मत्स्य पालन

भारत में मत्स्य पालन: एक उभरता हुआ आर्थिक और पोषणगत क्षेत्र

रीमा ठाकुर, डॉ. बी. नाइटिंगेल देवी, डॉ.वंदना भगत, डॉ. अरविंद कुमार नंदनवार

प्रस्तावना :  भारत जैसे विकासशील और कृषि-प्रधान देश में आजीविका के पारंपरिक साधनों में खेती, पशुपालन और वानिकी के साथ-साथ मत्स्य-पालन एक महत्वपूर्ण एवं तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र बन चुका है। प्राचीन काल से ही नदियाँ, तालाब, झीलें, समुद्र और तटीय क्षेत्रों की प्रचुरता के कारण मछलियों का भोजन, व्यापार और सांस्कृतिक महत्व रहा है। भारतीय साहित्य और इतिहास में भी मछली का वर्णन मिलता है, जो दर्शाता है कि यह केवल भोजन का ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रतीक रहा है। 21वीं सदी के बदलते आर्थिक परिदृश्य, बढ़ती जनसंख्या, पोषण असंतुलन और वैकल्पिक रोजगार की आवश्यकता ने मत्स्य-पालन को एक टिकाऊ, लाभदायक और वैज्ञानिक दृष्टि से सुदृढ़ व्यवसाय के रूप में स्थापित किया है। विशेष रूप से ग्रामीण, आदिवासी एवं तटीय क्षेत्रों के लिए यह आय सृजन का विश्वसनीय माध्यम बन रहा है। सीमित भूमि वाले किसान, बेरोजगार युवा, स्वयं सहायता समूह, और महिला उद्यमी भी इस क्षेत्र में सफल हो रहे हैं, क्योंकि इसमें अपेक्षाकृत कम भूमि, सीमित निवेश, तथा वैज्ञानिक प्रबंधन द्वारा उच्च लाभ की संभावनाएँ होती हैं।

सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीकों, उन्नत प्रजनन विधियों, गुणवत्तापूर्ण फीड, जल प्रबंधन और बाजार तक पहुँच की सुविधाओं के कारण आज भारत विश्व मत्स्य उत्पादन में अग्रणी राष्ट्रों में शामिल है। इसी कारण इसे ब्लू इकोनॉमी का एक प्रमुख स्तंभ माना जाता है, जो न केवल देश की खाद्य सुरक्षा और पोषण आवश्यकताएँ पूरी करता है, बल्कि निर्यात और विदेशी मुद्रा अर्जन में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।

मत्स्य पालन का महत्व

  1. पोषण का उत्कृष्ट स्रोत – मछली उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन डी  और खनिजों का बेहतरीन स्त्रोत है।
  2. रोजगार सृजन – लगभग 3 करोड़ से अधिक लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस क्षेत्र से जुड़े हैं।
  3. राष्ट्रीय आय में योगदान – मत्स्य उत्पाद भारत के कृषि निर्यात में एक बड़ा हिस्सा रखते हैं।
  4. ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन – तालाब, नहर, झील एवं जलाशयों के उपयोग से छोटे किसान भी अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं।

भारत में मत्स्य पालन की वर्तमान स्थिति (विस्तारित विवरण)

विश्व स्तर पर भारत दूसरे सबसे बड़े मत्स्य उत्पादक देशों में शामिल है और यह उपलब्धि देश की विशाल जल संपदा, अनुकूल मौसम, उन्नत मत्स्य-प्रबंधन तकनीकों तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिणाम है। वर्तमान समय में भारत ने अक्वाकल्चर एवं इनलैंड फिश प्रोडक्शन में उल्लेखनीय वृद्धि हासिल की है। नदियों, झीलों, तालाबों, जलाशयों, नहरों और बाँधों की प्रचुरता ने भारत को मत्स्य-उत्पादन के लिए अद्भुत प्राकृतिक आधार प्रदान किया है। तकनीकी प्रगति, जैसे – हाइपोफिसेशन (प्रेरित प्रजनन), एकीकृत मत्स्य-कृषि प्रणाली, बायो-फ्लॉक तकनीक, पुनः परिसंचारी जलीय कृषि प्रणाली, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन, एवं पोषक तत्वों से युक्त वैज्ञानिक फीड-फॉर्मुलेशन ने उत्पादन क्षमता में तेजी से वृद्धि की है। साथ ही स्वास्थ्य-प्रबंधन, जल-गुणवत्ता नियंत्रण, रोग-नियंत्रण उपाय और बेहतर मार्केट-लिंकज ने मत्स्य-उद्योग को अधिक टिकाऊ और लाभदायक बनाया है। निर्यात की दृष्टि से देखा जाए, तो झींगा , टाइगर प्रॉन, भारतीय निर्यात का प्रमुख हिस्सा हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में उच्च मांग है। झींगा कृषि का विकास आज भारत के मत्स्य-निर्यात उद्योग का मुख्य आधार बन चुका है और यह विदेशी मुद्रा अर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। भारत के ‘ब्लू इकॉनमी मिशन’ में भी समुद्री मत्स्य पालन और समुद्र आधारित मूल्यवर्धन उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई है। केंद्र एवं राज्य सरकारें प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, नीली क्रांति, मत्स्य विकास बोर्ड तथा कई प्रशिक्षण एवं वित्तीय सहायता परियोजनाओं के माध्यम से किसानों, युवाओं और महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहन दे रही हैं। इसके परिणामस्वरूप न केवल उत्पादन बढ़ा है, बल्कि रोजगार, ग्रामीण विकास, आजीविका – सुरक्षा और पोषण-सुरक्षा में भी वृद्धि हुई है।

