

तिल एक महत्वपुर्ण तिलहनी फसल है तिल मे 42 से 54 प्रतिशत तेल एवं 26 प्रतिशत प्रोटीन पाई जाती है। तिल के तेल मे ओलेयिक एसिड एवं अनसेचुरेटेड फैटी एसिड पाया जाता है जो स्वास्थय की दृष्टीकोण से काफी लाभदायक है। तिल की खेती छत्तीसगढ के सभी जिलो मे की जाती है परन्तु राजनादगाव कोरबा बलरामपुर कोरिया रायगढ सुरजपुर जिले मे प्रमुखता से की जाती है। छत्तीसगढ मे तिल की उत्पादकता 305 किण् ग्राम प्रति हेक्टेयर है।
भूमि : छत्तीसगढ मे तिल की खेती हल्की रेतीली दोमट मृदा मे की जाती है जिसका पी.एच. मान 5.5 से 7.5 तक उपयुक्त होता है
तैयारी : तिल की खेती करने के लिये खेत को बखर से जुताई करके अच्छी तरह तैयार करना चाहिये तथा गोबर की खाद को खेत की तैयारी करते समय मृदा मे मिला देना चाहिये। जिससे मृदा मे जल धारण क्षमता बढती है और अच्छी उपज प्राप्त होती है।
बीजदर : बीजोपचार एवं बुवाई की विधी
बीजदर – 5 से 7 कि. ग्राम प्रति हेक्टेयर
बुवाई का समय – 15 जून से 15 जुलाई
दुरी – कतार से कतार – 30-40 से. मी
पौध से पौध – 10 से 15 से. मी
बीजोपचार : तिल की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिय बीजो को उपचारित करना अत्यन्त आवश्यक है बीजो को 2 से 3 ग्राम कार्बेनडाजीम नामक फफुन्दनाशक दवा से प्रति किण् ग्राम बीज दर से उपचारित करना चाहिये इसके पश्चात जैव उर्वरक एजोस्पाइरिलम एवं पी. एस. बी क्लचर 5 से 10 ग्राम प्रति किण् ग्राम बीज दर से उपचारित करना चाहिये।
बुवाई की विधी : तैयार खेतो मे बीज को छिडकवा विधी या कतार विधी मे बोया जाता है परन्तु कतार विधी अच्छी मानी जाती है क्योकी इस विधी मे अधिक उपज प्राप्त होती है और कृषि कार्य करने मे आसानी होती है।
उन्नत किस्मे
| किस्म | उपज कि. ग्रा./हेक्टेयर | अवधि | तेल की मात्रा | विशेषता |
| टी.के. 21 जी | 600-700 | 85-90 | 50-53 | सफेद मध्यम दाना |
| टी.के. 22 जी | 650-700 | 82-85 | 50-54 | झुलसा रोग सहनशील |
| टी.के. 306 जी | 700-800 | 86-90 | 49‘-52 | झुलसा ब्लाइट भभुतियाा फोलाइडी रोग सहनशील |
| जवाहर तिल | 650-700 | 82-85 | 45-50 | झुलसा रोग सहनशील |
| सलेक्शन 5 | 800-1000 | 82-85 | 50-53 | झुलसा ब्लाइट भभुतियाा फोलाइडी रोग सहनशील |
- उर्वरक प्रंबधन
- 5 से 10 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर को खेत की तैयारी करते समय मृदा मे मीला देना चाहिये।
- तिल मे अच्छी उपज के लिये 25 -30 कि. ग्राम नत्रजन 25 -30 कि. ग्राम स्फुर एवं 15 से 20 कि. ग्राम पोटाश देना आवश्यक है।
- पोटाश एवं स्फुर की पुरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा को बुवाई के समय देना चाहिये तथा शेष मात्रा को बुवाई के 30 -35 दिनो बाद देना चाहिये।
