छत्तीसगढ़ में ग्रीष्मकालीन तिल की खेती
डॉ. प्रज्ञा पांडेय1, सहायक प्राध्यापक (सस्य विज्ञान) डॉ. चेतना बंजारे2, सहायक प्राध्यापक (सब्जी विज्ञान) कृषि महाविद्यालय, रायपुर1, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, बिलासपुर2


तिल (Sesamum indicum) एक प्राचीन और महत्वपूर्ण तिलहन फसल है| छत्तीसगढ़ राज्य में भी, तिल की खेती का एक महत्वपूर्ण स्थान है, विशेषकर गर्मियों के मौसम में। यह न केवल किसानों की आय का एक प्रमुख स्रोत है, बल्कि यह हमारे भोजन और स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। तिल की खेती छत्तीसगढ़ में गर्मियों में किसानों के लिए एक लाभदायक व्यवसाय है।

तिल एक मूल्यवान नकदी फसल है जो छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए अच्छी खासी आमदनी पैदा कर सकती है। तिल के बीज और तेल की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बहुत मांग है। तिल के बीज तेल, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं, इसके उच्च असंतृप्त वसा अम्ल की मात्रा के कारण स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। यह एक सूखा-रोधी फसल है जिसे विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है। तिल के तेल के साबुन, सौंदर्य प्रसाधन और फार्मास्यूटिकल्स के उत्पादन सहित विभिन्न औद्योगिक अनुप्रयोग हैं।
उचित तकनीकों का उपयोग करके, किसान तिल की अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं और अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं।
खेत की तैयारी– गर्मियों में तिल की खेती के लिए खेत की तैयारी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो अच्छी उपज के लिए नींव रखती है। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में, बलुई दोमट मिट्टी तिल की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। खेत की तैयारी के चरण इस प्रकार हैं:
जुताई (Ploughing): गर्मी के मौसम में खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए।
इससे मिट्टी की ऊपरी परत उलट जाती है, जिससे खरपतवार और पिछली फसल के अवशेष नष्ट हो जाते हैं। यह प्रक्रिया मिट्टी को हवादार बनाने में भी मदद करती है। पहली जुताई के बाद, जब मिट्टी थोड़ी सूख जाए, तो हैरो या कल्टीवेटर से दूसरी जुताई करनी चाहिए। यह मिट्टी को भुरभुरा बनाने और ढेलों को तोड़ने में मदद करता है। जुताई के बाद खेत को समतल करना बहुत जरूरी है। इससे सिंचाई के दौरान पानी का समान वितरण होता है और बीजों का अंकुरण भी बेहतर होता है। समतलीकरण के लिए पाटा या लेवलर का उपयोग किया जा सकता है।
बुवाई का समय: छत्तीसगढ़ में गर्मियों में तिल की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय फरवरी से मार्च तक का महीना होता है। हालांकि, स्थानीय जलवायु और मिट्टी के प्रकार के आधार पर इसमें थोड़ा बदलाव हो सकता है।
- फरवरी के पहले पखवाड़े – फरवरी के पहले पखवाड़े में बुवाई उन क्षेत्रों में की जा सकती है जहाँ मिट्टी का तापमान पर्याप्त हो और नमी मौजूद हो। यह समय उन किस्मों के लिए भी उपयुक्त है जो कम समय में पक जाती हैं।
- फरवरी के दूसरे पखवाड़े से लेकर मार्च – फरवरी के दूसरे पखवाड़े से लेकर मार्च तक का समय तिल की बुवाई के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। इस दौरान तापमान आमतौर पर बुवाई के लिए अनुकूल रहता है और मिट्टी में नमी भी बनी रहती है।
- मार्च के बाद बुवाई – मार्च के बाद बुवाई करने से उपज में कमी हो सकती है क्योंकि गर्मी बढ़ने के कारण पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है और बीजों के अंकुरण में भी समस्या आ सकती है।
बीज दर, दूरी और बुवाई विधि : तिल की बीज दर कई कारकों पर निर्भर करती है, जैसे कि किस्म, बुवाई की विधि और मिट्टी का प्रकार। सामान्य तौर पर, गर्मियों में तिल की खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 4-5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। यदि आप छिटकवा विधि से बुवाई कर रहे हैं, तो बीज दर थोड़ी बढ़ सकती है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15-20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। तिल के बीजों को 2-3 सेंटीमीटर से अधिक गहराई पर नहीं बोना चाहिए। अधिक गहराई पर बोने से बीजों का अंकुरण प्रभावित हो सकता है।
