदा स्वास्थ्य कृषि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका का मूल आधार है।  भारत के 46 प्रतिशत से अधिक कार्यबल के कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों में संलग्न होने के कारण, मृदा स्वास्थ्य खाद्य प्रणालियों और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करता है।  स्वस्थ मिट्टी फसल की अधिक पैदावार सुनिश्चित करने में सहायक होती है और बाहरी कृषि आदानों पर निर्भरता को कम करती है।

मृदा स्वास्थ्य के महत्व को ध्यान में रखते हुए, खेत बचाओ अभियान (केबीए) – रबी 2026,  “स्वस्थ धरा, समृद्ध किसान”  की परिकल्पना 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक चलने वाले एक राष्ट्रव्यापी अभियान के रूप में की गई है। यह अभियान समन्‍वय आधारित दृष्टिकोण अपनाता है,   जिसके तहत संतुलित एवं विवेकपूर्ण उर्वरक उपयोग तथा   टिकाऊ  पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभागों, अनुसंधान संस्थानों और जमीनी स्तर पर कार्यरत कर्मियों को एक  साथ लाया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य टिकाऊ  कृषि को बढ़ावा देना, मृदा स्वास्थ्य में सुधार करना और कृषि संसाधनों के  विवेकपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करना है। इसके साथ ही, यह प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के कुशल उपयोग  को भी बढ़ावा देता है। यह अभियान पोषक तत्वों के असंतुलित प्रयोग, मिट्टी में जैविक पदार्थों की घटती मात्रा, खेती की बढ़ती लागत  और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण जैसे सरोकारों पर गौर करता है।

इन पहलों में पुनर्योजी कृषि पद्धतियाँ (अर्थात् ऐसी कृषि विधियाँ जो मृदा स्वास्थ्य को बहाल करने और जैव विविधता को बढ़ाने पर केंद्रित हैं), क्षमता निर्माण, कृषि यंत्रीकरण और उन्नत कृषि प्रौद्योगिकियों पर भी बल दिया गया है।

इस अभियान में 34 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों, 700 से अधिक जिलों तथा 50,000 गाँवों को कवर किया जा रहा है।   इसका उद्देश्य समन्वित गतिविधियों के माध्यम से लगभग 50 लाख किसानों तक पहुँच कायम करना है।  राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुँच को सुदृढ़ बनाने तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने के  लिए  उर्वरकों की अधिक खपत वाले 100 जिलों  को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं।

अपनी  व्यापक पहुँच और खेत स्तर पर संचालित गतिविधियों के माध्यम से यह अभियान किसानों, वैज्ञानिकों और कृषि संस्थानों को  एक  साथ लाने का प्रयास करता है। इस समन्वित प्रयास से कृषि संबंधी निर्णय तथ्‍यपरक रूप से लेने तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को  अधिकाधिक अपनाने को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।

खेत बचाओ अभियान

 (1 से 30 जून 2026 तक)

खेत बचाओ अभियान की शुरुआत देशव्यापी स्तर पर 1 जून 2026 को एक महीने तक चलने वाले अभियान के रूप में की गई थी।  इसका उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य, उर्वरकों के संतुलित उपयोग और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना था। इस अभियान के तहत किसानों के साथ सीधे जमीनी स्तर पर जुड़ाव स्थापित करने के लिए 1,657 बहुविषयक टीमों को तैनात किया गया। इस पहल के अंतर्गत 92.44 लाख किसानों के लिए 1.34 लाख से अधिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। साथ ही, हरित खाद और जैव उर्वरकों पर 6,685 प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए, जिनसे 4.94 लाख किसानों को लाभ मिला। इसके अतिरिक्त, खेतों   में 3,167 व्‍यावहारिक प्रदर्शन और 4,779 संवादात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को व्यावहारिक जानकारी एवं प्रशिक्षण प्रदान किया गया। इसके अलावा उर्वरक एवं कृषि आदान विक्रेताओं की भागीदारी सहित 4,916 जनप्रतिनिधि सम्मेलनों ने जमीनी स्तर पर सहभागिता को और सुदृढ़ किया। कुल मिलाकर, इस अभियान के माध्यम से लगभग 1.07 करोड़ किसानों और अन्य हितधारकों तक सीधे पहुँच बनाई गई, जबकि सोशल मीडिया के माध्यम से लगभग 4.5 करोड़ नागरिकों तक पहुँच कायम की गई।

