

परिचयः ऑयल पाम, जिसे वैज्ञानिक भाषा (Elaeis guineensis) कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण तैलीय फसल है जो मुख्य रूप से खाद्य तेल उत्पादन के लिए उगाई जाती है। इसके फल से मिलने वाला पाम ऑयल विश्व का सबसे अधिक उपयोग में लाया जाने वाला वनस्पति तेल है। इसमें संतृप्त और असंतृप्त वसा, विटामिन A और जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह तेल न केवल खाने में प्रयोग होता है, बल्कि साबुन, सौंदर्य प्रसाधन, बायोडीजल और औद्योगिक उत्पादों में भी व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। ऑयल पाम का पौधा उच्च उत्पादकता और लंबी उम्र (25-30 वर्ष तक उत्पादन) के लिए जाना जाता है। यह मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया, नाइजीरिया और अब भारत के केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। सरकार द्वारा इस फसल को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी और तकनीकी सहायता भी दी जा रही है, और इसकी उच्च मांग के कारण किसानों को बाजार में अच्छा मूल्य (औसतन 80-120 प्रति किलोग्राम कच्चा फल) मिल रहा है। ऐसे में यह खेती किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बनती जा रही है। (Cultivation of Oil Palm)

जलवायुः तेल पाम एक उष्णकटिबंधीय फसल है, जिसे बेहतर उत्पादन के लिए विशेष प्रकार की जलवायु की आवश्यकता होती है: तेल पाम के लिए आदर्श तापमान 24° से 32° के बीच होता है। इससे कम या अधिक तापमान पौधे की वृद्धि को प्रभावित कर सकता है। सालाना 1500 मिमी से 2500 मिमी तक की नियमित और संतुलित वर्षा आवश्यक है। बहुत अधिक सूखा या अत्यधिक वर्षा हानिकारक हो सकती है। प्रतिदिन कम से कम 5-7 घंटे तेज धूप आवश्यक होती है, क्योंकि यह पौधे की प्रकाश संश्लेषण (चीवजवेलदजीमेपे) प्रक्रिया में सहायक होती है। हवा में पर्याप्त आर्द्रता फसल के लिए लाभकारी होती है, खासकर शुरुआती वर्षों में।
मिट्टी तेल पाम की अच्छी पैदावार के लिए उपयुक्त मिट्टी का चयन बहुत जरूरी है: बलुई दोमट चिकनी दोमट या गहरी जलोढ़ मिट्टी उपयुक्त होती है। मिट्टी में पानी का निकास अच्छा होना चाहिए, क्योंकि पानी का ठहराव जड़ों को सड़ने का खतरा बढ़ाता है। मिट्टी का pH 5.0 से 6.5 के बीच होना चाहिए। अधिक अम्लीय या क्षारीय मिट्टी तेल पाम के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। जैविक कार्बन और पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी पौधे की जड़ों को मजबूत बनाती है और उपज को बढ़ाती है।
प्रजातियाँ और किस्में : तेल पाम की तीन प्रमुख किस्में होती हैं:
1) ड्यूराः गाढ़ा छिलका, कम तेल।
2) पिसिफेराः बिना बीज के, आमतौर पर नर पौधे।
3) टेनेराः ड्यूरा और पिसिफेरा का संकर रूप, जो सबसे अधिक तेल देती है। यही किस्म खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

भारत में प्रचलित तेल पाम की किस्मः
टेनेराः सबसे प्रमुख किस्म यह ड्यूरा और पिसिफेरा किस्मों का संकर रूप है। इसमें तेल की मात्रा अधिक होती है और फल की गिरी (मितदमस) पतली होती है। यह उच्च उपज देने वाली किस्म मानी जाती है। भारत सरकार और विभिन्न राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा इसी किस्म की खेती को प्रोत्साहित किया जाता है।
टेनेरा किस्म की विशेषताएँः
| तेल की मात्रा | 20% से 28% क्रूड ऑयल पाम |
| पहली उपज | रोपण के 3-4 साल बाद |
| औसत उपज प्रति हेक्टेयर | 15-25 टन ताजे फल गुच्छे |
| फल का आकार | बड़ा और गूदा मोटा |
| उपयोगिता | खाद्य तेल, सौंदर्य प्रसाधन, बायोफ्यूल |
भूमि की तैयारी तेल पाम की अच्छी उपज के लिए खेत की समुचित तैयारी जैसे गर्म एवं आर्द्र जलवायु और पौधों की सही विधि से रोपाई अत्यंत आवश्यक होती है। चूंकि यह दीर्घकालिक फसल है (25-30 वर्षों तक उत्पादन देती है), इसलिए शुरुआत में की गई मेहनत और सावधानी आगे चलकर अधिक लाभदायक होती है।
