कृषि

फसलोत्पादन में संतुलित उर्वरक के साथ जैविक खाद का उपयोग, मृदा स्वाथ्य एवं धन हेतु लाभकारी

कृतिका डोंगरे, डॉ एस.एस.पोर्ते वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं डॉ अनुराग प्राध्यापक

बायोफर्टिलाइजर या जैविक खाद क्या है ?
यह खाद वातावरण में पाई जाने वाली नत्रजन को जैविक क्रिया द्वारा बदल कर फसल की जड़ों में विस्थापित करती है तथा पौधे को उपलब्ध कराती है। मृदा में पड़े सड़े गले पदार्थों को जैविक क्रिया द्वारा कम्पोस्ट खाद में बदलती है। एवं मृदा में पाए जाने वाले उपयोगी सूक्ष्मजीवों की वृद्धि करती है।

जैविक खाद का महत्व
1. रासायनिक खाद मंहगी होती हैं।
2. जैविक खाद बानाने में रासायनिक खाद की अपेक्षा ऊर्जा की खपत कम होती है।
3. प्रकृति में होने वाली कार्बनिक क्रिया में सहायक होती है ।
4. प्रदूषण मुक्त होती है।
5. उपयोग में आसानी होती है।
6. भूमि की उर्वरा शक्ति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।
7. भूमि को उपजाऊपन बनाये रखती है।

जैविक खाद के प्रकार
जैविक खाद विभिन्न रूपो में उपलब्ध होती है, जैसे-
1. राइजोबियम जीवाणु युक्त:-
यह खाद चना,उड़द,कुल्थी, मटर अरहर मूंग सोयाबीन मूंगफली, बरसीम व सनई इत्यादि में उपयोगी होती है।

2. एजोटोबेक्टर जीवाणु युक्त:-
यह खाद गेहॅं, चावल, ज्वार, जौ, मक्का बाजरा कपास गन्ना एवं विभिन्न फल व सब्जियों में उपयोग होती है।

3. एजास्पाइरिलम जीवाणु युक्त:-
यह खाद गेहूॅं , चावल, ज्वार, जौ चारा घास बाजरा इत्यादि में काम आता है।

4. नील हरित शैवाल (बीजीए)-
खाद धान में उपयोग की जाती है उदाहरण:- ऐनाबेना ऐनोबोनोवसिस ।

5. एजोला (फ्रेस वाटर फर्न)-
यह खाद चावल में उपयोगी की जाती है उदाहरण:- ऐजोला केरोलियाना, ऐजोला मेक्सीकाना, ऐजोला पिन्नाटा ।

6. फास्फोरस घुलनकण जीवाणु युक्त (पीएसबी) :-
यह खाद, गेहॅू ,कपास, गन्ना ,दलहन, धान तम्बाकू व विभन्न फल व फसलो में काम ली जाती है। उदाहरणः- स्यूडोमोनास, बेसीलस।7 7.

7. वेसीक्यूर आरबिसक्यूलर माइकाराइजा:-
इस फफूंद का उपयोग गेहूं, मक्का, जा,ै धान, सोयाबीन, आलू तथा फलों आदि में होता हैं उदाहरण -ग्लोमस मोजेई, ग्लोमस फेसिक्यूलेरस, गिगास्पोरा, मारगेरिटा ।

8. हरी खाद:- सभी फसलो में उपयोग की जा सकती है। उदाहरण- ढेंचा, ग्वार, बरसीम, सेंजी तिवरा आदि ।

9. कार्बनिक (प्राकृतिक ) खाद:- सभी फसलो में उपयोग ली जा सकती है।
एजोटोबेक्टर जीवाणुयुक्त खाद यह खाद वातावरण में पाई जाने वाली नत्रजन को जैविक क्रिया से अमोनिया में बदलकर फसल की जड़ो में विस्थापित करती है, जो पौधें को आसानी से उपलब्ध हो जाती है। उदाहरणः- एजोटोबेक्टर करोकोकम, एजोटोबेक्टर ऐलिजस।

विशेषताएँ –

  • भूमि में इसकी संख्या 104 से 105 प्रति ग्राम मृदा है।
  • यह जीवाणु भूमि में सीस्ट (खोल)बनाकर रहता है।
  • भूमि में नत्रजन उर्वरक इन जीवाणु की संख्या को कम करता है।
  • फास्फोरस युक्त उर्वरक इन जीवाणुओ की संख्या में वृद्धि करता है।
  • यह जीवाणु उपज के साथ अंकुरण क्षमता भी बढ़ाता है।
  • यह जीवाणु कुछ फाफुदनाशक तत्व भी बनाता है।

फसल पर प्रभाव
भारत में विभिन्न स्थानों पर किए गए अनुसंधानो से प्राप्त आकड़ों से पता चलता है कि इस खाद के प्रयोग से गेहूॅं की उपज 20 से 30 प्रतिषत तक बढ़ाई जा सकती है।

एजोस्पाईरिलम जीवाणुयुक्त खाद:-
इस खाद में ऐरोबिक जीवाणु होते है जो वातावरण मे पाई जाने वाली नत्रजन कों बदलकर पौधे को उपलब्ध करातें है। उदाहरण – एजोस्पाइरिलम लिपोफिरम, एजोस्पाइरिलम ब्रेसीलेन्स।

