प्याज (Onion) की जैविक खेती
सुमित, अमित, गुलाब दास बर्मन, सत्यनारायण सिहं, माहानंद साहु एवं सुनील कुमार


प्याज (Onion) पुरे विश्व मे उगायी जाने वाली फसल है। प्याज की खेती सब्जी एवं मसालो के लिये की जाती है। भारत मे प्याज की खेती महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, कर्नाटका, मध्यप्रदेश, बिहार, राजस्थान, आध्रप्रदेश, हरियाणा पश्चिम बंगाल एवं तमिलनाडु मे कि जाती है और इन्ही राज्यो द्वारा पुरे देश का 90 प्रतिशत प्याज का उत्पादन किया जाता है। प्याज के उत्पादन मे महाराष्ट्र प्रथम स्थान पर हैं। प्याज मे कैल्शीयम, फास्फोरस एवं कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है। प्याज मे एलिल प्रोपाईल-डाईसल्फाइड पाया जाता है जिसके कारण प्याज मे तिखापन होता है। प्याज का उपयोग मसालो, सुप, सास, सिजनिग तथा पत्तियो का उपयोग भाजी के रुप मे खाने मे किया जाता है। छत्तीसगढ़ मेे प्याज की खेती सभी जिलो मे की जाती है परन्तु मुख्य रुप से सुरजपुर, रायगढ़, बलरामपुर, सरगुजा, कांकेर, दुर्ग, कोन्डागावं, सरगुजा, कबीरधाम एवं रायपुर, मे की जाती है। छत्तीसगढ़ के कोन्डागावं, सुकमा, नारायणपुर, दंतेवाडा एवं गरियाबंद जिलो मे पुर्ण रुप से प्याज की जैविक खेती की जाती है। छत्तीसगढ़ मेे कुल 25782 हेक्टेयर क्षेत्र मे खेती की गयी थी जिससे 422867 मीट्रीेक टन उत्पादन प्राप्त हुआ।
जलवायु् – प्याज एक समशीतोष्ण जलवायु वाली फसल है। प्याज के वृद्धि विकास पर तापमान एवं प्रकाशकाल का बहुत अधिक प्रभाव पडता है। प्याज के वानस्पतिक वृद्धि के लिये 15-210 डीग्री तापमान उपयुक्त होती है तथा कंद बनते समय 20-250 डीग्री तापमान उपयुक्त रहता है। अधिक तापमान वृद्धि विकास को प्रभावित करता है। खरीफ प्याज को वृद्धि विकास के लिये 10-11 घटें एवं रबी प्याज को 12-13 घटें प्रकाशकाल की आवश्यकता होती है।
मृदा – प्याज की खेती सभी प्रकार की मृदाओ मे की जा सकती है परन्तु अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये गहरे काबर्निक पदार्थ युक्त रेतिली दोमट मृदा जिसका पी. एच. मान 6-7 तथा उचित जल निकास की वयावस्था होती है वह उपयुक्त रहती है।
खेत की तैयारी : प्याज की खेती करने के लिये खेत को पहले मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करके दो बार कल्टीवेटर या हैरो जुताई करके पाटा चला देना चाहिये जिससे मृदा भुरभुरी हो जाती है तथा नमी संरक्षित रहती है। गोबर की खाद को खेत की तैयारी करते समय मृदा मे मिला देना चाहिये। जिससे मृदा मे जल धारण क्षमता बढती है और अच्छी उपज प्राप्त होती है।
नर्सरी प्रबंधन : प्याज की नर्सरी हेतु बीजो को खरीफ मे मार्च- अप्रैल तथा रबी मे अक्टुबर- नवम्बर मे बोना चाहिये। अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिये प्याज को राईस्ड बेड मे बोना चाहिये जिसकी चौडाई 0.8 से 1 मीटर उचाई 15 से 20 से. मी. एवं आवश्यकतानुसार लम्बाई का बेड तैयार कर लगाना चाहिये। क्यारियो के बीच की दुरी 30 से. मी. रखनी चाहिये। नर्सरी तैयार करते समय आधा टन अच्छे से सडी़ हुई गोबर की खाद मिला देना चाहिये।
बीज दर एवं बुवाई की विधी
बुवाई का समय – खरीफ मे 15 मई से 15 जुन के बीच तथा रबी मे 15 अक्टुबर से 15 नवम्बर मध्य बोना चाहिये।
बीज दर – खरीफ 10-12 मे तथा रबी मे 8 – 10 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर
दुरी – पंक्ती से पंक्ती की दुरी 15 से. मी. तथा पौध से पौध 10 से. मी रखनी चाहिये।