नर्सरी की तैयारीः अच्छी गुणवत्ता वाले संकर बीज (जैसे ज्मदमतं किस्म) ही उपयोग करें। बीजों को अंकुरित करने के लिए गर्म और नम वातावरण (30-35°) की आवश्यकता होती है। अंकुरित बीजों को 25.35 सेमी आकार के पॉलीबैग्स में बोया जाता है जिसमें उपयुक्त मात्रा में मिट्टी, गोबर और बालू का मिश्रण होता के पौधों को 10-12 महीने तक नर्सरी में ही रखा जाता है जब तक वे रोपण योग्य नहीं हो जाते।
खेत की तैयारीः साफ-सफाईः खेत से खरपतवार, झाड़ियों और पत्थरों को हटाएं। मिट्टी को भुरभुरी और समतल बनाने के लिए 2-3 बार अच्छी तरह जुताई करें। पानी के ठहराव से बचने के लिए खेत को समतल करें या हल्की ढलान रखें। तेल पाम को पानी का ठहराव पसंद नहीं, इसलिए जलनिकास की अच्छी व्यवस्था करें।
गड्ढे की खुदाई और भराईः प्रत्येक पौधे के लिए 60 x 60 x 60का गड्ढा खोदा जाता है। गड्ढे को अच्छी मिट्टी, गोबर की खाद (10-15 किग्रा), नीम खली (250 ग्राम प्रति गड्डा) और फास्फेट खाद के मिश्रण से भरें। दीमक आदि से बचाव के लिए गड्ढे में क्लोरोपाइरीफॉस (20% EC 5 मिली/लीटर पानी) का छिडकाव किया जा सकता है।
रोपाई का समय और विधिः रोपाई का उपयुक्त समयः मानसून की शुरुआत (जून से अगस्त) सबसे अच्छा समय होता है क्योंकि नमी अधिक होती है। पौधों को 9 मीटर x 9 मीटर की त्रिकोणीय पद्धति में रोपें। इससे प्रति हेक्टेयर लगभग 143 पौधे लगाए जा सकते हैं।
रोपण के बाद देखभालः रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। पहले साल नियमित सिंचाई जरूरी होती है। पौधों के चारों ओर सूखी घास या पत्तियों से मल्चिग करें ताकि नमी बनी रहे और खरपतवार न उगें। सहारे के लिए खूंटीः पौधों को तेज हवा से बचाने के लिए लकड़ी की खूंटी से सहारा दें।
खाद प्रबंधनः तेल पाम की खेती में संतुलित पोषण के लिए खाद का सही समय और मात्रा बेहद महत्वपूर्ण होती है। प्रथम वर्ष में प्रति पौधे लगभग 150 ग्राम नाइट्रोजन, 60 ग्राम फास्फोरस और 200 ग्राम पोटाश (प्रति हेक्टेयर) देना चाहिए, जो चार बराबर हिस्सों में जून, सितंबर, दिसंबर और मार्च के महीनों में दिया जाता है। जैसे-जैसे पौधा बढ़ता है, खाद की मात्रा भी बढ़ती है, दूसरे वर्ष में नाइट्रोजन 300 ग्राम, फास्फोरस 120 ग्राम और पोटाश 400 ग्राम (प्रति हेक्टेयर) तक पहुंच जाता है। तीसरे वर्ष में यह क्रमशः 500 ग्राम, 200 ग्राम और 800 ग्राम हो जाता है, और चौथे वर्ष से खाद की मात्रा 750 से 1000 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस तथा 1000 से 1500 ग्राम पोटाश तक हो जाती है। इसके अलावा मैग्नीशियम सल्फेट 100 ग्राम और बोरॉन 15 ग्राम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी वर्ष में एक बार उपयोग पौधे की सेहत और उपज के लिए लाभकारी होता है। खाद को पौधे के आसपास 50 से 75 सेंटीमीटर की दूरी पर वृत्ताकार खांचे में डालकर मिट्टी से अच्छी तरह ढक देना चाहिए ताकि पौधे को पोषक तत्व अच्छी तरह से मिल सकें। इस प्रकार, समय पर और सही मात्रा में खाद देना तेल पाम की उच्च उपज और तेल की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है।
सिंचाई प्रबंधनः तेल पाम की खेती में सिंचाई का सही समय और मात्रा बेहद महत्वपूर्ण है। रोपाई के पहले 3-5 वर्षों में पौधों को नियमित और पर्याप्त पानी देना जरूरी होता है ताकि जड़ें मजबूती से विकसित हो सकें। मानसून के दौरान प्राकृ तिक वर्षा पर्याप्त होती है, लेकिन शुष्क मौसम में सप्ताह में 2-3 बार सिंचाई करनी चाहिए। शुरुआत में प्रति सिंचाई लगभग 20-25 लीटर पानी प्रति पौधा पर्याप्त होता है, जबकि पौधे के बड़े होने पर यह मात्रा 30-40 लीटर तक बढ़ाई जा सकती है। सिचाई के लिए ड्रिप इरिगेशन सबसे उपयुक्त विधि मानी जाती है क्योंकि इससे पानी की बचत होती है और पौधे को जल भी सही मात्रा में मिलता है। साथ ही, खेत में जलभराव या पानी का ठहराव न होने का खास ध्यान रखना चाहिए क्योंकि तेल पाम के पौधों को पानी में डूबे रहने से नुकसान हो सकता है। इस प्रकार, उचित अंतराल पर और सही मात्रा में सिंचाई तेल पाम की अच्छी वृद्धि और उत्पादन के लिए आवश्यक है।