विशेषताएँ

  • यह जीवाणु भूमि में पौधो की जड़ो के बाहर व अंदर तथा तनें पर पायें जातें है।
  • नाइट्रेट को नाइट्राइट में बदलने कि क्षमता ।
  • मिट्टी का पी. एच. 5.6 से 7.2 तक इस जीवाणु के बढ़वार में सहायक होता है।
  • जीवाणु की सबसें ज्यादा बढ़वार के लियें अनुपयुक्त होती हैं।

फसल पर प्रभाव
इस जीवाणु युक्त खाद के उपयोग से गेहूं की पैदावार में बढ़ोत्तरी होती है। परन्तु यह बढोत्तरी भूमि में प्रारंभिक नत्रजन की मात्रा पर निर्भर करती है।

फास्फोरस घुलनकण जीवाणु युक्त खाद (पी.एस.बी.)
यह खाद भूमि पाई जाने वाली अधुलनशील फास्फोरस को जैविक क्रिया द्वारा धुलनशील अवस्था में बदलती है एवं पौधें को उपलब्ध कराती है। उदाहरण- स्यूडोमोनास, बेसिलस ।

विशेषताएँ :

  • पीएसबी बहुत से कार्बनिक अम्ल बनाता है। जैसे फोरमिक प्रोपाइनिक, लेफ्टीक, ग्लाइकोलिक, सक्सेनिक इत्यादि, यह अम्ल पी.एच. को कम कर देते है जिससे फास्फेट घुलनशील हो जाता है।
  • कुछ अम्ल कैल्शियम व लोहे के साथ चिलेट बनाते है जिससे फास्फेट के घुलनशील होने में सहायता मिलती है।

फसल पर प्रभाव
भारत में विभिन्न स्थानों पर किये गये अनुसंधानो से ज्ञात हुआ है कि पी एस बी के उपयोग से पैदावार में बढ़ोत्तरी संभव है। अनुसंधानो से यह भी पता लगता है कि रॉक फास्फेट की उपस्थिति में इस खाद को उपयोग लेने पर अर्थपूर्ण बढ़ोत्तरी होती है।

वेसीक्यूलर आरबसक्यूलर माहक्रोराइजा (पी ,ए, एम,)
यह पौधो की जड़ व फफूंद की शाखाओं पर एक-दूसरे के लिये लाभ के लिये हैं। इन कवकों में वेसिक्ल्स व आरबसक्ल्स नामक अंग होतें है, जों भूमि के तत्वों कों सोखकर पौधे की जड़ो को पहुंचातें है। उदाहरण – ग्लोपस माइक्रोकारपस, ग्लोमस मोसेई गिगोस्पोरा।

विशेषताएँ :

  • भूमि में फास्फोरस की कमी होने पर वीएएस जड़ तंत्र का विस्तार करतें है। जिससें तत्वों कि उपलब्धता बढ़ती है। ज्यादा उपजाऊ भूमि में वीएएस की मात्रा कम होती है। बरसाती जंगलो में रेतीलें टीबों में, तथा घास के मैदान में तथा ओपन वुडलैंड में वीएएस अच्छे पनपते हैं।
  • जिक फास्फोरस व सल्फर तत्वों की उपलब्धता बढ़ातें है।
  • पौधें का क्लोरोफिल बढ़ाते है।
  • वीएएस पौधो में स्टोमेंटा पर नियंत्रण रखकर उसे पानी की कमी से बचाते है।

फसल पर प्रभाव
भारत में विभिन्न स्थानों पर किये गये अनुसंधानो से ज्ञात हुआ है कि वीएएस के उपयोग से मक्का, गेहूॅं जौ, इत्यादि में 12 से 20 प्रतिशत तक उपज में वृद्धि संभव हैं।

जीवाणुं उर्वरक के प्रयोग में लेनें के तरीके – जीवाणु खाद के प्रयोग की चार विधियॉं है।
1. जड़ों द्वारा:- कल्चर की बताई हुई निश्चित मात्रा में पानी धोल लें। जिन पौधो को भूमि में लगाना हो उनके जड़ों को कुछ देर तक इस घोल में डुबोये रखे। इसके बाद रोपाई करें धान, मिर्च, टमाटर एवं तम्बाकू इत्यादि में यह विधि काम में ली जाती हैं ।
2. बीजों द्वारा:- इस विधि में बीजों को बोने से पहलें थोड़ा पानी छिड़क कर गीला कर देतें है। इसके बाद बेक्टीरियल कल्चर को इन बीजों पर छिड़क दें बीजो को बंद बर्तन में डालकर अच्छी तरह से हिलायें, जिससे कि कल्चर समान रूपो से सभी बीजों पर लग जावें। इस बात का ध्यान आवश्य रखें कि कल्चर उपचारित बीज को जिस मिट्टी में बोना हों वह नम होना चाहियें अन्यथा कल्चर प्रभावहीन हो जाता हैं कल्चर उपचारित बीजों को तेज धूप से बचाकर रखें एवं 24 घंटे के अंदर ही बो दें ।
3. भूमि के द्वारा:- मिट्टी बैक्टिरियल कल्चर को समान मात्रा में अच्छी तरह आपस में मिला लेे। मिलाते समय गोबर की खाद व थोड़ा सा पानी भी डाल लें । जिससे मिश्रण अच्छी तरह तैयार हो जावें अब इस मिश्रण को समान रूप से खेत में फैला दें।
4. छिड़काव के द्वारा:- बैक्टिरीयल कल्चर की बताई गई मात्रा को पानी में अच्छी तरह घोल कर जहॉं पर बुवाई की गई हों, वहां पर छिड़क दें।

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