विधी – प्याज के पौधे खरीफ मे 35 से 40 तथा रबी मे 45 से 50 दिन बाद खेतो मे रोपाई हेतु तैयार हो जाते है। प्याज की रोपाई दिसंम्बर- जनवरी मे करनी चाहिये। रोपाई के लिये स्वस्थय एवं रोग रहित पौधो का चयन करना चाहिये तथा रोपाई के समय पौधो के शीर्ष का एक तिहाई भाग काट देना चाहिये जिससे पौधे अच्छे से स्थापित हो सके।
बीज उपचार : प्याज के बीजो को बुवाई के पुर्व ट्राईकोडर्मा विरीडी 4 से 5 ग्राम प्रति कि. ग्रा. बीज दर से उपचारित करना चाहिये। इसके अलावा बीजो को 3 प्रतिशत पन्चगाव्य तथा स्युडोमोनाज 5 ग्राम प्रति कि. ग्रा. बीज दर से उपचारित करना चाहिये।
प्याज की उपयुक्त किस्मे
| किस्म | उपज कुन्तल/हेक्टेयर | अवधी रोपाई के बाद | विशेषता |
| एग्रीफाउन्ड डार्क रेड | 300 | 95-110 | खरीफ मे लगाने हेतु उपयुक्त |
| भीमा शक्ती | 250-300 | 110-115 | खरीफ या पछेती खरीफ हेतु उपयुक्त एवं झुलसा रोग हेतु रोग प्रतिरोधक |
| भीमा डार्क रेड | 200-220 | 95-100 | खरीफ मे लगाने हेतु उपयुक्त एवं बैगनी धब्बा रोग हेतु रोग प्रतिरोधक |
| भीमा श्वेता | 260-300 | 110-120 | रबी एवं खरीफ मे लगाने हेतु उपयुक्त |
| भीमा शुभ्रा | 360-420 | 110-115 | खरीफ या पछेती खरीफ हेतु उपयुक्त मध्यम भण्डारण क्षमता |
| पुसा रेड | 250-300 | 125-140 | कद लाल रंग तथा 70-80 ग्राम एवं लम्बे समय तक भण्डारण क्षमता |
| पुसा व्हाईट राउन्ड | 300-350 | 125-130 | कद सफेद रंग के गोल तथा भण्डारण क्षमता अच्छी होती है। |
उर्वरक प्रबंधन
- प्याज की जैविक खेती मे उर्वरक प्रबंधन करने के लिये 250 से 300 क्विटल अच्छे से सडे हुये गाोबर खाद, 50 कि. ग्रा नीम की खली एवं 2 कि. ग्रा ट्राईकोडर्मा विरीडी को खेत की तैयारी करते समय मृदा मे मिला देना चाहिये।
- 2 टन कम्पोस्ट खाद $ 3 कि. ग्रा. माईकोराईजा $ 1 कि. ग्रा. स्युडोमोनाज को बोड बनाते समय बुवाई के तीन दिन पुर्व खेत मे डाल देना चाहिये।
- खडी फसल मे 250 मि. ली. एजोटोबैक्टर $ 250 मि. ली. स्युडोमोनाज $ 1 कि. ग्रा ट्राईकोडर्मा को 200 कि. ग्रा. अच्छे से सडे हुये गाोबर खाद मे मिलाकर रोपाई के 30 दिन बाद डालना चाहिये।
- पन्चगाव्य और अमृतपानी को बनाकर फसल की रोपाई के 30 दिन एवं 45 दिन बाद देने से उत्पादन मे वृद्धी होती है।
सिचांई प्रबंधन : प्याज की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये सिचांई आवश्यकता है । खरीफ की फसल मे वर्षा होने पर सिचांई की आवश्यकता नही होती है परन्तु वर्षा न होने पर 7-10 दिन के अन्तराल मे सिचांई करनी चाहिये तथा रबी की फसल मे 10-12 सिचांई आवश्यकता होती है जिसे 7-10 दिनो के अन्तराल मे सिचांई करनी चाहिये।
खरपतवार प्रबंधन
प्याज की जैविक खेती मे खरपतवार एक प्रमुख समस्या है और अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये खरपतवार नियंत्रण करना आवश्यक है। समय पर खरपतवार नियंत्रण न करने पर उपज मे 26 से 48 प्रतिशत तक नुकसान होता है। प्याज के प्रमुख खरपतवार
खरीफ के प्रमुख खरपतवार – सायनोडान डैक्टीलोन (दुब ग्रास), इकाइनोक्लोवा कोलोना (संावा), साइपेरस रोटंडस (नागर मौथा), साइपेरस ईरिया (जल मौथा), साइपेरस डीफार्मिस (मौथा), इल्युसाईन इंडिका (जंगली कोदो), डेजीटेरिया सेगीनेलिस (घोड दुब), पारथेनियम हिसटायरेफोरस (गाजरधास) एवं फायलेन्थस निरुरी (हजारदाना)
रबी के प्रमुख खरपतवार – फैसालिस मिनीमा (चिरपोटी), चिनोपोडियम एल्बम (बथुआ), एमारेन्थस विरीडीस (चौलाई), कान्वोनवुलस अरवेन्सीस (हिरणखुरी), एनागेलिस अरवेन्सीस (कृष्ण नील) एवं फयुमेरिया इंडिका (पित्तपापड़ा)