खेत बचाओ अभियान- रबी 2026  के मुख्य उद्देश्य  

इस अभियान का उद्देश्य किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि कृषि आदानों के उपयोग की दक्षता में सुधार हो और जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा मिले।

  • संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन : सामान्य उर्वरक सिफारिशों (जीएफआर) पर आधारित पोषक तत्व प्रबंधन तथा उर्वरकों के उपयोग के 4R सिद्धांत— सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान को बढ़ावा देना।  यह पद्धति रबी फसलों की आवश्यकताओं के अनुरूप उर्वरकों के संतुलित एवं कुशल उपयोग को सुनिश्चित करती है।
  • प्राकृतिक खेती: जागरूकता अभियानों, क्षमता निर्माण, प्रदर्शनों और किसानों के बीच आपसी अनुभवों के आदान – प्रदान के  माध्यम से प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।
  • एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम): जागरूकता, क्षमता निर्माण और प्रदर्शनों के माध्यम से एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन तथा उपयुक्त ऑर्गेनिक एवं जैविक आधारित आदानों के उपयोग को बढ़ावा देना।
  • फसल अवशेष प्रबंधन:  सूचना, शिक्षा एवं संचार (आईईसी) गतिविधियों के माध्यम से टिकाऊ फसल अवशेष प्रबंधन को बढ़ावा देना तथा पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फसल अवशेषों को जलाने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना।
  • फसल विविधीकरण: जागरूकता, क्षमता निर्माण और प्रदर्शनों के माध्यम से तिलहन एवं दलहन उत्पादन मजबूत करना, फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना तथा धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों का उत्पादक उपयोग बढ़ाना।
  • जलवायु अनुकूल कृषि: महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में  जलवायु अनुकूल फसल एवं संसाधन प्रबंधन को समर्थन देने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप आकस्मिक योजनाओं का कार्यान्वयन करना।
  • कृषि योजनाओं के बारे  में जागरूकता: कृषि से संबंधित सरकारी योजनाओं और उनसे प्राप्त होने वाले लाभों के बारे में जागरूकता फैलाना।
  • एकीकृत कीट प्रबंधन एवं कीटनाशकों का जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग : कीटनाशकों की गुणवत्ता और उनके सुरक्षित उपयोग के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना, एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) को प्रोत्साहित करना तथा सुरक्षित, आवश्‍यकता पर आधारित और लेबल पर दिए गए निर्देशों के अनुरूप कीटनाशकों के उपयोग को बढ़ावा देना।  साथ ही, कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग को हतोत्साहित करना।

ढैंचा और मूँग की खेती से मिट्टी को अधिक स्वस्थ बनाने का मार्ग प्रशस्‍त

बिहार के पूर्वी चंपारण के धान उत्पादक क्षेत्रों में उर्वरकों के उपयोग का प्रबंधन करते हुए मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना किसानों के लि ए एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है। मिट्टी में जैविक कार्बन की घटती मात्रा और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी इस चुनौती को और बढ़ा  देती है। खेत बचाओ अभियान-2026 के तहत, आईसीएआर –  महात्‍मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान   (एमजीआईएफआरआई), मोतिहारी, बिहार ने इस बात को रेखांकित किया कि हरित खाद और जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण  मृदा  स्वास्थ्य को बनाए रखने में किस प्रकार सहायक हो सकते हैं।

बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के रक्सौल प्रखंड की पंटोका पंचायत में आयोजित किसान आउटरीच कार्यक्रम के दौरान किसानों को अनु शंसित उर्वरक मात्राओं के साथ गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जैव उर्वरकों और फसल अवशेषों के समन्वित उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया गया। चर्चा के दौरान धान की नर्सरी के प्रबंधन तथा फसल अवशेषों को जलाने के विकल्पों पर विचार विमर्श किया गया। इन विकल्पों में कम्पोस्ट तैयार करना, मल्चिंग, और वर्मी कम्पोस्ट तैयार करना शामिल हैं।

वैज्ञानिकों ने धान आधारित फसल प्रणालियों में ढैंचा (सेसबानिया प्रजाति) और ग्रीष्मकालीन मूँग की खेती के उपयोग पर भी जोर दिया। ढैंचा प्रति हेक्टेयर लगभग 50–60 किलोग्राम नाइट्रोजन का योगदान कर सकता है, जो 110–130 किलोग्राम यूरिया के बराबर है। वहीं, ग्रीष्मकालीन मूँग प्रति हेक्टेयर 25–30 किलोग्राम नाइट्रोजन का योगदान कर सकती है, जो 55–65 किलोग्राम यूरिया के बराबर है। ये फसलें मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा और जैविक गतिविधियों में सुधार करते हुए उर्वरकों की आवश्यकता को कम करने में सहायक हो सकती हैं।

इस कार्यक्रम में 41 महिलाओं सहित कुल 62 किसानों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने हरित खाद  के उपयोग और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को अपनाने की इच्छा व्यक्त की।

अभियान को किसानों तक पहुंचाना: संस्थागत भूमिकाएं और जिम्मेदारियाँ

  • राज्‍य / केंद्र शासित प्रदेश  के  कृषि विभाग : अभियान की योजना बनाने और उसे कार्यान्वित करने, आवश्यक निर्देश जारी करने, तैयारी संबंधी बैठकें आयोजित  करने, जिला स्‍तरीय कार्यक्रमों को अनुमोदित करने, फील्‍ड में काम करने वाले कर्मियों एवं समन्‍वय  करने वाले साझेदारों को संगठित करने, योजनाओं एवं सेवाओं तक पहुँच सुगम बनाने तथा रिपोर्टों का संकलन करने के लिए  उत्तरदायी होंगे।
  • कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसियाँ (एटीएमए) एवं जिला कृषि प्रशासन  : जिला, प्रखंड और ग्राम स्तर पर अभियान की गतिविधि यों का समन्वय करने, सूक्ष्म योजनाएँ तैयार करने, किसानों एवं सामुदायिक संस्थानों को संगठित करने, कार्यक्रम स्थलों, खेतों तक प हुँच, सूचना, आईईसी सामग्री तथा अन्य व्यवस्थाएँ उपलब्ध कराने और उपस्थिति एवं गतिविधियों का रिकॉर्ड बनाए रखने के लिए  उत्तरदायी होंगे।
  • आईसीएआर  संस्थानों, कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (एटीएआरआई), कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) एवं कृषि विश्वविद्यालय (ज्ञान साझेदार): ये संस्थान विज्ञान आधारित  तकनीकी मार्गदर्शन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप सिफारिशें प्रदान करेंगे, रिसोर्स पर्सन  को नामित करेंगे, प्रशिक्षण में सहयोग देंगे, अनुरोध किए जाने पर प्रदर्शन तथा किसान  – वैज्ञानिक संवाद आयोजित करेंगे , तकनीकी आईईसी सामग्री और परामर्श संबंधी दिशा-निर्देश तैयार या प्रमाणित करेंगे, अनुसंधान संबंधी साक्ष्य साझा करेंगे और सीख का दस्तावेजीकरण करेंगे। इनकी भूमिका राज्‍य स्‍तरीय कार्यान्‍वयन, प्रशासनिक नियंत्रण, प्रवर्तन या व्यय संबंधी उत्तरदायित्वों तक विस्तारित नहीं होगी, जब तक कि इसके लिए अलग से प्राधिकृत न किया गया हो।

