

1. ब्लॉसम एन्ड रॉट –
टमाटर के कायिक विकारो में ब्लॉसम एन्ड रॉट सबसे गंभीर विकार है । यह ग्रीन हाउस और खेतों में उगाय जाने वाले टमाटरों में एक आम विकार है । शुरुआत में फल की निचली सतह पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते है । ये धब्बे तेजी से बढ़ते है, और प्रभावित भाग धसे हुए भूरे गहरे रंग के दिखाई देने लगते है ।
कारण –
- मिट्टी में नमी के तनाव की स्थिति में विशेष रूप से प्रक्षेपण की दर में अचानक परिवर्तन होना ।
- फल में नाइट्रोजन का बढ़ता स्तर।
- मिट्टी में लवण अवस्था के तहत असंतुलित मात्रा में मैग्नीशियम और पोटैशियम का होना ।
- फलों के निचली सतह में कैल्शियम की कमी होना ।
नियंत्रण –
- सिंचाई की आवृति में वृद्धि करना चाहिए (सिंचाई के अंतराल को कम करना चाहिए)।
- सही मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए ।
- मिट्टी में चूना का उपयोग करने पर विकार की स्थिति में कमी आती है ।
- फलों के विकास के समय 0.5: कैल्शियम क्लोराइड (ब्ंब्स2) का छिड़काव करना चाहिए ।

2. कैट फेस –
इस विकार की पहचान फलों में विकृति अथवा असामान्य आकार से किया जा सकता है। प्रभावित फलों में ऊपरी सतह उबड़ खाबड़ और बिना आकार के विकृत रचना के होते है। यह विकृति पुष्पण के समय आंतरिक या बाह्रय कारणों से होते हैं जिनके परिणाम स्वरुप फल सामान्य रूप से विकसित नहीं हो पाते हैं ।
कारण –
- पुष्पण के तीन सप्ताह पहले यदि तापमान में कमी आती है तो यह विकार की स्थिति में वृद्धि कर सकता है।
- पौधों को नाइट्रोजन सही समय में उपलब्ध न होना।
नियंत्रण –
- सही समय में फसल लेना और ग्रीन हाउस की स्थिति में तापमान का नियंत्रण रखना विकार की स्थिति को कम कर सकता है।
- सही समय पर संतुलित उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए।

3. क्रैकिंग –
टमाटर के फलों में क्रैकिंग के दो अलग-अलग रूप होते हैं। रेडियल क्रैकिंग मुख्यतः फलों में दिखाई देते हैं जिसमें दरार फलों के ऊपरी सतह से निकलते हुए फलों के निचली सतह की ओर बढ़ते हैं । कन्सेन्ट्रिक क्रैकिंग मुख्यतः पूर्ण विकसित फलों में अंगूठी के छल्लों के निशान की तरह ऊपरी सतह पर दिखाई देते हैं। एक ही फल में दोनों तरह के विकार होना संभव है। क्रैकिंग तब होती है जब फल में आंतरिक विस्तार एपिडर्मिस के विस्तार से तेज होता है और परिणाम स्वरुप एपिडर्मिस विभाजित हो जाता है।
कारण –
- पौधों में लम्बे अंतराल के बाद सिंचाई करने पर क्रैकिंग की समस्या हो सकती है।
- प्रूनिंग और स्टेकिंग के कारण फलों का सूरज की रौशनी के सीधे संपर्क में आने से क्रैकिंग की समस्या हो सकती है।
- बोरोन की कमी के कारण क्रैकिंग की समस्या होती है।
- अनुवांशिक कारणों से भी क्रैकिंग की समस्या हो सकती है।
नियंत्रण-
- नियमित अंतराल पर पौधों को सिंचाई करना चाहिए।
- गर्मी के मौसम में फलों को सीधे सूरज की रौशनी से बचाना चाहिए।
- फलों को पूरी तरह पकने से पहले तोड़ लेना चाहिए इससे रेडियल क्रैकिंग काम किया जा सकता है।
- पौधों पर रोपण से पहले 0.3 – 0.4: बोरेक्स का छिड़काव करना चाहिए और यही छिड़काव फलन के समय और फल पकने के समय दोहराना चाहिए।
- प्रतिरोधी किस्में जैसे रोमा, पंजाब छुहारा, पूसा रूबी, अर्का सौरभ इत्यादि प्रयोग में लाना चाहिए।