सिंचाई प्रबधंन : तिल की फसल जल भराव के प्रति संवेदनशील है अतरू जल निकास की उचित व्यावस्था करनी चाहिये। वर्षा के दिनो मे सिंचाई की आवश्यकता नही होती है परन्तु अवर्षा की स्थिती मे फसल की क्रातिंक समय फूल आने एवं दाना भरते समय सिंचाई करना चाहिये।
खरपतवार प्रबधंन : अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये खरपतवार प्रबधंन करना आवश्यक है खरपतवार नियत्रण के लिये हाथो द्वारा निराई करना चाहिये। प्रंथम निराई 15 -20 दिनो मे व दुसरी निराई 30-35 दिनो मे करना आवश्यक है।
रासायनिक विधि :
| खरपतवारनाशी | मात्रा ग्रा/लीटर प्रति हेक्टेयर मे | प्रयोग का समय | नियंत्रित खरपतवार |
| प्रीपलान्टइमरजेन्स | |||
| फ्लुक्लोरोलिन (बासालिन) | 1 | बुवाई से पहले | संकरी पत्ती |
| प्रीइमरजेन्स | |||
| पेन्डीमेथालिन (स्टाम्प) | 0.75 से 1.5 | बुवाई के 0-3 दिन के अंदर | स्ंकरी पत्ती |
| क्युजोलोफाप इथाईल | 1.00 | 2-3 पत्ती की अवस्था मे | स्ंकरी पत्ती |
पानी की मात्रा : दवाई की उपयुक्त मात्रा को 500 लिटर पानी मे घोल कर फसलो मे छिडकाव करना चाहिए।
रोग एवं कीट प्रबधंन
रोग प्रबधंन
- भभुतिया रोग : इस रोग का प्रकोप फसल के 45 दिन से फसल के पकने तक रहता है इसके लक्षण पत्तीयो मे सफेद चुर्ण के रुप मे दिखाई देता है।
निंयत्रण – घुलनशील गंधक 2 ग्राम प्रति लीटर पानी मे घोलकर छिडकाव करना चाहिये। - तना एवं जड सडन रोग : इस रोग के कारण पौधो के तना एवं जड कोयले के समान धुसर रंग का दिखाई देता है।
निंयत्रण –
1. टाईकोडर्मा विरडी 5 ग्राम प्रति कि. ग्राम बीजदर से बीजोपचार करना चाहिये।
2. थायरम व कार्बेनडाजीम 2रू1 ग्राम को पानी मे घोलकर छिडकाव करना चाहिये।
- फायलोडी (पर्णताभ रोग) : इस रोग का प्रकोप फुल आने के समय दिखाई देता है दस रोग के कारण फुल के सभी भाग हरे एवं पत्तीयो के गुच्छे के समान दिखाई देता है।
निंयत्रण – फोरेट 10 जी 10 कि. गाम प्रति हेक्टेयर छिडकाव करना चाहिये। तथा नीम तेल 5 मि. ली. या डायमेथोएट 3 मि. ली. प्रति लीटर को पानी मे घोलकर छिडकाव करना चाहिये।
कीट नियंत्रण
- क्ली मक्खी
निंयत्रण – क्विनालफास 25 ई.सी 1.5 मि. ली या टायफास 40 ई.सी 1.5 मि. ली प्रति लीटर को पानी मे घोलकर छिडकाव करना चाहिये। - ईल्लीया
निंयत्रण – प्रोफेनोफास 50 ई.सी 1 ली प्रति हेक्टेयर दवा को 500 लीटर पानी मे घोलकर छिडकाव करना चाहिये।
कटाई एवं भण्डारण
जब पौधे की फल्लीया पीली पडने लगे एवं झडना प्रांरभ हो जाये तब कटाई कर लेनी चाहिये कटाई के बाद इसे 8-10 दिन तक खेतो मे सुखाना चाहिये तथा डन्डो से पिटकर दानो को अलग कर लेना चाहिये तथा 8 प्रतिशत नमी होने पर भण्डारित करना चाहिये।