इस अभियान के अंतर्गत केवीके और एटीएमए को शामिल करते हुए 4,150 टीमों की परिकल्पना की गई है।   इसके कार्यान्वयन में 12,000 से अधिक वैज्ञानिकों और एटीएमए के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के सहयोग की अपेक्षा है।   एटीएमए और आइसीएआर के माध्यम से इस अभियान का लक्ष्य लगभग एक करोड़ प्रतिभागियों तक पहुँच कायम करना है।

  • अन्य राज्य विभाग एवं एजेंसियाँ : बागवानी, मृदा एवं जल संरक्षण, सिंचाई, पशुपालन, ग्रामीण विकास, सहकारिता, पंचायती राज,  पर्यावरण, कृषि विपणन और संबद्ध क्षेत्रों के लिए उत्तरदायी विभागों एवं एजेंसियों के समन्वित सहयोग के माध्यम से, अपने अपने  कार्यक्षेत्र के अनुसार अभियान की गतिविधियों को समर्थन एवं सुविधाएँ प्रदान करना।
  • किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), स्वयं सहायता समूह (एस एच  जी), प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ (पीएसीएस), कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) एवं प्रगतिशील किसान : किसानों को स्था  नीय स्तर पर संगठित करने, आपसी अनुभवों के आदान प्रदान,  प्रदर्शन स्थलों के भ्रमण तथा प्रमाणित कृषि परामर्शों का किसानों के बीच प्रसार करने में सहयोग देना।
  • मीडिया एवं संचार साझेदार:  स्थानीय मीडिया, सामुदायिक रेडियो, व्हाट्सऐप,  किसान सारथी  तथा अन्य उपयुक्त संचार माध्यमों के जरिए अभियान के अनुमोदित संदेशों का प्रसार करना। साथ ही, यह सुनिश्चित करना कि किसानों के साथ साझा की जाने वाली  कृषि संबंधी जानकारी सटीक एवं सत्यापित हो।

किसानों में जागरूकता बढ़ाना एवं उन तक पहुँच सुनिश्चित करना  

यह अभियान किसानों में जागरूकता बढ़ाने, क्षमता निर्माण, खेतों में प्रदर्शन, व्यावहारिक अनुभव प्रदान करने हेतु भ्रमण तथा बेहतर  खेती के तरीकों को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल आउटरीच, तकनीकी ज्ञान को सुदृढ़ करने तथा किसानों के बीच अभियान के संदेशों का व्यापक प्रसार करने जैसी गतिविधियों को एकीकृत करता है।

विभिन्न गतिविधियों के बारे में जागरूकता का प्रसार

इस अभियान का उद्देश्य किसानों में सामान्य उर्वरक सिफारिशों –  जीएफआर  पर आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, प्राकृतिक खेती,  एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम), फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) तथा तिलहन एवं दलहन उत्पादन की उन्नत तकनीकों के  प्रति जागरूकता और समझ बढ़ाना है। इसके अतिरिक्त, यह सूखा प्रभावित जिलों में आकस्मिक योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु मानक  संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) तथा कृषि से संबंधित प्रमुख सरकारी योजनाओं की जानकारी का भी प्रसार करता है।

  • आईसीएआर संस्‍थानों की  950 टीमों में से प्रत्येक को प्रति सप्ताह तीन गाँवों के दौरे करने का दायित्व सौंपा गया है,  जबकि केवीके की 700 टीमों से प्रति सप्ताह चार दौरे किए जाने की अपेक्षा है। प्रत्येक दौरे में 100 किसानों की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया है।
  • पाँचसप्ताह की अवधि में इस अभियान के तहत 5,650 जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने की परिकल्पना की गई है,  जिनके माध्यम से अनुमानित रूप से 28.25 लाख किसानों तक पहुँच कायम करने का लक्ष्य है।

किसानों का क्षमता निर्माण

प्रशिक्षण कार्यक्रमों की रूपरेखा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम), फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम), प्राकृतिक खेती,  तिलहन एवं दलहन उत्पादन की उन्नत पद्धतियों, एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) तथा अन्य प्रासंगिक विषयगत क्षेत्रों  में किसानों के ज्ञान और तकनीकी क्षमताओं को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से तैयार की गई है।