प्रमुख कीट और उनके निवारणः
रेड पाम वीविलः रेड पाम वीविल कीट तेल पाम के तने में सुराख करता है, जिससे पौधा कमजोर होकर धीरे-धीरे मर जाता है। इस कीट से बचाव के लिए प्रति हेक्टेयर 10 फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करना चाहिए, साथ ही संक्रमित पौधों को तुरंत खेत से निकालकर नष्ट कर देना चाहिए। इसके अलावा, नियमित रूप से खेत की निगरानी करके इस कीट के प्रारंभिक संक्रमण का पता लगाना और समय रहते नियंत्रण करना बहुत जरूरी है ताकि फसल की क्षति से बचा जा सके।
राइनोसीरस बीटलः राइनोसीरस बीटल तेल पाम की कोमल पत्तियों और तने को नुकसान पहुंचाता है, जिससे पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है। इस कीट से बचाव के लिए जैविक कीटनाशक जैसः 5 ग्राम प्रति लीटर पानी मेटाराइजियम का छिड़काव करना आवश्यक है। इसके साथ ही, फसल क्षेत्र की सफाई बनाए रखना भी कीट नियंत्रण में मदद करता है।
स्केल कीटः स्केल कीट पौधे के रस को चूसकर पत्तियों को पीला कर देते हैं और पौधे की समग्र वृद्धि को कम कर देते हैं। इस कीट के नियंत्रण के लिए नीम आधारित कीटनाशक या साबुन के घोल (5 मिली प्रति लीटर पानी) का छिड़काव प्रभावी उपाय है, जिससे पौधे स्वस्थ रह सकते हैं।
प्रमुख रोग और उनके निवारणः
बड रॉटः बड रॉट रोग में पौधे की शीर्ष कलिका गल जाती है जिससे पौधा कमजोर होकर बढना बंद कर देता है। इस रोग के नियंत्रण के लिए रोगग्रस्त भाग को सावधानीपूर्वक काटकर निकाल देना चाहिए और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लीटर पानी) या बोर्डो मिश्रण (1%) का छिड़काव करना आवश्यक होता है ताकि संक्रमण फैलने से रोका जा सके।
लीफ स्पॉटः लीफ स्पॉट रोग में पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं, जो पत्तियों को खराब कर देते हैं और पौधे की सेहत पर बुरा प्रभाव डालते हैं। इस रोग से बचाव के लिए मैंकोजेब 2.5 ग्राम या कैप्टन 2 ग्राम जैसे कवकनाशकों का छिड़काव करना चाहिए, साथ ही खेत की सफाई बनाए रखना आवश्यक होता है ताकि रोग का प्रसार रोका जा सके।
कटाई और उपजः तेल पाम की पहली कटाई रोपण के 3 से 4 साल बाद शुरू होती है। एक बार फल लगने के बाद यह हर 10-15 दिन में फल देने लगता है। एक पौधे से सालाना औसतन 15-20 टन फल प्राप्त होते हैं, जिनसे 3-5 टन कच्चा पाम ऑयल 180 से 250 किलोग्राम (0.18 से 0.25 टन) निकाला जा सकता है।
पाम ऑयल निष्कर्षण की विधिः
ताड़ के फल की कटाई
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फल की सफाई
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फल को छीलना
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फलो की पिसाई
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तेल का अलगाव
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तेल का शोधन
पाम ऑयल का विपणन बाजार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों होता है। तेल का उपयोग खाद्य उद्योग, कॉस्मेटिक्स, पियूल में होता है। बाजार में तेल की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है जैसे कि तेल की शुद्धता, रंग, गंध आदि। गुणवत्ता हे अनुसार प्रमाण पत्र मिलना जरूरी है। पाम ऑयल की कीमत वैश्विक बाजार, उत्पादन, मांग, और अन्य वनस्पति भाव पर निर्भर करती है। उत्पादकों और विक्रेताओं को बाज़ार में उचित ब्रांडिंग, प्रचार, और वितरण चैनल विकसित ते हैं। निर्यातकों के लिए विदेशी बाजारों में व्यापार समझौते और नियमों का ध्यान रखना होता है।
लेखक:
लिशा तंबोली, डॉ. संगीता एवं संस्कृति शुक्ला
पं. किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, राजनांदगांव (छ.ग.)