सरकारी प्रयास और योजनाएँ

सरकार ने मत्स्य-पालन को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं जैसे:

  • प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (PMMSY) –

प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (PMMSY) भारत सरकार की एक प्रमुख योजना है, जिसे मत्स्य विभाग, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी) तथा राज्य सरकारों के सम-सहयोग से लागू किया जा रहा है। यह योजना मत्स्य-पालन, एक्वाकल्चर तथा मत्स्यपार उत्पाद श्रृंखला को वैज्ञानिक, समेकित और टिकाऊ तरीके से विकसित करने पर केंद्रित है।

  • राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी)

राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी) भारत सरकार के मंत्रालय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी के अंतर्गत कार्य करता एक प्रमुख संस्थान है। इसकी स्थापना मुख्य रूप से भारत में मत्स्य पालन, एक्वाकल्चर तथा मत्स्य संबंधित गतिविधियों को वैज्ञानिक, समेकित और टिकाऊ तरीके से बढ़ावा देने के लिए की गई है।

  • मछुआरा बीमा योजना

यह योजना विशेष रूप से मछुआरों, मत्स्य-किसानों, मत्स्य-कर्मियों एवं मत्स्य-उद्योग से जुड़े व्यक्तियों (पुरुष एवं महिलाएँ) के लिए है। इसे राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी) द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है, और यह प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना का एक उप-घटक है।

  • नीली क्रांति

नीली क्रांति भारत में मत्स्य पालन के विकास और मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए चलाया गया एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम है। इसे वर्ष 2015–16 में शुरू किया गया और इसका उद्देश्य मत्स्य क्षेत्र को आधुनिक, तकनीकी और वैज्ञानिक आधार प्रदान करना था। नीली क्रांति के अंतर्गत तालाब निर्माण, जलाशयों का विकास, मत्स्य बीज उत्पादन और आधुनिक पालन तकनीकों को बढ़ावा दिया गया। यह कार्यक्रम इनलैंड फिशरीज, मरीन फिशरीज और कोस्टल एक्वाकल्चर – तीनों क्षेत्रों के समग्र विकास पर केंद्रित था। इस योजना ने बायोफ्लॉक, केज कल्चर, पेन कल्चर जैसी नई तकनीकों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मछुआरों और किसानों को प्रशिक्षण, ऋण, उपकरण और बीमा जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं।

इन योजनाओं के माध्यम से वित्तीय सहायता, तकनीकी प्रशिक्षण और बुनियादी संरचना का विकास किया जा रहा है।

निष्कर्ष

मत्स्य-पालन भारत की ग्रामीण, तटीय तथा आदिवासी अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण और संभावनापूर्ण क्षेत्र है। यह न केवल पौष्टिक एवं सुलभ प्रोटीन स्रोत उपलब्ध कराता है, बल्कि कृषि एवं सहयोगी व्यवसायों के साथ एकीकृत होकर किसानों की आय में वृद्धि, महिला सशक्तिकरण तथा उद्यमिता विकास में भी योगदान देता है। देश में व्यापक जल संसाधनों, अनुकूल जलवायु तथा विविध जैविक क्षमता के कारण इस क्षेत्र में नवाचार, वैज्ञानिक तकनीकों और उद्यमशीलता की अपार संभावनाएँ निहित हैं। यदि वैज्ञानिक शोध, नीतिगत समर्थन, तकनीकी निवेश, पर्यावरणीय संरक्षण तथा उद्यमिता विकास को निरंतर प्रोत्साहन मिलता रहा, तो मत्स्य-पालन क्षेत्र भारत की आर्थिक, पोषणीय और सामाजिक प्रगति में एक सशक्त स्तंभ के रूप में उभर सकता है।

लेखक :
रीमा ठाकुर
, डॉ. बी. नाइटिंगेल देवी, डॉ.वंदना भगत, डॉ. अरविंद कुमार नंदनवार
(स्वर्गीय श्री पुनाराम निषाद मत्स्य पालन महाविद्यालय, कवर्धा)

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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