  • आईसीएआर संस्‍थानों की  950 टीमों में से प्रत्येक से प्रति सप्ताह एक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की अपेक्षा है,  जबकि केवीके की 700 टीमों को प्रति सप्ताह दो प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने का दायित्व सौंपा गया है। प्रत्येक कार्यक्रम में  40 प्रतिभागियों की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया है।
  • पाँच सप्ताह की अवधि में इस अभियान के तहत 11,750 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की परिकल्पना की गई है,  जिनके माध्यम से अनुमानित रूप से 4.70 लाख किसानों तक पहुँच कायम करने का लक्ष्य है।

किसानों के खेतों में प्रदर्शन

आईसीएआर के संस्‍थान और कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) उन्नत कृषि तकनीकों की क्षमता और उनके लाभों को प्रदर्शित करने के  लिए चयनित किसानों के खेतों में प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित करते हैं।   इन प्रदर्शनों के माध्यम से किसान वैज्ञानिक उपायों का आकलन कर सकते हैं और उनके परिणामों की तुलना अपनी मौजूदा कृषि पद्ध तियों से कर सकते हैं। इनमें ग्रीन अमोनिया, फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम), एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम), एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम), प्राकृतिक खेती, तिलहन एवं दलहनों के लिए एकीकृत फसल प्रबंधन (आईसीएम), जैव उर्वरक तथा ऑर्गेनिक तथा जैविक आधारित आदानों जैसे प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।

  • इसअभियान के तहत खेतों में 50,000  व्‍यावहारिक प्रदर्शन आयोजित करने की परिकल्पना की गई है, जिनमें से 40,000 केवीके  और 10,000 प्रदर्शन आईसीएआर के संस्थानों द्वारा आयोजित किए जाएंगे।
  • प्रत्येकप्रदर्शन में 20 किसानों की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया है। इस प्रकार,  इस पहल के माध्यम से अनुमानित रूप  से 10 लाख किसानों तक पहुँच कायम करने का लक्ष्य है।

खेत दिवस, फसल कटाई दिवस एवं अनुभवात्मक भ्रमण

खेत दिवस, फसल कटाई कार्यक्रम और प्रदर्शन स्थलों के अनुभवात्मक भ्रमण अभियान “आँखों देखी पर भरोसा  करने” के दृष्टिकोण का अभिन्न हिस्सा हैं। इन गतिविधियों के माध्यम से किसानों को उन्नत कृषि तकनीकों को प्रत्यक्ष रूप से देखने,  उनके व्यावहारिक उपयोग को समझने तथा खेतों की वास्तविक परिस्थितियों में उनके लाभों का आकलन करने का अवसर मिलता है।

  • 1,650 टीमों में से प्रत्‍येक को  फसल के मौसम के दौरान तीन खेत दिवस या फसल कटाई दिवस तथा दो अनुभवात्मक भ्रमण आयोजित करने का दायित्व सौंपा ग या है। प्रत्येक गतिविधि में लगभग 125 किसानों की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया है।
  • इन गतिविधियों के माध्यम से सामूहिक रूप से लगभग 10 लाख किसानों तक पहुँच कायम किए जाने की अपेक्षा है।

सोशल मीडिया आउटरीच

डिजिटल प्लेटफॉर्म बेहतर कृषि पद्धतियों, तकनीकी परामर्शों और अभियान से संबंधित गतिविधियों की जानकारी प्रसारित करने के एक  महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में कार्य करते हैं। इस प्रकार, ये अभियान की पहुँच को खेतों में किए जाने वाले प्रत्यक्ष हस्तक्षेपों से आगे बढ़ाकर व्यापक स्तर तक विस्तारित करते हैं।