बीजों को बीमारियों और कीटों से बचाने के लिए बुआई से पहले बीजोपचार करना आवश्यक है। इसके लिए सर्वप्रथम फफूंद से बचाव हेतु बीजों को कार्बेन्डाजिम या थिरम 2 ग्राम/किग्रा बीज से उपचारित करें। इसके बाद शुरुआती चरण के कीटों को रोकने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 5 मिलीध्किग्रा बीज का उपयोग करें।
तिल के बीजों के अंकुरण के लिए उपयुक्त तापमान 25-30 डिग्री सेल्सियस होता है। बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। यदि मिट्टी सूखी है, तो बुवाई से पहले हल्की सिंचाई कर लेनी चाहिए।
किस्म: तिल की विभिन्न किस्में अलग-अलग समय पर पकती हैं। इसलिए अपनी क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के प्रकार के अनुसार उपयुक्त किस्म का चयन करना चाहिए। तिल उपयुक्त किस्म टीकेजी-22, टीकेजी-55, टीकेजी-21, टीकेजी-308, टीकेजी-306, जेटीएस -8, गुजरात तिल-10 आदि हैं ।
बुवाई विधि (Sowing Method): तिल की बुवाई की प्रमुख विधियाँ मे से सबसे सरल और सस्ती विधि छिटकवा विधि है । इस विधि में बीजों को खेत में समान रूप से बिखेर दिया जाता है। लेकिन इसमें बीजों का समान वितरण सुनिश्चित करना मुश्किल होता है। पंक्ति में की बुवाई विधि अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी है। इसमें बीजों को निश्चित दूरी और गहराई पर पंक्तियों में बोया जाता है। इस विधि में बीज दर कम लगती है और पौधों का विकास भी बेहतर होता है। पंक्ति बुवाई के लिए सीड ड्रिल या डिबलर का उपयोग किया जा सकता है। इसमें इसके अलावा बीजों को निश्चित दूरी और गहराई पर हाथों से या डिबलर की सहायता से भी बोया जाता है।
उर्वरक (Fertilizers): मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों की मात्रा निर्धारित करनी चाहिए। सामान्य तौर पर तिल की फसल के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (N:P:K-30:30:20 kg ha-1) की आवश्यकता होती है। बुवाई के समय सिंगल सुपर फास्फेट (SSP) और डीएपी (DAP) जैसे उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है। नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए यूरिया को बाद में टॉप ड्रेसिंग के रूप में दिया जा सकता है।
सिंचाई : समतल खेत में क्यारियाँ बनाना सिंचाई की जानी चाहिए
ताकि उनमें पानी आसानी से पहुँच सके और अनावश्यक पानी न रुके। तिल की बुवाई के लिए समतल क्यारियाँ उपयुक्त होती हैं।
तिल की फसल को विभिन्न चरणों में अलग-अलग मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। गर्मियों में, फसल को 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। मुख्य रूप से, बुवाई के समय, अंकुरण के बाद, फूल आने के समय, तथा फलियाँ बनने के समय सिंचाई की आवश्यकता होती है । बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए ताकि बीजों का अंकुरण अच्छी तरह से हो सके। यदि मिट्टी सूखी है, तो बुवाई से पहले हल्की सिंचाई करनी चाहिए। मिट्टी को सूखने से पहले हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। फूल आने के समय तिल की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इस समय पानी की कमी से फूल झड़ सकते हैं और उपज कम हो सकती है। फलियाँ बनने के समय भी पर्याप्त नमी बनाए रखना आवश्यक है। पानी की कमी से फलियाँ छोटी रह सकती हैं और उनमें तेल की मात्रा कम हो सकती है। जब फलियाँ पकने लगें तो सिंचाई कम कर देनी चाहिए। अधिक सिंचाई से फलियाँ सड़ सकती हैं।
खरपतवार नियंत्रण: गर्मियों में तिल की खेती में खरपतवार एक बड़ी समस्या हो सकती है। खरपतवार न केवल पोषक तत्वों, पानी और धूप के लिए तिल की फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, बल्कि वे कीटों और रोगों को भी आश्रय प्रदान कर सकते हैं। इसलिए तिल की अच्छी उपज के लिए खरपतवार प्रबंधन आवश्यक है।
तिल की फसल में खरपतवार नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण समय बुवाई के बाद 15–35 दिनों तक का होता है। इस समय खरपतवारों की वृद्धि तेजी से होती है और वे फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसलिए इस अवधि के दौरान खरपतवारों को नियंत्रित करना बहुत आवश्यक है।
बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई करके खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता है। जुताई के दौरान मिट्टी पलटने वाले हल का उपयोग करने से खरपतवारों के बीज और जड़ें ऊपर आ जाते हैं और सूख जाते हैं। निराई-गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण का सबसे आम और प्रभावी तरीका है। बुवाई के बाद जब खरपतवार छोटे होते हैं, तो उन्हें हाथों से या खुरपी की सहायता से निकाला जा सकता है। निराई-गुड़ाई नियमित अंतराल पर करनी चाहिए ताकि खरपतवारों को बढ़ने से रोका जा सके।
कुछ शस्य क्रियाओं जैसे कि उचित बीज दर, उचित दूरी और समय पर बुवाई करके भी खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है। मल्चिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें खेत को पुआल, घास या प्लास्टिक शीट से ढक दिया जाता है। मल्चिंग से खरपतवारों के अंकुरण को रोका जा सकता है और मिट्टी की नमी को भी बचाया जा सकता है।
- रासायनिक खरपतवारनाशक: खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए रासायनिक खरपतवारनाशकों का भी उपयोग किया जा सकता है। बुआई के 0-3 दिनों के भीतर पेंडिमेथालिन 0.75-1 किग्रा/हेक्टेयर या डाययूरॉन 0.4 -0.6 किग्रा सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर डालें। घासों पर नियंत्रण के लिए बुआई के 15-20 दिन बाद प्रोपाक्विजाफॉप 0.10 किलोग्राम सक्रिय घटक/हेक्टेयर या फ्यूजीफॉप 0.25 किलोग्राम/हेक्टेयर सक्रिय घटक का प्रयोग कर सकते हैं।
- खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए नियमित रूप से निगरानी करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए हमेशा एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसका मतलब है कि विभिन्न तरीकों को मिलाकर खरपतवारों को नियंत्रित करना चाहिए। खरपतवारनाशकों का उपयोग करते समय सावधानी बरतनी चाहिए और लेबल पर दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए।
रोग और कीट नियंत्रण: तिल की फसल को कई प्रकार के कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख कीट निम्नलिखित हैं:
- तिल की पत्ती मोड़क इल्ली (Sesamum Leaf Roller): यह इल्ली पत्तियों को मोड़कर उनके अंदर रहती है और पत्तियों को खाती है, जिससे पौधों की वृद्धि रुक जाती है।
- तिल का माहू (Sesamum Aphid): ये छोटे-छोटे कीट पत्तियों और तनों से रस चूसते हैं, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और उनकी वृद्धि रुक जाती है। ये रस चूसने के साथ-साथ विषाणु जनित रोगों को भी फैलाते हैं।

- तिल की फली छेदक इल्ली (Sesamum Pod Borer): यह इल्ली फलियों में छेद करके बीजों को खाती है, जिससे उपज में भारी नुकसान होता है।
- तिल का तना मक्खी (Sesamum Stem Fly): इस मक्खी के लार्वा तने के अंदर घुसकर उसे खाते हैं, जिससे तना कमजोर हो जाता है और पौधा मर भी सकता है।
- सफ़ेद मक्खी (Whitefly): यह कीट भी रस चूसता है और विषाणु जनित रोगों को फैलाता है।
कीट प्रबंधन के तरीके:
तिल में कीट नियंत्रण के खेत में नियमित रूप से निगरानी करनी चाहिए ताकि कीटों के प्रकोप का पता चल सके। तिल की फसल में कीट नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण समय कीटों के प्रकोप के अनुसार होता है। जब कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर (Economic Threshold Level – ETL) को पार कर जाए, तो नियंत्रण के उपाय अपनाने चाहिए। शुरुआती अवस्था में कीटों का पता चलने पर उन्हें आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।उचित बीज दर, उचित दूरी और समय पर बुवाई करके भी कीटों के प्रकोप को कम किया जा सकता है। स्वस्थ और मजबूत पौधे कीटों के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं।
- रासायनिक नियंत्रण: यदि कीटों का प्रकोप अधिक हो, तो रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है। इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 150 मिली/हेक्टेयर या प्रोपेनोफॉस 40 ईसी + साइपरमेथ्रिन 4 ईसी-1 लीटर/हेक्टेयर कीटनाशक माहू और सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए उपयोगी हैं। फली छेदक इल्ली के नियंत्रण के लिए क्लोरपायरीफोस या स्पिनोसैड 45 एससी 200 मिली/हेक्टेयर, का उपयोग किया जा सकता है। तना मक्खी के नियंत्रण के लिए डाइमेथोएट का उपयोग किया जा सकता है।