नियंत्रण-
- गर्मी के दिनो मे खेत की गहरी जुताई करनी चाहिये।
- प्रमाणित बीजो का उपयोग करना चाहिये।
- स्टेल सीड बेड द्वारा खरपतवार को नियंत्रित करना चाहिये।
- हाथो द्वारा निराई करना चाहिये। प्रंथम निराई 20-25 दिनो मे व दुसरी निराई 40-45 दिनो मे करना आवश्यक है।
कीट एवं रोग प्रबंधन
रोग प्रबंधन
1. परपल ब्लोच (बैगनी धब्बा) : यह प्याज का सर्वाधिक हानिकारक रोग है इस रोग के लक्षण पौधे की पत्तियो पर बैगनी धब्बे के रुप मे दिखाई देता है। जो समय के साथ बडे़ हो जाते है और धब्बे का रंग काला हो जाता है। इस रोग के कारण पत्तिया सुख जाती है तथा फुलो की डन्डीया टुटकर मुड जाती है।
नियंत्रण
- रोग प्रतिरोधी किस्मो अरका क्लयान, अरका लालीमा, भीमा डार्क रेड को लगाना चाहिये।
- फसल चक्र अपनाना चाहिये।
2. आद्रगलन (डंपिग आफ) : इस रोग के लक्षण अंकुरण के 10-15 दिन बाद दिखाई देता है। इस रोग के कारण जमीन की सतह से लगे हुये तने मे गलन हो जाता है। जिससे पौधा गिरकर मर जाता है।
नियंत्रण
- रोग मुक्त बीजो का उपयोग बोने के लिये करना चाहिये।
- प्याज के बीजो को बुवाई के पुर्व ट्राईकोडर्मा विरीडी 4 से 5 ग्राम प्रति कि. ग्रा. बीज दर से उपचारित करना चाहिये।
- खरीफ मे पौधशाला की क्यारीयो को जमीन से उपर बनाना चाहिये।
3. झुलसा रोग- इस रोग के कारण शुरुआत मे प्त्तिया एक तरफ सफेद पीली होने लगती है और एक ओर हरी ही रहती है तथा प्रकोप बढ़ने पर भुरी होकर काली हो जाती है।
नियंत्रण-
- रोग प्रतिरोधी किस्मो अरका निकेतन, भीमा शक्ती को लगाना चाहिये।
- फसल अवशेषे को जलाकर नष्ट कर देना चाहिये।
4. भुरा विलगन रोग : यह रोग जीवाणु द्वारा होता है और इस रोग का प्रकोप समन्यतया भण्डारण के समय मे होता है। इस रोग के कारण कंदो के गर्दन वाले भाग मे सड़न होने लगता है जो बाद मे सड़कर गंध करने लगता है।
नियंत्रण-
- प्याज की खुदाई के पश्चात कंदो को उपयुक्त नमी स्तर तक सुखाना चाहिये।
- भण्डारण कम नमी व हवादार कमरे मे करना चाहिये।
कीट प्रबंधन
1. कट वर्म (कटुआ सुडी़) – इस कीट का लार्वा हानिकारक होता हैं। लार्वा रात्रि के समय मे निकलकर पौधो को जमीन की सतह के पास से काट देते है जिससे पौधा सुखकर मर जाता है।
2. हेलिकोवर्पा की सुड़ी (शीर्ष बेधक़) –
नियंत्रण-
- गर्मी के दिनो मे खेत की गहरी जुताई करनी चाहिये।
- इल्लियो को हाथ से पकड़कर नष्ट कर देना चाहिये।
- प्रकाश प्रपंज की सहायता से वयस्क कीटो को पकड़कर नष्ट कर देना चाहिये।
- हेलिकोवर्पा की सुड़ी को नियंत्रित करने के लिये एन. पी. वी. विषाणु 250 एल ई को 500 लीटर पानी मे घोलकर छिडकाव करना चाहिये।
3. थ्रीप्स – इस कीट का शिशु तथा वयस्क दोनो ही पौधो की पत्तियो से रंस चुसते है जिससे पत्तियो पर धब्बे बनते है जो बाद मे पीले रंग के हो जाते है।
नियंत्रण- थ्रीप्स के जैविक नियंत्रण के लिये लैक विग या पीरेट बग का उपयोग करना चाहिय
खुदाई – रोपाई करने के बाद प्याज की फसल 4-5 महीने में तैयार हो जाती है, लेकिन इस फसल में पत्ती खुदाई के समय में भी पीली न हो कर हरी की हरी रह जाती है। इसलिए 4-5 महिने होते ही खड़ी पर हर एक कतार पर चल-चल कर पौधे को झुकाना पडता है जिससे पौधे कि गर्दन मुड़ जाए, इसे फसल गिराना कहते हैं। फसल गिराने के करीब एक सप्ताह के बाद शल्क कन्द की खुदाई कर लेनी चाहिए।
उपज:- 180-300 ( कुन्तल प्रति हेक्टेयर)
भन्डारण – प्याज के फसल को कोल्ड स्टोरेज मे 0-50 डीग्री तापमान पर 12 माह के लिये भन्डारित करके रखा जा सकता है।