4. सनस्काल्ड –
जब फल और पत्तियाँ सूरज की रौशनी के सीधे संपर्क में आते हैं तब सन स्काल्ड के लक्षण दिखाई देते हैं। भारत में मई और जून के महीने में यह एक गंभीर समस्या है। सबसे पहले हरे और पके हुए फलों पर पीले या सफ़ेद धब्बे दिखाई देते हैं। बाद में इन धब्बों पर कवक आदि का दुतिय संक्रमण हो सकता है जिससे गहरे काले धब्बे दिखाई देते हैं। सनस्काल्डडिंग के कारण फल नरम होने के बजाय कठोर हो जाते हैं ।
कारण –
- फलों का सूरज की रौशनी से सीधे संपर्क में आना।
- अधिक छटनी से भी धूप की समस्या बढ़ सकती है।
नियंत्रण –
- गर्मी के महीनो में छटनी और प्रूनिंग रोक देना चाहिए।
- पत्तेदार टमाटर के किस्मों का प्रयोग और पौधों की सही देखभाल विकार की समस्याओं को काम कर सकता है।

5. पफीनेस –
इस विकार में जब फल लगभग दो तिहाई के हो जाते है तब बाहरी सतह सामान्य रूप से विकसित होती जाती है लेकिन शेष आंतरिक उत्तक (प्लेसेंटा, मेसोकार्प) सामान्य रूप से विकसित नहीं हो पाते है परिणाम स्वरुप फल आधे भरे रहते हैं जो वजन में हल्के होते हैं।
कारण –
- अधिक तापमान और मिट्टी में अधिक नमी इस विकार के प्राथमिक कारक हैं।
- फलों में सामान्य विकास के बाद आंतरिक ऊतकों का गाल जाना विकार के कारक हैं।
- फूलों में अंडाशय का निषेचन न होना।
- फूलों में सामान्य निषेचन के बाद भ्रूण का गर्भपात हो जाना।
नियंत्रण –
- पौधों को जरुरत से ज्यादा सिंचाई नहीं देना चाहिए।
- पौधों को संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन उर्वरक देना चाहिए।

6. गोल्ड फ्लेक व फलों का पॉक्स –
ज्यादातर मामलों में जब एक फल प्रभावित होता है तो दोनों विकार एक साथ पाए जाते हैं लेकिन इन विकारों को अलग – अलग समझा जाता है। पॉक्स, फलों के सतह पर अनियमित रूप से फैले हुए छोटे उभार या दरार होते हैं जो संख्या में काम या ज्यादा हो सकते हैं। वहीं गोल्ड फ्लेक में अपरिपक्व फलों के सतहों पर अनियमित आकार के छोटे हरे धब्बे दिखाई देते हैं जो फलों के पकने पर सुनहरे रंग के हो जाते हैं । इन विकारों से ग्रसित फल बाजार के लायक नहीं रहते हैं।
कारण – गोल्ड फ्लेक
- फलों में कैल्शियम ऑक्सालेट के जमाओ के कारण यह समस्या उत्पन्न होते हैं।
- गोल्ड फ्लेक फॉस्फेट और कैल्शियम उर्वरकों के अधिक उपयोग से होता है।
- फलों में मैग्नीशियम की वृद्धि के कारण भी यह समस्या उत्पन्न होती है।
नियंत्रण –
- गर्मी के मौसम में पौधों को छाया प्रदान करने से विकार में कमी आती है।
- फॉस्फेट और कैल्शियम उर्वरकों का संतुलित मात्रा में उपयोग करना चाहिए।

7. बलोची राइपनिंग –
इस विकार में पके हुए फलों पर पीले या सफ़ेद धब्बे होते हैं जो खास तौर पर तने के अंतिम छोर पर होते हैं। कभी-कभी सफ़ेद या भूरे रंग के उत्तक धब्बेदार जगहों पर दिखाई देते हैं।
कारण –
- मिट्टी में नाइट्रोजन और पोटैषिक तत्वों का असंतुलन होना।
- अत्यधिक प्रत्यारोपण के समय पानी की कमी होना।
नियंत्रण –
- मिट्टी में नाइट्रोजन और पोटैशियम उर्वरकों का संतुलित मात्रा में उपयोग करना चाहिए।
- प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करना चाहिए जिसमें पोटैशियम का कुशलता पूर्वक उपयोग करने की छमता हो।