  • व्हाट्सऐप, फेसबुक, एक्स (X) और अन्य उपयुक्त डिजिटल मंचों के माध्यम से दैनिक अपडेट का प्रसार करने के लिए टीमों का  गठन करना।
  • इस अभियान के तहत सोशल मीडिया के माध्यम से 1.5 करोड़ किसानों तक पहुँच कायम करने का लक्ष्य रखा गया है,  जबकि समग्र डिजिटल पहुँच को बढ़ाकर 2.5 करोड़ तक करने की परिकल्पना की गई है।

किसानों को योजनाओं एवं सेवाओं से जोड़ना

यह अभियान किसानों को प्रमुख कृषि योजनाओं,  सेवाओं और पद्धतियों से परिचित कराने के लिए लक्षित जागरूकता गतिविधियाँ  संचालित करता है। इनमें पीएम –   किसान,  कीटनाशकों का संतुलित उपयोग, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, उर्वरकों की बिक्री से संबंधित लागू व्यवस्था तथा व्यापार सम  झौतों के संभावित लाभों की जानकारी देना शामिल है। इसके अतिरिक्त, यह किसान पहचान पत्र  बनाने  एवं उन्हें अद्यतन करने में   सहायता प्रदान करता है और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई)  के अंतर्गत फसल बीमा कवरेज से संबंधित जानकारी   का प्रसार करता है। साथ ही, किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना के तहत संतृप्ति अभियान चलाकर पात्र किसानों को   संस्थागत ऋण की सुविधा प्राप्त करने में सहायता प्रदान की जाती है।

सामूहिक रूप से, इन पहलों का उद्देश्य सरकारी सहायता तंत्र के प्रति किसानों की जागरूकता बढ़ाना तथा आवश्यक कृषि सेवाओं,  औपचारिक ऋण और जोखिम न्यूनीकरण के साधनों तक उनकी पहुँच में सुधार करना है। इसके माध्यम से कृषि आजीविका के  संस्थागत एवं वित्तीय आधार को और सुदृढ़ किया जा सकेगा।

टिकाऊ कृषि की नींव को सुदृढ़ बनाना

खेत बचाओ अभियान  – रबी 2026  मृदा स्वास्थ्य और टिकाऊ  संसाधन प्रबंधन को कृषि विकास के केंद्र में स्थापित करने का  इच्‍छुक है।  वैज्ञानिक संस्थानों, सरकारी विभागों, विस्तार तंत्रों और कृषक समुदायों के बीच समन्वय के माध्यम से यह अभियान वैज्ञानिक ज्ञान को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि पद्धतियों में परिवर्तित करने का प्रयास करता है। इसका एकीकृत  दृष्टिकोण किसानों में जागरूकता, क्षमता निर्माण, खेतों में प्रदर्शन और डिजिटल आउटरीच जैसी गतिविधियों को शामिल करते हुए उन्नत कृ षि पद्धतियों को बढ़ावा देता है। संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, प्राकृतिक खेती और इनपुट के कुशल उपयोग के साथ ही साथ यह  अभियान फसल विविधीकरण, फसल अवशेष प्रबंधन, एकीकृत कीट प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन पर भी विशेष बल देता है।  संस्थागत समन्वय और किसानों की भागीदारी पर इसका विशेष ध्यान जमीनी स्तर पर कृषि विस्तार तंत्र को सुदृढ़ करने तथा कृषि  सेवाओं तक किसानों की पहुँच बढ़ाने में भी सहायक है।

ये पहलें संसाधनों के कुशल उपयोग पर आधारित कृषि प्रणालियों, स्वस्थ मृदा और सुदृढ़ कृषि आजीविका को बढ़ावा देती हैं तथा विक सित भारत  के व्यापक दृष्टिकोण को साकार करने में योगदान देती हैं।  इसके अतिरिक्त, यह अभियान विशेष रूप से शून्य भुखमरी (एसडीजी 2) और जलवायु कार्रवाई (एसडीजी 13) के लक्ष्यों सहित सतत  विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की दिशा में प्रगति में सहायता प्रदान करता है

Source : https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?id=160669&NoteId=160669&ModuleId=3&reg=3&lang=2

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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