तिल के प्रमुख रोग: तिल की फसल में रोग नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण समय रोगों के प्रकोप के अनुसार होता है। जैसे ही रोगों के लक्षण दिखाई दें, तुरंत नियंत्रण के उपाय अपनाने चाहिए। तिल की फसल को कई प्रकार के रोग लग सकते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख रोग निम्नलिखित हैं:
- उकठा रोग (Wilt): यह रोग कवक (फफूंद) के कारण होता है। इस रोग से पौधे अचानक मुरझा जाते हैं और सूख जाते हैं। यह रोग आमतौर पर गर्म और शुष्क मौसम में अधिक होता है।

- पर्ण धब्बा रोग (Leaf Spot): यह रोग भी कवक के कारण होता है। इस रोग से पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे बन जाते हैं, जो धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं और पूरी पत्ती को ढक लेते हैं। इससे पत्तियां सूख जाती हैं और गिर जाती हैं।
- तना सड़न रोग (Stem Rot): यह रोग भी कवक के कारण होता है। इस रोग से तने के निचले हिस्से में सड़न हो जाती है, जिससे पौधा कमजोर हो जाता है और गिर जाता है।
- जीवाणु झुलसा रोग (Bacterial Blight): यह रोग जीवाणु के कारण होता है। इस रोग से पत्तियों पर अनियमित आकार के धब्बे बन जाते हैं, जो धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं और पूरी पत्ती को झुलसा देते हैं।
- विषाणु रोग (Viral Diseases): तिल में कई प्रकार के विषाणु रोग भी लगते हैं, जैसे कि पत्ती मोड़ रोग, मोज़ेक रोग आदि। इन रोगों से पौधों की वृद्धि रुक जाती है और उपज में कमी होती है।
रोग प्रबंधन के तरीके:
तिल में रोग नियंत्रण के लिये खेत को साफ रखना चाहिए, पिछली फसल के अवशेषों को हटा देना चाहिए और खरपतवारों को नियंत्रित करना चाहिए। बुवाई से पहले बीजों को कवकनाशी (फंजिसाइड) से उपचारित करना चाहिए। उचित बीज दर, उचित दूरी और समय पर बुवाई स्वस्थ और मजबूत पौधे प्रदान करता है जो रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं।
- रासायनिक नियंत्रण: यदि रोगों का प्रकोप अधिक हो, तो रासायनिक कवकनाशकों का उपयोग किया जा सकता है। फसल के लिए अनुशंसित कवकनाशकों का ही उपयोग करें और लेबल पर दिए गए निर्देशों का पालन करें। उकठा रोग और तना सड़न रोग के नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम या थीरम का उपयोग किया जा सकता है। झुलसन रोग के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम या मेटालेक्सिजल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए । अवयक्तनुसर 10-15 दिन के अंतराल से 2-3 बार छिदकाव करें । पर्ण धब्बा रोग के लिए मैन्कोजेब 3 ग्राम या कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 10-15 दिन के अंतर पर छिड़काव किया जा सकता है।
कटाई का समय: जब पत्तियां पीली पड़ने लगें और झड़ने लगें, और निचले कैप्सूल नींबू पीले रंग के हो जाएं तब तिल की कटाई का सही समय होता है । लगभग 90-110 दिनों में फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है, लेकिन यह किस्म और मौसम की स्थिति पर निर्भर करता है। कटाई में देरी करने से बीज झड़ सकते हैं, जिससे उपज में नुकसान हो सकता है।
कटाई की प्रक्रिया: तिल की कटाई सुबह के समय करनी चाहिए, क्योंकि इस समय कैप्सूल में नमी होती है और बीज झड़ने का खतरा कम होता है। पौधों को जड़ से उखाड़ लें या हँसिया से काट लें। कटाई के बाद पौधों को 3-4 दिनों के लिए बंडलों में बांधकर खेत में ही सूखने दें, जिससे पत्तियां झड़ जाएं। कटाई के बाद पौधों को ज्यादा समय तक खेत में न छोड़ें, क्योंकि इससे बीजों का रंग खराब हो सकता है और तेल की मात्रा कम हो सकती है। सूखे हुए पौधों को धूप में फैलाएं और लाठियों से पीटकर या बैलों से रौंदकर कैप्सूल खोलें। बीजों को साफ करें और 7 दिनों तक धूप में सुखाएं, ताकि नमी 9-10% तक कम हो जाए।
उपज: औसतन छत्तीसगढ़ में गर्मियों में तिल की उपज 5-7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। यदि उचित तकनीकों का उपयोग किया जाए, तो उपज को बढ़ाया जा सकता है।










